अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

नया दिन...!

चिरंतन के लिए 'नया दिन' शीर्षक से कुछ लिखना था... आभार चिरंतन, नए दिन के लिए... नयेपन की उम्मीद के साथ कुछ लिखने को प्रेरित करने के लिए...
यहाँ भी सहेज लें, नए दिन की ओर अनमने देखती नज़र और मौन प्रार्थना को...


हर दिन
एक सा होता है...
वही दोहराव देख
मन कितना रोता है...


वैसे ही
चलता जाता है क्रम...
बढ़ते ही जाते हैं
अन्यान्य भ्रम...


कितनी तो
विवश हैं राहें...
कोई नहीं थामता
किसी की बाहें...


ज़िन्दगी हर दिन
ढलती शाम हो जाती है...
गम की आंधियां
बहुत सताती हैं...


प्रेम कहीं कोहरे में
ओझल होता है...
मैं तुम के द्वन्द में
मन बोझल होता है...


बादल
नए गगन की तलाश में
नयी राह पकड़ते हैं...
अजीब स्थिति है,
एक दूसरे के पूरक होकर
मन-मस्तिष्क आपस में खूब झगड़ते हैं...


ये सब
दिन भर
चलता रहता है...
पर ये भी सच है
हर रात के बाद
एक नया दिन निकलता है...


नए दिन की देहरी पर
नए विश्वास के साथ
चरण धरना है...
आसमान के
सूरज का स्वागत
धरा के अनगिन सूर्यों को करना है...


अपना तेज़
पहचान कर...
अपनी क्षमताओं को
जान कर...


जब हम
सूरज सम
लोककल्यान की खातिर जलेंगे...
तब देखना
नए दिन की आँखों में
सुनहरे स्वप्न पलेंगे...


"सर्वे भवन्तु सुखिनः"
वाली प्रार्थना
फलित हो जायेगी...
सुन्दर है कितनी ये धरा
हम सबके पूण्य प्रताप से
और ललित हो जायेगी...!

सागर, अपनी अनुभूतियाँ कहते रहना...!

सागर किनारे... वहाँ इस समय जाना चाहिए...!
ठण्ड से ठिठुरती... अपने एकांत में मुस्कुराती... निर्जन तट से टकराती लहरों के बीच...! व्याकुल मन की समस्त उलझनें दूर हो जाएँगी, कुछ पलों के लिए ही सही... सम्पूर्ण कोलाहल मन का शांत हो जाएगा... प्रकृतिस्थ हृदय समस्त चिंताओं से मुक्त दूर क्षितिज पर उगने वाले सूर्य को प्रणाम निवेदित कर अपने भीतर भी कुछ किरणें समाहित कर लेगा...!
बाहें फैलाये... स्वागत करते सागर के तट पर इस सर्द मौसम में एक बार जाना ही चाहिए... ये देखने कि वह अकेला हो कर भी तनिक विचलित नहीं है...!
एक मौसम था न जब इसी तट पर कितनी भीड़ हुआ करती थी... कितनी चहल पहल... कितना तो उत्सव का माहौल... ग्रीष्म के वो दिन जब जमघट लगा हुआ होता था... सुबह से शाम तक सागर एक पल के लिए भी अकेला नहीं होता था... और ये ज्यूँ मौसम बदला अब कहाँ है जमघट... भीड़ क्या... उस भीड़ का कोई भी हिस्सा भूल से भी नहीं आता सागर के पास...
सागर को पता है सब मौसम के मेहमान हैं... सब अपने मतलब से आते हैं... सागर से किसी को कोई लगाव नहीं है... कोई नहीं प्यार करता लहरों से... सब को अपनी अपनी सहूलियतों से प्यार है...!
मैंने देखा... सवेरे सवेरे गयी थी मैं बीते कल सागर के पास... देखा मैंने तट भी यथावत था... सागर लहरें वृक्ष पहाड़ सब यथावत थे और खुश भी... उस एकांत ने किस तरह मेरे एकांत को अपने भीतर समा लिया इसको लिखने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है... लिख पाती तो अवश्य लिखती वह एहसास... कि उस एहसास ने टूटे हुए मेरे मन को किस तरह जोड़ने का भरसक प्रयास किया...!
बाहें फैलाये सागर को देख फूट फूट कर रोई मैं... तिरस्कृत संवेदनाओं को कितने ही समय बाद यूँ कोई गले लगाने को तत्पर था... और वो भी इस आत्मीयता के साथ! कितने ही दिनों बाद तो आई थी मैं इन रज कणों तक... इन लहरों तक... फिर भी कोई बेगानापन नहीं था... कंटक वन से आया कोई पथिक ज्यूँ फूलों का एक उपवन पा गया हो... दूर दूर तक निराश वातावरण में जैसे अकस्मात् सूर्योदय की सम्भावना दिखी हो... असह्य पीड़ा से आहत  मन को जैसे संजीवनी मिल गयी हो...!
आज अभी जब लिख रही हूँ तो मन ही मन उस सागर के पास ही हूँ... और आंसू नहीं थम रहे...
चलूँ आज भी उधर ही... तट पर बैठ कर पेंडिंग असाइनमेंट्स कम्पलीट करूंगी... अब कितने दिन यूँ टाला जाए आवश्यक कार्यों को... मन का क्या है? उसे कहाँ ठीक होना है... एक गुजरेगी दूसरी विपत्ति आ जाएगी...! विपत्तियों के बीच ही जीना है... सारे आवश्यक कार्य भी निपटाने हैं... अब सांस लेना तो स्थगित नहीं किया जा सकता न...
यही तो हम करते हैं... केवल सांस ही तो लेते हैं... सांस लेने और जीने के बीच एक अंतराल है... एक दूरी है जिसे शायद ही हम पाट पाते हैं कभी...! हाँ, ये सागर कर पाता है... लहरें कर पाती हैं ऐसा... वो सांस भी लेते हैं... जीते भी हैं तभी तो आने वाले अनजान पथिक के सूने नयनों में भी जीवन की आस जगा पाते हैं...!


हे अनंत सागर!
इन ठिठुरती हवाओं में भी
तुमने इतनी आत्मीयता भर दी है 


कि
नहीं कांपी मैं
इनके सान्निध्य में


लहराती हुई लहरों को
देखते हुए...
मन के कितने ही घाव बिसराने का
करती रही प्रयास...


ये और बात है...
असफल रहा
मेरा हर प्रयत्न

कि...
मन तो अभी भी
टूटा है...
मेरे भीतर ही एक कोना है
जाने क्यूँ?
मुझसे ही रूठा है...! 


आज भी
उदास हूँ...
मन ही मन
तेरे पास हूँ...

ये लिख लूं एहसास
बीते कल के...
फिर आती हूँ
तुम्हारे ही पास चल के... 


सागर!
तुम्हारे ही तट पर
रज कणों के बीच मुझे
ज्योति मिलेगी...
दूर
पहाड़ों के पीछे से
सूर्य की लालिमा
खिलेगी...


वैसे ही
जैसे कल हुआ था...
तुमने
मेरी आत्मा को छुआ था...!


यूँ ही
बहते रहना...
सागर! अपनी अनुभूतियाँ
कहते रहना...!

कितने ही रंग...!

उदासी के
कितने ही रंग...
सब एक साथ
मुझे मिल गए...!
उन रंगों में
जाने क्या था ऐसा...?
मन के अनगिन
तह छिल गए...!!


अब रिसता दर्द
हा! अपनी ओर से
ध्यान हटने ही नहीं देता...
देख पाती
तो शायद दिखती कहीं
दुबकी हुई ख़ुशी भी
मगर जीवन है कि आंसुओं को
सिमटने ही नहीं देता... 



इन बूंदों से हो कर ही
शायद
इन्द्रधनुषी रंगों को
बिखरना है...
इन राहों में
कितनी ही बार है टूटना
और फिर उतनी ही बार
निखरना है... 


ये विरले तथ्य
भरी हुई आँखों को
जाने कौन बता जाता है...?
जब रोता है रोम रोम
मौन अपनी उपस्थिति
चुपचाप जता जाता है...!


उस शून्य में
धरा-आकाश
उग आते हैं अवचेतन में...
कभी-कभी
होता है घटित
ये संयोग जीवन में...


धरा-आकाश
साथ साथ रोते हैं...
न होकर भी साथ
दोनों साथ होते हैं... 


शायद
आंसू बहुत कुछ
जोड़ देता है...
संभवतः
दूरियों का भरम
तोड़ देता है... 


अब
जब मैं
आकाश देख रही हूँ...
तो-
अपने आंसू
भूल चुकी हूँ...! 


उदासी का रंग
वहाँ कहीं अधिक काला है...
अरे! मेरे पास तो फिर भी
बहुत उजाला है...!


ये मोमबत्ती
जो जल रही है...
लम्हा-लम्हा
पिघल रही है... 


फिर भी
दर्द से बेपरवाह है...
उसके कष्ट की
कहाँ किसी को थाह है...


मेरा हर कष्ट
उसके दर्द के समक्ष
कितना कम है...!
पहले अपने कष्ट से रो रही थी मैं
अब इस बात से मेरी आँख नम है...!!
सच! मेरा दर्द उसकी तुलना में कितना कम है...!


ईश्वर! तेरी लीला
कैसी विहंगम है...!
विराट दुःख की रागिनी से
पल पल तरंगित प्रकृति
तमाम विरोधाभासों के बावजूद सुन्दरतम है...!!!

