रह जाता है
एक अंतहीन मौन!
इंसान
चला जाता है
मगर
अपने पीछे
छोड़ जाता है
अनगिनत यादें
अपार शून्य
असह्य वेदना
और
एक अंतहीन मौन
जिंदगी
चलती चली जाती है
लांघते
अनगिनत फासले
पार करते हुए
कई पड़ाव
और
अंतिम क्षण में
हो जाती हैं
सारी बातें गौण
चक्र यह
यूँ ही चलता है
राही राह बदलता है
रह जाती हैं राहें
चलने वाला तो
चल ही देता है;
पूर्वनिर्धारित
इस घटनाचक्र का
जाने
है नियंता कौन
रह जाता है
एक अंतहीन मौन!
एक अंतहीन मौन!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
25 अक्टूबर 2010

15 टिप्पणियाँ:
जीवन चक्र की निर्धारित व्यवस्था का मार्मिक चित्रण
"चक्र यह
यूँ ही चलता है
राही …. राह बदलता है
रह जाती हैं राहें … चलने वाला तो
चल ही देता है; पूर्वनिर्धारित
इस घटनाचक्र का …. जाने है नियंता कौन
pradeep Singh Chauhan
Pradeeprau786@gmail.com
अंतिम क्षण में
हो जाती हैं
सारी बातें गौण
राही राह बदलता है
रह जाती हैं राहें
चलने वाला तो
चल ही देता है;
पूर्वनिर्धारित
इस घटनाचक्र का
जाने
है नियंता कौन
yahi soch kar man bol padta hai he agyat vichata tujhe pranam.
bahdai sundar kavita prastut karne ke liye anu.
जिंदगी
चलती चली जाती है
लांघते
अनगिनत फासले
पार करते हुए
कई पड़ाव
और
अंतिम क्षण में
हो जाती हैं
सारी बातें गौण
'आनंद' का एक गाना याद आ गया...''जिंदगी कैसी है पहेली हाय...कभी तो हंसाये..कभी ये रुलाये...'
कुल मिलाकर सत्य को उद्घाटित करती एक बेहतरीन प्रस्तुति.
काश आप के जैसा लिखना मैं भी सीख जाऊं.
राही राह बदलता है
रह जाती हैं राहें
चलने वाला तो
चल ही देता है;....ये पल जो छोड़ जाते है ...बस ये ही उस की महानता है ... अनु जी आप की इस कविता ने मुझे अपने खुद के बारे में विचलित किया है ...और अभी थोड़े दिन पहले मैने अलोक जी की ये पंक्तियाँ सहेज कर राखी थी और मैनें आपने प्रोफाइल पर भी डाली थी शायद आप का उन दिनों ध्यान नहीं गया था उस को मैने अपने forefathers की याद में ले थी श्राहद पक्ष में alok ji ka qt. ...."""हम तो अब एक शून्य में अटके हुए हैं और तुम जीवन-कथाएं लिख रहे हो। यदि समय मिले, तो हमारी इस व्याकुलता का उत्तर भी लिखना कि क्यों हम जैसे माता-पिता को मरणोपरांत ही मिलता है वह आदर-समर्पण, जिसके हम जीते-जी अधिकारी थे। क्यों उम्र के अंतिम सोपान पर हम एकाकी हो जाते हैं। किसी आश्रम, देवालय या घर के किसी किनारे-कमरे में सिमट जाते हैं। अपने ही समय में बीते हुए समय-सा हो जाते हैं।जीवन में अनगिनत प्रसंग बनाए, फिर भी हमने अपना अप्रासंगिक होना भोगा..? हालांकि किसी ने हमारे दर्द को शब्द दिए, तो किसी ने अपनी संवेदना इन पंक्तियों में व्यक्त की-‘जाती हुई धूप संध्या की सेंक रही है मां ,...अपना अप्रासंगिक होना देख रही है मां"
......बहुत धन्यवाद ..एक सुन्दर कविता के लिये
Bilkul yatharth chitran hai "ek anthin moun"mere dil ke tar kshankrit ho gaye .......kabhi mai bhi is anthin maoun ka sakshi raha hu.......yadon ne aankhen nam kar di...anu .hadso ne is ananthin moun ki chupi "Vipsna" ne todi thi ....dhanybad Bahan.....
anginat yadye aaapar shunya ashyya vedna .....anu ji jivan ka such he apno ka milna ,sath-sath jivan ki dagar par chalna bichudna our uske baad pathraiy ankho se shunya me anvrat takte rahna ... kisi apno ke dur chale jane ki vedna ka sundar samawesh he , dard he
शायद यही तो है सभी की मंजिल!
--
रचना के भाव सोचने को बाध्य करते हैं!
हमारी अंतहीन यात्राओं की परिणति मृत्यु ही है जो हमारे सामने अंतहीन मौन बन कर आती है और हमें अपने जीवनों में झांकने और सोचने के लिए विवश कर देती है. मृत्यु की पहेली को कभी सुलझाया नहीं जा सकता है, मगर फ़िर भी इस का ख्याल हमारे मन को मथता रहता है. इस वेदना और दुख को बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से उकेरा गया है. आभार.
सादर,
डोरोथी.
Your blog is very pretty!
हम्म......
गहन चिंतन...!
वाह , क्या कहूं इतने कम समयांतराल में इतना कुछ कैसे लिख पाती हैं आप...
बेहतरीन..
मेरे ब्लॉग में इस बार अग्निपरीक्षा ....
@ BLIKUL SAHI KAHA ROOPCHAND JI NE
शायद यही तो है सभी की मंजिल!
anupama ji aapke blog per bahut hi behataren kavita padhne ko mili thanks
very nice
excellent !
aapko our bhi mnn krna chahungi kyon ki bhavnaye bhut nishchhl lgi .
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