अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हर 'है' को एक दिन 'था' हो जाना है...!

चलती जाती थी अंतहीन राहें
जीवन चलता जाता था
ये कैसी अद्भुत बात है
कभी स्वर... तो कभी मौन हमें रुलाता था!

एक ऐसा भी समय हुआ इस धरा पर
जब 'कथनी' का 'करनी' से नाता था
दिखती थी जितनी उज्जवल तस्वीर
अन्दर भी उतना ही तेज जगमगाता था!

हर 'है' को एक दिन 'था' हो जाना है
इस सच को स्वीकार अम्बर में बादल छाता था
'है' का अस्तित्व साकार करने को
तत्क्षण वह बरस जाता था!

भले दिन गुज़र गए भले ही
स्मृति में सबकुछ पूर्ववत मुस्काता था
ये 'आज' ही जाने कैसे हावी हो गयी निराशा...
कल तक चाहते थे और सौन्दर्य अवतरित हो जाता था

होगी फिर से शुरुआत अवश्य, आखिर जानते ही हैं
यहाँ झूठ हर क्षण भरमाता है.... भरमाता था
नयी रीत नहीं है... पुरानी प्रीत है यह
जीवन अब भी वैसे ही रुलाता है... कल जैसे रुलाता था!

खिली धूप के बाद की उदासी...!

क्यूँ होते हैं लोग ऐसे... दुनिया इतनी बुरी क्यूँ है... हम किसी के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करते तो कोई क्यूँ बेवजह हमें कष्ट पहुंचता है... ये ऐसे सवाल हैं जो ज़िन्दगी हमेशा दागती रहती है! अभी कुछ ही दिन पूर्व बहुत सारी बेवजह की समस्यायों से मन व्यथित था, आज भी व्यथित है. ये सोच रहे हैं कि लोगों में इतनी हिम्मत क्यूँ नहीं कि जो कहना है वो सामने आकर कह सकें, बेतुके अनाम कमेंट्स करना ओछी मानसिकता नहीं तो और क्या है...? ये मेरी जगह है, यहाँ मैं कुछ एक सुकून के पल बिताती हूँ... 'अनुशील' पर होना मेरे लिए ऐसे कई प्रियजनों के संग होना है जो मुझे मेरी लेखनी की वजह से आज तक याद रखे हुए हैं... ये उन दोस्तों के लिए है जो कमेन्ट तो नहीं करते पर वे जब भी आते हैं यहाँ तो उनकी आहट महसूस हो जाती है मुझे...! यहाँ पर आकर अगर कोई अनामी असंगत टिपण्णी कर के जाता है तो मैं ही नहीं मेरे मित्र भी आहत होते हैं... ऐसी ही कुछ अनाम असंगतियों को रोकने के लिए comment moderation लागू किया! लेकिन, समस्याएं और व्यथित करने वाले तत्व पीछा छोड़ने वाले थोड़े ही न हैं... शायद दोष मेरा ही है... अगर ऐसा नहीं होता तो एक के बाद एक विचलित करने वाली बातें मुझ छोटी सी जान के साथ ही क्यूँ घटित होती और वो भी बिना किसी अंतराल के... एक के बाद एक!
*****
कल बड़े प्यार से एक बेहद प्यारी लड़की के लिए यूँ ही कुछ लिखा था... मन के किन्हीं तहों में खिलखिलाती हुई वह खुद कुछ लिख गयी थी... अशेष मुस्कानें, जिसे मैंने शब्द मात्र दिया था... सब अच्छा था, खुश थी मैं... अपनी व्यस्तताओं के बीच मुस्कुराने का अवकाश पाकर बहुत दिनों के बाद ज़रा सी व्यवस्थित थी मैं!
ऐसा नहीं है कि ऐसी कोई बड़ी विपत्ति आ गयी हो लेकिन मैं कद-काठी और शरीर से ही नहीं, मन-मिजाज़ और बुद्धि से भी बहुत छोटी हूँ... कृशकाय हूँ... बहुत जल्दी विचलित हो जाती हूँ. अगर बात मेरी होती तो रो-धो कर समाप्त कर देती, अपने मन को समझा देती, लेकिन यहाँ बात उसकी थी जिसे मैंने बड़े प्यार से कुछ एक शब्द भेंट किये थे और टिपण्णी करने वाले एक महानुभाव ने आकर सीधे सीधे उसके शिष्टाचार पर ही प्रश्न कर दिया...!
क्या कहूँ? कमेन्ट का आदान प्रदान अगर शिष्ट होने की शर्त है तो मैं भी अशिष्ट हूँ... क्यूंकि मैं भी हर जगह कमेन्ट के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं कर पाती हूँ... लेकिन ये शर्त मुझे हास्यास्पद लगती है.... और जहां तक पूजा का सवाल है उसकी शिष्टता पर शायद ही किसी को संदेह होगा... छह वर्षों से लगातार लिख रहीं हैं वे... मीडिया से जुड़ी हैं तो ब्लॉगिंग शिष्टाचार और अन्य पहलुओं से परिचित हैं ही...
अपनी राय रखने का हक सबको है लेकिन समय स्थान और स्थिति भी कोई चीज़ होती है... यह भी तो एक शिष्टाचार है! उम्र, अनुभव और ज्ञान में सभी मुझसे बहुत बड़े हैं... ये सब कहना मुझे अपनी अशिष्टता ही लग रही है लेकिन यह कहे बिना रहना भी मेरे लिए संभव नहीं...
मुझे पता है, पूजा अनुभवी है... आहत हुई भी होगी पिछली पोस्ट पर किये गए किसी के कमेन्ट और बेबुनियाद इलज़ाम से तो मुझे क्षमा कर देगी!

लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि सी!

एक भोली भाली भली सी... प्यारी सी लड़की... अपनी खिलखिलाहट से अँधेरा रौशन कर देने वाली लड़की... अपनी उदासी से हवाओं को भी उदासी का ही कोई नगमा डूब कर गाने को प्रेरित कर देने वाली लड़की... अपने विशुद्ध पागलपन में कुछ कुछ मेरे जैसी लेकिन अपनी विशिष्टताओं में केवल और केवल अपने जैसी, अकेली और अनूठी लड़की... कलम से हर बार चमत्कृत कर देने वाली रचनात्मकता का प्रतिबिम्ब- मेरे लिए यही तो है न परिचय लहरें वाली पूजा का!
बहुत दिनों से इस प्यारी सी लड़की के लिए बहुत कुछ लिखने का मन था... लेकिन जो हम करना चाहते हैं जो हम कहना चाहते हैं वह हमेशा हो ऐसा संभव तो नहीं... पता नहीं आज भी लिख जाएगा वह कुछ या नहीं या लिख भी गया तो प्रेषित हो पायेगा या नहीं...
एक दिन यूँ ही ढ़ेर सारी उदासी घेरे हुए थी... कोई ऐसा नहीं था जिससे बात की जाए... जिसके पास बस यूँ ही फ़ोन घुमा दिया जाए तभी कहीं से एक हवा के झोंके सी वह आई और परिचय का गहरा रंग लगाती हुई उड़ गयी...! तारीख़ भी कुछ ऐसी ही थी... कभी कभार आने वाली... २९ फ़रवरी! लेकिन उस दिन पहली बार बात करते हुए ही ये एहसास पक्का हो गया कि ये रंग अब हमेशा रहेगा मेरे जीवन में! लहरें आती जाती ये सुदूर तट अवश्य छूती रहेंगी और प्रतिविम्ब सा कुछ कुछ हर बार किनारों को लौटते हुए देती जायेंगी!
बहुत सारी यहाँ वहाँ की बातों के बीच उसकी खनकती हुई आवाज़ मेरी निधि बन गयी और एक प्यारी सी दोस्त से पुराना सा परिचय जान पड़ा भले बात पहली बार हुई हो...! कुछ एक परिचय ऐसे ही होते हैं, उनका होना ऐसा होता है जैसे नीरव अन्धकार में चमकता एक ध्रुवतारा! रिश्ते, भाव और एहसासों का आकाश ऐसा ही होता है... कल्पना सा सुन्दर पर यथार्थ की ठोस ज़मीन पर कड़ी
धूप में खिलखिलाता हुआ भी... तभी तो इनसे बड़ा सत्य कुछ और नहीं होता!
बात करते हुए ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार बात कर रहे हैं...
पूजा, देखना कहीं किसी दिन ढ़ेर सारी डार्क चोक्लेट्स के साथ तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक देने न पहुँच जायें... जितनी दूर हैं ऐसा संभव तो नहीं जान पड़ता लेकिन कौन जाने सच भी हो जाए... आखिर संभावनाओं का नाम ही तो जीवन है!