लिखना क्यूँ ज़रूरी है...?

लिखना...
मृत्यु से गुज़र कर
मृत्यु को जीतने जैसा है...


लिखना...
मेरे लिए
किसी बेहद अपने की
ऊँगली पकड़ कर चलने जैसा है...


लिखना...
तड़प को
घड़ी भर का विराम दे जाता है...


लिखना...
बेचैनियों को
भला सा एक नाम दे जाता है...


लिखना...
जाने-अनजाने लिखना
रेत में जल की तलाश के अनवरत क्रम जैसा है...


लिखना...
मेरे लिए
निराश हताश वीराने तट से
जीवन की ओर लौटने के अनिवार्य उपक्रम जैसा है...


अपने आप से
संवाद ज़रूरी है...
जीवन के थपेड़ों का
प्रतिवाद ज़रूरी है...
इस पथ पर चलने वाली
हर आस...
जाने क्यूँ???
आधी-अधूरी है...

कंटकाकीर्ण 

पथरीली राहों पर चलते हुए
हौसला बना रहे

शायद इसलिए... लिखना ज़रूरी है...! 

लड़खड़ाते ही सही... चल पड़ा जीवन!

समय का दोष नही है
सारा दोष मेरा है...


व्यथित हृदय...
आहत अंतर्मन...
इनकी असह्य पीड़ा
कैसे जीयूं... पर जीना है...!



जाने किस कोने में
छुपी बैठी है मुस्कान...


एक अरसा बीता... मिली नहीं मुझसे
कहाँ से खोज लाऊं उसे
इसी आस में जाने कब तक
सूनी आँखों में... आंसू लिए जीना है...!


धुंधली थी नज़र
चलते हुए पत्थरों से टकराई
आहत हुई...
पर अप्रत्याशित
एक सुखद आश्चर्य से भी
हुआ सामना-

जैसे बड़ी सहजता से
कर जाते हैं न हम इंसान...
उस तरह पत्थर नहीं कर सके
संवेदनाओं की अवमानना...!!

मुझ रोती हुई को एकाकी नहीं छोड़ा...
मन की चोट पर हाथ फेरा
आश्वस्त किया...
और फिर पत्थरों ने कहा---


मन को यूँ मत
भटकने के लिए छोड़ा करो
हृदय थोड़ा कड़ा करो
थोड़ा सिमट जाओ...


मन से यूँ न लगाओ बातें
कि ऐसी अभी तेरे राह में
हैं और कटु सौगातें...



ज़िन्दगी बहुत छ्लेगी...
उसका वही चरित्र है...
हर कदम पर वो आश्चर्य है...
स्वभावतः विचित्र है...


कितना रूठोगी...?
कितना रोओगी...?
खोने की कोई सीमा नहीं है
अरे! अभी बहुत कुछ खोना है... बहुत कुछ खोओगी!  


तो सब मान विधि का लेखा
सीख लो मुस्कुराना...
गिरी न अभी तुम ठोकर खाकर... कोई बात नहीं
सीखो उठना और उठ कर बढ़ जाना...


पत्थरों के बोल सुन
बिखरे हुए एहसास चुन
उठ खड़ा हुआ मन...
लम्बी डगर थी... लड़खड़ाते ही सही... चल पड़ा जीवन!

असम्बद्ध टुकड़े...!

यहाँ अजब परिपाटी है... न रहने के बाद ही लोग याद करते हैं... जीवन रहते याद आने को तरसते हुए ही कटती है अक्सर ज़िंदगियाँ...
***
बहुत डर लगता है... सब रूठ जाते हैं मुझसे... जिन्हें हम चाहते हैं... मानते हैं... उनसे बात करने के लिए तरसते रह जाते हैं... ये अभागापन नहीं तो और क्या है, कि ज़िन्दगी! तू भी तो अक्सर रूठी हुई ही मिलती है मुझे...
***
आज पुरानी कहानियां बेतरह याद आ रही हैं... वो कहानियां जो उन नादान दिनों में लिखी थी कभी और कब वक़्त ने टुकड़े टुकड़े कर दिए उन पन्नों के... पता ही नहीं चला! वो किरदार जैसे आज पास आ बैठे हैं मेरी नम आँखों में कोई रौशनी ढूँढने या शायद कोई रौशनी देने... 
मरे हुए लोग कैसे आ जाते हैं न कभी स्वप्न में और कितनी ही बातें कह जाते हैं... वैसे ही शायद ये किरदार भी वक़्त के हाथों नष्ट हुई कहानी से निकल कर अपना फ़र्ज़ निभाने आये हों... एक टूटे बिखरे इंसान को हौसला देना आसान तो नहीं पर किरदारों ने न हार मानी है... न किरदारों को बनाने वाले ने अभी करुणा त्यागी है...
वो गढ़ता है किस्से... वही बिगाड़ता है और फिर वही संवारता है... वो ईश्वर है... वो हमारी लिखी जा चुकी कहानी का कहानीकार है... उसे सब पता है पर वह नहीं करता हस्तक्षेप... किरदारों पर छोड़ देता है सब और खुद होता है बस तमाशबीन या शायद ऐसा तो नहीं कि कर्ता धर्ता वही होता है... किरदार बस अपने होने का भ्रम जीते रह जाते हैं...!
***
बार बार उन गलियों तक लौट रहा है मन जहां जिए थे कितने ही पल... केन्द्रीय पुस्तकालय बहुत याद आ रहा है... उन सीढ़ियों पर माथा टेक फिर प्रवेश करना भीतर... सुबह से शाम तक किताबों के बीच जाने क्या क्या जीना... तब क्या पता था कि ये दिन बीत जायेंगे...!
आज जब इस दूर देश के अद्भुत पुस्तकालयों में बैठते हैं तो मन में कहीं न कहीं वही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का पुस्तकालय धड़क उठता है और ऐसा लगता है जैसे बस बाहर निकलेंगे तो विश्वनाथ मंदिर भी मिल जाएगा और डिपार्टमेंट भी जैसे पास ही होगा जहां तक सीधा रास्ता जाता था पुस्तकालय से... सेंट्रली लोकेटेड हमारी सेंट्रल लाइब्रेरी आज भी मन प्रांगन में सेंट्रली लोकेटेड ही है! टटोलते रहते हैं पर नहीं मिलते अब वो पल... नहीं मिलेंगे अब वो पल... और वो लोग भी कहाँ मिलेंगे जो उन यादों का ज़रूरी हिस्सा हैं कि हमनें रोज़ एक ही मंदिर में शीश नवाते हुए एक महीन सा रिश्ता जोड़ा था सौहार्द का...
चलो, जीवन है... जो कहीं मिल भी गए वो लोग तो वैसे तो नहीं ही मिलेंगे... वक़्त बेरहमी से छीन जो लेता है मासूमियत और फिर खाई भी तो रचता जाता है समय... जिसे पाटना शायद ही संभव होता है... पर हाँ! कभी जो फिर उन सीढ़ियों पर शीश नवाने पहुंचे तो वो यथावत मिलेगी... इस बात का तो यकीन है और ऐसे ही कुछ विश्वास जीवन हैं...!
***
चलते हुए... चलते जाना है बस... क्या पता कब गति रुक जाए और जो रुक गयी तो अफ़सोस जताने को हम होंगे कहाँ... तो जब तक हैं... हो लें अपने साथ कि खुद से जुदा होने से बड़ा कष्ट भी है क्या कोई दुनिया में...
***
थके हारे मन ने जाने क्या क्या टुकड़ा कर लिया है इकठ्ठा और शब्द मूक से देख रहे हैं मन की ओर... और मन है कि कहीं शून्य की ओर टकटकी लगाये हुए है... जाने क्या ढूंढ़ता है... जाने क्या चाहता है...

जाने क्या...!

इतने अकेले क्यूँ हो जाते हैं हम कि हमारी चीख भी नहीं पहुँचती किसी तक... हमारा फूट फूट कर रोना भी सुकून नहीं देता कि आंसू भी जैसे अपने न हों... इस वर्ष की शरुआत रोते हुए ही हुई थी और जब जा रहा है तो भी यह वर्ष बेतरह रुला रहा है... मन बहुत उदास है... कहीं कोई सिरा नहीं मिलता... अजब स्थिति है... कहीं कोई नहीं है... दुनिया यूँ रमी हुई है अपनी धुन में कि न किसी को किसी से कोई लेना देना है न किसी को किसी की फ़िक्र ही है... कुछ रीत ही ऐसी है शायद... सब समझदार हैं... नासमझी सिर्फ मेरे ही पल्ले आई है...
निराश हताश मन से हम टुकड़े समेट रहे हैं... कांच के टुकड़ों को समेटना आसान कहाँ... कहीं न कहीं लग ही जायेगी हाथ में कोई नोक और लहुलूहान हो जाने हैं सारे आस विश्वास के प्रतिमान!
हाथ जो है जख्मी वह तो ठीक हो जाएगा पर मन जो हो छलनी तो भी क्या भर जाते हैं जख्म... कौन जाने!


बारिश की बूंदें
बूंदों में भींगती हुई मैं...


कोहरे में डूबी धरती
और अपने गंतव्य की ओर भागती हुई रेल...


पटरियों पर पसरी उदासी
और उन उदासियों को अपने भीतर सींचती हुई मैं...


