अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

नव प्रभात सुखद रहे!

तिथि बदलती है बस
वक्त कहाँ बदलता है
वैसे ही पुराने ढ़र्रे पर
जीवन चलता रहता है!

एक सुबह का आगमन
एक संध्या की विदाई
वही पुराना सिलसिला
चक्रवत चलता रहता है!

सदियों के इस मेले में
एक वर्ष की क्या बिसात
प्रचंड अग्नि की लपटों में
जीवन जलता रहता है!

समय जो बीत रहा है
वह लौट नहीं पाएगा
अंत आखिर होना ही है
दिन ढ़लता रहता है!

बीत रहा जो वर्ष
वह दे जाए आशीष
नव प्रभात सुखद रहे
सपना पलता रहता है!

एक किरण!

चुपचाप
थाह रहे थे हम
क्या कहता है तम
इस निस्तब्धता में
क्या रहस्य
खोज पायेंगे हम!

तभी
अँधेरा हुआ कम
कुछ वाचाल हुआ तम
और सहज ही कह चला
सकल प्रश्नों का हल है
एक किरण!

किरण-
जिसका मात्र आगमन
तोड़े अन्धकार का भरम
आबद्ध हो जाये श्रृंखला
प्रमुदित हो
झूमे सकल चमन!

किरण-
जो अंक में समेट ले तम
सुनहरा करे वातावरण
और समा जाए अंतस में
तो बन जाएँ स्वयं
किरण के वाहक हम!

ऐसे ही
बनें प्रकाशपुंज हम
लिए झोली में औरों के भी गम
और गतिमान रहे जीवन
फिर रहस्य
खोज लायेंगे हम!

वक़्त हो चला है...!

कहते हुए
सुनते हुए
वक़्त हो चला है
सपने बुनते हुए
अब चलने की बारी है
गति और विश्वास साथ हों
फिर निश्चित ही
जीत हमारी है!

हँसते हुए
रोते हुए
वक़्त हो चला है
साँसे खोते हुए
अब संभलने की बारी है
बीतती हुई जिंदगी में
दो पल जी लेने की
आस्था हमारी है!

सोते हुए
जागते हुए
वक़्त हो चला है
बेवजह भागते हुए
अब समझने की बारी है
अंधी दौड़ में
यूँ शामिल होना
भूल हमारी है!

मिल जाएगा प्रेम यहीं...!

मिलते हैं धरती और गगन जहाँ
वह क्षितिज ये नहीं
प्रेम पल्लवित होता है प्रतिपल जहाँ
वह चमन ये नहीं
स्वार्थ के कांटे उग आये हैं यहाँ वहाँ
खो गयी अस्मिता कहीं
आज किसी को किसी से प्रेम नहीं!!!

मनुष्यता की सुगंध बिखरी हो जहाँ
वहाँ होते नित उत्पात नहीं
प्रेम बाँध लेता है पल में ही सबको
यहाँ कहीं कोई पक्षपात नहीं
झुक गयी है कमर हौसलों की यहाँ
खो गयी कविता कहीं
आज किसी को किसी से प्रेम नहीं!!!

मिलते मिलते मिल जायेगी मंजिल यहाँ
संभावनाओं की कोई सीमा नहीं
प्रेम अंकुरित होगा स्वाभाविक रूप से
नफ़रत ने कभी मैदान जीता नहीं
खोजते रहने से मिल जायेगी भीतर ही
खो गयी इंसानियत कहीं
मिले वह मिल जाएगा प्रेम यहीं!!!

जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!

कहते हैं-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी!

पर कुछ बातें
अटल सत्य सी
सदा उपस्थित प्रकाशवान
बहती धारा न रुकी कभी
पेड़ सदा से ही निस्वार्थ दानी!

आशीर्वाद स्वरूप
मिली जो धरा को
असीम धरोहरें
रहे उनपर श्रद्धा
हों हम भक्तहृदय आत्मज्ञानी!

पर ह्रास की
ये कैसी परिपाटी
मैला होने दिया
हा! हमने
पापनाशिनी माँ गंगे का पानी!

शाश्वत कुछ तो हो
जो दे संबल
ऐसे कैसे
चलती जाए
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!

भले ही-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी!

चलते चलते इन राहों में...!

चलते चलते
इन राहों में
दो प्रेम की बातें
कर लें!

न मिलेगा
ये अवसर फिर
एक दूजे की पीर
हर लें!

संध्याबेला आ जायेगी
विदा का सन्देश लिए
भावसुधा का प्याला
भर लें!

सहज प्रेम और भक्ति से
संभव है
हम यह भवसागर
तर लें!

चलते चलते
इन राहों में
दो प्रेम की बातें
कर लें!

समय!

वाक्य में विराम सा
विस्मृत किसी नाम सा
गढ़ता नयी कहानी कोई
समय चलायमान रहा!

कब कितने पड़ाव छूटे
कुछ हुए पूरे कुछ सपने टूटे
सारे जोड़ घटाव के बीच
समय ही बलवान रहा!

कितना प्रभु के हैं समीप
कितनी आस्था से जला दीप
आडम्बर के खेल सभी
समय सब पहचान रहा!

बीतते हैं प्रतिपल हम
लिखते हुए हैं आँखें नम
इन आत्मीय उद्गारों में
समय अंतर्ध्यान रहा!

क्या हार क्या जीत
सभी भुलावे के हैं गीत
इनकी कब परवाह उसे
समय गतिमान रहा!

वाक्य में विराम सा
विस्मृत किसी नाम सा
गढ़ता नयी कहानी कोई
समय चलायमान रहा!

संकट बढ़ता ही रहा!

कभी यहाँ कभी वहाँ
जीवन चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!

कहीं अभावों का समुद्र
कहीं समृद्धि के पर्वत
प्रकृति रहस्यमयी है
अपनी ही धुन में रत

सृष्टि के आरम्भ से
चक्र चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!

युगों का अनुभव लिए
बढ़ रहें हैं हम सतत
विकास की गति ने
न छोड़ा कुछ भी पूर्ववत

इंसानियत का पाठ
क्षीण होता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!

सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत

ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!

मेरे सपने!

अथाह सागर को
एक नन्ही सी
नाव के सहारे
नाप आये...
मेरे सपने!

विस्तार कितना है
जीवन का
सब सत्य
भांप आये...
मेरे सपने!

विशाल अम्बर पर
विचरण कर
वहाँ अपनी शब्दावली
छाप आये...
मेरे सपने!

सारी घृणा
सकल कृत्रिमता को
इकठ्ठा कर
ताप आये...
मेरे सपने!

आशान्वित हो
दुर्गम राहों को
बड़ी सुगमता से
नाप आये...
मेरे सपने!

कविता कभी ख़त्म नहीं होती...!

अनवरत चलता है
भावों का बहना
जी लिए जाते हैं
अनेकानेक शब्द
अक्षरों के मेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!

आते जाते रहते हैं
कई विम्ब
कुछ ठहर कर
ठोस हो जाते हैं
जीवन के खेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!

छन छन कर
आज भी आती है चांदनी
देने को कुछ
बेहद सजीव पल
इस रेलमपेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!

निश्चित
ज्योत जलेगी
हृदय की बाती
आकंठ है डूबी
भावों के तेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!

जीवन के उन्मुक्त गगन पर...!

बहती
चली आ रही है
अविरल धारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!

बूंद बूंद कर
बरसे बादल
हो धरती का रंग न्यारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!

बाँध कर रखना क्या
कहो सच्चा स्नेह
कहाँ कभी हारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!

हमेशा साथ ही होता है
दूर होकर भी
वो जो है आँखों का तारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!

संवेदना की
बहुत बड़ी पहचान है
बहती हुई अश्रुधारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!

सांत्वना के स्वर!

मेरे चारो ओर अँधेरे
हर पल कटु सत्य है घेरे!
स्वयं को ही दे रहे हैं सांत्वना
ये मन प्राण मेरे!

क्यूँ तेरी आँखें नम है
अरे! लोग औरों को-
उजाला इस लिए नहीं दे सकते
क्यूंकि..
उन्हें खुद घेरे हुए तम है!

उम्मीदों से
दुःख ही होगा हासिल-
जहां औरों को मुरझाता देख
खिल जाएँ लोग..
ऐसी राह में हम है!

मिल बाँट कर सहजता से
सहेज लिया जाये जीवन को-
पर ये क्या? यहाँ तो
सब अलग थलग है..
जुदा जुदा सबका ग़म है!

इसलिए अपने सिद्धांतों पर
बिना हारे चल-
विडम्बनाओं से
लड़ना ही..
जीवन में संतोष परम है!

निराशा के भंवर में
डूबना क्या-
यहाँ ऐसे ही
चलता है व्यापार..
विश्वास मात्र भरम है!

शांत है हृदय,
अब यह स्वीकार-
ऐसे ही हैं जगत के फेरे
हर पल कटु सत्य है घेरे!
स्वयं को ही दे रहे हैं सांत्वना
ये मन प्राण मेरे!

सरलता की खोज!

इस जगत के खेल
सभी निराले हैं!
ऊपर से सब स्वच्छ निर्मल
भीतर से सब काले हैं!
सत्य के मुख पर
जड़े हुए ताले हैं;
हँसना भूल गया है मन
यहाँ सब लोग..
रुलाने वाले है!
आओ सब मिल
खोजें उस सरलता को,
जो अतीत में कहीं
दफन हो गयी!
हमारे भोले-भाले बाल मन की-
कफ़न हो गयी!

नयनो में
कितने सुन्दर सपने पाले हैं!
तब भी अंधकार ही क्यूँ स्पष्ट है
और खोये से उजाले हैं!
प्रसाद के अभाव में
सूनी मंदिर की थालें हैं;
भावविहीन पूजा है
भगवन भी चकित..कहाँ गए वे
जो भक्ति का रूप सजाने वाले हैं!
आओ सब मिल
खोजें उस भावना को,
जो बिछड़ा हुआ
वतन हो गयी!
कब वाष्प बन कर उड़ गयी सरलता-
जमीं रेगिस्तान की तपन हो गयी!!

जिए गए पल!

खुले खुले
अम्बर तले..
जो दो-चार कदम
हम चले..
वही जिंदगी में
असल जिए गए पल है!
शेष सब कुछ मिथ्या
सब कुछ अनर्गल है!!

नन्हें सपनों के
आँचल तले..
जो अनुभूति के पुष्प
हम समेटते चले..
वही जिंदगी में
असल जिए गए पल है!
शेष सब कुछ मिथ्या
सब कुछ अनर्गल है!!

एक संभावित तस्वीर!

नये विचारों का
प्रादुर्भाव हो!
सहज सा
सुन्दर जुड़ाव हो!!
फिर काव्य भी होगा
और
कहानी भी..!
आंसू ही कहेंगे उसे,
जिसे आज-
लोग कह जाते हैं..
आँखों का पानी भी..!!

नया कुछ सृजित हो
निर्मल स्वभाव हो!
जीवन में
सच्चा कोई पड़ाव हो!!
फिर बात बनेगी
हृदय होगा
बिरले सपनों का मानी भी..!
आंसू ही कहेंगे उसे,
जिसे आज-
लोग कह जाते हैं..
आँखों का पानी भी..!!

रुकी रहे कबतक धारा
अब शाश्वत बहाव हो!
सबके प्रति सहिष्णुता
सहज हृदय का भाव हो!!
फिर होंगे हम
सौम्य विनीत
अद्भुत दानी भी..!
आंसू ही कहेंगे उसे,
जिसे आज-
लोग कह जाते हैं..
आँखों का पानी भी..!!

समय की धारा पर
बहती जीवन की नाव हो!
सुख दुःख की आवाजाही को
झेलने का कौतुकपूर्ण चाव हो!!
फिर तो संभव है
अंकित हो जाए
अमिट निशानी भी..!
आंसू ही कहेंगे उसे,
जिसे आज-
लोग कह जाते हैं..
आँखों का पानी भी..!!

ध्येय चाहिए!

बहती रहे कविता
सरिता की तरह
बने यह
कई लोगों के लिए
जुड़ने की वजह
मानव जीवन को
और क्या
श्रेय चाहिए!
जीने के लिए बस हमें
पावन एक
ध्येय चाहिए!!

अकेले
चले थे हम
शब्दों की
मशाल लेकर!
मिले राह में हमें
ऐसे भी लोग
जो
इस ठहराव में
स्वयं
गति की पहचान हैं;
सजाये शब्द हमने
उनसे ही
हौसलों की ताल लेकर!
इस ताल पे देखो अब
कितने भाव नाच उठते हैं
आपकी आवाज़ जुड़ी
तो कितने ही छन्द
स्वयं
कविता से आ जुड़ते हैं;
ऐसे ही चलें हम
स्वच्छ मन
और कुछ सवाल लेकर!
साथ
अनेकानेक कड़ियाँ
जुड़ती जाए
और उत्तर की भी
सम्भावना जन्मे;
स्वस्थ विचारों का
आदान प्रदान हो
समझ की
वृहद् थाल लेकर!
चलते
चलें हम
शब्दों की
मशाल लेकर!

बहती रहे कविता
सरिता की तरह
बने यह
कई लोगों के लिए
जुड़ने की वजह
मानव जीवन को
और क्या
श्रेय चाहिए!
जीने के लिए बस हमें
पावन एक
ध्येय चाहिए!!

एक बर्फीली सुबह!

आसमान के
कोमल एहसास
बरस रहें हैं धरती पर
जाने इस उजली बारिश से
क्या देना चाहता है सन्देश अम्बर!

कुछ दिव्य सी
ज्योति लिए हुए
सूर्य की किरणों से तर
चमकते रजकणों से धवल कण
आ रहें हैं धीरे से धरती पर उतर!

ठिठुर रहा है
पूरा वातावरण
बेख़ौफ़ खड़े हैं तरुवर
बहता पानी ठोस हो गया है
जम सा गया है गतिमान समंदर!

ऐसे में
ऐसी बारिश में
जहां दूर तक उजली हो डगर
आसमान कुछ कहना चाह रहा है
जैसे लेनी हो उसे धरती की पीड़ा हर!

ऐसे दृश्य
अपने प्रभाव से
कुछ लिखवाना चाहते हैं अगर
तो लेखनी तैयार है बर्फ में चलने को
अनुभूति की स्याही से निकलेगी वाणी प्रखर!

ऋतुपरिवर्तन
सुख दुःख की आवाजाही सा
सिखा रहा कि जीवन एक समर
इस चक्र के साथ यूँ घुल मिल जाना है
विचलित कर न पाए कोई भी उदास पहर!

सौंदर्य
और सन्देश लिए
पंछी लौट आयेंगे घर
खुशी खुशी बीतने दो ये मौसम
कह कह कर भावविभोर किये हुए है अम्बर!

अभी कहाँ...!

खाली पहर
फिर भी
रीता कहाँ!
बीतता जीवन
अभी है
बीता कहाँ!!

जश्न का ये दौर
अधूरा सा
लगता है
अभी हमने
मन को है
जीता कहाँ!!

ग्रंथों में
सिमट कर रह गए
उज्ज्वल चरित्र
नर में राम नहीं
नारियों में
सीता कहाँ!!

ये तो नदियाँ हैं
आकर
मिल जाती हैं गले
अथाह सागर भला
जल कभी
पीता कहाँ!!

अरे अभी और
झंझनाहट महसूसना
शेष है, पतन की
शुरुआत है ये तो
फल अभी
तीता कहाँ!!

खाली पहर
फिर भी
रीता कहाँ!
बीतता जीवन
अभी है
बीता कहाँ!!

दौड़ रही हैं एकाकी राहें...!

मन थक कर
बैठ गया है,
दौड़ रही हैं
एकाकी राहें!

सब हैं विकल
व्यथित से,
कौन भला
थामे बाहें!

कांप रहा है
कोमल हृदय,
सुन समय की
खामोश आहें!

ऐसे विचारशून्य
पल में,
अब क्या हम
जीवन थाहें!

गुजरेगी रात
तब शायद,
सूरज पुनः ले आएगा
नयी चाहें!

पर अभी तो-
मन थक कर
बैठ गया है,
दौड़ रही हैं
एकाकी राहें!

विचित्र लहर!

खुशबू का तो है
अंतहीन सफर
ठहरती है
हर दर पे वह मगर
बस एहसास की ही
अबूझी सी कहानी है,
चाहे जितना सहेज ले
गुजरता हुआ पहर!

