अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मीलों चलना है अभी!

हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए
लिखने बैठते हैं जब भी हम
तो कचोटने लगता है गम ही गम
कभी भूख से बिलखती आत्माओं का दर्द रुला देता है
तो कभी कहीं किसी के झुके कन्धों का बोझ मुस्कुरा देता है
हम बेबसी को काव्यात्मक वैभव की वस्तु नहीं बना सकते
अश्रु ढलते दृगों की तस्वीर हम दीवारों पे नहीं सजा सकते
इसलिए-
हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए
विस्तार का दौर है यह
कथनी और करनी में फर्क की आखिर क्या है वजह
यह सोच कर हृदय द्रवित होता है
हमारी संवेदना का रथ अक्सर बिन पहियों का ही क्यूँ होता है
श्रृंखला में कड़ी जोड़ने को प्रयासरत हैं
शब्दों के मायाजाल से मुक्ति हेतु मौन की महिमा के शरणागत हैं
इसलिए-
हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए
कविता जीवन का सेतु है
सुख दुःख में तठष्ट रहने हेतु है
पर फिर भी मुझे मात्र कविता लिखने के लिए कविता नहीं लिखनी है
अंतर के श्रोतों को प्रगट कर जीवन के ध्येय की गरिमा ही सिंचनी है
पहले जरा सुधरने-सुधारने दो आसपास बिखरी विकृत छवि
अगर ये ध्येय सफल होता है तब ही है कोई सफल कवि
इसलिए-
कुछ एक पंक्तियाँ पढ़ कर मत कह देना मुझे कवि!
अभी तो शुरुआत हुई है...मीलों चलना है अभी!!

7 टिप्पणियाँ:

Navin C. Chaturvedi 6 सितंबर 2010 को 12:54 pm  

mast mast kavita hai anu. sach men kavi hona ka tatpary vivechit karti hui jiti jagti kavita hai ye.............

राजभाषा हिंदी 7 सितंबर 2010 को 5:34 am  

संवेदनशील रचना।

हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।

हिंदी और अर्थव्यवस्था, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

anupama 7 सितंबर 2010 को 6:30 am  

dhanyavad naveen ji...
bahut pahle likhi thi ... school ke dino mein;
jitna smaran hua.. punah likha;
u appreciated this thought process,i m glad!

anupama 7 सितंबर 2010 को 6:32 am  

@rajbhasha hindi
dhanyavad!

मनोज कुमार 7 सितंबर 2010 को 7:05 am  

हम नहीं लिखते मनीषियों विद्वानों के लिए ..
अपने छंद तो बस है दीवानों के लिए ..
बहुत सही है, काव्य रसिक और आम जन के लिए लिखना चाहिए।

गीली मिट्टी पर पैरों के निशान!!, “मनोज” पर, ... देखिए ...ना!

anupama 7 सितंबर 2010 को 1:19 pm  

dhanyavad manoj ji...
had been to the link suggested,shabd chandan ne bhaavvibhor kiya!

Aparna Manoj Bhatnagar 10 सितंबर 2010 को 7:36 am  

Miles to go before I sleep !
This reminds me of Robert Frost... Forest are lovely dark and deep ....

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