हम सब साथ चले दूर तक अकेले
फिर ले ली अपनी अपनी राह...
किसी ने किसी को फिर याद नहीं किया
नहीं हुई किसी को किसी की परवाह...


धरती कोहरे से घिरी रही...
पटरियां उदासियों को जीती रहीं...
रेल भाग रही थी... भागती रही...
और मैं...
मैं थी ही कहाँ... मैं कहीं भी तो नहीं...!

लेखनी से संवाद!

मैं
नहीं लिखना चाहती
कुछ भी...


लेखनी! सुनो...
इस सुबह
मैं नहीं होना चाहती
तुम्हारे साथ...



क्यूंकि...
अब मुझे कुछ नहीं कहना है...!


इस बीत रहे वर्ष का
हर लम्हा अब खामोश रहे...
मेरे आंसू ही बस
अब मेरे पास रहे...



शब्द शब्द दर्द की कथा
फिर कभी...
थक गया है मन
अब और चलना नहीं अभी...


इतने में
लेखनी बोली-
कह लिया न
अब तुम सुनो---
तुम्हें क्या लगता है
तुम कहती हो?
अरे! तुम हमेशा तो चुप ही रहती हो...!



ये
वो दूर की कोई
प्रेरक शक्ति है...
जो कह जाती है...
और तुम्हें जाने क्यूँ
हर बार ये भ्रम रहता है...
कि कविता घटित होती होती रह जाती है...



सुनो, तुम नहीं लिखती...
मैं लिखती हूँ...
हाँ! ये बात और है
मैं नहीं दिखती तुम दिखती हो...


और
जो कहीं
कविता है न
तो वो सतत जारी है...
तू निमित्त है
और मैं भी मात्र जरिया हूँ
लिखने वाली प्रेरणा है
वो कहाँ कभी भी हारी है...! 


जो कहीं
कविता है न
तो वो सतत जारी है...!!!

***
इस सुबह अँधेरे में टटोलती रही अपना मन... नहीं कुछ भी कहना था फिर भी वाचाल तम कहता रहा... सूर्योदय तो शायद ही हो... नौ दस बजे तक ही शायद कुछ रौशनी हो बाहर... रात भी ऐसी कि इधर न चाँद ही निकल रहा है... न तारे ही हैं और न ही बर्फ के फाहे... अँधेरा ही अँधेरा है... 
आसमान को सब छोड़ गए हैं...!
स्टॉकहोम की एक खामोश सुबह... पंछी अब अपने मौसम में ही आयेंगे और गायेंगे... सो इस समय ये भी आस नहीं कि कोई चिड़िया फुदकती हुई आ जायेगी... ख़ामोशी थी... है... और रहेगी... कि छुट्टियाँ हैं तो सब छुट्टी पर हैं... एक आंसुओं को छोड़ कर!!!
कागज़ कलम आपस में बात कर रहे थे... उनका ही कहा उनसे ही सुना कुछ उतार दिया यहाँ भी...!
समय बीत जाएगा... हम भी बीत जायेंगे पर फिर भी कुछ है जो नहीं बीतेगा कभी... उस शाश्वत अंश को प्रणाम!

शुभ दिवस...!

फिर भी आस अशेष...!

रात
अपलक
जगे हुए बीती...

अँधेरा हारा
न मैं जीती...! 


कहती ही रही
स्नेहमयी
रात...
देनी चाही
उसने
नींदिया की सौगात... 


पर दीप जल रहा था
तो लौ संग
मैं भी जगी रही...
उसने नहीं माना अपना
पर मैं फिर भी
उसकी सगी रही...


अँधेरे से
उजाले की ही
बात करती रही...
बार बार मैं
आस विश्वास से
अपना दामन भरती रही...


लेकिन
सब जाने कहाँ
गुम हो जाता था...
रिक्त पात्र
स्वयं को लाख प्रयास के बाद भी
रिक्त ही पाता था... 


तार-तार
था दामन
किन धागों से सीती...

अँधेरा हारा
न मैं जीती...!!

लौ को
निहारते हुए
उदास अँधेरे को देखा...
कोहरे से घिरी हुई
बड़ी महीन थी
उजाले और अँधेरे के बीच की रेखा...

जीवन का ही
ताना बाना
दोनों बुन रहे थे...
बारी बारी से
दोनों ही
एक दूसरे की सुन रहे थे...

सूरज का आना
शेष था, फिर भी
गढ़े जा रहे थे उजाले...
एक दीप था
जो जगा रहा साथ
अनगिन सपने पाले...

कोई पंछी नहीं
कहीं कोई आहट नहीं
न ही कहीं आवाज़ कोई...
या तो लौ कभी
लड़खड़ा जाती थी
या फिर कभी मैं रोई...

उदास सी सुबह
फिर भी आस अशेष
यही है जीवन की रीति...
भले ही
न अँधेरा हारा
न मैं जीती...!!!

जाने उद्गम है क्या, स्रोत किधर...?

तुम्हारी
एक मुस्कान के लिए,
किया कितना कितना इंतज़ार...
और जब झलकी वो
तेरे मुख पर,
खिल गया मेरा उर संसार... 


तुम्हारा प्रेम
तुम्हारी राह का दीप बन
करे रोशन हर दिशा का द्वार...
तुम्हारा प्यार
हमारी राह की श्रद्धा
वह है हमारे हृदय का भी उद्गार... 


बहुत खुशियाँ मिले तुम्हें
मुस्कानों पर हो
तुम्हारा सहज अधिकार...
जो कहते हो
सब कविता ही तो है
है तुम्हारी हर बात में संग्रहणीय सार... 



छलक आया
जो आंसू बन कर,
उन शब्दों में है अमित संसार...
मोती सा
सहेज लिया हमने,
छलके शब्दों का पारावार...


खुश रहना हमेशा
मुस्काने उगाना
कि तुम्हारी ख़ुशी से जुड़ा है मेरी खुशियों का संसार...
तुम्हारे
हर एक आंसू मेरे हैं
मेरी आँखों से ही बहने दो न ये धार...!!


पता है...
रिश्ते यूँ ही खिल आते हैं
अजाने अपने हो जाते है...
जानते हो,
पथ की अनूठी रीत है ये-
जुड़ जाना...
फिर मोड़ से मुड़ जाना...
तब भी होना अभिन्न
और अनन्य भी...
सकल तर्कों के पार
कुछ कहे अनकहे तथ्यों के अनुसार!
जो कह दिया, मित्र!
सब हैं तुम्हारे ही तो हृदय के उदगार...!!


जाने उद्गम है क्या
स्रोत किधर...?
कविता लुप्त
काँप कर रह गए अधर...
अजब बात है,
हम ही मौन... हम ही मुखर... ... ...!!

दर्द... हमदर्द...!

क्या?
हाथ जला लिया?
फिर...?
ओह! कैसे...?
कहाँ रहता है ध्यान...
तुम्हारा?
क्या सोचती रहती हो...?
मन किस शून्य में विचरता है...?
ठोकर खाती हो
गिर जाती हो...


अभी
उसी दिन तो
गिरी थी न...
जाने वो चोट
ठीक हुई भी कि नहीं?
और फिर गिर गयी...
अरे! कैसे...?


यूँ
खुद को ही
डांटते-डपटते हैं...
समझाते हैं... 



कोई उत्तर
नहीं सूझता...
कुछ नहीं कह पाते हैं...


बस इतना ही
महसूस होता है-

एक दर्द
पुराने दर्द की
दवा हो जाता है... 


जब तक जलन
रहती है
हाथ में...
पाँव का दर्द
हवा हो जाता है... 


यूँ ही
दर्द दर्द मिलकर
हमदर्द हो जाते हैं...
रास्ते जाते हैं
सब शून्य की ओर
एक घड़ी बाद सर्द हो जाते हैं...!

यही जुड़ाव जीवन है...!

आकाश से शायद बूँदें गिर रही हैं... क्या पता उसे भी कोई दुःख हो... या फिर ख़ुशी के आंसू रो रहा हो अम्बर... या ये हो कि बस रोने के सुख की खातिर रो रहा हो...!
बहुत अँधेरा है... न आसमान से गिरती बूंदें दिख रहीं हैं, न मेरी आँखों की नमी ही स्पष्ट है... खिड़की से हाथ बाहर निकाल कर बूंदें छू आई... अब मन भी गीला है...!
नयी सुबह का खिल आना बहुत बड़ी बात है... ये इतनी आसानी से कहाँ संभव है... हर रोज़ अपने काल क्रम के अनुरूप आने वाली सुबह नयी भी हो ये आवश्यक थोड़े ही है... कई बार तो वही दोहराव उसे नीरस बनाता है... 'आज' भी 'कल' की तरह ही तो कितनी बार हताश होता है... बस तिथि बदलती है... मन नहीं बदलता... ऐसी स्थितियों में, सुबह यूँ ही नहीं होती... कहीं से कोई मुस्कान जब तक सूरज की किरणों संग दूर क्षितिज से नहीं आती... तब तक नहीं खिलती भोर... 
बूंदों की दस्तक तो है खिड़की की कांच पर लेकिन सुबह कहीं नहीं है... कहाँ खो गयी है सुबह...  कब खोज पायेंगे उसे... यही सोच रहीं हैं नम आँखें...
दिसंबर विदा हो रहा है... २०१३ अपने अंतिम दिनों में जाने क्यूँ और अधिक रुला रहा है... आस बंधती है फिर टूट जाती है...!
बस ऐसे ही, आसमान देख रहे हैं और सोच रहे हैं-- कष्ट में होना उतना कष्टकर नहीं जितना कष्टकर किसी और के कष्ट का कारण होना है... आसमान भी तो उदास होता है, जब नहीं निकलता सूरज... आसमान को लगता है कि धरती वाले उसकी वजह से कष्ट में हैं... अँधेरे में हैं... क्यूंकि सूरज लुप्त हैं कहीं... और इसलिए वह अजाने ही रोता है... बूंदें गिरती हैं धरा पर और धरती आश्वस्त करती है आसमान को कि धैर्य धरे... कोहरे नहीं रहेंगे बहुत समय तक... मौसम बदल जाएगा... सूरज कहीं नहीं गया है... वहीँ है, बस कुछ समय के लिए ओझल है... और यह चिंतित होने का विषय बिलकुल नहीं है!
धरा अपनी तरह से धैर्य धरे हुए वही धैर्य आसमान तक पहुँचाने को उद्धत होती है... क्या पता जिस क्षितिज पर दोनों मिलते हैं वहाँ किसी संवाद की सम्भावना होती भी है या नहीं, पर कुछ है जो धरा गगन को जोड़े हुए है और यही जुड़ाव जीवन है...
ईश्वर हमेशा हमें औरों के लिए खुशियों का कारण बनाये... संबल बने हम अपने अपनों का... कभी ऐसी परिस्थितियां न उत्पन्न हो कि अन्तःस्थिति उस पर विजय न प्राप्त कर पाए... जब भी मन उदास हो... मन में ही हो एक ऐसा कोना जहां हो अप्रतिम प्रकाश और यही संचित प्रकाश सकल संताप हरे... अपना भी, अपने अभिन्न का भी... अपने अपनों का भी...!