हृदय में है
समाया हुआ जहर
सुधा की बात ही
करते हैं मगर
व्यवहारकुशलता की
आज यही निशानी है,
जाने इस दौर में चली
कैसी ये विचित्र लहर!

माना बड़ी ही
लंबी है डगर
थोड़ा विश्राम तो
कर ही लें मगर
यादों में संजो लें
कुछ जो बातें पुरानी है,
जाने फिर कब
लौट पाए इधर नजर!

प्रत्युत्तर में तू कब तक चुप रहने वाली है!

प्रतीक्षारत नयनों में
आशा की लाली है!
क्या हुआ जो दूर तक
फैली रात काली है!!

हम तुम्हें बहुत चाहते हैं,
ऐ! जिंदगी...
प्रत्युत्तर में तू कब तक
चुप रहने वाली है!
तुम्हे हंसना भी होगा
गाना भी होगा...
सुर ताल में बज रही
समय की ताली है!
सारे सितारे नयनों में
जो समा लिए...
आसमान का विस्तार
कितना खाली है!
तू झूम रही है धरा पर
तो देख...
कितना मंत्रमुग्ध सा
चमन का माली है!
मानव मस्तिष्क
जाने क्या ढूँढ रहा...
अंतरिक्ष की कैसी
परिकल्पनाएं पाली है!
हृदय अब भी तो
माटी से ही है जुड़ा...
चन्दन पुष्पों से सजी
पूजा की थाली है!

प्रतीक्षारत नयनों में
आशा की लाली है!
क्या हुआ जो दूर तक
फैली रात काली है!!

संकरी गलियों से चौड़ी सड़कों तक...!

अब तक था
मूक खड़ा
पर आज
वह
अनुभवी पेड़
बोला-
हे विचारशील प्राणियों!
कुछ पल ठहर
अपने मानव जीवन का
भान कर
ये जन्म हुआ किस अर्थ
जरा यह
ध्यान धर
और फिर बढ़ जा
संकरी गलियों से
चौड़ी सड़कों तक!
जहां जीत ही नहीं
सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!

अब तक था
मूक खड़ा
पर आज
वह
अनुभवी पेड़
बोला-
हे विचारशील प्राणियों!
कहाँ चले हो
अमृत कलश को
बिसार कर
जैसे मैं सबको छाया देता हूँ
वैसे ही, तू
निर्विकार सबसे प्यार कर
जड़ों से जुड़े रहे कदम
फिर विचरण हो
विस्तृत फ़लक तक!
जहां जीत ही नहीं
सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!

अब तक था
मूक खड़ा
पर आज
वह
अनुभवी पेड़
बोला-
हे विचारशील प्राणियों!
धरा को आने वाले
कल की खातिर तो
जरा इत्मीनान कर
कुछ परमार्थ की भी
बातें हो लें, न केवल
स्वार्थ का गान कर
और फिर बढ़ जा
संकरी गलियों से
चौड़ी सड़कों तक!
जहां जीत ही नहीं
सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!

पथिक, तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

पहले ही कदम पर
तुम नहीं कर सकते
गंतव्य के
सत्य का निर्धारण;
उस तक पहुँचने हेतु
मार्ग में
कई चढ़ाईयों को चढ़ना है
पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

दुर्गम राहों पर
असीम दुविधाएं भी घेरेंगी
संभव है
विचलित हो आचरण;
पर किसी भी सूरत में
दोष
भाग्य पर नहीं मढ़ना है
पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

कोमल एहसासों पर
आपदाएं भी चोट करेंगी
पर हो विजयी आस्था
किये हुए धैर्य धारण;
उपलब्धियों का मानक
स्वयं
अपने पुरुषार्थ से गढ़ना है
पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

पथिक
तुम्हें निरंतर बढ़ना है!

यही पूजन है!

खुले दिल से
सबका स्वागत हो
सबको स्थान मिले
हो सहर्ष दान...
विस्तार इतना हो-
जितना स्वयं
धरती आसमान...
यही पूजन है!

रहे प्रस्तुत सेवार्थ
जितनी जिसकी ताकत हो
सबके दिल हों खिले
इस अनुभूति को पहचान...
क्या गम क्या खुशी-
सब गले लगाएं
सबको अपना जान...
यही पूजन है!

बाँटीं जाएँ खुशियाँ
मौत जीवन का शरणागत हो
निर्द्वंद निर्भीक हों सिलसिले
उदित होते रहें दिनमान...
यह एहसास हो-
सब हैं एक
एक ही मालिक की संतान...
यही पूजन है!

"मैं" की लड़ाई थमेगी...!

" मेरे होने
न होने से
क्या अंतर है
पड़नेवाला!
वैसे ही तो
होता रहेगा
बारी बारी से
अँधेरा उजाला!
जिंदगी
एक पल के लिए भी
न थमेगी...
अगले ही क्षण
फिर
महफ़िल जमेगी! "

ये एहसास
जीते जी
हो जाये,
तो क्या कहना!
सुकून देगा
ठहरी हुई
संतप्त
जलधारा का बहना!
अहंकार
मिट जाएगा
"मैं" की लड़ाई थमेगी...
कुछ बादल बरसेंगे
फिर
निश्चित बात बनेगी!

आस का खग!

बर्फ की चादर
बिछी है
दूर तक राहों में
चलते चलते इनपर
हृदय कांप जाता है!

मौसम का बदलना तय था
तय थे ये काले सफ़ेद मंजर
फिर भी
आने वाली हरियाली को
आशान्वित मन भांप जाता है!

सूरज फिर से चमकेगा
फिर से धूप खिलेगी
इन विम्बों का
जीवन से
बड़ा ही गहरा नाता है!

विश्वास के सहारे
काट ली जाती हैं
दुर्गम राहें
आस का खग
अँधेरी बेला में भी गाता है!

चलते चलते ही तो सीखेंगे
सलीका चलने का
राहों में
गिरना और संभलना
हमें खूब भाता है!

कितने ही भेद छुपे हैं
मानव मन के भीतर
हृदय की गहराई
कहाँ कभी कोई
नाप पाता है!

अहर्निश चलते ही रहें
है यायावरी ही जीवन
कैसी चिंता जब हमें
राम नाम का
पावन जाप आता है!

जीवन!

धुंधले से
आसमान पर
टकटकी लगाये देखता
विश्वास है जीवन!
परिभाषा ढूँढने निकले हैं
और अपनी समग्रता में
हमारे ही पास है जीवन!

जितने इधर खड़े हैं
उन्हें लगता है,
यहाँ नहीं
उस पार है जीवन!
ये भ्रम की ही कहानी है
मृगतृष्णा का ही मिला जुला
सार है जीवन!

खोने पाने के
क्रम के बीच
नदी का सागर की ओर
प्रस्थान है जीवन!
रिश्तों को बुनते हुए
भाव औ’ भाषा का अनन्य
उत्थान है जीवन!

कहीं से विदाई
कहीं पर स्वागत
अन्यान्य कथाओं का
विस्तार है जीवन!
कोई भी भाव स्थायी नहीं
कभी जीत की खुशी
कभी हार है जीवन!

खो रही घड़ियों को
सप्रेम सहेजता
प्राणों में बसाता
प्रयास है जीवन!
परिभाषा ढूँढने निकले हैं
और अपनी समग्रता में
हमारे ही पास है जीवन!

जाने कितने मोड़...!

जीवन की
दुर्गम राह में
गाने हैं..
जाने
कौन कौन से गीत;
आने हैं..
जाने
कितने
मोड़!

चले
जा रहे हम
अनवरत..
रेत पर,
केवल
मिट जाने वाली
ही
निशानियाँ
छोड़!

कुछ छाप
ऐसे भी पड़ें
जो
अन्यान्य हृदयों की
सीमा से
हो कर जाते हों,
उन चिन्हों का
कहाँ कोई
जोड़!


सही हो
या हो गलत-
चाहे
राह कुछ भी हो
बस
मंजिल तक
पहुंचना है-
अच्छी नहीं यह बेतुकी
होड़!

मन
हो संतुष्ट सहज
परोपकार
बन जाए स्वभाव,
आये
सबके जीवन में
यह
चिरप्रतीक्षित पावन
मोड़!

जीवंत सत्य!

एक देशभक्त से हमने पूछा
बताओ तुम्हारा सपना क्या है... क्या सोचा करते हो
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करते हो

उसके रुंधे हुए गले से निकला चिरपरिचित स्वर
शरीर का मोह नहीं आत्मा है अमर
जहां हूँ वहाँ से दो कदम ही सही, आगे को बढ़ता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ

दीवारों को गिरा कर दूरियां मिटानी है
मुझे नए समाज की कहानी बनानी है
इसलिए आशा का दीप जलाये, अहर्निश चलता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ

भेद भाव की तलवारें जब मानवता को करती है लहुलूहान
एक दूसरे के सुख दुःख से जब पाता हूँ सबको अनजान
तब शून्य को निहारता, नीलगगन के तारे गिनता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ

व्यवस्था की ईटें भ्रष्ट आचरणों की नींव पर खड़ी है
स्वप्न और वास्तविकता के बीच की खाई बहुत बड़ी है
इसे पाटने हेतु, निरंतर शक्ति से बढ़कर प्रयत्न करता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ

उसकी बातें सुन हमारा मन क्रंदन कर उठा
आखिर हम भी तो इसी व्यवस्था के शिकार हैं
उस वीर की तरह अनीति देखने को लाचार हैं
फिर भी उसमें और हममें बहुत अंतर है
वह अपना सबकुछ कर देता है न्योछावर
और हम करते हैं स्वार्थ का व्यापार
हमारी भी आँखें नम हैं, पर नूर नहीं चमकता
क्यूँकि-
हम जान पर खेलने का जोख़िम नहीं उठाते!!!

जीवन के महोत्सव में...!

जीवन के
महोत्सव में
कोई जूझता अँधेरा कोना
रौशन कर आयें!

तय करने हैं
फासले बहुत
कृतसंकल्प हो अब
आलस्य दूर भगायें!

पथिकों की सहुलियत हेतु
हमारी चेतना
घर की चौखट के बाहर
एक दीप जलाये!

तन्द्रा भंग हो
जीवन के उमंग में
सजगता घुले
सहज से कुछ दृश्य सजायें!

समय के चक्र में
हैं तिरोहित सारे भाव
कुछ शाश्वत तत्व भी समाहित हों
अब तो दुन्दुभी हमें जगाये!

पथिकों की सहूलियत हेतु
हमारी चेतना
घर की चौखट के बाहर
एक दीप जलाये!

प्रश्नों में ही है निहित उत्तर!

प्रश्नों के
तिमिर व्यूह से
हमारी चेतना बन
उबारेगा,
दीप प्रज्वलित कर
हृदय में
ढ़ाल उत्तर के साँचें में
स्वयं हमें संवारेगा!

इसके लिए
संवेदनाओं के
चरमोत्कर्ष तक
जाना होगा,
इश्वर को
जानने के लिए
ईश्वरीय छवि
हो जाना होगा!

सारे उत्तर
प्रश्नों में
निहित
मिल जायेंगे,
उसकी कृपा होगी
तो
समस्यायों से हल
निकल आयेंगे!

सूर्योपासना!

विश्वास
श्रद्धा
कृतज्ञता
है उसके प्रति अपार
सूर्योपासना
है पावन त्योहार!

असीम आस्था
कठिन तप
सात्विक
है व्यवहार
दिनमणि का कृपापात्र
है सकल संसार!

तन
मन
वातावरण
हो शुद्ध, है यही सार
प्रकृति के प्रति आस्था
है जीवन का आधार!

पर्व
पूजा
प्रार्थना
हैं मानव संस्कार
पुष्पित पल्लवित इनसे
है वसुंधरा परिवार!

इन्द्रधनुष खिल जायेंगे!

मौसम आने जाने हैं
बादल छट जायेंगे
अश्रु बूंदों के बीच से
इन्द्रधनुष खिल जायेंगे!

बस कुछ पल का है विरोध
सारे भेद मिट जायेंगे
जीवन देता है अवसर
सब बिछड़े मिल जायेंगे!

इस भीड़ को एक कड़ी सा
जोड़ते चले जायेंगे
और कहीं एक कड़ी बन
इस भीड़ में मिल जायेंगे!

विशिष्ट होने की चाह कैसी
शिष्ट बुलबुलों सा खो जायेंगे
ओजस्वी शब्दों में समाहित हो
कविता में मिल जायेंगे!

मौसम आने जाने हैं
बादल छट जायेंगे
अश्रु बूंदों के बीच से
इन्द्रधनुष खिल जायेंगे!

अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं!

एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती
जुदा जुदा राहियों को मंजिल है मिला देती!

चलते हुए कितने ही दीप जलते हैं
सुन्दर सपने.. हृदयों में पलते हैं
साझे सपनों का इन्द्रधनुष है खिला देती
अठखेलियाँ करती हवा लौ को है हिला देती!

वसुधा की गोद में क्या क्या खेल चलते हैं
समय निर्धारित है अवसान का.. फिर भी हम मचलते हैं
क्षणिकता के सौंदर्य को कीर्ति है दिला देती
जलती हुई दीपमालिका बुझी आस है खिला देती!

यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं
गंतव्य स्पष्ट हो तो संकल्पशक्ति जीत है दिला देती
जिजीविषा मुरझाती कली को भी है खिला देती!

जुदा जुदा राहियों को मंजिल है मिला देती
एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती!

दीपों के मद्धिम प्रकाश में...!

आवाजों की गूँज में
मौन की भाषा पहचानी जाये!
दीपों के मद्धिम प्रकाश में
अदृश्य सी दुनिया ज़रा जानी जाये!

बाहर ही बाहर भागता जीवन
अन्दर थोड़ा प्रवेश करे
इस आपाधापी से दूर
कुछ तो अतिविशेष करे
जिससे समृद्धि का पुष्प
हृदयांगन में भी खिले
ऐसी हो सुषमा जैसे क्षितिज पर
हों धरती और गगन मिले
तमाम कल्पनाओं को तो
टिमटिमाती लौ में ही हैं आकार मिले
जीवन की राहों में
सकल भाव साकार मिले

दीपों के मद्धिम प्रकाश की
महिमा सहज ही मानी जाये!
आवाजों की गूँज में
मौन की भाषा पहचानी जाये!

फिर मने दिवाली...!

निर्वासन भोग कर
लौट आये प्रभु
तो मनी दिवाली
दीपों वाली!!!

आज हैं हृदयांगन
से निर्वासित वो
आनन है खाली!
ये कैसी दिवाली!!!

मन मिले नहीं हैं
दरिद्रता से है ग्रस्त
चमन का माली!
ये कैसी दिवाली!!!

कुसंस्कारों से
जूझते मन प्राण
खोयी हुई लाली!
ये कैसी दिवाली!!!

स्वार्थ के कारागार में
कैद है आत्मा और
जिद है हमने पाली
ये कैसी दिवाली!!!

पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!

दिया और बाती!

दिया और बाती
का संयोग
जगत की
सबसे
अनुपम घटना है!

प्रज्वलित
हो जाये जो
फिर तो
अन्धकार को
निश्चित हटना है!

संयुक्त हो
दीप
अपनी बाती से
जीवनपाठ
अकेले नहीं रटना है!

अब घटित हो
जो न हुआ अबतक
प्रगट हो जाये
अब, जो अबतक
केवल कल्पना है!

दिया और बाती
का संयोग
जगत की
सबसे
अनुपम घटना है!

ये अब जाने कौन!

बर्फ की
परतों के नीचे
दबी होती है..
ज्यूँ
पतझड़ में गिरी पत्तियां,
वैसे ही
मन की तहों में
दबे होते हैं
विचार..
कवितायेँ और
अनेकानेक तथ्य;
जब
प्रकाशित होना हो
उन्हें,
तो सारी तहें
हो जाती हैं गौण!
और
कविता बोल पड़ती है,
हो जाते हैं हम मौन!
कैसे आई
कहाँ से आई
ये अब जाने कौन!

जितने हों
दीप रौशन
राहों में..
जितनी
प्रखर हों शक्तियां,
उतनी ही कंटकाकीर्ण
होती हैं राहें
कठिन होते हैं
इम्तहान..
क्लिष्ट होता है
जीवन का आत्मकथ्य;
संवारती है
कष्ट देकर नियति हमें,
जलता है
तभी तो
विशिष्ट है दीप गौण!
स्पष्ट है
उसका संघर्ष
सारे कष्ट क्लेश मौन!
अपरिमेय प्रकाश के
आलोक में कितनी दिव्यता
ये अब जाने कौन!

