साथ ही हैं...!
कश्तियाँ
ज़िन्दगी जब मुस्कुरा रही हो
जब कभी
कुछ यूँ रखना
जैसे,
जो नमी है
कहीं न कोई
देखना,
बस यूँ ही
साथ चलें...!
चलो ऐसा करें
साथ चलें...
इन हवाओं में बिखरे
जो संदेशें हैं,
उन्हें
एक एक कर बांचें...
और उनसे जुड़ते चले जाएँ...
चलो ऐसा करें
शाम ढले...
ढलते सूरज को
एकटक देखें,
गढ़ें
मन ही मन सुकून...
और उसमें डूबते चले जाएँ...
चलो ऐसा करें
साथ चलें...
कोहरे में जो उदासी है
उसमें कतरा कतरा सिमटते हुए,
समेटें
वहीँ से ख़ुशी का कोई राग...
और उससे जुड़ते चले जाएँ...
कि
जुड़ना
हमारी नियति है...
सहज प्रकृति है...
ज़िन्दगी! तू हर बार जीतती है...
तू हमेशा ही जीती है
तेरी मुझसे... मेरी तुझसे
अनन्य प्रीती है...!
घर की ओर देखते हुए...!
एक आंसू...
एक मुस्कान...
दोनों के प्रतिमान
दिख रहे हैं मुझे
आसमान से गिरते
बर्फ के फ़ाहों में...
अपने घर से बहुत बहुत दूर
जहां बैठी हूँ मैं
वहाँ से खुलती हुई खिड़की
मुझे दिखाती है
दृश्य कई कई
रोज़ रंग बदलता है मौसम
रोज़ कोहरे से कोई नया सत्य प्रगट हो आता है
बरसती बूँदें हर बार कुछ नया गा जाती हैं
दूरी का एहसास जगा जाती हैं
घर--
कहीं क्षितिज पर
टिमटिमाते तारे सा हो जाता है...
दूर इतना
कि पहुँच कर भी
कोई वहाँ कहाँ पहुँच पाता है...
विदा होता हुआ समय
अपने साथ ले जाता है
हमारा बीता हुआ जीवन
और वे पथ भी नहीं रहते यथावत
जिनसे उस जीवन तक राह जाती थी
उन पर यूँ उग आते हैं
बदली प्राथमिकताओं व विवशताओं के जंगल
कि नहीं रहता कहीं कोई अस्तित्व पथ का...
वो पथ ही नहीं रहे
तो उनपर चलना कैसे होगा...!
यादों की गली में सुरक्षित
हर सुख दुःख जो भी हमने भोगा...!
इन बर्फ के फ़ाहों को
गिरते हुए देख रही हूँ...
कहीं से विदा हो
कहीं पर आ रहे हैं...
आसमान की देहरी लांघ कर
धरा का आँगन सजा रहे हैं...
ये भी--
कभी नहीं लौट पायेंगे
अपने पूर्ववत रूप में पुनः अपने घर...
नियति
यही होगी उनकी
धरा पर बिछे हुए निर्निमेष देखेंगे अम्बर...
हम बेटियों की तरह...
विदा होते हुए हम
सब तो पीछे छोड़ आते हैं
फिर हम ही हम कहाँ रह जाते हैं
वो घर वही रहता है उतना ही स्नेहिल
पर हमारे लिए क्षितिज का
टिमटिमाता तारा हो जाता है...!
वो हम तक आ भी जाए
हमारा उसतक पहुंचना कहाँ हो पाता है...!
कैसे कैसे मोड़ आते हैं न
जीवन की राहों में...
एक आंसू...
एक मुस्कान...
दोनों के प्रतिमान
दिख रहे हैं मुझे
आसमान से गिरते
बर्फ के फ़ाहों में...
समय की शिला पर...!
मुरझाते हुए
खिलते हुए...
कोहरों में
मिलते हुए...
कोहरे से ही
निकलते हुए...
अजानी राहों के
राही हम...
जुदा डगर पर
चलते हुए...
सपनों की तरह
नयनों में पलते हुए...
एक अरसे बाद
मिले हम...
दोनों की ही आँखें नम...
ये अब हुआ शुरू
और...
और पलक झपकते ही
हो गया समापन
कहते हैं,
है चार दिन का जीवन
तो...
इस गणित से तो
बीत ही चुका है न
लम्बा समय,
बीत ही चुके हैं
आधे हम...
अब
जो आधे-अधूरे बचे हैं
वह न अपरिचय के अँधेरे में
जाए बीत...
हे कविते! हे जीवन!
थाम लेने दे अपना दामन
कि समय की शिला पर
रच जाए कोई
सतत सम्भावनाओं का गीत...!
अजाने फ़लक की तलाश में!