रोने के सुख
पर कुछ कह रहा था
अम्बर... 


सुन कर
रो पड़े हम भी... 


आकाश
और
हृदयाकाश की बूंदों का
मेल था सुन्दर... 


सच,
बहुत सुख है
रोने में...
जो हैं हम
वही
होने में...


कोई भेद
नहीं था
एकाकार थे...
कि
आसमान ओढ़े
सपने साकार थे... 


दूरी
नहीं है कोई
वह पास है...
देखो तो-
हम सब के ऊपर
एक ही तो आकाश है... 


विविध भाँती
मन को
समझा लिया...
जो दूर मुंह फेरे खड़ा था
उसे हृदय से
लगा लिया... 


फिर
खुद ही
अपने आंसू पोंछे,
स्वयं को शब्दों में
उलझा लिया...
यूँ जाने कितने ही
मृत्युतुल्य कष्टों को,
हमने पलक झपकते ही
जैसे कुछ पल के लिए
सुलझा लिया... 


शब्द
संबल बन कर
आये...
उन्हें तह लिया
जो कहना था कह लिया
अब कुछ घड़ी मौन हो जाएँ!

अनन्य प्रीती...!

हे जीवन!
तुमने कह लिया...
अब सुनो हमसे...


जो तुम
अब कह पाये शब्दों में,
वह हमें
पहले से ज्ञात है...


तुम्हें क्या लगता है
कोई रहस्योद्घाटन किया है तुमने...?
बंधू, तुम भले न रहे हो साथ रह कर भी साथ
पर फिर भी कुछ है जो सदा से साथ है...!


ये हमेशा यूँ ही बना रहे...
स्नेह से घर आँगन हरा रहे...


जितने फूल खिले
तुम्हारी हंसी की धूप में...
उन सबमें देखा हमने वही ईश्वर
दिव्य स्वरुप में...


वही ईश्वर...
शब्द ब्रह्म बन कर...
तुझको मुझको जोड़े है,
वही नियति है...
जो जाने कहाँ से...
कौन सी राह मोड़े है...!


इस राह पर
चलते चलते...
मिल जाते हैं मन,
स्नेह सदा-सर्वदा
बना रहे...
कि इससे ही हम हैं हम! 


और बढ़ता रहे
तुम्हारा प्रताप...
धवल रहे कीर्ति तुम्हारी...
ज़िन्दगी हमेशा से ही है एक पहेली
इसे सुलझाएगी
इसके प्रति अनन्य प्रीती हमारी...!!!

***

हम जितना उसे मानते हैं... उसे चाहते हैं... वह भी हमें उतना ही चाहती है... कभी कहती नहीं... पर न कह कर भी यही तो कहती रहती है वो... दोहराती जाती है वो... हमेशा... बस ज़रा सा टटोलना भर है... हमारे साथ ही है, हमारे पास ही है ज़िन्दगी... कई कई रूपों में हंसती हुई... गाती हुई... गुनगुनाती हुई... हंसी और आंसुओं के बीच जूझती हुई... और जीतती हुई... हर बार... बार बार...!
हे ज़िन्दगी, शब्दों में नहीं हो सकता व्यक्त तुम्हारे स्नेह का आभार... पर शब्द के अलावा है ही क्या हमारे पास...
तो जो है वही तुम्हें अर्पण... हे! जीवन... ... ...

यूँ ही...!

उदास हैं
सोच रहे हैं
यूँ ही...

क्या केवल
हमको ही
फ़िक्र लगी रहती है...?
सब तक पहुँचने की...


या
कोई ऐसा भी है...?
जिसे
मेरी फ़िक्र हो
जो मेरा हाल जानना चाहे...??


लगता है-
अपने आप को
रख कर कहीं
भूल जायें...


खो जायें...
मौन हो जायें...


कहीं न पहुंचना हो...
न किसी तक...
न कहीं पर... 


न दस्तक दें कहीं...
न किसी आहट की उम्मीद लगायें... 


बस खो जाएँ...
मौन हो जाएँ...!!!

***
कितनी ही बार आता है न ऐसा मन में... हम सब के मन में... कभी न कभी... पर फिर भी हम मौन से कोसों दूर रहते हैं... उलझे रहते हैं अन्यान्य उलझनों में... 
काश! पकड़ पाते मौन का कोई सिरा तो जान लेते हम कि कोई हो न हो हमारा विश्वास... हमारा ईश्वर... हमेशा हमारे साथ ही तो होता है... और इन्हें हमसे कोई दूर भी नहीं कर सकता...
और जिन्हें मन ने बाँध लिया अपने आप में निहित विश्वास से... वो भी दूर होकर कभी दूर नहीं होते... नहीं हो सकते...!!!

कविता के पास...!

मेरे आसपास
नहीं होता कोई
जो सुने
मेरी बातें...
समझे मेरी उलझनें...


मेरे डर को
पुरुषार्थ में बदल दे...
ऐसी कोई सम्भावना नहीं नज़र आती
जो आश्वस्त करे
हँसते गाते पल दे... 


जाने क्या दोहराती है
आती जाती सांस...
निराश हताश मन से
छिन जाता है धरती और आकाश...


ऐसे में मैं
लिखती हूँ शब्द
शब्दों में तराशती हूँ अर्थ
और फिर कोई रंग लेकर इन्द्रधनुष से
रंग देती हूँ स्याह से मंज़र 


अँधेरा बढ़ता ही रहता है लिए हाथ में खंजर 


तब शब्दों में पिरो कर खुद को
राह बनाती हूँ...
नहीं पहुँच पाती तुम तक
शब्द सेतु निर्मित करती जाती हूँ...


ये सेतु तुमसे मुझको जोड़ेंगे
यही हमारा मौन तोड़ेंगे 


बनी रहे
ये आस...
भले न हो समाधान कोई
पर जिलाए जाने की
संजीवनी
तो है ही न
कविता के पास...!!

तुम तक...!

आवाज़ दे रहे हैं हम
पर खामोश है गगन
जाने क्या कारण है...
दूरी बहुत है...?
या बीच में है शून्य...?
जिससे हो कर
नहीं गुजरती कोई आवाज़... 


नहीं पहुँचते मेरे स्वर वहाँ तक...?
या अनसुनी कर दी जाती है पुकार...?
क्या पता...
बहती ही जाती है क्यूँ
आंसुओं की धार...!  


पहुँचने की कोशिश में
बहुत चले...
बहुत थके... चूर हुए...
अपने आप से ही कई बार दूर हुए...


फिर ज़रा संभले... 


दृढ़ किया टुकड़ा टुकड़ा मन...
समझाते रहे अपने आप को ही हम- 


कि,
बस जरा सा सफ़र और शेष है...
थोड़ा सा धैर्य और फिर संतुष्टि अशेष है...! 


यूँ ही खुद से करते हुए संवाद
खुद को ही देते हुए दिलासा
निरंतर बढे जा रहे हैं हम
हे दुष्प्राप्य मंजिल!
तुम तक चल कर आ रहे हैं हम...!!!



कह उठा जीवन...!