दीप और इंसान!

ऊँचे पर्वत पर है जो दीप
अपनी लौ के कारण
बड़ी दूर से नजर आता है!

जलती है बाती
अन्धकार को भेदना
उसे खूब भाता है!

अपने उज्जवल प्रकाशवृत्त
की महिमा से सबका
वह आत्मीय बन जाता है!

दूर से आने वाले
अनजाने राही का मन
लौ संग गीत गाता है!

...............

यह माटी की काया भी
जो रौशन हो सत्कर्मों से
तो दीप सा जगमगाएगी!

जले जो सद्भावों की लौ
तो खिल जायेगा चमन
रौशनी दूर तक जाएगी!

औरों के दुःख से रोये
ऐसे अश्रुविग्लित नयनों की
सुषमा मुस्काएगी!

अनंत आत्माएं श्रृंखलाबद्ध हो
गीत प्रेम के गाये तो
दीपावली रोज़ हो जाएगी!

हमारे ही अन्दर है भगवान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

अकेले नहीं
जल सकता दीप,
जबतक
बाती न हो समीप;
दिया और बाती का संयोग
है वरदान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

सामना करती है
सहजता से डटकर,
नहीं आई है वह
कोई कृत्रिम पाठ रटकर;
अँधेरे से लड़ती हुई
लौ का संघर्ष है महान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

माहौल प्रकाशित हो
जलना जरूरी है,
सुवासित होने की
सम्भावना फिर पूरी है;
संघर्षरत भाव ही तो हैं
जीवन की पहचान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

घर बाहर सब दिव्य
रौशन हो,
हर कोने में उल्लास का
मौसम हो;
जगमग हो दिवाली
हो हर्षित हर इंसान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

यहाँ वहाँ
क्या ढूंढ रहे हो,
सच से
आँखें मूँद रहे हो;
सोयी आत्मा जागे
हमारे ही अन्दर है भगवान!

माटी की काया में जगमग प्राण!
सुन्दर है दीपश्रृंखला का विधान!!

कविता का प्रादुर्भाव!

जैसे झरने से झरता है जल
समय की धारा में जैसे बहते हैं पल
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!

होते हैं जब शब्द विकल
बाँधने को वेदना सकल
तब घास पर, ओस की बूंदों सी
मिल जाती है कविता!

खिलता है जब कोई कमल
कल्याणार्थ पीता है जब कोई गरल
तब आस का अमृत पीकर, मानों
जी जाती है कविता!

ठोस पत्थर भी हो जाते हैं तरल
ये सच है.. जीना नहीं सरल
इस उहापोह में, मूंदी पलकों के बीच
खो जाती है कविता!

कठिन प्रश्नों के ढूँढने हैं हल
आज सृजित होने हैं आनेवाले कल
इस निश्चय की ज़मीन पर, सहजता से
खिल जाती है कविता!

जैसे झरने से झरता है जल
समय की धारा में जैसे बहते हैं पल
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!

वे आँखें आज भी नम है!

कितनी वेदनाएं
उलझी हैं दामन में
कितना कुछ सहा है
सदियों के आवागमन ने
कितनी संतप्त हैं
जिन्दगानियाँ
धरती पर फैली
चहुँ ओर परेशानियाँ
लेकिन जाने कैसे
इन सब को
कर परे
हमें समृद्धि का हुआ भ्रम है
धरती से दूर
चाँद की दूरी नापने का मन है!

जबतक न हो स्थापित
सुख समृद्धि का साम्राज्य
हर एक को हो
मूलभूत सुविधाएँ प्राप्य
तब तक कैसे कोई
आसमान में विचर सकता है
वसुंधरा पर रेंगते कीड़े सदृश इंसानों का
भविष्य यूँ कैसे संवर सकता है
आशा लेकिन कायम है
राहें बन कर रहेंगी
इसके लिए
ये ही प्रमाण क्या कम है
पथरा जाना चाहिए था जिन्हें
वे आँखें आज भी नम है!

संरचना!

एक सपना
आज हो गया
चकनाचूर
निर्जन...
अकेले
सभी से दूर


वर्षों से
हमारी आखों में
बसा वह सपना
सच होते होते
रूठ गया
एक सपना
फिर टूट गया


स्वस्थ्य समाज की
संरचना
का स्वप्न
अंधकार पर
प्रकाश की जीत
का स्वप्न
वास्तविकता के कगार पर
जाकर लौट गया
एक सपना
फिर टूट गया


उसी पल...
हमने
टूटे हुए
सुनहरे स्वप्न
को समेटा
उसे
देने को
उचित आकार
तत्क्षण ही
शुरू हो गए
हमारे अनवरत प्रयास
अब नहीं होगा
जीवन मूल्यों में ह्रास
फैलेगा एक नूर
अब नहीं होगा
हमारा सपना चकनाचूर


एक सुगठित समाज की
संरचना का स्वप्न
ग़र फिर धराशायी होगा..
तब भी हम
घुटने नहीं टेकेंगे
नया ताना-बाना बुन कर
निकल पड़ेंगे
एक और
नया प्रयास
जरूर करेंगे


जब तक है
जिजीविषा...
तब तक
रहेगा जीवन
और
जब तक
है जीवन
तबतक
जन्म लेती रहेंगी
असंख्य संभावनाएं
शक्ति का अभ्युदय होगा
शांति की होगी स्थापना
परिवर्तन होगा,
जो मुट्ठी भर ही सही...
मगर
सच्चे लोगों के
प्रयास का फल होगा
और
स्वप्न से
वास्तवीकता तक के सफ़र को-
विराम मिल जायेगा!!!

सर्वव्यापी सूर्य!

आसमान के
दायरों में कैद नहीं,
सुबह बन
धरती पर प्रतिदिन
उतर आता हूँ मैं!

सूरज हूँ
जीवनदायी हैं किरणें मेरी,
आस विश्वास बन
शाम की उदासी में
बिखर जाता हूँ मैं!

मिटती है भले रौशनी
और छाता है अन्धकार,
पर क्षणिकता का सौंदर्य बन
डूबने के बाद हर रोज
संवर जाता हूँ मैं!

मुझे भी छाँव चाहिए
लाँघ सभी फांसलों को,
दिखे जो सुहाना दर कोई
तो वहाँ घड़ी दो घड़ी
ठहर जाता हूँ मैं!

आसमान के
दायरों में कैद नहीं,
सुबह बन
धरती पर प्रतिदिन
उतर आता हूँ मैं!

इंसानियत का आत्मकथ्य!

गुजरती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आये
कितने ही दलदल
पर
झेल सबकुछ
अब तक
अड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

अट्टालिकाएं
करें अट्टहास
गर्वित उनका
हर उच्छ्वास
अनजान
इस बात से, कि
नींव बन
पड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

देख नहीं
पाते तुम
दामन छुड़ा
हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे
बिसार दूं
इंसानियत की
कड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

जब जब हारा
तुम्हारा विवेक
आये राह में
रोड़े अनेक
तब तब
कोमल एहसास बन
परिस्थितियों से
लड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

भूलते हो
जब राह तुम
घेर लेते हैं
जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर
होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका
छड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

मैं नहीं खोयी
खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो
इंसानियत हो तुममें मौजूद
फिर धरा पर ही
स्वर्ग होगा
प्रभुप्रदत्त नेयमतों में, सबसे
बड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

जिंदगी क्या चीज़ है!

स्कूल के अंतिम दिनों में रचित एक कविता ...करीब १० वर्ष बीत गए हैं अब, पर आज भी याद आई तो नयी सी ही लगी!!!

बीत जाती है जब
तब
पता चलता है
जिंदगी क्या चीज़ है!
टूटने लगती है जब
साँसों की डोर
तब एहसास होता है
वह
कितनी अज़ीज है!

जब घिरे हुए हों अंजानो से
तब पता चलता है
पहचाने चेहरों
के बीच होना क्या चीज़ है!
जगह छूटती है
तब एहसास होता है
अपने आसमान तले
अपनी ज़मीन
कितनी अज़ीज है!

दुःख से भारी हो मन
तब पता चलता है
मुस्कान का
खिल आना क्या चीज़ है!
आँखों में जो बूंदें है
उनका एहसास
हमें तमाम
खिलखिलाहटों से भी
अज़ीज है!

जब वेदनाएं
प्रबल हो उठती हैं
तब पता चलता है
बंदगी क्या चीज़ है!
हाथ जोड़े
घुटनों के ब़ल बैठ
"उसकी" आराधना में लीन-
ये छवि
चेतना को
सबसे अज़ीज है!

जब ये हवाएं
सबकुछ
सुखा ले जाती हैं
तब पता चलता है
पाँव तले
घास की नमी क्या चीज़ है!
जब रोने का मन हो..
तो, रो लेना दोस्तों
हंसने की कोशिश में
रोये जा रहे हैं हम,
ये सोच,
कि अपनी तो है,
पर-
हर मोड़ पे जिंदगी
कितनी जुदा-जुदा
कितनी अजीब है!

बीत जाती है जब
तब
पता चलता है
जिंदगी क्या चीज़ है!
टूटने लगती है जब
साँसों की डोर
तब एहसास होता है
वह
कितनी अज़ीज है!

ऐसी एक शाम आये...!

भीड़ में
बीत रही है जिंदगी,
अपनी मुलाकात
खुद से हो
ऐसी एक शाम आये...

कोई लिखता नहीं अब
पर फिर भी चाहे मन,
सुन्दर भावों से
सुसज्जित एक पत्र
जिंदगी के भी नाम आये...

सहेजते हैं कितने ही
कहे अनकहे आशीष,
सारी शुभकामनायें
सकल प्रार्थनाएं
दुर्गम यात्रा में काम आये...

भटकते हैं
मन के अंधियारों में,
पार कर निर्विघ्न सब
पहुँचें गंतव्य तक
अनूठा उज्जवल धाम आये...

बहुत उत्पात
मचा लिया रावण ने,
अब तो आतंरिक संघर्ष में
हो धराशायी वह
शुभसंकल्प सा हृदय में राम आये...

भीड़ में
बीत रही है जिंदगी,
अपनी मुलाकात
खुद से हो
ऐसी एक शाम आये...

एक अंतहीन मौन!

रह जाता है
एक अंतहीन मौन!

इंसान
चला जाता है
मगर
अपने पीछे
छोड़ जाता है
अनगिनत यादें
अपार शून्य
असह्य वेदना
और
एक अंतहीन मौन

जिंदगी
चलती चली जाती है
लांघते
अनगिनत फासले
पार करते हुए
कई पड़ाव
और
अंतिम क्षण में
हो जाती हैं
सारी बातें गौण

चक्र यह
यूँ ही चलता है
राही राह बदलता है
रह जाती हैं राहें
चलने वाला तो
चल ही देता है;
पूर्वनिर्धारित
इस घटनाचक्र का
जाने
है नियंता कौन

रह जाता है
एक अंतहीन मौन!

एक बूंद जो बिछड़े सागर से...!

एक बूंद जो बिछड़े
सागर से,
तो सागर
कुछ नहीं खोता है;
पर जो सागर है
बूंद बूंद से ही तो-
वो सागर होता है!
तुम्हें
एक कदम बढ़ाना है,
मैं भी-
अपनी शक्ति भर चलूंगी,
छोटे-छोटे प्रयोगों में ही
वृहद् सत्य
उजागर होता है!

हर इकाई की
अपनी महत्ता है,
तलवार से
किसी मायने में
कम नहीं,
भले ही
नन्ही सुई का
अस्तित्व छोटा है!

याद करें वो दोहा
जिसमें-
रहीम ने गाया था
बड़े को देख
लघु को न बीसारें
ये मर्म बतलाया था;
सुई का काम
तलवार नहीं कर सकती!
नदियों के बिना..
धारों के बिना..
परिष्कारों के बिना..
शब्द सरिता
नहीं झर सकती!

इसलिए,
महत्व सबका है
ये स्वीकारना होगा!
हमें
अपने हिस्से का
कर्त्तव्य
जी कर दिखलाना होगा!
तब
बात बदलेगी!
बहस के आगे
सरल कर्मों की
ज्योत जलेगी!

चलो..
अब चलना शुरू करें
देखें..
आगे क्या होता है!
हर इकाई की
अपनी महत्ता है,
तलवार से
किसी मायने में
कम नहीं,
भले ही
नन्ही सुई का
अस्तित्व छोटा है!

एक बूंद जो बिछड़े
सागर से.......
.............

पंछी आयेंगे...!

पेड़
राह देखते हैं,
पंछियों का-
पंछी आयेंगे...

वे गुनगुनायेंगे
मधुर स्वर-
गीतों का लेकर
शांत निर्जन राहों को,
जीवन दे जायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

वीरान पड़ी डाली
फिर से
आबाद होगी
वो नीड़
यहाँ बनायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

मौसम बदलेगा
बहार फिर आएगी
धरती की खातिर
नीलगगन का
संदेशा लायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

ये समय
निकल जायेगा
उदास पलों से मुक्त कर,
सहेजी खुशियाँ
दे जायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

ओस बन
कोमल पंखुड़ियों पर
आशा की
किरणों संग
झिलमिलायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

दिए तो जल रहे हैं
रौशन हो
दिल का भी अँधियारा
फिर कोई शाश्वत-
दिवाली मनायेंगे!
पंछी आयेंगे!!

पेड़
राह देखते हैं,
पंछियों का-
पंछी आयेंगे...

रास्ते का पत्थर!

रास्ते औ'
रिश्ते की
बात करें!
थोडा चलें..
चलते हुए
आज रात करें!
चले जो राह पकड़े हम
मिटते रहे कितने ही भरम
हमने जाना
मोड़ से आगे तक
राहें जाती हैं!
हमारी चेतना
बेवजह
निराश हो
आधी राह से
लौट आती है!
चलते जाने से ही
हल
निकलेगा!
संवेदना जागृत होगी..
पत्थर का भी
हिय
पिघलेगा!

हाँ,
पत्थर से याद आया,
रास्ते में
एक पत्थर था पड़ा हुआ
जाने
कब से था
वह
वहाँ अड़ा हुआ
आने जाने वाले राही
किनारा कर
निकल जाते थे
तो कुछ
ठोकर खा
संभल जाते थे
बीचों-बीच
पड़ा वह पत्थर
हर बार
आशा खोता था!
उसके लिए स्वयं
राह से
हटना भी कहाँ मुमकिन
वहाँ पड़ा
वह
ह़र चोटिल राही के दुःख से
रोता था!

जरा सा हाथ लगा कर
हमने
पत्थर को
किनारे कर दिया!
कोई गुजरा पास से हमारे
उसकी मदद से
हमने
वह भार उठा
किनारे को धर दिया!

फिर वेदना से सिक्त हिय ने
पत्थर की बात सुनी
पत्थर के उदगार सुने
कुछ बात गुनी-
"सिर्फ एक सोच-
एक चाह चाहिए
रास्ता खुद बन जायेगा,
बस दृढ़ता को
एक ठहराव चाहिए
मेरे बाद भी
कोई आएगा
बेचारा अनजाना
शायद ठोकर खाएगा
इसलिए
समस्या का
निदान करता चलूँ
आने वाले के लिए
राह कुछ
आसान करता चलूँ-
इतना सोचे बिना
जो आगे बढ़ गया
वह आगत
सभी
सुखद संभावनाओं को
दगा दे गया"

ये थे
पाषाण हिय के
उदगार!
आँखों में
नमी की कमी
रुला रही थी बारम्बार!
आश्चर्य!
चारों ओर
संवेदनहीनता
है छायी!
ऐसे में
पत्थर का हिय सोचा
संवेदना की
ज्योत जलायी!

सच!
है पात्रता
तभी तो
चोट वह खाता है
नियति द्वारा
क्या खूब
तराशा जाता है
और उसी पत्थर का अंश
मूर्ति की आत्मा हो जाता है!
खो कर अपना "निज"
पत्थर देवरूप बन जाता है!
.....देवरूप बन जाता है!

भावों की धरती... अब भी उर्वरा है!

अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!

बादलों से
आच्छादित
है भावविभोर अम्बर,
और
सत्यनिष्ठ
सहनशील धरा है!

