अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अलविदा....

कहते हैं, हम स्वर्ग में रहना कहते हैं या नरक में , इसका निर्णय हमें स्वयं करना है!
अपने कदमो तले की धरती और सर पर मुट्ठी भर आकाश की दुनिया .... जो हमारी है , उसे अपनी शक्तियों से स्वर्ग बनाने का दायित्व भी हमारा ही है ! ऐसी ही किसी भावदशा में ये कुछ पंक्तियाँ लिखी थी कभी .... आज स्मरण हो आयीं !


अलविदा....
काँटों से पाटी हुई दुनिया
हम तो चले बसाने लहलहाती हुई दुनिया!
जिस पड़ाव से ...
आत्मा स्नेहसूत्र में... अनायास बंध जाये
अलविदा कहते हुए भी दिल जिसे अलविदा कभी न कह पाये-
ऐसी सुन्दर ... खिलखिलाती हुई दुनिया !!
हो लो साथ हमारे ...
हम दिखायेंगे तुम्हे ,
स्वर्ग को भी अपने चरणों में झुकाती हुई दुनिया !!!

9 टिप्पणियाँ:

माधव 8 सितंबर 2010 को 9:48 am  

बढ़िया

मनोज कुमार 8 सितंबर 2010 को 6:54 pm  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

देसिल बयना-खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई!, “मनोज” पर, ... रोचक, मज़ेदार,...!

राजभाषा हिंदी 9 सितंबर 2010 को 2:29 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।

काव्य प्रयोजन (भाग-७)कला कला के लिए, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

anupama 9 सितंबर 2010 को 5:39 pm  

dhanyavad!

दीपक 'मशाल' 11 सितंबर 2010 को 7:56 pm  

बहुत सुन्दर सोच का नज़ारा दिखता है इस कविता में.. एक सकारात्मक सोच के साथ बढ़िया शब्दों से सजी कविता..

anupama 12 सितंबर 2010 को 1:37 am  

dhanyavad deepak ji!

Vinay Sharma 14 सितंबर 2010 को 8:03 am  

achhi kavita he

संजय भास्कर 19 सितंबर 2010 को 9:22 am  

बहुत सुन्दर सोच

rafat 23 मई 2015 को 6:13 pm  

अलविदा कहते हुए भी दिल जिसे अलविदा कभी न कह पाये...kyaa hi acchi pankti hai.puri kavita dil mein utrti hai waah.shukriya

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