हर सुबह नयी होती है... हर सुबह उदास भी होती है... कुछ तो छूट गया होता है न पीछे हर नयी सुबह से... हाँ, ये सोच समझ हम बहला लेते हैं मन कि नयी सुबह कुछ नए एहसास ले कर आएगी... जो छूट गया है उसे या उससे कहीं अधिक दे कर जायेगी नयी सुबह... आस विश्वास का दामन थामे रहते हैं हम और जीवन इस तरह सुबह शाम के क्रम को जीता हुआ गुजरता ही चला जाता है... ख़ुशी और उदासी के चोले पहनते उतारते मन तार तार हो जाता है, पर जीवन तो जीए जाने का नाम है और आस का दामन थामे हम अंतिम सांस तक चलते ही तो चले जाते हैं...
आज की सुबह उदास थी... कि मेरे गमले का पौधा मुरझा चुका था... पूरी तरह... मरणासन्न था... अब तो पूरा मृत ही था... फूल तो कबके साथ छोड़ गए थे डालियों का, बस इसी आस में जिए जा रहा था पौधा कि जो कुछ एक कलियाँ है वो खिल जाएँ... पर कलियाँ भी एक एक कर मृत्यु को प्राप्त होती गयीं... फूल फिर खिले ही नहीं... और अब देख रहे हैं कि सभी डालियाँ मुरझायीं हुई हैं... पौधा मर चुका है...
स्कूल के पाठ्य पुस्तक में पढ़ी एक कहानी याद आती है... बस धुंधला सा ही याद है... कहानी का शीर्षक था रक्षा में हत्या... कहानी में दो बच्चे थे जिनके घर में चिड़िया ने घोंसले बनाये... जब अंडे दिखे तो बच्चों ने बड़े जतन से अण्डों को ठण्ड से बचाने के लिए कुछ इंतजाम किये... उसी उपक्रम में अंडे टूट गए... और जो नहीं होना चाहिए था वही अनहोनी हो गयी...! बच्चों की मंशा सही थी पर अनजान थे वो इस बात से कि उनके इस प्रयास की आवश्यकता ही नहीं थी... प्रकृति ने स्वमेव ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि उन अण्डों की रक्षा हो जाती ठण्ड से... चिडिया रख लेती ख्याल... कोई सहायता अपेक्षित ही नहीं थी...! किसका दोष है... अज्ञानता का ही न... भाव तो पावन ही थे पर अनिष्ट कर गए न...
ऐसा ही कुछ मेरे पौधे के साथ भी हुआ... जल की अधिकता के कारण गल गया पौधा... नष्ट हो गया... ये जानते थे हम कि इन्हें ज्यादा जल नहीं चाहिए फिर भी जाने क्यूँ, ज्यादा पानी न डालने की सुशील जी की हिदायत के बावजूद,  दो तीन दिनों के अंतराल पर पानी दे दिया पौधे को और यही स्नेह ले डूबा कलियों को... टहनियों को... और पौधे को भी! होना ही था, ठण्ड है ही, सूर्य देवता का कहीं कोई पता नहीं... कैसे खिले फूल... कैसे खिले मन...! 



मुरझाया पौधा...
देखकर
उदास थे हम
कचोट रहा था मन
मन में समा रहा था तम
आँखें अनायास ही थीं नम 


कि
इतने में
उठ खड़ा हुआ
जीवन... 



और कह उठा---



सब कुछ क्षणिक है
और यही क्षणिकता
बनाये है हर सुन्दर तत्व को
सुन्दरतम...



मत उदास हो
हाँ, हो सके तो
हो जाओ कुछ अवधि के लिए
मौन...


मन में सींचों एक पौधा
आस का
फिर देखना तुम्हारी सारी दुविधाएं
हो जाएँगी गौण...


तुम कांटे चुन पाओगी
तुम अनकहा दर्द सुन पाओगी 


फूल खिलेंगे
तुम्हें सभी प्रश्नों के हल मिलेंगे 


उठते गिरते चलती जाओ
पोंछों आंसू...
आओ, मेरे हृदय से लग जाओ!

प्रतिभा, तुम्हारी प्रेरणा से... तुम्हारे लिए!

प्रतिभा... मेरी प्रिय दोस्त... मेरी रूम मेट... उन दिनों की दोस्त जब हम रोते हुए बनारस आये थे और साल भर रोते ही रहे, घर लौट जाने की जिद लिए...! तब हमें झेलने वाली... समझाने वाली... सँभालने वाली... प्यारी रूम मेट... प्यारी दोस्त...!
वो दिन बीत गए, फिर और पांच वर्ष गुजर गए... दूर हो गए हम, बनारस भी छूट गया... पर आज जब बात हुई तो लगा जैसे वही कीर्ति कुञ्ज हॉस्टल हो, और वही हम हों... २००१ में जैसे थे वैसे ही... न समय बदला हो... न हम... 
सच, कुछ बातें कभी नहीं बदलती... हम भी नहीं बदलेंगे कभी... है न प्रतिभा...?


तुम एक ही थी...
तुम एक ही हो...


अपने आप में अनोखी...
अद्भुत...


चेहरे पर तेज़...
मन में दृढ़ निश्चय...
और जीवन के प्रति
एक अनूठी आस्था के साथ...
चलायमान...
अग्रसर...


अपने सपनों के लिए
अपनी ज़मीन तराशती
संकल्पों के बीज रोपती नमीं थी तुम...


उन बेफिक्र दिनों में भी
एक जुदा आसमान... एक अलग ज़मी थी तुम...


आज जब तुमसे बात हुई न
जानती हो,
बनारस...
और वो हॉस्टल का हमारा कमरा बहुत याद आया...
इतना, कि
सजीव हो उठा...
कितने छूट गए
राह में साथी कितने रूठ गए
पर वो लम्हा साथ रहा...
कभी नहीं रूठा...


वो लम्हा
जो हमने साथ जिया था...
काशी की पुण्यभूमि में
कभी हमने भी सांस लिया था...


आज भी सब पूर्ववत है...
यथावत है...

बह ले जितना बहना है, ज़िन्दगी...
कह ले जो जो कहना है, ज़िन्दगी...

ये हमारी सिफ़त है...
ये हमारी प्रतिभा है...
कि...
ज़िन्दगी! हम तुम्हें हृदय से लगाये
आज भी यथावत हैं...


भले
दूर चले आये हैं...
पर अब भी हम वहीँ कहीं उसी माटी में रमे हैं...
वैसे ही बादल हृदयाकाश पर अब भी छाए हैं...


सच बस इतना है...
आसमान हमारे सपनों जितना है...


दोस्त! जितने नेक सपने हैं...
उतना बड़ा तुझे आसमान मिले...
छोटी छोटी खुशियों को रचते संवारते
राह में तेरे अनगिनत पुष्प अभिराम खिले...


सफलता तेरी अनुयायी हो...
तेरे दामन में अनंत सितारों की रौशनी समायी हो...


हृदय से निकले स्वर
हृदय तक की राह तय करें...
उन दिनों भी बहुत कुछ सीखा था तुमसे
आज भी तुमसे प्रेरित हो हम कोई मीठा सा जीवन गीत गढ़ें...!

हाँ, अब शायद कह पाओगे... कहो...!

बंधन वही श्रेष्ठ
जो बांधे न...!


अब रिश्ता तो वही दृढ़ हुआ न
जहां कोई संकोच नहीं
कोई बंदिश नहीं...
जो दे खुला आसमान,
बाहों में सिमटा हुआ जहान... 


बेड़ियों में जकड़ा हुआ समुदाय
सब बंधे हुए... सब बंधन के पर्याय
जीवन से व्यथित... क्लांत...
चंचल मन न कभी शांत...
ऐसे में जो परम आनंद पाना हो
तो अंदाज़ जरा जुदा हो मनमाना हो


कुछ कुछ पंछियों सा...


कोई नहीं बांधता उन्हें
उड़ने को...
समूचा आसमान है...
फिर भी,
शाम ढले...
ये धरती का प्यार ही है न...
जो खींच लाता है उन्हें वापस
अपने घोंसले में!


धरा नहीं बांधती उन्हें
इसलिए वो छूट नहीं पाते हैं...
उड़ते हैं और पुनः
अपनी धरा के पास ही लौट आते हैं...


नदिया यूँ बहती है
मानों वो निर्मोही है निर्विकार है
धरा से पर उसे भी बहुत प्यार है...
भले कुछ समय के लिए गगन का बादल हो जाती है
पर बरस कर पुनः नदिया ही हो जाती है
धरा से अपना स्नेह बंधन खूब निभाती है...


रिश्ते यूँ होते हैं...
रिश्ते यूँ ही होने चाहिए
सहज सुन्दर जीवन के
उत्प्रेरक...
प्रकृति से बहुत कुछ
सीखना है हमें
हम हैं मात्र उसके
संरक्षक और सेवक...


सेवा भाव प्रबल हो,
प्रकृति बहुत कुछ सिखाएगी...
हाथ पकड़ कर चलना सीखाया है उसने,
आज भी वही सिखाएगी-


चलना भी...
संभलना भी...
जीना भी...
खुश रहना भी...
निभाना भी...
और सच्चे अर्थों में पाना भी...


और वह ही दिखाएगी...
परमलक्ष्य की प्राप्ति की राह भी,
रौशनी का गीत भी वही...
वही है रात स्याह भी...!


मित्र! बस महसूस करो ये तथ्य
और मेरा हाथ
थामे रहो...
कुछ कहना था न तुम्हें...?
हाँ, अब शायद कह पाओगे...
कहो...!


जिंदगी
जैसे बहती है
अपनी रौ में...
वैसे ही
उन्मुक्त
बहो...!!!

मेरा पूरा आसमान...!

यूँ होता है कितनी ही बार
कि कहीं भी हो मन
आत्मा घुटनों पर बैठी
रहती है प्रार्थनारत...


ऐसा ही कोई क्षण था...
जैसा रहता है
वैसे ही अनमना सा मन था... 


उम्मीदें उदास थीं...
फिर भी
आस की कोई किरण पास थी...