विडम्बना ही है-
अंतर अकालग्रस्त
और बाहर,
कृत्रिम संसाधनों से
सज्जित
सबकुछ हरा भरा है!

मानवीय क्रियाक्लापों के
कितने दूरगामी
हैं प्रभाव,
इससे अनभिज्ञ..
कलयुगी चेतना ने
कृत्रिमता को ही तो वरा है!

चलता ही रहता है शोरगुल
खामोशी..
बोल न पाती है,
हमने खोये हैं मनभावन शब्द
भावों की धरती तो
अब भी उर्वरा है!

अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!

पेड़ अद्भुत दानी है!

पेड़ की व्यथा, मानव हृदय की ही तो व्यथा है.... वातावरण के प्रभावों को झेलते हुए आखिर उसके मन में भी तो आता होगा कि बिना उससे हरेपन की उम्मीद लगाये कोई उसे स्नेहपूर्ण छाँव दे, उसकी सूखी डाली पर आस का पंछी गाता रहे, ऐसी कोई व्यवस्था हो नियति के द्वारा..... कौन जाने!

चिर प्रतीक्षा
में लीन,
हृदय के उदगार!
पेड़
अद्भुत दानी है,
करता ही रहा उपकार!

स्थिरचित्त क्या डिगेगा
जगत करे
कुछ भी व्यवहार!
कालचक्र की क्रूरता असह्य,
अब भी
पेड़ से है दूर बहार!

धैर्य की
और कितनी परीक्षा होगी,
कब तक करे वह इंतज़ार!
पर अविचलित
अटल खड़ा वह,
आस की महिमा है अपार!

देख रहा है जाने कबसे
आने-जाने वाले
राही भिन्न प्रकार!
छाँव देते दिल बहलाते
सह रहा,
कितने ही निर्मम प्रहार!

फिर भी
अविचलित,
करता ही रहा उपकार!
शायद कोई सहृदय
साथ हो ले
हो जाये स्वप्न साकार!

दुनिया में सहृदयता
अब भी शेष है
है कुछ बातों में सार!
प्रमाणित हो यह, जब-
पेड़ को बिना शर्त
मिले वसुधा का प्यार!

कोई तो समझे
पेड़ की व्यथा को
इतना कृतघ्न क्यों है संसार!
पेड़
अद्भुत दानी है,
करता ही रहा उपकार!

जीवन संगीत!

जीवन की
विचित्र
ही है रीत!
दुःख दर्द ही जैसे
हों मानव के
सच्चे मीत!
सौहार्द प्रेम की
अनोखी
पहचान लिये,
अधरों पे खिला
मनामोहक
एक गीत!
मेरे दामन में
एक
फूल था केवल,
कैसे बनती माला
कैसे
एकाकी होती जीत!
तभी सहृदयता का
पावन
स्पर्श हुआ,
साथ हो चली
अन्जान विम्बों से
स्फुरित होती प्रीत!
संबंधों का सार छुपा है
साथ बढ़ते
क़दमों में,
अब भी
सांस लेते हैं
कुछ रिश्ते पुनीत!
अविरल बहती धारा में
प्रतिपल
मुखरित जीवन संगीत!

इंसानी फ़ितरतों में घुला इतना जहर क्यूँ है!

जिंदगी तन्हा तन्हा,
इस कदर क्यूँ है
सब हासिल,
तो भटकता मन..
दर बदर क्यूँ है!

खो गयी बीते शाम ही
सारी खुशबू,
पंखुड़ियों का-
ऐसा क्षणिक..
सफ़र क्यूँ है!

आसमान छत है
और जमीन ही ठिकाना है,
ठिठुरती रूहों पे-
बरपता..
ऐसा कहर क्यूँ है!

झूम रही हैं लताएँ
जाने किस ख़ुशी से,
मेरे आँगन में-
ठहरा..
ये उदास पहर क्यूँ है!

सुना है फैली हुई
अमन की बस्ती है यहाँ,
नफरतों के लिए-
बदनाम..
फिर ये शहर क्यूँ है!

हर आँख में पानी
रोता हुआ हर दिल,
फिर पास से गुजरता-
सूखा..
ये नहर क्यूँ है!

हर पल
हार ही तो रहें हैं जिंदगी,
फिर बेवजह-
जश्न की..
ये लहर क्यूँ है!

हवाओं में
गाते परिंदों की ताने घुली है,
इंसानी फ़ितरतों में-
घुला..
इतना जहर क्यूँ है!

जिंदगी तन्हा तन्हा,
इस कदर क्यूँ है
सब हासिल,
तो भटकता मन..
दर बदर क्यूँ है!

कृतज्ञ लेखनी!

मेरी क्या बिसात थी..!
कविता ने
मेरा वरण किया..
जब नीरवता में खोयी-
चेतना को घेरे हुए
काली रात थी..!!
मेरी क्या बिसात थी..!

शब्द
थिरकने लगे-
कहीं से
हो रही
स्नेहमयी बरसात थी..!!
मेरी क्या बिसात थी..!

मेरा कुछ भी नहीं..
केवल
प्रेरणा का प्रताप है-
प्रेरक हौसले की ही
यह सौगात थी..!!
मेरी क्या बिसात थी..!

शब्दों ने
व्यक्त होने को
मेरी लेखनी चुनी,
स्याही धन्य, आज-
कोई अनन्य सी बात थी..!!
मेरी क्या बिसात थी..!

एक सुखद परिवर्तन हो!

ज्ञान चक्षु से
दृश्य का अवलोकन हो!
आशा का दीपक जलता रहे,
यही हृदय के भावों का प्रयोजन हो!!


ये विस्मरण का दौर है-
हम भूल रहे है अपनी संस्कृतियों को
नवीनता के साथ-साथ,
गौरवपूर्ण मूल्यों का भी संवर्धन हो!!


आने वाली सन्ततियाँ-
इस युग को भी नमन करे
इस युग के हम कर्णधारों द्वारा,
ऐसा भी कुछ समायोजन हो!!


जीवन भर लगी रहेगी-
दिवा-रात्रि की आवाजाही
तन्द्रा भंग हो..कुछ लोग तो जागें,
आज संध्या से पहले एक सुखद परिवर्तन हो!!


ज्ञान चक्षु से
दृश्य का अवलोकन हो!
आशा का दीपक जलता रहे,
यही हृदय के भावों का प्रयोजन हो!!

सत्य की ओर!

तोतली बोली का बयान
क्या कहेगा कविता
कोई मुझ सा अनजान!
पर फिर भी,
अगर सम्भावना नजर आती है
मुझमें कविता के प्रस्फुटन की-
आस दिख जाती है
तो, ईश्वर कृपा से..
तुलसी मीरा के देश की
यह बिटिया,
किसी छंद में
उतार लाएगी-
सकल दिव्य रश्मियाँ,
उस प्रकाश से
आलोकित होगी शाम!
आखिर तो,
अंतिम सत्य है ही राम नाम!
बड़े सत्य की
मंजिल तक पहुँचने हेतु-
पार करते हैं,
कितने ही छोटे-छोटे सत्यों के-
ताल..तलैया..नदिया..सेतु,
तब जाकर बात प्रगट हो पाती है!
परम सत्य के दिग्दर्शन से-
स्वतः
यात्रा की सारी थकान
मिट जाती है!
ऐसा अद्भुत संयोग
हम सबके जीवन में आये..
बुझने से पहले
लौ एक बार अवश्य,
माहौल प्रकाशित कर जाये..
तो..ही ये जीवन सार्थक है!
अपनी-अपनी चाल से
सब बढ़े सत्य की ओर-
हम स्वयं ही
अपनी राह रोके खड़े हैं..
कोई और नहीं बाधक है!!

दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!

दोस्ती अत्यंत सुन्दर रिश्ता है...सखा भाव में ही तो सारे भावों की धाराएँ आकर तिरोहित हो जाती हैं! एक द्वन्द से घिरी कविता.., जो रिश्तों को दोस्ती का नाम देना तो चाहती है पर ठिठक जाती है! स्वार्थ के रिश्तों को आखिर दोस्ती का नाम कैसे दे दिया जाये...; दोस्ती तो कृष्ण-सुदामा के अद्भुत रिश्ते को ही कहते हैं! है न....

दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
कृष्ण-सुदामा की
अद्भुत मैत्री की झाँकी
कहाँ मिलेगी आज...
उस भाव से भिन्न
अगर है कुछ,
उससे,
कमतर अगर है कुछ,
तो-
उसे दोस्ती-
कैसे कह दी जाये?
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
जो दिव्य प्रतिमान
हैं विद्यमान
उनके अनुरूप कहाँ हैं
संबंधों की गरिमा...
कहाँ शुद्ध है हमारा आचरण,
संवरे न विचार
सरल न हो हृदय
तो-
शब्दों के व्यूह मात्र को-
प्रार्थना कैसे कह दी जाये?
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!

ऐ जिंदगी! हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

तेरी राह के काटों को
तहे दिल से स्वीकारा है..
तेरी बेबसी को हौसले के साथ जिया है
तेरा हर रंग हमे प्यारा है..,
तमाम विरोधाभाषों के बावजूद-
सपनों के अम्बर पे
इन्द्रधनुष सा खिलते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

हर ओर छिड़ी है
स्वार्थ की लड़ाई..
क्यूँ है ये विरोध
क्यूँ रूठा है भाई से भाई..,
इस वेदना से तड़पते हुए-
अश्रु बूंदों को दृगों से
नित ढ़लते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

कभी कुछ तो कभी कुछ और में
उलझा हुआ..
वक़्त की मार झेलते हुए
कुछ कुछ झुका हुआ..,
बढ़ते हुए अनजान क्षितिज की ओर-
धूप-छाँव का खेल
निरंतर चलते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

कई उद्देश्य हैं
हासिल करने को..
कोई नहीं है
हृदय की पीर हरने को..,
ऐसे में चाँद तारों की परवाह किये बिना-
एक नन्हे फूल को
अपने आँचल में समेटते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

भागते समय की
धार पे..
किसी शाम को
बैठ किसी किनार पे..,
आशा-निराशा का ताना-बाना बुनते हुए-
दिवस भर का...जीवन भर का
आंकड़ा जोड़ते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

लोग रिश्तों का
दम भरते हैं..
साथ और प्रेम की
व्याख्या करते हैं..,
मगर श्मशान की नीरवता में-
मरने वाले के साथ
कहाँ किसी को मरते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

हर दिवस के बाद
सांझ का आना..
और सांझ का
रात्री में परिवर्तित हो जाना..,
कई बार चलते हुए राहों में-
हमने "राम नाम सत्य है" को
उच्चरित होते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

हमारी बाहें थाम
सत्य का दिग्दर्शन कराना..
थकी हारी आत्मा के लिए
तू संजीवनी बन जाना..,
घोर निराशा के अन्धकार में-
अद्भुत ज्योति सा
खिलते देखा है..
ऐ जिंदगी!
हमने तुम्हें बड़े करीब से देखा है!

कविता कोश को मेरा शत शत नमन!

कविता कोश(www.kavitakosh.org)से मेरा परिचय कुछ दिनों पूर्व हुआ.... यह बड़ी ही सुन्दर परिकल्पना के तहत सृजित है; इसके संस्थापक बधाई के पात्र हैं.... निस्वार्थ भाव और सच्ची निष्ठा से ही ऐसे यज्ञ संभव हैं!
कुछ पंक्तियाँ इस अमूल्य धरोहर के प्रति:-

सकल काव्य पुष्पों का सार्थक संचयन!
कविता कोश की परिकल्पना को नमन!!

असंख्य मोतियों को पिरो कर
बनायी एक माला!
साहित्याकाश पर चमकता हुआ
सात्विक श्रम का उजाला!
ये अक्षय अमित
आशाओं की कहानी है!
"कविता कोश"
अद्वितीय संकल्पों की निशानी है!

जुड़ते रहें स्तम्भ, लगी रहे लगन!
कविता कोश को मेरा शत शत नमन!!

जो कह जाते हैं.. सब अनायास है!

स्वयं से ही प्रश्न करती और स्वयं ही उत्तर तलाशती कविता:-

क्या गम है तुम्हें,
क्यूँ तेरी कवितायेँ उदास हैं?

इतने आशीष..
इतनी सुखद संभावनाएं,
सब तो तेरे पास है!

तुम्हें खो जाना चाहिए..
सुनहरे प्रेमपूर्ण छंदों में,
तेरे क़दमों तले कितनी नर्म घास है!

क्या गम है तुम्हें,
क्यूँ तेरी कवितायेँ उदास हैं?

.............................

क्या कहें..
क्यूँ शब्द उदास हैं!

क्या दे इसका उत्तर कविता,
जब उसके पास केवल..
चन्द लम्हों की ही सांस है!

पास घिरे बादल हैं,
और कितने ही पहचाने..
अपने से, विम्ब उदास हैं!

धरा की गोद में,
प्रतिपल खेलती है विडम्बनायें..
राम के प्रारब्ध में वनवास है!

फिर, कैसे हँसे कविता,
हाँ, आशान्वित ज़रूर है वह..
गाती गुनगुनाती उसकी आस है!

क्या कहें..
क्यूँ शब्द उदास हैं!

सिर्फ मुस्कराहट ही होनी थी,
जिस डाल की पहचान..
उसके हिस्से में खंडित प्रकाश है!

जग में क्यूँ ऐसे वितरित हैं,
अन्यायपूर्ण विधान..
विधि! यह तो तेरी शक्ति का उपहास है!

असमय मुरझाई,
कलियों का अनकहा दर्द..
चमन के पास है!

नहीं व्यक्त होती हैं,
सायास भावनाएं..
जो कह जाते हैं.. सब अनायास है!

क्या कहें..
क्यूँ शब्द उदास हैं!

एक आशान्वित परिकल्पना!

कुछ बातें हैं,जो कविता की आत्मा होती हैं; अपनी निराशाओं..अपनी टूटती अभिलाषाओं को देख..टूटते मन को सँभालने का प्रयास ही तो है कविता..
औरों को समझाने का बहाना लेकर खुद को ही समझाने और टटोलने का नाम ही तो है कविता..! कुछ दिन हुए एक रचना पढ़ी थी- रंगों जैसे लोग की तलाश में कवि ने सारी मार्मिकता को जैसे पिरो डाला था; सच अब लोग रंगों से नहीं होते .... मिल कर भी कहाँ मिलते हैं..व्यस्तता के बीच समय कहाँ है जो रंगों की बात की जाए..रंगों सा हुआ जाये! पर जाने कैसे रंगों जैसे लोग... नहीं होते के भाव से हमारी चेतना रंगों की तरह कैसे मिल गयी और हमने लिखी एक कविता इस भाव के साथ, कि भले न होते हों रंगों से लोग अब..लेकिन क्यूँ ये आस छोड़ी जाए, कि रंगों की तरह मिलकर एक हो जाने वाली बात आज भी उतनी ही सही है जितनी कभी रही होगी!
आखिर ये दुनिया चल रही है तो ऐसे ही कुछ स्पर्श..ऐसे ही कुछ अनचिन्हे मेलों के बलबूते पर ....


स्वयं को समझती... समझाती हुई एक भावदशा:-


हे! संवेदनशील मित्र..
हे! आदरणीय भ्राता..
सच है, आज के युग में
मात्र भ्रम ही है प्रगट हो आता..


मगर युगों के संस्कार भी
सांस ले रहें हैं
जो हमसे..तुमसे
यह कह रहें हैं-
स्वार्थ के कारागार से निकल
आत्मा मुक्त होगी...
मेरी वाणी
मेरे हमसाये की चेतना से संयुक्त होगी...


और होगी
एक दिव्य सफ़र की शुरुआत
कब तक आखिर
रूठा रहेगा प्रभात
रौशनी में...
युगों के सम्बन्ध स्पष्ट होंगे
छूमंतर...
हिय के सारे कष्ट होंगे


अवश्य कोई
तुम्हारे स्वप्न की बाहें थाम चलेगा...
"मैं"..."तुम" नहीं
बल्कि "हम" का सूरज चमकेगा...
रंगों के मेल सा
कुछ अघटित घटेगा...
अप्रतिम सुषमा से हृदयधाम चमक उठेगा...