मिलते ही लगा, कि
अपनी है
जीवन इसकी आखों में
अर्थ नया पाता है!
'लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि'
देख इसे
शब्द स्वयं
संवर जाता है!!

काश!

कहीं
किसी
भाषा में
कोई तो शब्द ऐसा होता
जो यहाँ के भाव
जस का तस
वहाँ तक पहुंचा देता
पर ये खेद की बात है,
ऐसा होता नहीं है...

शब्दों
की अपनी सीमाएं हैं...
अपने बंधन हैं...
और जब यूँ चलते हैं शब्द
एक स्थान से अपने गंतव्य की ओर
तो मार्ग में
और भी अन्य ध्वनियाँ
साथ हो लेती हैं,
या कभी कभी
ऐसा भी होता है-
कुछ ध्वनियाँ छिटक जाती हैं
मूल शब्द से;
अपनी समग्रता में तो शब्द
नहीं ही पहुँचते हैं
मंजिल तक!

सम्प्रेषण
की सारी समस्याएं
और इन समस्यायों से
जन्म लेने वाली
अन्य भिन्न समस्याएं...
जाने
क्या
उपचार है इसका?

शब्द
अपना काम करें,
पर शब्द और भाषा से परे भी
एक ज़मीन हो...
जहाँ मौन में बात हो जाए...
आपसी समझ और सहजता की वह निधि हो
जो हर कठिन परिस्थिति में
समाधान लेकर अवतरित हो पाए...
काश!

कंठ क्यूँ अवरुद्ध है...!

अणु अणु संबद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

उच्चरित होते ही
प्राण सहित
अस्तित्व में आ जाता है शब्द
इसलिए जब बोलें,
तो सोच समझ कर बोलें!
दे जब भी
अवसर
ये भागती हुई ज़िन्दगी
तब बिना एक भी पल गवाएं
मन की गांठें खोलें!

कंठ क्यूँ अवरुद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

सब नाज़ुक से तार हैं
टूटन से
इनकार नहीं
टूट जाये, तो
हौसलों को फिर से जोड़ें!
राह में आने वाले
रोड़े पत्थर से
जो आहत हों
तो हृदय कुञ्ज की
विश्वासी कलियों को निचोड़ें!

मिल जायेगा अमिय भाव जो शुद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

वो इत्र
इकठ्ठा हो जायेगा
जो हवाओं को महका देगा
ऐसे में
कुछ विशिष्ट से बीज बोयें!
काँटों और फूलों का
मेल ही तो है
ये दुनिया
इसे विपत्ति मान कर
भला क्यूँ रोयें!

अणु अणु संबद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

एक गीत सुनते हुए...!