कि श्रीचरणों में अभी अभी
दिया जलाया था...
आस्था का एक दीप
मन में सजाया था... 



बाहर खिड़कियों के...
फैला आकाश था
वो दूर भी था...
पर फिर भी पास था 



वह हमारा मन 

पढ़ रहा था...?
उसके मन में भी शायद 

कुछ उमड़ घुमड़ रहा था...! 


तभी मेरी आँखें
बरस पड़ीं...
जाने क्या सोचते हुए
भावनाएं उमड़ पड़ीं... 



और फिर क्या देखते हैं-
आसमान सब देख रहा है...
अपनी धरा के लिए,
उजली किरणें भेज रहा है...


बर्फ के फ़ाहों से...
आच्छादित होने लगी धरा,
कुछ जख्म मुस्कुराये...
कुछ हो गया फिर से हरा, 



स्नेह की बारिश ने
सब शोक संताप
हर लिए...
उड़ रहे कुछ सपने
अपने दामन में भी
हमने भर लिए... 



यही उजले कण
आज उग आई धूप में चमकेंगे...
हीरा हो जायेंगे,
मेरी खिड़की से
जल-वायु-आकाश...
सभी तत्व प्रवेश पायेंगे 


और मन में फिर
धूप खिलेगी...
बाती जो जलायी थी ईश चरणों में
वह निर्विघ्न जलेगी... 



जानते हैं,
समय गढ़ता ही रहेगा 

नित नए इम्तहान...
मानते हैं,
राह आसान नहीं होगी...
पर, चलते रहने से 

एक दूसरे का
संबल बने रहने से...
राह की कठिनाई
कुछ तो कहीं कम होगी...! 


इंसान हैं हम
जीवन भर परीक्षाएं
न थमीं हैं... न थमेंगी...
हे मित्र! नम आँखें मेरी 

बस तुमसे
इतना ही कहेंगी...

मत होना कभी उदास
कैसी भी परिस्थिति हो...
स्मरण रहे,
खुशियाँ तुम्हें तुम्हारे भीतर ही
मिलेंगी...

और उन्हें थाह कर
जब तुम मुस्कुराओगे
आनंद का अप्रतिम संसार
अपने पास ही पाओगे

और इस प्रक्रिया में...

अनायास ही मेरे लिए
धूप... किरण... दिनमान...
मेरा पूरा आसमान...
सब अपनी एक ही मुस्कान से रच जाओगे...!!!

तुम बेतरह रुलाते हो...!

दिसंबर हमेशा ही उदास होता है... जाने क्यूँ विदा होते हुए उसकी आँखें भी नम हो ही जाती हैं... भले ही वह निर्मम निष्ठुर समय की इकाई है... समय है...!
सभी माह एक के बाद एक आते जाते रहते हैं... उनमें एक रिश्ता है निरंतरता का... एक के बाद जो दूसरा आता है वह उसी वर्ष का हिस्सा होता है... लेकिन दिसंबर इस आशय से अकेला है कि यहाँ आकर... इस पायदान से निरंतरता टूटती है... इसके बाद आने वाली तिथि... इसके बाद का माह नहीं होता इस वर्ष का हिस्सा... वह किसी नए वर्ष की पहली सीढ़ी होती है जिससे होते हुए पुनः उसी दिसंबर तक की राह तय होनी है जिसकी अंतिम परिणति पुनः एक नया वर्ष होगी... और इसी तरह क्रम चलता जाता है... सन... दशक... बीत जाते हैं, ऐसे ही सदियाँ बीत जाती हैं... और वहीँ कोई एक लम्हा हमेशा के लिए रुका रह जाता है... !
हृदय का कैलेण्डर यूँ भी कहाँ समय से ताल मेल बिठा पाता है... यहाँ तारीख और वर्ष नहीं होते अंकित... यहाँ अंकित होते हैं तो सिर्फ लम्हे!
उन्ही लम्हों द्वारा मेरे उदास से दिसंबर के लिए...


तुम
विदा का सन्देश लिए
आते हो...


ठिठुरती हुई तारीखों में
जाने क्या
जड़ जाते हो... 


हम
पीछे मुड़ मुड़ कर देखते हुए
कभी आगे बढ़ नहीं पाते है...
बीते दिसंबर की
स्मृतियों के कितने ही अंश
लगातार पढ़ जाते हो...

कोई पुष्प बसंत का 

मन के फ्रेम में
मढ़ जाते हो... 


तुम बेतरह रुलाते हो...! 

इंतज़ार...!

एक प्रिय मित्र ने हमसे कहा था कभी
इंतज़ार से अच्छी और बुरी चीज़
कोई नहीं...


तब से हम
जी रहे हैं हर वो अच्छी चीज़
जो निहित है इंतज़ार में,
और हर वो बुरी चीज़ भी
हमको तार तार किये हुए है
जो इंतज़ार की घड़ियों का सच है...


पीड़ा ही है इंतज़ार
आनंद भी है इंतज़ार 


तो,


पीड़ा भी है
सुकून भी है 


दोनों ही है इंतज़ार...???


इस आशय से

गणित के सिद्धांत की मानें तो

पीड़ा को ही
आनंद कह जाएँ...

कि
प्रतीक्षा
दोनों ही भावों को
जीने का नाम है...
सुबह कभी यह
तो कभी यह
घिर आई शाम है... 


अब कविता में

कहनी हो यह बात

तो पीड़ा एवं आनंद को
समकक्ष रखते हुए
यूँ कह लें-
पीड़ा में ही आनंद है...
दोनों में मूलतः कहाँ कोई द्वन्द है...


बहती रहे अश्रूधार,
जीवन रहते करते ही रहना है...

जीवन का इंतज़ार...!!!

विस्मित हम!

कैसे जुड़ जाते हैं न मन!
कोई रिश्ता नहीं...
न कोई दृष्ट-अदृष्ट बंधन...
फिर भी
तुम हमारे अपने,
और तुम्हारे अपने हम...


भावों का बादल सघन
बन कर बारिश,
कर जाता है नम...
उमड़ते-घुमड़ते
कुछ पल के लिए
उलझन जाती है थम...


जुदा राहों पर चलने वाले राहियों का
जुदा जुदा होना,
है मात्र एक भरम...
एक ही तो हैं,
आखिर एक ही परमात्म तत्व
समाहित किये है तेरा मेरा जीवन... 



भावातिरेक में
कह जाते हैं...
जाने क्या क्या हम...
सोच सोच विस्मित है,
अपरिचय का तम....
कैसे जुड़ जाते हैं न मन!


कितना लिखना है,
कितना लिख गयी...
और जाने
क्या क्या लिखेगी...

ज़िन्दगी! तुम्हारी ही तो है न
ये कलम...!!!

इस बार वह कह पायी...!

एक उदास सा दिन
और एक उदासी भरी शाम...
जब हम समेट रहे थे,
एक एक शब्द याद हो आये
जो तुमने कहे थे... 


कितनी ही
आस विश्वास की बातें...
हमें रुला रही थी,
जाने कैसी एक आवाज़ थी
जैसे हमें बुला रही थी... 


हम ठोकर खाते रहे
गिरते रहे...
गिर गिर कर सँभलते रहे,
याद नहीं दर्द ने कितना विचलित किया
जाने कितने तो आंसू ढलकते रहे... 


फिर सुन्न हो गया मन
देख कितने ही व्यवधान...
राह में कितनी सारी अड़चन,
समय की बहती धारा कब जान पायी
किनारों की उलझन... 


जिंदगी सब देख रही थी,
धीरे से मुस्कुरायी...
कहने को उसके पास भी नहीं होता अक्सर कुछ भी
पर फिर भी इस बार वह कह पायी-


चलते रहो...
जलते रहो...


गिरते रहो...
सँभलते रहो...


आंसुओं को आस में बदलते रहो...!

हमने तुम्हें चुन लिया...!

रात भर
जलता रहा
दिया...
जीवन का होना
व्यर्थ नहीं गया...
हम देखते रहे
टिमटिमाती लौ
एकटक,
जागी आँखों ने
जागे जागे
सपना बुन लिया... 


आँखों ने हृदय का
जाने कौन सा भाव
पढ़ लिया...
अश्रूकणों का एक पारावार
हवा में तैर गया...
हम विस्मित से
देखते ही रह गए
निर्निमेष,
जाने किसने
मूक आंसुओं का
कहा सुन लिया... 


सब नियति के खेल हैं
हमने भला
क्या कब किया...
निमित्त मात्र हैं
राहों पर बस निष्ठा से चल लिया...
मार्ग में कितनी ही बार बिखरा मन
ये क्रम कभी नहीं
है होना शेष,
हताश रुके कुछ पल
कोई था नहीं, कौन चुनता?
खुद ही हमने अपना बिखरा मन चुन लिया... 



रात भर
जलता रहा
दिया...
जागी आँखों ने
लौ को पल पल जिया...
रौशनी
तम से लड़ती रही
देर तक,
इसी आस्था की डोर को
अपने सपनो संग
हमने धीरे धीरे बुन लिया...


"तम" और "तुम" में एक को चुनना था...

रौशनी! हमने तुम्हें चुन लिया...!

संदेशे धरती के नाम!

कभी कभी...
सारा दिन
एक सा ही होता है


घिर आने वाली शाम की तरह ही
उदास...! 


बादलों से पटा
समूचा अम्बर...
सूरज का कहीं कोई
अता पता नहीं...
एक अजीब से अँधेरे में घिरी सुबह 


जाने कैसी तो सुबह...!