आत्मा-परमात्मा के मिलन सी
कोई अद्भुत बात
चकित कर दे तुझे
आज की रात
फिर रंगों के मिलने की
गरिमा पहचानोगे...
प्रभुकृपा से कुछ अद्भुत विश्वास
मन की कंदराओं में पालोगे...


तब तक आशान्वित परिकल्पनाएं
हो तेरी त्राता..
हे! संवेदनशील मित्र..
हे! आदरणीय भ्राता..

मेरी अभिलाषा!

कविता कभी कभी नितांत निजी वेदना की अभिव्यक्ति होती है, लेकिन कलम की नोक से आगे का उनका संसार वृहद् होता है। कविता की सार्थकता तभी है जब वह निज वेदना का सीमित धरातल छोड़ कर आगे की ओर अग्रसर हो... हर एक पढ़ने वाले को वह अपनी बात लगे... लिखने वाले के भाव और शब्द बह कर पढ़ने वाले की अनुभूतियों का अंश बन जाये!
यही सब बातें बादलों की तरह मानसपटल पर छाई हुई है, शायद एक कविता बरसे फुहारों की तरह... आंसू की तरह, और आद्र करे उन अन्तस्तलों को जो स्वयं इस कविता की प्रेरणा है! और फिर प्रेरणा का रूप तो शब्दों से परे है... साँसों के गीत के साथ जुड़ी है प्रेरणा; भला उसे क्या नाम देना...!




आँखों में आंसू लिए
मेरी कलम चल रही है,
वेदना
धरा-अम्बर की गोद में
बेफिक्र टहल रही है,
ऐसे में
कुछ अन्तर को
छू जाता है...
एकाकी हृदय
अनायास
सुकून पाता है...
और फिर
मौन निकलती है राहें!
थामें
उत्कट अभिलाषाओ की बाहें!!


मेरी यह अभिलाषा, कि
श्वेत छंद गाये जायें
जो कुछ भी
है विशुद्ध उज्जवल
वे छवियां प्रकाश में आयें
मेरी यह अभिलाषा, कि
किरणें बिखरे
दूर तलक
उसकी सीमा
धरती ही नहीं
प्रकाशित करे वह पूर्ण फ़लक
मेरी यह अभिलाषा, कि
मरूभूमि में भी
मृदुल छन्द जायें गाये
राहगीरों की खातिर
घर की चौखट के बाहर भी...
हमारी चेतना एक दीप जलाये


बातें कितनी ही सार भरी
हिय में मचल रही है
हमेशा से
कवितायेँ ही हमारी
नितांत निजी वेदनाओं का हल रही है
ऐसे में
सरिता का बहना
स्वतः हो आता है
जो है पढ़ता
बात कवि की, वह उसे
अपनी बात बताता है
और फिर ऐसे में हम
कैसी-कैसी गहराई को थाहें!
विश्व वेदना की बात चली हो
निज सुख की मिट गयी हो चाहें!!


मेरी यह अभिलाषा, कि
कविता मुक्तकंठ गाये
अंधियारे में
प्रेरक आत्माएं
प्रकाश पुंज बन जाये
मेरी यह अभिलाषा, कि
सृजन की राह में
कभी न जाये चेतना थक
उसकी सीमा निजता से वृहद्...
पहुंचे वह आत्मिक छोर से
भीड़ के शोर तक
मेरी यह अभिलाषा, कि
शब्दों की सच्चाई से
कोलाहल थम जाये
ह़र सच्चे गीत की
प्राण-प्रतिष्ठा हो, तेरा गीत
जरा हम भी तो गुनगुनायें


आँखों में आंसू लिए
मेरी कलम चल रही है,
वेदना
धरा-अम्बर की गोद में
बेफिक्र टहल रही है,
ऐसे में
कुछ अन्तर को
छू जाता है...
एकाकी हृदय
अनायास
सुकून पाता है...
और फिर
मौन निकलती है राहें!
थामें
उत्कट अभिलाषाओ की बाहें!!

चन्द लम्हों की साँसे...कुछ मूक आवाजें!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

चमन की वादियों में
आंसू के मोती झरते हैं,
"वन्दे मातरम" से...
"वनडे मातरम" तक के
बारे में सोच
वे रोया करते हैं;
एक सूत्र में आबद्ध कर देते थे,
कहाँ गए वो धागे हैं!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

भोग-विलास हेतु
लगी हुई कतारें हैं,
बाज़ार और
घर के बीच की-
हा! कहाँ गयी
वो दीवारें हैं;
भाई की कलाई से विलुप्त
आज राखी के धागे हैं!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

अनाम बलिदानियों को
श्रद्धा पुष्प चढाने हैं,
आसपास
उन स्मृतियों के
मुस्कुराते फूल
खिलाने हैं;
उस दौर को इस दौर से जोड़ रहे
अदृस्य से धागे हैं!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

परिवर्तन शाश्वत है...!

स्तब्धकारी
निराशा की
सीमा ही नहीं है!
कहती है
वीरान पड़ी डाली
जीना ही नहीं है!

पर अनभिज्ञ है वह,
इस तथ्य से-
मौसम परिवर्तन के साथ,
वह फिर हरी भरी हो जायेगी!
निर्जन मौन आज है,
पर कल हवा पुनः गुनगुनायेगी!

निराशा का यह अन्धकार ही,
आने वाली बहार का-
सूचक और सर्जक है,
आशा की कली न मुरझायेगी!
हरेपन की सुषमा जल्दी ही,
पुनः लौट आयेगी!

ये कैसा हठ कि
अभिलाषाओं का अमृत
पीना ही नहीं है!
कहती है
वीरान पड़ी डाली
जीना ही नहीं है!

जिजीविषा के मंत्र से,
प्रेरित हो-
डाली की व्यथित मनोदशा,
स्वतः परिवर्तित हो जायेगी!
एक बार अन्तःचक्षु जो खुल गए,
सारी गाँठ खुल जायेगी!

फिर पत्तियों के बिछोह से,
मर्माहत डाली-
कुछ तो संयत होगी,
परिवर्तन को हंसती हुई अपनायेगी!
बनी रहेगी ठूंठ मगर,
आत्महंता नहीं कहायेगी!

जीवनपथ पर
संभावनाओं की
सीमा ही नहीं है!
सार्थक हो कुछ,
मात्र जीने के लिए जीना तो
जीना ही नहीं है!

काटों के बीच खिली कली स्वयं ही सन्देश है!

दर्द के देश में
मौन परिवेश में
सहनशक्ति की परीक्षा
अभी शेष है
काटों के बीच खिली कली
स्वयं ही सन्देश है!

निर्मम हवाओं से
लड़ती लौ को
नहीं किसी से द्वेष है
प्रारब्ध से कोई
शिकायत ही नहीं
लुप्त सकल क्लेश है
काटों के बीच खिली कली
स्वयं ही सन्देश है!

दुर्गम प्रदेश में
परिस्थितियों के वेश में
परखने को भक्त की निष्ठा
आता स्वयं सर्वेश है
काटों के बीच खिली कली
स्वयं ही सन्देश है!

गहराई को मापने
की प्रक्रिया कुछ जटिल
कुछ विशेष है
जीवन में
सुख दुःख के विधान का
स्वाभाविक समावेश है
काटों के बीच खिली कली
स्वयं ही सन्देश है!

प्रतीक्षारत नयनों में आशा अथाह है...!

"मेरे सुख दुःख से
सरोकार रखने वाला
होता कोई एक प्यारा साथी!
काश..होता कोई ऐसा
जिसे मेरी-
अटपटी भाषा आती!
कहने को...
समझने को परस्पर
मौन ही होता पर्याप्त,
जीवन में
कितने मनोरम होते तब
सूर्योदय औ' सूर्यास्त!
सह जाते सारी पीड़ाएँ
कर देते
परिस्थितियों को परास्त,
हर लेने को
सारी विषमता
उसका स्पर्श ही होता पर्याप्त,
जीवन में
कितने मनोरम होते तब
सूर्योदय औ' सूर्यास्त!"
.............

ये,
हर हृदय की
अनकही सी चाह है!
रिक्तता के बोध से
जन्मी करुण आह है!
दुविधाओं से घिरी
अकेली जीवन राह है!
चिरप्रतीक्षित खुशियों को,
आना ही होगा
प्रतीक्षारत नयनों में-
आशा जो अथाह है!
धरती पर,
किसी न किसी को तो ज़रूर
आसमानी बादलों के-
अरमानों की थाह है!
खोने पाने के
गणित से अनभिज्ञ-
मन तो बेपरवाह है!
साये की सन्निद्धि,
हर हृदय की
अनकही सी चाह है!

सजल नयन..!

एक कविता सजल नयनों की मुस्कान में विम्बित इन्द्रधनुषी सुषमा के लिए, सपनों के अम्बर पर आस विश्वास के सितारों के लिए, जीवन के अधूरे वाक्यांशों की व्यथा के नाम....

"सजल नयन"

अधूरे सपने
जगमगाते हैं नयनों में
सच होने को मचलते हैं
उनके मन-प्राण
पर जाने क्या है,
जो आस को-
हर बार झूठलाता है
सपना...
सच होते-होते...
रह जाता है!

ऐसी नीरस बेला में भी
दूब आस की उगी रहे चमनों में
आज भले हो निर्जन
पर नहीं रहेगी वाटिका सुनसान;
कोंपले फुंट ही आएँगी,
अद्भुत आस का खग-
अँधेरी बेला में भी गाता है
भले मिलते-मिलते...
हर रोज़, अम्बर...
धरती से जुदा हो जाता है!

उमड़ते हैं
भाव सागर नयनों में
आंसू बन बह जाने को मचलते हैं
उनके मन प्राण
पर पलकों में बंद कर
अश्रुबुन्दों को-
सजल नयन, मुस्कुराता है
सपना...
सच होते-होते...
रह जाता है!

बादलों का सहोदर!

बादल किसी से कुछ नहीं लेते..... उनका तो एकमात्र ध्येय है बस छाना और बरस जाना.... स्नेहमयी बूंदों से आद्र कर जाना सबों को! यूँ ही यह कविता कुछ रोज़ पहले लिख गयी थी.... मेरी कलम से! मुझे बादलों का सहोदर जो मिला..... तो मैंने जाना, बादल की व्यथा को, और उसके भावों से साम्य स्थापित करते हुए..., बादलों के सहोदर ने, मुझसे यह कविता लिखवा दी! आज ऐसी ही एक स्नेह भरी बारिश ने मेरे इस सृजन संसार (इस ब्लॉग) को नीले रंग की सुषमा से भर दिया....
मन अभिभूत हो तो शब्द मौन हो जाते हैं.....!!!
बादलों की बातें करते हुए ललित भैया की प्रेरणा से यह रचना अस्तित्व में आई थी...., आज उन्ही के द्वारा नए रूप में सजाये गए "अनुशील ...एक अनुपम यात्रा" पर सबसे पहले उन्ही की प्रेरणा से लिखी एक कविता.....

"बादलों का सहोदर"

बादल अपनी व्यथा-
उनसे कहते हैं...
वो पीर लिए हृदय में-
हँसते हुए सबकुछ सहते हैं...

और अगर यह कहूं-
तो न बादल ही मानेंगे,
न आप ही कभी जान पाओगे
कि दोनों के भाव
मेरी आँखों से निरंतर बहते हैं-
कभी आंसू तो कभी प्रार्थना बनकर
कभी सांसारिक विरक्ति
तो कभी याचना बनकर
कोई क्या पहचानेगा-
कि भावनाओं का तार
कैसे रिश्ते जोड़ जाता है
तेरा दर्द-
अनजाना होकर भी
क्यूँ (?) मुझे यहाँ रुलाता है!

जैसे बादल-
तेरे अपने हैं...
वैसे ही दूर क्षितिज पर तैरते-
मेरे भी कुछ सपने हैं...
मेरा भी-
छाए हुए बादलों से सरोकार है...
हृदयहीन नहीं हैं,
सुशील हृदया की आँखों में भी-
बादलों सा एक संसार है...
कौन कहाँ कैसे जगह पाता है
मीलों लम्बी दूरी है फिर...
क्यूँ (?) मुझे सबकुछ स्पष्ट नज़र आता है!


सभी भ्रांतियों से परे-
कथा कहनी है...
पेड़ क्या जाने-
कितना रोई टूट कर,
वो जो एक टहनी है...
बहनें कहाँ जड़ों संग रह पाती हैं...
जहां जन्मी...वहाँ से परे
दुनिया अलग बसाती हैं...
वैसे ही जैसे-
बादल जन्मते है कहीं...
हो जाते है कहीं के...
और बरसते हैं कहीं
फिर भी हृदय तो
बचपन के आँगन के लिए
रोता है न...
बादल बिना सोचे,
धरती की आद्रता की खातिर
अपना वजूद खोता है न...
सब विम्ब जुड़े हुए से हैं;
गर जुड़े नहीं हैं तो,
"जल की आस ... सागर सा हृदय"
क्यूँ (?) मुझे यूँ उद्वेलित कर जाता है!

बादल मेरा भी सगा है...
और जाने क्यूँ
मुझे अभी अभी ऐसा लगा है...
कि आपके हृदय की बात,
मुझ तक है आयी
आशीषों से भरी वाणी ने
मुझको आवाज़ लगायी:
"बादल...तू और मैं-
ये सब जाने दे!
जीवन के इस महासमर में
गीत तराने गाने दे!"
कविता-कहानी, कर के-
यह सब परे...
जीवन की-
व्यवहारगत सच्चाईयों को
जब हम टटोलने लगे...
तब मन बहुत रोया
तेरे दर्द का कोई बीज-
शायद विधाता ने,
मेरे भीतर भी है बोया
तभी तो ये जुड़ाव है...
भैया! आपके नेह की अनुपम यह नाव है!

और क्या बोलूं
बादलों के सहोदर से!
मेरी सारी खुशियाँ, उन्हें दे डालो
इस राखी पर...यही याचना है, गिरिधर से!

(२१/८/२०१०)

एक भावयात्रा...प्रकृति की गोद में..!

नीला अम्बर नीला समंदर
सुनहरे बादल सुरीली लहर

झिलमिल करती..
किरणों की चादर,
झुका धरती की ओर
गगन सादर,
जल तरंगों में-
बहते पल
चहुँ ओर फैली-
शांति निश्छल
सागर की लहरों की
झंकार
सृष्टी हो जैसे
नीले रंग का विस्तार
किनारे विलीन...
न आदि न अंत,
क्षितिज की सीमा तक
आशाएं अनंत,
वहाँ जरूर मिलते होंगे..
धरती गगन
ये सोच आह्लादित है हम,
मन ही मन
चहुँ ओर अथाह
जल ही जल
किनारों सी विलुप्त, मानों
चाहें सकल
विस्मित किये हुए हैं,
लोक दृश्यमान
जल थल औ'नभ के-
रिश्तों का विधान
है यह सृष्टी
अद्भुत रहस्यमय !
समाये हुए कितने अचरज..
कितना विस्मय !!

विस्मित नयनों में भी
एक समंदर है,
एक दिव्यलोक-
सबके अन्दर है,
भावनाओं की लहरें..
हृदय किनारों से टकराती है
बादल से हृदय सीमायें..
आच्छादित हुई जाती है
जल के विस्तार पर-
संस्कार की किरणें पड़ती है,
परिस्थितियों से-
आत्मशक्ति निरंतर लड़ती है,
कभी अथाह तो कभी-
क्षितिज सी रम्य,
हृदयप्रदेश की-
बातें हैं अगम्य,
उन्ही गहराईयों से आते हैं,
कैसे कैसे निर्देश
अनसुना कर जिसे, हम तकते हैं
जाने क्या निर्निमेष
इसी तरह हो जाता है..
दिवस का अवसान,
सागर की गोद में
अदृश्य हो जाते हैं दिनमान,
आंतरिक स्वर दब जाते हैं
कोलाहल में,
कभी विस्तृत सागर..
तो कभी निर्जन मरुस्थल में,
बीतने में जीवन को-
लगते ही कितने पल हैं !
आज हैं..और अगले ही क्षण,
हम बीता हुआ कल हैं !!

