अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

इन दिनों...

एक बूँद आंसू में
झलकता रहा समंदर...
कितनी बेचैन लहरें
लहराती हैं अन्दर... 


तट की गीली मिट्टी में
थाहते रहे 

खोया हुआ सुकून...
तलुओं की अनुभूति अलग
कुछ अलग सी ही है 

मन की भी धुन... 


हवा के आँचल में
है टंकी हुई 

बेचैनियाँ...
लहरों के शोर में
है पसरी हुई 

खामोशियाँ... 


अपना पता भूले हुए
हम इस मौन में
अपनी बात तलाश रहे हैं...
लौटने की राह ओझल है
इस तथ्य से
बीते दिनों हम बड़े हताश रहे हैं !


इन दिनों


एक रास्ता उकेर रहे हैं 

कल्पना की सरहद पर...
जी रहे हैं एक मौन 

कविता में...


इस तरह सांस लेते रहने की गुंजाईश बचा रखी है हमने !! 

समंदर सी गहरी है पीड़ा...

पहाड़ से दुःख हैं...
समंदर सी गहरी है पीड़ा...


मुट्ठी से
रेत की तरह
फिसलते दिख रहे हैं रिश्ते...


इतना दर्द
कि आंसू सूख जाए...


ऐसी बेचैनी
कि 'जीवन'
जीवन न रह जाए...


सोचा न था 

कि इतना दुरूह भी हो सकता है समय...
इतनी निर्मम भी हो सकती है नियति की क्रीड़ा...


ओह! पहाड़ से दुःख हैं...
समंदर सी गहरी है पीड़ा...

अनकहा सा कुछ

जो कहे जाने से रह गयीं
वे बातें अनमोल हैं   


अनकही रहीं
बचा रहा उनका आत्मिक स्पंदन 


उच्चरित होते ही शायद
गुम जाता अर्थ
कहीं कोलाहल में !


ठीक ही है
बहुत कुछ अनकहा रहना
आखर-आखर भावों को तहना 


कि किसी रोज़ मिलेंगे बिछड़े हुए रस्ते 

हो जायेगा सब अभिव्यक्त फिर आँखों के खारे जल में !
















इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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