अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सबकी एक सी पीर है...!

स्वप्न और सच्चाई के बीच
एक सूक्ष्म सी लकीर है...!

उस सीमा की तलाश व्यर्थ,
खोने-पाने के गणित से परे-
जब मन ही फ़कीर है...!

क्षितिज पर डूबता सूरज और
उगती हुई लाली पर क्या लिखें-
जब धरती पर छाई समस्याएं गंभीर है...!

क्षमता ऐसी,कि पर्वत लाँघ ले
हौसला ऐसा,कि सागर बाँध ले
फिर भी यहाँ कईयों से रूठी तकदीर है...!

मुक्त होना अगर चाहे-
तो बस पल भर की ही बात है,
हमारी अपनी सीमित सोच ही पाँव की जंजीर है...!

सकल कर्तव्यों के संपादन हेतु-
इसी पल उद्धत हों मन प्राण,
समय नहीं रूकने वाला,हर क्षण मिट ही रहा शरीर है...!

संग्रह की गयी सब उपलब्द्धियां
सारे सामान...यहीं रह जाने हैं
आवाजाही के इस चक्र में सबकी एक सी पीर है...!

भेद सारे यही समाप्त हों जाते हैं
उस दरबार के समक्ष-
सब याचक...सब फ़कीर हैं...!

स्वप्न और सच्चाई के बीच
एक सूक्ष्म सी लकीर है...!

8 टिप्पणियाँ:

M VERMA 29 सितंबर 2010 को 2:55 pm  

स्वप्न और सच्चाई के बीच
एक सूक्ष्म सी लकीर है...!
सुन्दर भाव

Majaal 29 सितंबर 2010 को 4:25 pm  

एक एक कलाम आपका,
लगा है जैसे तीर है ..

बहुत खूब, लिखते रहिये ....

anju 29 सितंबर 2010 को 6:12 pm  

सबकी एक सी पीर हे ...........बहुत लिखा हे अनुजी

hem pandey 29 सितंबर 2010 को 7:03 pm  

स्वप्न और सच्चाई के बीच
एक सूक्ष्म सी लकीर है...!

- इस लकीर को मिटा दीजिये स्वप्न साकार हो जायेंगे |

मनोज कुमार 29 सितंबर 2010 को 8:54 pm  

क्षितिज पर डूबता सूरज और
उगती हुई लाली पर क्या लिखें-
जब धरती पर छाई समस्याएं गंभीर है...!

अनुपमा जी आपकी कविता समय के सरोकार केवल पहाड़ नदी से नहीं, कहीं न कहीं पूरे भूमंडल से जुड़े हैं।

jai kallikkal 30 सितंबर 2010 को 11:17 am  

Swapn aur Sachhai ke beech
Dil aur jeevan ki taqdeer hai
Kathinaiyon mein hon to lagta hai sacchai hai
Kushion mein rahoon to sach bhi swapn ban aai hai!
Tehra ek faqeer
Woh mai, jo khada hoon upar
jiske woh lakeer.

अरविंद पाण्डेय:Aravind Pandey's blog : परावाणी 30 सितंबर 2010 को 12:12 pm  

bahut sundar hai anupamaa.

हरकीरत ' हीर' 1 अक्तूबर 2010 को 11:51 am  

क्षितिज पर डूबता सूरज और
उगती हुई लाली पर क्या लिखें-
जब धरती पर छाई समस्याएं गंभीर है...!

.वाह ...अनुपमा जी बहुत अच्छी रचना ......!!

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