क्षणिकता के इस सौंदर्य को,
सरसता से जो जीना हो
जितनी भी मिली, उस जीवनामृत को
सहजता से जो पीना हो
तो ज़रा रफ़्तार
धीमी हो
वाणी ज़रा
भावभीनी हो
ईशनाम के संकीर्तन से
गूंजती हो हवाएं
रामनाम का संग्रह कर ले,
सूरज डूबा जाए
अस्ताचलगामी सूर्य की
मनोहारी छवि
भर ले अपने दामन में,
अब विदा हुए रवि
लो, अब तो-
शाम हो चली है
जिंदगी कितनी निर्मोही-
औ' छली है
मृत्यु के कगार पर
अकेला छोड़ आती है
किसी अनचिन्हे क्षण
मुँह मोड़ जाती है;
कहाँ से चले थे..
और कहाँ चले आये
कलम की यात्रा भी
कैसे-कैसे रंग सजाये
कभी नीले रंग की सुषमा,
कभी श्याम संसार !
युगों युगों से सत्कर्म ही है
जगत का आधार !!

नीला अम्बर नीला समंदर
सुनहरे बादल सुरीली लहर

खोज ईशतत्व की: एक बालसुलभ प्रयास...!

जीवन के इस
महासमर में,
गति का ही गणित है!
एक ही रूप में वो-
विद्यमान सबके भीतर
धमनियों में जैसे बह रहा शोणित है!

राम ही
रहीम,
वही गीता वही कुरान!
फिर क्यूँ बाँट रहा-
दिव्य शक्ति को
टुकड़ों में इंसान!

वही मसीह की
करुण प्रार्थना,
वही पैगम्बर!
वही धरती की
सहनशीलता-
वही विशाल अम्बर!

नानक की
वाणी है वो,
ह़र भक्त की पहचान वही!
नाम अलग,
दर्शन भिन्न-
पर एक ही है सबका हरि!

परमशक्ति की
परिभाषा नहीं होती,
उसे महसूस किया जाता है!
बहस का औचित्य नहीं-
उसकी सत्ता को
स्वयं जिया जाता है!

इश्वर को पहचानने के लिए,
हमें खुद ईश्वरीय छवि में
ढलना होगा!
अपनी पीड़ा भूल-
औरो का कष्ट हरते हुए
कुछ दूर चलना होगा!

फिर देखना! वह जो भी है-
राम-रहीम-जेसुस या नानक,
स्वयं प्रकट हो जाएगा!
वो तड़प जगाएं भीतर,
फिर तो भक्त के द्वार-
कन्हैया दौड़ा चला आएगा!

जीवन के इस
महासमर में,
गति का ही गणित है!
एक ही रूप में वो-
विद्यमान सबके भीतर
धमनियों में जैसे बह रहा शोणित है!

सबकी एक सी पीर है...!

स्वप्न और सच्चाई के बीच
एक सूक्ष्म सी लकीर है...!

उस सीमा की तलाश व्यर्थ,
खोने-पाने के गणित से परे-
जब मन ही फ़कीर है...!

क्षितिज पर डूबता सूरज और
उगती हुई लाली पर क्या लिखें-
जब धरती पर छाई समस्याएं गंभीर है...!

क्षमता ऐसी,कि पर्वत लाँघ ले
हौसला ऐसा,कि सागर बाँध ले
फिर भी यहाँ कईयों से रूठी तकदीर है...!

मुक्त होना अगर चाहे-
तो बस पल भर की ही बात है,
हमारी अपनी सीमित सोच ही पाँव की जंजीर है...!

सकल कर्तव्यों के संपादन हेतु-
इसी पल उद्धत हों मन प्राण,
समय नहीं रूकने वाला,हर क्षण मिट ही रहा शरीर है...!

संग्रह की गयी सब उपलब्द्धियां
सारे सामान...यहीं रह जाने हैं
आवाजाही के इस चक्र में सबकी एक सी पीर है...!

भेद सारे यही समाप्त हों जाते हैं
उस दरबार के समक्ष-
सब याचक...सब फ़कीर हैं...!

स्वप्न और सच्चाई के बीच
एक सूक्ष्म सी लकीर है...!

जिंदगी कैसे कैसे... अनुभूति के रंग सजाती है !

बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !

बीत गया,
भले बीत गया...
पर टीस उसकी
आज भी रुला जाती है !

तुम्हारी अपनी सोच,
अपने तर्क तरीके है
हम ही ग़लत, अभागे है
हमे तो शीतलता जलाती है !

जब ढह रहे थे सारे संबल तब
काश ! तुमने हमारा पक्ष लिया होता
ऐ जिंदगी ! ये व्यथा-
हमें सदा सताती है !

आधारहीन नहीं हैं
हमारे कष्ट...हमारी शिकायतें
ये बात और है, कि-
तेरी हर शाम हमें लुभाती है !

तू जरा सा संवेदनशील होती
हमारी भावनाओं के प्रति
तो क्या बात होती,
ये बात हमे भावविभोर किये जाती है !

लाचार सी आँखों से
सपने जो दूर हुए
संबंधों की सकल सच्चाई
ओझल सी हुई जाती है !

क्या कहें...
किसे दोष दें...
उलझे हुए हैं सब लोग ...
साँसें बोझिल हुई जाती है !

अब जाना
सब मतलब के रिश्ते हैं
जिंदगी कैसे-कैसे
अनुभूति के रंग सजाती है !

बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !

पतझड़ की भी... मैं हो गयी सगी !

परायी है,
पर जाने क्यूँ-
मुझे दुनिया..
बिल्कुल अपनी सी लगी!

निद्रामग्न कलम में
जब सृजन की प्यास जगी,
शब्दों के संसार में..
भावनाएं विचरण करने लगी
बसंत भी जैसे था मेरा,
और पतझड़ की भी मैं हो गयी सगी
सभी स्तिथियाँ परिस्थितियाँ..
हो चली थी मिठास से पगी
तभी एक निर्मम आंधी आई..
और मैं रह गयी स्तब्ध ठगी

दिवस का अवसान
और सूरज की विदाई
अब लेने को उसकी जगह
उद्धत हुई दिया सलाई
जोड़ने बैठे शाम ढले हम
दिवस भर की कमाई
अंधियारे से बुझे मन को
चांदनी ने सूर्योदय की आस दिलाई
बाल अरुण की लालिमा
तब मन ही मन मुस्काई

फिर हो गयी भोर..
और जिंदगी पुनः चलने लगी
मृत्यु होगी अटल सत्य
पर जिंदगी ही अपनी, वह ही है सगी
कितने दर्द कितने सपने लिए..
कितने ही अरमानों से है पगी
प्रयत्न चलते ही रहेंगे, चाहे-
कितनी ही बार संभावनाएं जाएँ ठगी
और हो भी क्यों न, क्षीण हौसलों की..
सुप्त आत्मा है आज जगी

परायी है,
पर जाने क्यूँ-
मुझे दुनिया..
बिल्कुल अपनी सी लगी!

लेखनी है रमी... आज लिख डालो!

आँखों की सकल
नमी... आज लिख डालो!
आसमानी सपने छोड़
दूब जिसको है समर्पित
चरणों के नीचे वो ठोस
जमीं... आज लिख डालो!

कितने ही
प्रवाह में हो सरिता
चुन सारे कीचड़ कंकड़, अपनी
कमी... आज लिख डालो!

अपनी व्यथा
सागर की कथा
शब्दों के उलट-फेर में है
थमी... आज लिख डालो!

अपनी छोटी सी धरती
की कई गहन समस्यायों के
कारण कहीं न कहीं, खुद हैं
हमीं... आज लिख डालो!

जाने कल क्या हो
शायद आज ही कोई जगे-
अपनी बात सुन, लेखनी है
रमी... आज लिख डालो!

संवेदनशीलता पर बर्फ है
जमी... आज लिख डालो!
हवा का अट्टहास
और धरती की पीड़ा,
अश्रुधार से भीगे हृदय की
नमी... आज लिख डालो!

कलम आज तू मेरी सुनना...

कलम आज तू मेरी सुनना
सुन्दर ही सुन्दर सपने बुनना!

आये जब कोई बात अतुकान्त
क्रोध से जूझ रहा हो मन प्रान्त
तब शांत कर हृदय को...
राह में बिखरे सब कांटे चुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

मरुस्थली में कैसी सिक्तता
जीवन में हर क्षण रिक्तता
ये सत्य गहन जानकर...
करना चिंतन.., गूढ़ अर्थ गुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

शब्द व्यथित, अक्षर सारे शान्त
कैसे कहा जाये सकल वृतान्त
ऐसी दुविधा में भी, गुनगुनाते हुए...
अभिव्यक्ति के नए आयाम बुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

संध्याबेला में प्रातपहर की यादें चुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

दे जिंदगी, अगर ऐसी कोई सौगात हो !

जिजीविषा से परिपूर्ण
दिवारात हो !

आशा की किरणों से
सजा रहे अम्बर
जीवन में नवप्रभात हो !

क्या सहेजूँ मैं,
सब तो यहीं रह जाता है...
जो चिता संग साथ जाये-
दे जिंदगी,
अगर ऐसी कोई सौगात हो !

आँचल में कांटे भी हों
फूल भी..
सुख दुःख की आंखमिचौनी में-
समदृष्टि अपनाये,
ऐसी अद्भूत बात हो !

साँसों की आवाजाही
कोमल से कुछ स्वर
धुंधली सी यादों की बरसात हो !

जिजीविषा से परिपूर्ण
दिवारात हो !

"कृष्णार्पनं अस्तु"

मनोरम छवि
प्रभु की..
ऐसा ही सुन्दर
जीवन का हर प्रभात हो !
कृष्ण...राधिका संग
हृदय में विराजे...
भाव-भक्ति की
यह अनुपम सौगात हो !!

बाल ग्वालों के
झूंड में..
कान्हा की उपस्थिति सा
आभास साथ हो !
कौन्तेय को जैसे
सन्निधि प्राप्त थी...
वैसे ही हमारे सर भी
केशव का हाथ हो !!

मुखरित
कर्म सन्देश बन..
अविरल बहती धारा से
सिंचित दिवारात हो !
सौम्य सी छवि
नयनो में बसी हो...
हिय में खिला सदा ही..
दिव्य प्रात हो !!

कृष्णार्पनं अस्तु
मंत्र से उत्प्रेरित सिंचित..
सकल क्रिया-क्लापों की
श्रेष्ठता की कभी न मात हो !
कृष्ण...राधिका संग
हृदय में विराजे...
भाव-भक्ति की
यह अनुपम सौगात हो !!

जीवन बीत रहा है...!

भाग रहा है वक़्त
हर क्षण
जीवन
बीत रहा है!

क्या सहेजें
क्या संभालें
पात्र से हर पल-
जल रीत रहा है!

ये कैसी उलटी
हवा चली है
राम पराजित-
रावण जीत रहा है!

भागते बादलों की
क्षणिक सफलता मात्र है यह
सत्य-संयम-सौंदर्य-
जहां में आशातीत रहा है!

चमकता हुआ
हर ग्रहण के बाद,
सूर्य का तेज..युगों से-
धरा का मीत रहा है !

भाग रहा है वक़्त
हर क्षण
जीवन
बीत रहा है!

.....कहो तो, अपना ऊर दिखलाऊं !

प्रकृति में कितने सुन्दर विम्ब बसे हैं..
किसे लिखूं..क्या कह जाऊं
इतनी विविधता है धरा की गोद में
मैं किसकी महिमा गाऊं

झर झर झरते पानी में
इतनी शीतलता झलकती है
माटी की सौंधी खुशबू से
मेरी हृदय धरित्री महकती है

समेट सकूँ ऐसे दुर्लभ उपहार
इतना बड़ा आँचल कहाँ से लाऊं
ऐसी समृद्धि से प्रतिपल सुगन्धित है
शब्दों में कैसे यह भाव कह पाऊं

नीड़ का निर्माण करती..उड़ती है
आह्लादित हो चहकती है
चिड़िया आसमान की होती हुई भी
धरा से सच्चा प्रेम करती है

ऐसी व्यवहारिकता..ऐसा अनुशासन
कैसे अपने मानव समाज में पाऊं
इतना मीठा...इतना कोमल-
कलरव सी तान..कैसे गीतों में लाऊं

इश्वर का ही विम्ब सर्वत्र है
परमात्म शक्ति हर कण में बसती है
हर डाली उसकी कलाकारी...
मानवता को आशीषती रहती है

इन आशीर्वादों के योग्य बन सकें
ऐसी पात्रता कहाँ से लाऊं
सब की एक ही व्यथा है
कहो तो,अपना ऊर दिखलाऊं

प्रकृति में कितने सुन्दर विम्ब बसे हैं..
किसे लिखूं..क्या कह जाऊं
इतनी विविधता है धरा की गोद में
मैं किसकी महिमा गाऊं

रचनात्मक गति साक्षात आराध्य है....

बिना किसी जोड़-घटाओ या कृत्रिम साज संवार के..
जो अभिव्यक्त हो , वो काव्य है !
नियमावलियों से गणित चलता है..
रचनात्मकता कहाँ इन परिधियों को प्राप्य है !

मानसिक यात्राओं की यंत्रणाएँ झेलने का साहस हो,तो-
कठिन पड़ावों की सकल विडम्बनायें स्वयं श्रमसाध्य हैं !
लिखती हुई कलम क्या जाने..
विम्बों को जोड़ती उसकी गति साक्षात आराध्य है !
चल पड़ती है तरंगें विचार गंगा की..
जिसे सहेजने को इस अकिंचन की लेखनी बाध्य है !

बिना किसी जोड़-घटाओ या कृत्रिम साज संवार के..
जो अभिव्यक्त हो , वो काव्य है !
नियमावलियों से गणित चलता है..
रचनात्मकता कहाँ इन परिधियों को प्राप्य है !

जड़ों में ही तो... प्राण बसा है !

मैंने अविरल अश्रुलड़ियों को
शब्द श्रृंखला सा रचा है!
मेरे भीतर कई छंदों का
सुन्दर संसार बसा है!
इस एहसास के साथ मैं
हर शब्द बुनती हूँ, कि
मिटा न पाए उसकी क्रूरता
भले निर्मम समय हर रचना पर हँसा है!

क्या लिख लेंगे नया हम
बड़ी विचित्र सी दशा है!
जीवन कमल कीचड़ के बीच
खिला और सदा से वहीँ फँसा है!
इस व्यूहचक्र से आगे ही
सुन्दरता परिभाषित होती है
धरती पर हैं जीनेवाले, पर
आसमानी ख्वाब ही क्यूँ यूँ नैनों को जँचा है!

अपनी मिट्टी की खुशबू से
भाव भाषा का अंतस्तल रचा है!
ऊपर की ओर बढती लता है
पर जड़ों में ही तो... प्राण बसा है!
इस भावसुधा को अपनाकर
चलते रहिये राहों पर,
मिल जाएगी सुनहरी मंजिल भी-
आखिर जीवन अपने आप में प्रेरक एक नशा है!


आँच (आँच-37 चक्रव्यूह से आगे) की समीक्षा में सुझाये गए परिवर्तनों के बाद सचमुच समृद्ध हुई है कविता!
कविता पर इस स्नेह वर्षा हेतु आचार्य परशुराम राय जी के प्रति आभार सहित पुनः पोस्ट कर रहे हैं यहाँ...


अविरल अश्रुलड़ियों को
शब्द श्रृंखला सा रचा है!
मेरे भीतर छंदों का
सुन्दर संसार बसा है!
इस एहसास के साथ
हर शब्द बुनती हूँ-
मिटा न पाए क्रूरता
भले निर्मम जगत हर रचना पर हँसा है!

नया लिख लेंगे क्या हम
बड़ी विचित्र सी दशा है!
जीवन कमल कीचड़ के बीच
खिला और सदा से वहीँ फँसा है!
इस व्यूहचक्र से आगे ही
सुन्दरता परिभाषित होती है
धरती पर हैं जीनेवाले, पर
आसमानी ख्वाब ही क्यूँ नैनों को जँचा है!

अपनी मिट्टी की खुशबू से
भाव भाषा का अन्तस रचा है!
ऊपर की ओर बढ़ती लता
पर जड़ों में ही तो... प्राण बसा है!
इस भावसुधा को अपनाकर
चलते रहिये राहों पर,
मिल जाएगी मंजिल भी-
आखिर जीवन स्वयं में प्रेरक एक नशा है!

सच्ची एक कलम चाहिए!

उन्मुक्त गगन में उड़ पायें पंछी की भांति...
इसके लिए एक स्वाभाविक सी लगन चाहिए!