सुबह का नहीं कोई रंग...
यह सुबह उकेरना भी चाहें
तो नहीं उतरती कागज़ पर
नहीं तो हो लेते स्याही के संग
हा! सुबह कितनी है बेरंग...!



कि तभी अम्बर ने
भेजी धरा के नाम
कुछ सफ़ेद रुई के फ़ाहे सी फुहार...
एक उजली चादर ने ढक लिया
सूखे पत्तों का अम्बार...



अब ये इस मौसम की पहली पहली उजली बारिश
सब ढक लेगी...
मन रखती आई है प्रकृति
हमारा मन रख लेगी...


सब रंग घुल जाएँ तो
श्वेत होता है परिणाम
सारे रंग घोल भेज रहा है अम्बर
संदेशे धरती के नाम!

एक और शीर्षकविहीन रचना...!

डायरी से कई दिनों से यहाँ उतार रहे हैं इसे... आज पूरी लिख पाए... ये ९८ में लिखी गयी थी कभी, तब हम एलेवेनथ में थे... और बेवजह लम्बी इस कविता को शायद ही किसी को सुनाया है... न ही पढ़ा है किसी ने... तुम्हारे अलावा, प्रिय श्वेता... याद होगी शायद तुम्हें धुंधली सी...?
कितना वक़्त निकल गया न इस बीच... कहाँ खो गए न वो दिन... अब तो तुमसे बात हुए भी कितना समय हो गया... कहो व्यस्तता को कि थोड़ा अवकाश दे तुम्हें कि तुम बाँट सको हमसे अपनी कवितायेँ...
समय बीत जाता है, रह जाती हैं यादें... रह जाती हैं बातें... और उस समय को सचित्र आँखों के सामने पुनः ले आने के लिए आभार... हे, शीर्षकविहीन रचना...!


बार बार निराश हुआ
किसी तलाश में भटकता मन
कई बार हताश हुआ
तलाश जारी है...

जहां से चले थे स्थिति अब भी वहीँ है
क्या सचमुच कोई भी नहीं है...?
मेला सजा है
पर ऐसी न कोई सखी न सखा है
जो समझे मेरी भाषा
हो जिसके नयनों में अप्रतिम आशा
उलझे मेरे विचारों से
मगर परस्पर प्रेम एवं आदर का सम्बन्ध हो
विचारों की स्वतंत्रता जिसमें निर्द्वंद हो

अपनी तमाम दुर्बलताओं के बावजूद
जिसे प्रिय होते हम... काश!
कोई होता ऐसा
जो नहीं करता मुझमें सम्पूर्णता की तलाश

आँखों में सपने सजाये
मुझे यहाँ से दूर ऐसी दुनिया में ले जाता
जहां प्यार अपनापन श्रद्धा विश्वास का
मजमा न लगता हो
लोग मुखौटों के पीछे न रखते हों
जहां प्रेम पगी बोली जाती हो भाषा
आत्मा से आत्मा का सम्बन्ध ही जहां प्रेम की परिभाषा


सच मुझे आज तक वह नहीं मिला
हृदय का सुमन अब तक नहीं खिला
कली फूल बनते बनते मुरझा गयी
जिसकी तलाश तुझे है
ऐसा कोई है ही नहीं... समझा गयी!

कभी न कभी सबने आघात किया
संवेदनाओं पर बार बार वज्रपात हुआ
आज तक नहीं मिला मुझे वह प्यारा साथी
जिसे हो मेरी अटपटी भाषा आती

लेकिन कोई है... जो भीड़ से अलग है
कम से कम वह मेरे लिए सजग है
तलाश को भले विराम नहीं मिला
पर, इस बार सचमुच हृदय में सुमन खिला

चलो एक पडाव तो हासिल हुआ
धूप में भटकते राही को
छांव ने कुछ देर के लिए ही सही छुआ


वह मिल गया
गति रुक गयी कुछ पल के लिए तलाश थम गया
मुझे वह प्रिय नितांत है
कुछ और नहीं... वो "एकांत" है

वह निरुपम कब व्याख्येय है
मेरे लिए वह श्रद्धेय है
वह मुझे बहुत आगे तक ले जाता है
कल्पना के लोक से
शाश्वत स्वप्नों से थाल सजा लाता है
भावनाएं पंख लगा कर उड़तीं है
कई ओर विचारधारा स्वयं मुडती है
वह मुझे मेरे पास ले आता है
मेरे व्यक्तित्व के रचनात्मक पहलू को
रेखांकित कर जाता है

आँखों को सपने देकर
नयी संभावनाएं जगाता है
नित बढ़ते ही रहने की बात
समझाता है
तभी तो उसकी बात मान कर
उसके ही सिद्धांतों को सच जान कर
मैं आगे बढती हूँ...
नए आयाम ढूढती हूँ...

उसका प्रेम
नहीं बांधता है मुझको
हर बार वह यही है कहता...
स्वतंत्र आसमान में विचरना है तुझको
पंछी की भांति...


एकांत मेरा प्रिय साथी है
मौन से मैंने दोस्ती गांठी है


लम्बी यात्रा की राह पर हूँ
बस एक मौन कराह भर हूँ
साथ होने की सबको मनाही है...
एकांत मेरा हमराही है...!


उसका दामन थाम कर
निकल पड़ती हूँ अपनी ही खोज पर
अजीब है न बात...
कितना रहस्यमय यह साथ!

मुझे अपने साथ ले आता है
वह उस किनार पर
जिससे बहुत आगे जाने पर ही
पहुंचूं मैं अपनी आत्मा के द्वार पर
मेरे साथ मेरे स्वार्थ के लिए
मुझे सहारा दिए
चलता है वह साथ
अपने हाथों में लिए मेरा हाथ...

एकांत मेरा प्रिय साथी है
मौन से मैंने दोस्ती गांठी है


मेरी भाषा जानता है वह
मुझे भली तरह पहचानता है वह
कई बार मेरी बातों को मानता है
कई बार विरोध में मोर्चा भी ठानता है
परन्तु... अंत सदैव मधुर होता है...
उसके मुख पर
हर तनावपूर्ण क्षण के बाद
स्मित हास्य मुखर होता है!

मुझे विचार के सीमित दायरे से कर विमुक्त
उसका विरोध विस्तार देता है सशक्त
उसकी मूक आलोचना मुझे मेरे पास ले आती है
मेरे विचारों को परिपक्व बनाती है

उससे अलग होते हुए
वेदना नयन भिगोती है
बिछोह की यंत्रणा
हृदय कुञ्ज में संजोती है

मेरा हृदय भर भर आता है...
वह कभी अपनी महत्ता नहीं जताता है!

एकांत मेरा प्रिय साथी है
मौन से मैंने दोस्ती गांठी है


जब उससे दूर होती हूँ
तो अपना आप ही खोया होता है
स्वयं से दूर
एक वेदना से रहती हूँ चूर
एक शून्य का आभास होता है
ख़ामोशी शोर हो जाती है... मन अनायास रोता है
याद आती है
उसकी मधुर स्मृति विचलित कर जाती है
पर विषाद को पीछे छोड़ कर
बंधन सारे तोड़ कर
मैं आगे बढती हूँ
निरंतर संघर्ष करती हूँ...

क्यूंकि ये उसी के विचार हैं
उसी के हृदय के उत्कट उदगार हैं
कि प्रेम शक्ति है
प्रेम कोई साधारण भाव न होकर स्वमेव भक्ति है
विचलित जो होने लगे मन
पाँव जो डगमगाने लगें
तो....
किया था उसने मुझे कई बार आगाह-
समझ लेना अनुभूत प्रेम था मात्र एक प्रवाह
सच्चा प्यार नहीं... सच्चा साथ नहीं...
स्वार्थरहित वह आकाश नहीं
जिसके नीचे हम मिले थे
तुम्हारे इन्द्रधनुषी सपने आकाशकुसुम बन खिले थे...!


दोस्ती... प्रेम... साथ... की
इतनी सुन्दर व्याख्या
सच, मेरे प्रिय एकांत!
मौन को नहीं था कभी मैंने
इतना मुखर पाया...


इसलिए तो हे एकांत! हे एकाकीपन! तू मेरा साथी है
तुम्हारी अनकही भाषा मौन से मैंने दोस्ती गांठी है...!!


२४/३/९८


********



कई बार होता है... लिख कर लगता है नहीं लिखना चाहिए था, जुड़ कर लगता है नहीं यूँ नहीं जुड़ना था... मन पर इतना सारा कष्ट इतनी सारी व्यथा यूँ नहीं ओढनी चाहिए थी... कह कर लगता है नहीं यूँ नहीं कहना था... कितना कुछ प्रवाह में कहे चले जाते हैं, जो नहीं कहा जाना चाहिए था... ये सब हमें हमेशा से समस्या बनाता रहा है... अपने लिए भी, औरों के लिए भी, और अपने अपनों के लिए भी...
हम नहीं लिखना चाहते... लिख जाते हैं, नहीं कहना चाहते, कह जाते हैं... नहीं रोना चाहते पर नहीं रोने की कोशिश करते हुए भी रो ही रहे हैं... जाने क्या टूट रहा इन सबके बीच... आस, विश्वास, कविता या फिर सब दृष्टिकोण का खेल है...
बिना सोचे बिना विचारे बिना मन पर बोझ लिए बहते जाना चाहिए हमें या नियंत्रित हो कहीं ठहर जाना चाहिए... कहीं तो होगा कोई कोना जहां सुकून होगा... जहां होगी मेरी सारी धृष्टताओं के लिए क्षमा... जहाँ नहीं होगा कोई प्रश्नचिन्ह जो अनायास मेरी भावनाओं के आगे लग कर समस्त आस विश्वास लील जाता है... मेरे मन में जो स्नेह की नींव है न उसे ही बेध जाता है... है कोई ऐसी जगह जहां बिन सोचे विचारे हमें कुछ भी कहने की आश्वस्तता होगी... जहां डर न होगा कोई... सोचना जहां बड़बड़ाते हुए भी संभव हो... कि जो हो सुनने वाला वो इतना अपना हो कि कहीं कोई दुराव छुपाव की सम्भावना ही न हो...
होती है ऐसी जगह कोई... है इस जहां में कहीं कोई ऐसा कोना... है क्या कोई इतना अनन्य इस भरे संसार में...
अरे, है न...
एकांत... ... ... !!!
इससे अनन्य कुछ नहीं... कोई नहीं!!!