जीवन के कई रंग होते हैं... कई पड़ाव होते हैं, कई मोड़ों से गुजरती है ज़िन्दगी... कभी तेज तो कभी मद्धम और एक ऐसा भी पल आता है जब अध्याय बदलता है. इस जीवन से उस जीवन का फासला पल में तय हो जाता है और मन अटका रह जाता है बीच में कहीं अपना क्षितिज तलाशता हुआ! इस पार से उस पार जाना हमेशा आसान नहीं होता..., कहीं से विदाई ही तो कहीं पर स्वागत का शंखनाद है- लेकिन भावों का संसार इन वाक्यांशों से नहीं बनता... यहाँ तो अश्रुधार है जो बह निकलती है शहनाई की धुन पर...! बचपन के आँगन को छोड़ते हुए यह दर्द सहती आई हैं बेटियां... अपने अंश को विदा करते हुए मात पिता अकथ पीड़ा महसूस करते आये हैं सदा से... और विदा करा कर ले जाने वालों की भी आँखें नम होती आयीं हैं सदा से ही... विदाई की घड़ी होती ही है ऐसी, गंभीरता की प्रतिमूर्ति बने भाई भी सुबकने लगते हैं और यह दृश्य इतना हृदयविदारक होता है कि इसकी कल्पना मात्र से मन विचलित सा होने लगता है.
कितना अजीब है ... पौधे भी अपनी ज़मीन और वातावरण से जुदा कर दिए जाएँ तो मर जाते हैं... गमले में खिलने वाला पौधा, वन में नहीं पनपता और वनफूल गमलों में नहीं खिलते लेकिन बेटियां एक आँगन को छोड़ दूसरे आँगन में कदम रखतीं हैं तो वहीँ की हो जाती हैं... ये सामर्थ्य केवल हमें दिया है प्रभु ने, रीत रिवाज़ जो निबाहने थे उसे सो उसने सारा धैर्य और अकूत सहनशक्ति हमें उपहारस्वरूप दे दी... तभी तो लीला चल रही है उसकी!
इन बातों को लेकर खूब उलझता है मन... सारे नियम भी खूब समझता है मन और ऐसे में नम आँखों से स्मृति का एक धागा पकड़ कर, छूट गए घर के आँगन में, बचपन के कितना ही लम्हे जी आता है. और फिर तो नयी उर्जा के साथ नए वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने का क्रम चलता ही रहता है आजीवन...
ऐसे में अगर 'अब के बरस भेजो भैया को बाबुल' जो कहीं बज रहा हो तो सिर्फ कान ही नहीं रोम रोम सुनता है यह गीत और रुंधे हुए गले से स्वर नहीं निकलते तो आंसू कुछ शब्द के रूप में बह जाते हैं... इन शब्दों को सहेजते हुए हम उन कोटि कोटि नयनों की नमी महसूस कर रहे हैं जो इस दर्द से अनजान नहीं हैं...
पीछे छूट गए बचपन को याद करते हुए अपने आँगन के लिए ललकती... अपने नैहर से सन्देश की राह तकती पथरायी आखों का मर्म बेध डालता है. रिमझिम फुहारों के लिए तड़पती आत्मा का गीत है यह... कैसे भीगेगी आँखें! 'क्यूँ हुई मैं परायी' का जवाब किसी के पास नहीं यह जानते हुए भी जब स्वर मिलते हैं इस भाव को गीत में तो पूरी कलात्मकता से बिखरी हुई उदासी कुछ और उदास सी लगती है... है ?
ललित भैया, आपका भावुक हृदय अगर इस गीत पर कुछ लिखता तो वह निश्चित ही अनुपम होता... हम तो ऐसे में बस मौन ही साध सकते हैं...! आपकी प्रेरणा से कुछ बूंदें उकेरी हैं... दशमलव पर कभी इस गीत पर एक आलेख अपूर्ण से भावों को पूर्णता प्रदान करेगा इसी आशा के साथ आज अनुशील पर प्रस्तुत हैं मेरे बिखरे से शब्द...!

सामीप्य के कुछ मानक भेज रहे हैं...!

आज मेरे छोटे भाई का जन्मदिन है...
उपहारों को चुनते हुए... बुनते हुए... यूँ लिख गयी भावनाएं...
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं, ब्रज वल्लभ :))

बादलों के देश से
खूब सारी किरणें इकट्ठी की
और उन्हें तुम्हारा पता बताया...
बताना तो...
वे तुम तक पहुंची या नहीं?

खिलखिलाते फूलों की मुस्कान से कहा-
वे तेरे चेहरे पर खिल जाए
यह अनुरोध किये बड़ा वक़्त हुआ...
बताना तो...
तेरे मुख पर वह खिली या नहीं?

इतनी दूरी से
सामीप्य के कुछ मानक भेज रहे हैं
यादों की गलियों के पत्थर से हम खेल रहे हैं...
बताना तो...
ये आवाजें तुम तक पहुंची या नहीं?

लम्बी दूरी तय करनी है न
सो बड़े सवेरे ही चल पड़ी थीं यहाँ से
शुभकामनाओं की... आशीषों की नाव
बताना तो...
अब तक पहुंची या नहीं?

'यश', 'कीर्ति' और 'सफलता' से कहा
कि तुम्हारे द्वार जाए
पता है?
एक स्वर में सब क्या बोले...?
'हम रहते हैं वहीँ...'!!!

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