लिख सके अपने समाज की व्यथा...
इसके लिए धड़कता हृदय औ' सच्ची एक कलम चाहिए!

बरसे तो ऐसा बरसे, कि अंतस्तल भिगो जाये...
धरा की ख़ामोशी को समझने वाला गगन चाहिए!

परहित की खातिर स्वहित का मोह बिसार दे...
सार्थक जीवन यज्ञ को स्वार्थ का हवन चाहिए!

सुनने वाले का मन-प्राण बाँध सके जो...
ऐसी विचारों की प्रगल्भता औ' भावनाएं सघन चाहिए!

दृढ़ता ऐसी कि स्तिथियाँ-परिस्थितियाँ डिगा पाए न...
समस्यायों की भूमि पर रोपे अंगद से चरण चाहिए!

होता है सबकुछ हासिल..पत्थर भी पिघलते हैं...
बस हौसलों में सच्ची एक तपन चाहिए!

उन्मुक्त गगन में उड़ पायें पंछी की भांति...
इसके लिए एक स्वाभाविक सी लगन चाहिए!

लिख सके अपने समाज की व्यथा...
इसके लिए धड़कता हृदय औ' सच्ची एक कलम चाहिए!

एक पल में ही सदियाँ जी जाएँ!

कविता श्रृंखला की तरह ही तो होती है...बात शुरु होती है...शब्द तरंगित होते हैं...नितांत अकेलेपन से,पर अकेलेपन की बात करते हुए ये शब्द क्या हमे अकेला रहने देते हैं...कदापि नहीं! सृजन के इस संसार में आत्माएं एक दूसरे से आबद्ध हैं, यहाँ ऐसा होता है कि एक के दर्द से दूसरा रोता है ; ऐसी ही भावदशा में यह कविता लिखी गयी थी...एकाकी विम्बों के साथ वार्ता की संभावनाएं तलाशते हुए-


यहाँ पर
सांसारिक बातों के
पग-पग पर झमेलें हैं..
इस डगर में
हम सब तनहा हैं,
हम सब अकेले हैं..
चलो अकेलेपन में
सृजन की
अनोखी घड़ियाँ जी जाएँ
कुछ उलझनें
मिल कर
हल की जाएँ
फिर तो
सफ़र भी होगा..
और हमसफ़र भी..
ऐ! एकांत के साथी,
हमसे कुछ देर बात कर..
जरा ठहर भी..

जीवन
जितना अपना लगता है
वह उतना ही पराया भी..
वक़्त वक़्त की बात है
कभी तो साथ छोड़ जाता है
अपना ही साया भी..
इस सच की रौशनी में
साथ-प्रेम की
कुछ व्याख्याएं जी जाएँ
कुछ देर सवेरा हो
रौशनी की बातें हों
हम दीपक की लौ सा जल जाएँ
फिर तो
सफ़र भी होगा..
और हमसफ़र भी..
ऐ! एकांत के साथी,
हमसे कुछ देर बात कर..
जरा ठहर भी..

आशा निराशा से लड़ती कविता
हमारी शक्ति
हमारा विश्वास है..
अकेलेपन की रागिनी न होकर
ये तो
अपराजित प्रकाश है..
इस प्रकाश में
कितने अपने लगते हैं सब
चलो सारे भाव छंदों में सी जाएँ
जिंदगी जो है,
जैसी भी है..हमें क्या!
एक पल में ही सदियाँ जी जाएँ
फिर तो
सफ़र भी होगा..
और हमसफ़र भी..
ऐ! एकांत के साथी,
हमसे कुछ देर बात कर..
जरा ठहर भी..

यादें...

गुजर जाने के बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती हैं याद ही!

वो तोतले लबों का गायन
प्यार भरी नज़रों ने किये जो रिश्ते कायम
वो ठोकर खाकर गिरना
और चखना सफलता का स्वाद भी,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

वो रिमझिम बरसता सावन
वो अपना भीगा-भीगा दामन
जिंदगी अपनी प्रेयसी ....
हम ही इसके मजनू भी ..... फरहाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

वो पाप-पुण्य का खेल पुरातन
कभी मन के राम पे जो पड़ा भरी रावण
वो संघर्ष की सनातन बेला -
और जीतने का उन्माद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

वो झूमती हुई कलियाँ ... वो आँगन
वो पीछे छूटा घर ... वो यादों में बसा प्रांगन
यही हमारी पूंजी है -
और यही हमारी जायदाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

सुख-दुःख का बारी-बारी से आगमन
पतझड़ भी है सगा उसका .... जिसे हम कहते हैं सावन
जीना है गुलशन को..
गम नहीं गर कुछ कलियाँ हो जाएँ बर्बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

त्याग से ही आभूषित जीवन कानन है
आज फिर मचा हुआ ये कैसा आनन-फानन है
सहर्ष त्याग दें खुद को लक्ष्य की खातिर ,
हरियाली छाये इसके लिए बनना पड़ता है कुछ को खाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

स्वार्थ का कर चोला धारण
क्यों ये चौपायों सा आचरण
अरे!करें कुछ ऐसे कर्म जो दीप्त करे ... राहें आजीवन
और शायद जीवन के बाद भी ...
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

गुजर जाने के बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती हैं याद ही!

अन्जान विम्बों से स्फुरित होती प्रीत...

संसार यूँ रचित ही है ,कि .. सारे सम्बन्ध अन्योन्याश्रित हैं.... महसूस करें तो अनायास ही अनुभूति होती है कि जड़ चेतन कई वस्तुओं से .... लोगों से... हम किस गहराई से जुड़े हैं.... !!!
जब रिश्ते टूट रहे हों ... बिखराव सहज ही नज़र आता हो तब यूँ प्राकृतिक विम्बों से जुड़ा हुआ महसूस करना सुन्दर अनुभूति है.... ;ऐसे ही कुछ पंक्तियाँ....


गीतों का मधुरम स्वर,
खग वृन्दों का जीवन संगीत
मधुर.. मनोहर.. अप्रतिम.. सुन्दर
प्रकृति ने रचे कैसे अद्भुत मीत

सौहार्द प्रेम की अनोखी पहचान लिये...
अधरो पे खिला मनामोहक एक गीत
मेरे दामन मे एक फूल था केवल...
कैसे बनती माला...कैसे एकाकी होती जीत
तभी एक पावन स्पर्श हुआ...
साथ हो चली अन्जान विम्बों से स्फुरित होती प्रीत

गीतों का मधुरम स्वर,
खग वृन्दों का जीवन संगीत
मधुर.. मनोहर.. अप्रतिम.. सुन्दर
प्रकृति ने रचे कैसे अद्भुत मीत

वो पास मेरे आया...

एक रोज़ जीवन दुबका सा
पास मेरे आया ...

मेरी भाव भंगिमा में
जाने उसने क्या पाया ...
बोल उठा अनायास ही-
'क्यूँ चिंता में डूबी है काया ...
काहे घेरे हुए है तुझे
मिथ्या जगत की माया ...
अंतस्तल की दुनिया में
नहीं है कोई दुरूह साया ...
स्वयं से सामंजस्य बिठाना
क्यूँ नहीं फिर तुझको भाया ...
जा समेट अपने आप को
न कर व्यर्थ वक़्त ज़ाया ...!'
मैंने उसी पल चेतन शक्ति को-
बड़ी विनम्रता से शीश नवाया ...
आत्मद्वार को आहिस्ते से
खटखटाया ...
फिर इस अद्भुत यात्रा का
चित्र सम्मुख हो आया ...
जीवन का मीठापन.. शीतलता.. भगवन..
ऱब.. सब तब मन के भीतर पाया ...

एक रोज़ जीवन दुबका सा
पास मेरे आया ...

निज भाषा के प्रति

निज भाषा में हो व्यक्त व्यथा,
निज भाषा उत्थान हित हो स्व जीवन कथा!
ऐसा पावन भाव जगे..
हम ही तो हैं भाव भाषा के सगे..!
हिंद का गौरव हिंद का पर्याय,
हिंदी से पगा हमारी अभिव्यक्ति का हर अध्याय!
कौन नहीं जो भरे इस बात पर हामी..
हृदय तो है निश्छल भावों का अनुगामी....!
भाषा की परिधि में और उससे परे भी,
कष्ट-कंटकों में विवेकपूर्ण चरण धरे ही..
बढ़ें चुनौतियों को कर स्वीकार ,
हिंदी सर्व समर्थ है,तभी तो सह जाती है उपेक्षा की मार!
जीवट के साथ मुस्कुराने का नाम है
हिंदी हमारे राष्ट्र की शान है !
हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर आओ हृदय जोड़ें
चलो आज परदे का भ्रम तोड़ें ...!
सारी खिड़कियाँ ...सभी दरवाज़े खोलें
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खड़े हो गर्वपूर्वक हिंदी बोलें!!

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्ते औ' जीवन

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्तों में
प्रभु स्वयं मुस्कुराता है ..
ये प्रीत कभी ख़त्म नहीं होती
जीवन ख़तम हो जाता है ...

एक बार जो
औरों के दुःख से रोना सीख लिया-
तो जीवन का
ध्येय सफल हो जाता है !

रस्ते के काँटों का भान रहे
पुष्प बिछाने का ध्यान रहे-
फिर सारा निज कष्ट
सरल हो जाता है !

रिश्ते...
सहज स्फुरित है जो,
उनका
अनंत से गहरा नाता है !

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्तों में
प्रभु स्वयं मुस्कुराता है ..
ये प्रीत कभी ख़त्म नहीं होती
जीवन ख़तम हो जाता है ...

कुछ एक लुप्तप्राय सी खुशियाँ ....

नन्ही सी गौरैया
जितने दाने चुगती है
उससे कहीं अधिक
आँगन में
खुशी बिखेर जाती है !
आज जब
ये खुशियाँ
लुप्तप्राय सी हैं ,
तो गौरैया ...
बहुत याद आती है !!
अब शायद
होगा उनका
काव्य-कविताओं में ही
आना-जाना
यह बात अनायास
रुला जाती है !!!
आने वाली पीढ़ी
क्या पायेगी हमसे..?
जरा सोचें-
प्रकृतिस्थ बातें,
कैसे हमसे
हर पल दूर
हुई जाती है ???
हमारे आँगन में
आज
गौरैया
क्यूँ नहीं गाती है ?

आपसी सौहार्द ... इंसानियत... औ ' प्यार

अम्बर की गोद में बिखरी चंदा की चांदनी ...
ज्यूँ अंधकार पे विजय पाती है
अनगिनत बिखरे तारों के बीच केवल एक अकेला चाँद जब अपनी चांदनी के साथ होता है -
तो कितने ही बुझे उम्मीदों की ज्योति जग जाती है

वैसे ही अगर साथ हो हम
तो हर अन्धकार से लड़ लेंगे
धरती माँ का सारा दर्द -
हम अपने हिय में भर लेंगे

फिर देखना -
कैसे नहीं छूमंतर होता है ये दुनियावी दर्द का व्यापार
जब दीप बन कर जल रहा हो... आंसू के मोती सा निर्मल -
आपसी सौहार्द ... इंसानियत... औ ' प्यार

अलविदा....

कहते हैं, हम स्वर्ग में रहना कहते हैं या नरक में , इसका निर्णय हमें स्वयं करना है!
अपने कदमो तले की धरती और सर पर मुट्ठी भर आकाश की दुनिया .... जो हमारी है , उसे अपनी शक्तियों से स्वर्ग बनाने का दायित्व भी हमारा ही है ! ऐसी ही किसी भावदशा में ये कुछ पंक्तियाँ लिखी थी कभी .... आज स्मरण हो आयीं !


अलविदा....
काँटों से पाटी हुई दुनिया
हम तो चले बसाने लहलहाती हुई दुनिया!
जिस पड़ाव से ...
आत्मा स्नेहसूत्र में... अनायास बंध जाये
अलविदा कहते हुए भी दिल जिसे अलविदा कभी न कह पाये-
ऐसी सुन्दर ... खिलखिलाती हुई दुनिया !!
हो लो साथ हमारे ...
हम दिखायेंगे तुम्हे ,
स्वर्ग को भी अपने चरणों में झुकाती हुई दुनिया !!!

मीलों चलना है अभी!

हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए
लिखने बैठते हैं जब भी हम
तो कचोटने लगता है गम ही गम
कभी भूख से बिलखती आत्माओं का दर्द रुला देता है
तो कभी कहीं किसी के झुके कन्धों का बोझ मुस्कुरा देता है
हम बेबसी को काव्यात्मक वैभव की वस्तु नहीं बना सकते
अश्रु ढलते दृगों की तस्वीर हम दीवारों पे नहीं सजा सकते
इसलिए-
हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए
विस्तार का दौर है यह
कथनी और करनी में फर्क की आखिर क्या है वजह
यह सोच कर हृदय द्रवित होता है
हमारी संवेदना का रथ अक्सर बिन पहियों का ही क्यूँ होता है
श्रृंखला में कड़ी जोड़ने को प्रयासरत हैं
शब्दों के मायाजाल से मुक्ति हेतु मौन की महिमा के शरणागत हैं
इसलिए-
हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए
कविता जीवन का सेतु है
सुख दुःख में तठष्ट रहने हेतु है
पर फिर भी मुझे मात्र कविता लिखने के लिए कविता नहीं लिखनी है
अंतर के श्रोतों को प्रगट कर जीवन के ध्येय की गरिमा ही सिंचनी है
पहले जरा सुधरने-सुधारने दो आसपास बिखरी विकृत छवि
अगर ये ध्येय सफल होता है तब ही है कोई सफल कवि
इसलिए-
कुछ एक पंक्तियाँ पढ़ कर मत कह देना मुझे कवि!
अभी तो शुरुआत हुई है...मीलों चलना है अभी!!

गुरु कृपा की छाँव में!

गुरु कृपा की छाँव में
कोई काँटा चुभता ही नहीं पाँव में!
लक्ष्य साधने की राह में,
शुरू होती है यात्रा श्रद्धा की थाह में!

सिद्धांतों की रौशनी... सत्कर्मों के दीप,
जीवन की संध्या हर घड़ी आ रही समीप!

इससे पहले कि दिन ढ़ले,
हम राह के काँटे समेटते चले,
फिर शिक्षा हो सार्थक,
गुरु कृपा से बनें पथ प्रदर्शक!

राह दिखाने वाली दृष्टि
सर्वथा पूज्य हो,
प्रभुकृपा होती है तभी
जब गुरुकृपा से परिपूर्ण जीवन स्तुत्य हो!

अध्ययन-अध्यापन की
गौरवशाली परंपरा के स्तम्भ हों,
जीवन की पाठशाला के विद्यार्थियों में
लेशमात्र भी न दंभ हो!

यहाँ सीखने सीखाने की
परिपाटी हो
निर्माण हेतु मिले जो,
वो निर्मल स्वच्छ माटी हो!

गुरु का समुचित आदर हो
हमारे भीतर सदैव एक जागरूक विद्यार्थी सादर हो

ये लगन ही उच्च स्थान दिलाती है,
अद्भुत रूपों में गुरुकृपा फलित हो जाती है!

और प्रताप ऐसा, कि...
खिल जाती हैं सुवासित कलियाँ-
मन के भोले भाले गाँव में;
गुरु कृपा की छाँव में
कोई काँटा चुभता ही नहीं पाँव में!!

जल श्रोतों की खोज!

"ठाकुर का कुआँ"
प्रेमचंद की कहानी का
वह गाँव
कुछ कुछ सजीव होता है !
जब बात उठती है जल श्रोतों की
तो भरी भीड़ की
प्यास के आगे
बूंदों का अभाव सजीव होता है !

कहाँ है जल...
यहाँ तो
केवल
प्यासी आत्माएं खड़ी हैं
कौन बताएगा
कि
आखिर कैसे
जीवन "शव" से "शिव" होता है?!!!

अभाव के संकट से ...
कैसे उबरा जाये ...
मिलते हैं प्रभु तभी... जब
उन तक पहुचने का संकल्प अतीव होता है !
प्रकृति छेड़-छाड़ से तंग आ चुकी है ...
सुख रहे हैं जलश्रोत
मनुष्यता का यूँ तार तार हुआ जाना ...
क्या चेतन जगत
इस कदर निर्जीव होता है?!!!

