अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कविता का सफ़र चल निकला ....

जीवन का ताना-बाना बुनने को जब मन मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....
हम जीवन-गीत गाते हैं ...
कवि नहीं हैं,मगर
रेगिस्तान में जल की आस जागते हैं ...
यूँ ही स्पंदित हुआ हृदय और शब्दों का हिय मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....


ढलती हुई शामों को जब कोई याद बन आता है ...
मानस की देहरी पर चुपके से ...
द्वार खटखटाता है ...
बीती बातों का एक समंदर ...
जब लहरा कर हृदय पे छाता है ...
तो आगे बढने की उत्कट लालसा से
स्वतः साक्षात्कार हो जाता है ...
अतीत के गर्भ से ही जन्मी वर्त्तमान की ये प्रेरणा है ..
यही से भविष्य का है "कल" निकला ...
समय की धुरी पर,दिन की ताक में,रात्री का सफ़र चल निकला ...


जीवन का ताना-बाना बुनने को जब मन मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....
हम जीवन-गीत गाते हैं ...
कवि नहीं हैं,मगर
रेगिस्तान में जल की आस जागते हैं ...
यूँ ही स्पंदित हुआ हृदय और शब्दों का हिय मचला ...
तब अनायास ही कविता का सफ़र चल निकला ....

8 टिप्पणियाँ:

वन्दना 29 अगस्त 2010 को 11:34 am  

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (30/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

anupama 29 अगस्त 2010 को 12:49 pm  

:)

अशोक बजाज 30 अगस्त 2010 को 4:39 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
धन्यवाद !

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) 30 अगस्त 2010 को 6:09 am  

बहुत सुन्दर ....जब जब अंतस में आग लगी...कविता का सफ़र चल निकला| बहुत भावपूर्ण कविता|

शोभना चौरे 30 अगस्त 2010 को 9:15 am  

bahut achhe bhav

anupama 30 अगस्त 2010 को 11:06 am  

dhanyavad ashok ji, rana ji, shobhna ji

सुरेश यादव 30 अगस्त 2010 को 4:11 pm  

अनुपमा जी ,आप की कविता सुन्दर है बधाई.

anupama 31 अगस्त 2010 को 4:58 am  

dhanyavad suresh ji!

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