अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अन्जान विम्बों से स्फुरित होती प्रीत...

संसार यूँ रचित ही है ,कि .. सारे सम्बन्ध अन्योन्याश्रित हैं.... महसूस करें तो अनायास ही अनुभूति होती है कि जड़ चेतन कई वस्तुओं से .... लोगों से... हम किस गहराई से जुड़े हैं.... !!!
जब रिश्ते टूट रहे हों ... बिखराव सहज ही नज़र आता हो तब यूँ प्राकृतिक विम्बों से जुड़ा हुआ महसूस करना सुन्दर अनुभूति है.... ;ऐसे ही कुछ पंक्तियाँ....


गीतों का मधुरम स्वर,
खग वृन्दों का जीवन संगीत
मधुर.. मनोहर.. अप्रतिम.. सुन्दर
प्रकृति ने रचे कैसे अद्भुत मीत

सौहार्द प्रेम की अनोखी पहचान लिये...
अधरो पे खिला मनामोहक एक गीत
मेरे दामन मे एक फूल था केवल...
कैसे बनती माला...कैसे एकाकी होती जीत
तभी एक पावन स्पर्श हुआ...
साथ हो चली अन्जान विम्बों से स्फुरित होती प्रीत

गीतों का मधुरम स्वर,
खग वृन्दों का जीवन संगीत
मधुर.. मनोहर.. अप्रतिम.. सुन्दर
प्रकृति ने रचे कैसे अद्भुत मीत

7 टिप्पणियाँ:

राजभाषा हिंदी 16 सितंबर 2010 को 10:01 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

POOJA... 16 सितंबर 2010 को 1:43 pm  

सौहार्द प्रेम की अनोखी पहचान लिये...
अधरो पे खिला मनामोहक एक गीत
मेरे दामन मे एक फूल था केवल...
कैसे बनती माला...कैसे एकाकी होती जीत
तभी एक पावन स्पर्श हुआ...
साथ हो चली अन्जान विम्बों से स्फुरित होती प्रीत

well written... very natural...

Aparna Manoj Bhatnagar 16 सितंबर 2010 को 2:28 pm  

सौहार्द प्रेम की अनोखी पहचान लिये...
अधरो पे खिला मनामोहक एक गीत
मेरे दामन मे एक फूल था केवल...
कैसे बनती माला...कैसे एकाकी होती जीत
तभी एक पावन स्पर्श हुआ...
साथ हो चली अन्जान विम्बों से स्फुरित होती प्रीत

गीतों का मधुरम स्वर,
खग वृन्दों का जीवन संगीत
मधुर.. मनोहर.. अप्रतिम.. सुन्दर
प्रकृति ने रचे कैसे अद्भुत मीत
sundar sangeet sun paaye ham ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 16 सितंबर 2010 को 3:19 pm  

बहुत सुन्दर शब्दों में खूबसूरत बात ...अच्छी कृति

मनोज कुमार 16 सितंबर 2010 को 5:29 pm  

कविता अभिधेयात्मक एवं व्यंजनात्मक शक्तियों को लिए हुए है।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

अभिलाषा की तीव्रता एक समीक्षा आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

babanpandey 17 सितंबर 2010 को 4:29 am  

maine aapke blog ko apne list me add kar rakha hai ..ab aapki rachna main turant padh paunga ..

वन्दना 17 सितंबर 2010 को 7:49 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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