हम समस्यायों और प्रश्नों से
वैसे ही घिरे हुए हैं ...
जिस तरह
किसी जलश्रोत को घेरे भीड़ खड़ी हो
समाधान भी होगा जरूर....
आखिर
हममे से ही तो कोई
दृढ उत्तर सा सजीव होता है!

एक अकेला सरल सा उत्तर
सारे प्रश्नों का हल होगा ....
हौसले की बात हो...
पानी का क्या ...
अरे! क्या हर पल
हमारी आँखों में ही नहीं
उनका अक्स आंसू बन कर
सजीव होता है ?!!!

अश्रु ढलते दृगों को
हास से परिचीत कराना है
झिलमिल बूंदों से ही
तो इन्द्रधनुषी संसार सजीव होता है !
ज़रा सी संवेदना जागे...
एक दुसरे के सुख दुःख के प्रति सरोकार हो
जीवन इन छोटे छोटे उपादानो से ही तो
सांस लेता है... चलता है ... सजीव होता है !

सफ़र

सफ़र में होंगी
रूकावटे...
राह में होंगी
तमाम मुश्किलें!
सच है!कांटो की
उपस्थिति भी महसूस होगी
जरूरी तो नहीं
हर पल
फूल ही फूल खिलें!!

विरोधाभास भी होंगे
मतभेद भी होगा...
चांदनी
हर निशा को
शायद ही मिले!
टहनियां टूटती हो
तो टूटें...
पत्ते भी पीले हों...
पर जडें कभी न हिलें!!

साथ होने के लिए
साथ हंसने
साथ रोने के लिए
बिंदु-दर-बिंदु समानता
कहाँ जरूरी है!
सागर की कलकल...
पवन की हलचल-
दोनों दो बातें हैं
पर उनमे कहाँ कोई दूरी है!!

आपके ही आसपास से
प्रेरणा हवा में तैरती
हम तक आती है
ऐसे में लिख जाते हैं शब्द:
आपकी प्रेरणा के बिना-
हर कविता मेरी अधूरी है!
जब तक प्रेरक एक भी सांस बाकी है...
तब तक सृजन की
संभावनाएं पूरी हैं!!

हे!मित्रों!
ऐसे ही
हमारा
साथ-साथ
चलना हो!
आपकी
स्नेह भरी छाँव में
हमारा...
गिरना और सम्हलना हो!!

हे! जगदीश्वर .... हे! कृष्ण

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
केवल इतनी शक्ति दो कि हम दर्द सबका समझ सकें ..
क्या पीड़ा है ...क्या दारुण व्यथा, सब खुलकर तुझसे कह सकें ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
तेरे भक्तों की परिधि में मेरा भी एक नाम रहे ..
इतना तो करना प्रभु ...कि आ जाना सुदर्शन लेकर जब अकेली गम की शाम रहे ..

हे! जगदीश्वर...हे! कृष्ण
तेरी लीला से भिन्न कुछ भी नहीं, ये समझा दे ..
सकल आत्माओं की समस्त व्यथा मेरे भीतर आज जगा दे ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
तेरी छवि अभिराम है, फिर आँखों में मेरे रूप अनंत क्यूँ नहीं ..
मुट्ठी में मेरे केवल पतझड़ ...सावन या बसंत क्यूँ नहीं ..

हे! जगदीश्वर....हे! कष्ण
तुम कहवा रहे हो हमसे प्रभु ...प्रज्ञा को यह आभास हो ..
तुम तक पहुँचने का ...अच्युत मेरा प्रयास हो ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
देखना शक्ति तुम्हारी नए आयाम पायेगी ..
भक्ति का प्रसाद दे दो ...आत्मा तेजपूर्ण प्रकाशमय हो जायेगी ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
सभी प्रार्थनारत हैं, मेरी भी विनती सुनना ..
आशीषों का हाथ हमारे सर हो ...हो हमारा काम औरों की राह के कांटे चुनना ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
जो भी शक्ति दी ...उसका हमको भान करा दे ..
जो भूल गया है इस चक्र में पड़कर ...वो पावन ध्येय ध्यान धरा दे ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
आत्मविश्वास की वह धारा निकले जिससे ...ब्रह्माण्ड प्रकाशित हो जाये ..
थोडा तो कमाल दिखा प्रभु.. ये कलयुग बैठा है कबसे तेरी दयालुता पर नजर टिकाये ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण

नाता

यह रचना एक दशक पूर्व कभी लिखी गयी थी ... आज भी कई भाव जुड़े हैं इस कविता से!


" नाता "

रिश्तों के बियाबान जंगल में ..
एक नाता ऐसा भी है .. जो समयसीमा में कैद नहीं
सदियों का कालचक्र जिसमे स्वयं निहित है
जुड़ जाने पे यह रिश्ता मोक्ष तक ले जाता है .. ऐसा सर्वविदित है
फिर भी यह नाता क्यूँ विस्मृत है ?
शब्दों में नहीं समा सकता आत्मा-परमात्मा का चिर सम्बन्ध !!!!!
ये वो दुर्लभ अनुभव है .. नहीं प्राप्त कर सकते जिसे लोग मदान्ध!!!!!

शब्द रचे कुछ सस्वर!

कृष्ण भक्ति की धारा में
शब्द रचे कुछ सस्वर!
जीवन की क्या बिसात
ये माटी तो है नश्वर!!

एक एक मोती पिरोकर
एक माला भावों वाली!
हमने भी मुरलीवाले के चरणों में
अर्पित कर डाली!!

सकल काँटों को कर विस्मृत
पुष्प का तेज हुआ प्रखर!
प्रभु गुण के गान से
धन्य हुए अधर!!

ऐसी ही बातें हो
मधुरता हो बांसुरी वाली!
भक्ति भाव के पुष्पों से
लहलहाए डाली डाली!!

स्वार्थ के कारागार से
आत्मा मुक्त हो इसी पहर!
आज से कलुषता विलुप्त हो जाये
ऐसी चले लहर!!

राधा-मीरा सा प्रेम
भक्ति चैतन्य महाप्रभु वाली!
भाव सुधा का प्याला औ'
झूमती हुई हृदयकुञ्ज की हर डाली!!

ऐसा अद्भुत हो वातावरण
तो कालचक्र भी जाये ठहर!
कृष्ण भक्ति की धारा में
शब्द रचे कुछ सस्वर!!

कविता का सफ़र चल निकला ....

जीवन का ताना-बाना बुनने को जब मन मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....
हम जीवन-गीत गाते हैं ...
कवि नहीं हैं,मगर
रेगिस्तान में जल की आस जागते हैं ...
यूँ ही स्पंदित हुआ हृदय और शब्दों का हिय मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....


ढलती हुई शामों को जब कोई याद बन आता है ...
मानस की देहरी पर चुपके से ...
द्वार खटखटाता है ...
बीती बातों का एक समंदर ...
जब लहरा कर हृदय पे छाता है ...
तो आगे बढने की उत्कट लालसा से
स्वतः साक्षात्कार हो जाता है ...
अतीत के गर्भ से ही जन्मी वर्त्तमान की ये प्रेरणा है ..
यही से भविष्य का है "कल" निकला ...
समय की धुरी पर,दिन की ताक में,रात्री का सफ़र चल निकला ...


जीवन का ताना-बाना बुनने को जब मन मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....
हम जीवन-गीत गाते हैं ...
कवि नहीं हैं,मगर
रेगिस्तान में जल की आस जागते हैं ...
यूँ ही स्पंदित हुआ हृदय और शब्दों का हिय मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....

अगले मोड़ तक हमारा साथ अभी बाक़ी है...!

कई बातों की
बात अभी बाक़ी है...
कुछ पहर शेष है,
रात अभी बाक़ी है...


पर रात बीतेगी, उसे बीतना ही होगा...
अहले सुबह की शुरुआत अभी बाक़ी है...


हर तरफ
हौसलों के टूटने का
दौर ही अगर चल पड़ा है...
तो टूटने को तो पूरी ज़मात अभी बाक़ी है...


अंधकार को विदा होना ही होगा...
मेरी आँखों में सपनो की बारात अभी बाक़ी है...


क्यूँ करते हो
अभी से जाने की बातें...
अगले मोड़ तक
हमारा साथ अभी बाक़ी है...


कई बातों की
बात अभी बाक़ी है...
कुछ पहर शेष है,
रात अभी बाक़ी है...


पर रात बीतेगी, उसे बीतना ही होगा...
अहले सुबह की शुरुआत अभी बाक़ी है...!!

एक धागा भेजा है!

भ्रातृत्व और अपनत्व के भाव से सकल संसार ही अनुप्राणीत है.....: हृदय के उद्गार हर उस रिश्ते के लिए जिसकी प्रेरणा इन शब्दों की आत्मा है :-


भावों से परिपूर्ण.., भाव रूप में ही
एक धागा भेजा है!
जीवन के कई सांझ-सवेरों के अनुगूंज को-
शब्दों में सहेजा है!!

इन्ही शब्द विम्बों में
अपनी राखी...
पा लेना भैया!
हमारी दूरी
पाट ली जाएगी...
चल पड़ी है जो..,भावों की नैया!
अविचल चलते राहों पर
कवच शुभकामनाओं का...
तेरे भीतर विराजते शिव ही तो स्वयं है..,तेरे खेवैया!
सबकुछ शुद्ध अटल है तो
पहुंचेगा ज़रूर तुम तक....
इतना कहते हुए अब तो आँखों से..,बह चली है गंगा मैया!

अब विराम देती हूँ अपनी वाणी को
सहेज लेना जो इस अकिंचन ने भेजा है!
जीवन के कई सांझ-सवेरों के अनुगूंज को-
शब्दों में सहेजा है!!

क्यूँ??? एक प्रश्न माला!

पूछेंगे तुमसे हम ..
एक रोज़ ... भगवन !

जीवन में खुशियों का भरम
क्यूँ है आसमान की आँखें नम
क्यूँ बिकती है दुकानों में
रखी हुई आस्था बीच सामानों के
क्यूँ जगमगा रहा है मंदिर तेरा
जब चहुँ ओर है छाया अँधेरा
काहे इतनी घी की बातियाँ यहाँ जलती हैं
और उधर दीन-हीन साँसे अंधकार की लौ में पलती हैं
शाषण क्यूँ दुशासन का दास है
किसने सौंपी नरभाग्य की कुंजी उसके पास है
तेरी मूर्ति के सत्कार में हर भक्त लगा रहता है
वहीँ मूर्तिकार भूखे ही सब सहता है
स्वार्थ जब मानव काया में प्रविष्ट हुआ
तब नियति ने अपना विरोध क्यूँ नहीं स्पष्ट किया
मोह निशा का अंधकार हर पल छलने में पारंगत है
फिर क्यूँ हमारा हृदय निर्मोही जीवन का ही शरणागत है
क्यूँ ये अंधी दौड़ न जाती थम
इतना क्लिष्ट क्यूँ है अंतर्मन

पूछेंगे तुमसे हम ..
एक रोज़ ... भगवन !

कविता

बनती रहे कविता . .
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
भाव नित परिमार्जित होता रहे अपने वेग से
लेखक और पाठक .. संवेदना के एक ही धरातल पर हो खड़े
भेद ही मिट जाये .....
फिर सौंदर्य ही सौंदर्य है इस विलय में !!!!

जीने के लिए जमीन के साथ-साथ ..
आसमान का होना भी जरूरी है
धरती पे रोपे कदम ... सपने फ़लक पे भाग सकें
फिर सृजन की संभावनाएं पूरी हैं
हो विश्वास का आधार .. हो स्नेह का अवलंब
नहीं तो नैया डूब जाती है संशय में !!!!

बहती रहे कविता सरिता की तरह ..
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
जीवन की आपाधापी में कुछ क्षणों का अवकाश हो
कुछ लम्हे एकाकी से पास हो
निहारने को आसपास बिखरी अद्भुत रश्मियाँ ..
और डूब जाने को विष्मय में !!!!

यही तो सहेजा जायेगा ..
और शब्दों में सजकर नयी आभा में प्रगट हो पायेगा
एक पल की अनुभूति का मर्म
विस्तार को प्राप्त हो नीलगगन की गरिमा पायेगा
ये कालजयी भावनाएं ही बच जाएँगी ..
नहीं तो .. यहाँ कहाँ कुछ भी बच पाता है प्रलय में !!!!!!!!!!

प्रेरणा और गीत

हम तो श्रीहीन हो सोये थे..
ऐसे में कोई लिख रहा था उजालों को!
शब्दों की व्यथा हर संघर्षरत प्राणी की व्यथा है..
अपने गीतों का सारा श्रेय चलनेवालों को!!

कहीं इस कविता को पढ़ने वाले पहले व्यक्ति की ही ये प्रेरणा तो नहीं
ये अद्भुत बात है, कहीं लिखनेवाले से पढ़नेवाला ही बड़ा तो नहीं
विचारों का मंथन जरूरी है...
लिखा जाना पर्याप्त नहीं, लिखने वाला और पढ़ने वाले विचारमग्न हों
तब कथनी और करनी की खाई को पाटने की सम्भावना पूरी है
इस दिशा में प्रयास हो...
हमारे उद्देश्य किन्ही अर्थों में भिन्न तो नहीं
जो मेरी बात... वही तेरा कथ्य... कोई भी खिन्न तो नहीं

हम तो श्रीहीन हो सोये थे..
ऐसे में कोई लिख रहा था उजालों को!
शब्दों की व्यथा हर संघर्षरत प्राणी की व्यथा है..
अपने गीतों का सारा श्रेय चलनेवालों को!!

हमारे बीच एक कविता बहती है!

कविता
कैसे बनती है
कैसे वह हृदय से
बह निकलती है
इस विस्मय में
कई युग बीत जाते हैं,
कई कल्पों तक
शामें ढलती हैं!
आज कौन से
मन मयूर की
झांकी दिखाई जाये!
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये!!

गीत कहे जब छंदों से
रे! तू मेरी प्यारी बहना
आँधियों में जला जो दीपक
उसके तिमिर विजय का क्या कहना
हौसलों के दम पे
ज़िन्दगी जी जाती है,
बातों बातों में ही
कोई दिव्य बात निकल आती है!
तब तक चलो
अनुभूति की धूल
फाँकी जाये!
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये!!

संवेदना का
एक ही धरातल हो
कहने वाला जितना रोया
सुनने वाला भी उतना ही द्रवित उतना ही घायल हो
तब जाकर
काव्य की धारा बहती है,
हर क्षण हमें आबद्ध किये
एक कविता रहती है!
हृदय सुने
और हृदय से ही
शब्द सरिता बांची जाये!
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये!!

नहीं लिखना चाहते हम ...

नहीं लिखना चाहते हम ...
पर अनायास बन जाती है कविता
नहीं बहना चाहते हम ...
पर हर बार बन जाते है हम निर्बाध बहती सरिता
नहीं बदलना चाहते परिवेश हम ...
पर हर पल छिड़ी रहती है अंतस में लड़ाई
अन्दर कुछ है
जो करने लगता है मटियाने वाली प्रवृति पर चढ़ाई
चहुँ ओर फैली अराजकता ...और -
इंसानी बेबसी को महसूस आद्र हुए जाते हैं
समस्यायों को देख ..
हम अंधेपन का स्वांग नहीं भर पाते हैं
इसलिए
अब इस राह की यंत्रणाओं को तहे दिल से स्वीकार लिया है ..
मन मंदिर में एक नन्हा दीप जला लिया है ..
जब जीना ही चाहती है कविता ..
मानस की उत्प्रीड़क यात्राओं से उत्पन्न दुहिता ...
तो क्यूँ न सृजन की राह पे नन्हे कदम बढ़ाये जाएँ ..
कुछ संवेदनशील ... कुछ ओस की बूंदों से निर्मल गीत गाये जाएँ ..
अनिश्चितता की स्तिथि से -
दूर आ चुके हैं ..
अब रुकना नहीं है ..; चौराहे पे खड़े खड़े -
हम पहले ही कई कीमती पल गवां चुके हैं
आज आप भले ही इन विम्बों से हो सहमत नहीं .....
पर इतना तो स्वीकारो ....... कि यह प्रयास गलत नहीं .....
कौन जाने -
आपकी ज़रा सी सार्थक पहल हमे दृढ कर जाये !
संभावनाओ का आकाश बहुत ऊंचा होता है -
संभव है कल को ये भाव ही ....,रेगिस्तान में भटकती कृशकाय आत्माओं की रीढ़ बन जाये !!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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