****

आज जाने क्यों बहुत उदास मन से ये सब लिखता चला गया... तो एकांत पर लिखी वो पुरानी रचना भी याद हो आई... पूरा किया अधूरा ड्राफ्ट और सहेज ले रहे हैं यहाँ...
सच, समय बदल जाता है... पर कुछ भाव, कुछ सच कभी नहीं बदलते...!!!

नमी कहेगी...!


कोई किसी की व्यथा
नहीं कर सकता कम,
नहीं बाँट सकता
कोई किसी का गम...

निज व्यथा
निज ही को सहना है,
कभी नहीं मुख से
कुछ कहना है... 


हाँ, मिले जो कोई
साथ रोनेवाला
लगे कि
कुछ अघटित है होनेवाला
तो होने देना...
जो रोना चाहे कोई साथ
तो संग उसे रोने देना...

गम बांटने का दावा
कितने ही कर जायेंगे...
पर ऐसे कुछ एक ही होंगे जिनकी आँखों में
तुम्हारे आंसू उतर जायेंगे!
वो तुम्हारे गम हर लेने की
बात नहीं करेंगे...
पर उनके होने से तुम्हारे गम
सिर्फ तुम्हारे नहीं रहेंगे!!

कोई एक
अनकहा सम्बन्ध
जुड़ जाएगा...
जब जब तुम रोओगे
मन उसका भी
नम हो जाएगा... 


ये नम आँखों का रिश्ता होगा न
इसकी बात जुदा होगी
आंसू को आंसुओं का साथ मिल जाएगा
जो एक न कह पाए तो वो दूजे की नमी कहेगी 


ये बस इस जहां में ही संभव है
गम हो धरती का तो आसमान रोता है
बादल सारे अनमने हों
तो यहाँ हरियाली का पूरा कुनबा उदास होता है 


जीवन यूँ ही
चलता जाता है...
आंसू का जितना गम से है
उतना ही तो खुशियों से भी नाता है...!!!

आँख का पानी...!

रोते हुए...
सिसकते हुए...
जाने क्या क्या
कहे जा रहे थे आंसू...

उन पर
कभी नहीं रहा है मेरा वश
उन्हें जब बहना है बहेंगे ही
जो कहना है कहेंगे ही... 


फिर भी,
जितना... जो जैसा
कहा-अनकहा
छुआ-अनछुआ
दर्द है हृदय में
कहाँ सब कह पायेंगे...?


आंसू बहेंगे...
चूक जायेंगे...
फिर मूक हो जायेंगे... 


पर, जो-
कहा-अनकहा
छुआ-अनछुआ
दर्द है भीतर,
वह तो
रिसता रहेगा ही...
ये दौर कभी
थमेगा नहीं...


कि
जब तक है जीवन
चलती रहनी है कहानी
बहता आया है
बहता ही रहेगा आँख का पानी... !!!

साझी व्यथा...!

अपरिचय... परिचय... अपरिचय
मृत्यु... जीवन... मृत्यु 


यही कथा है...
इतनी ही व्यथा है! 


जीवन का चक्र
अपरिचय के दौर से
परिचय की सीमा पर
रखता है कदम... 


अपने हो जाते हैं सपने
और फिर देखते ही देखते सपना हो जाता है
अपनों का साथ
होने लगती हैं आँखें नम...


परिचय की सीमा को छूकर
फिर अपरिचय की परिधि में
घिरने लगते हैं हम
घेरने लगता है प्रकाश को तम...


अपरिचय... परिचय... अपरिचय
मृत्यु... जीवन... मृत्यु 


यही कथा है...
इतनी ही व्यथा है! 


अप्रकट और पुनः
एक अंतराल के बाद अप्रकट
दो अप्रकट के बीच जो अंतराल है
बस उतना ही है जीवन...


क्षणिक है जो उसके खो जाने पर
कैसा कष्ट कैसा दुःख
आत्मा अभेद्य है
बस यह सत्य रहे स्मरण...


जो ज़रा सा समय हमारे हिस्से है
वो जी भर कर जीए हम
सत्कर्म और भक्ति भाव का दीप जले
कि मृत्यु के बाद भी जीता है जीवन...


यही कथा है
जीवन अंततः तेरी मेरी साझी व्यथा है...!!!


हम कौन हैं?

कहने को कितना कुछ है
इसीलिए
मौन हैं...
परिभाषित करते रहे हैं हम कितना कुछ
और ये ही नहीं जानते कि
हम कौन हैं?


ये कैसी विडम्बना है
अपनी ही पहचान नहीं है
जी रहे हैं बस ऐसे ही
शरीर में कोई जान नहीं है 


क्या कहें...
क्या न कहें?
ये दुविधा जब आन पड़ी,
तो समाधान बन कर खिल गया वो-
कुछ न कहो कि ऐसा कुछ है ही नहीं
जिसका मुझको भान नहीं है...! 


रिश्ते सच्चे होते हैं तो
घिरे हुए तम में भी
रौशनी बन रह लेते हैं,
चाहे जितनी भी विडम्बनाएं घेर लें
आपस में
सारे गम कह लेते हैं...!


यात्रा अंतहीन है
और डगर आसान नहीं है
चलता हुआ पथिक कुछ आश्वस्त है आज
शायद राह आज कल जैसी सुनसान नहीं है


और पुनः पुनः उस सनातन प्रश्न का
उत्तर होने को चीखता हुआ मन
मौन है...
परिभाषित करते रहे हैं हम कितना कुछ
और ये ही नहीं जानते कि
हम कौन हैं?


अकारण...!

खुद से ही नाराज़
बहुत बहुत बहुत नाराज़ हो
फफ़क फफ़क कर रोते हुए
मन प्राण सब भिगोते हुए
हम लिखते रहे शब्द... 


खोखले शब्द
बेजान शब्द
बेवजह बेमतलब शब्द 


और बहते रहे आंसू
चीख कर नहीं रोये कितने दिनों से
अभी चीख रहे हैं
लिख रहे हैं 

वही
बेवजह बेमतलब बेजान शब्द 

और रो रहे हैं आंसू 


बहती रही आंसू की लड़ियाँ
आँखें मूंदें जोड़ते रहे हम कितनी ही कड़ियाँ 


फिर भी ज्ञात न हुआ कारण
रोते रहे वैसे ही...
जैसे लिखते हैं हम अकारण...


मन रे!
कर धैर्य धारण...

थक जायेंगी रोते हुए आँखें
चूक जायेंगे आंसू
फिर स्वमेव
साँसे व्यवस्थित हो जायेंगी

मौन हो जा कुछ समय के लिए
हो जाएगा शायद फिर निवारण...


यूँ ही लिखते रह अकारण... !!!




एकाकी शाम...!


चाँद चलता रहा साथ... कहने लगा... रात नहीं दिखा था न, तो लो दूर कर दी शिकायत तुम्हारी... दिख गया न दिन में... चलो रास्ते भर तुम्हारे साथ चलता हूँ... फिर मैं अपनी राह ले लूँगा... अदृश्य हो जाऊंगा पुनः रात्रि में प्रगट होने को... देखो नाव जैसी आकृति है न आज मेरी... आओ ले चलता हूँ पार... सभी उलझनों से पार...
सुबह सूर्य तो न थे पर साफ़ से आसमान पर चाँद था चिपका हुआ... नाव की आकृति में एकदम स्पष्ट धवल अप्रतिम... उसको देखते हुए चल रहे थे और सामने से बस छूटती हुई प्रतीत हो रही थी कि दौड़ लगा दी... ठोकर लगी, गिर पड़े... फिर उठे और दौड़ गए... बस छूटने नहीं दिया... स्टेशन पहुँच कर देखा... चाँद अब भी साथ था... तो ट्रेन की राह देखते हुए वह भी साथ ही रहा मेरे और चलती ट्रेन के साथ भी चलता ही रहा... मंजिल आई फिर चलते हुए उसे ही देखते रहे और अब यूनिवर्सिटी गेट पर उसे अलविदा कह दिया... हमने नहीं... उसी ने पहले कहा... अब रौशनी हो रही थी कुछ... और उसे दूसरी राह पकड़नी थी...!
आज प्रेजेंटेशन था... हमको अभी कई परीक्षाओं से गुज़रना था दिन भर में ... और कई आगत परीक्षाओं की तिथि और समय से भी तो परिचित होना था... कि जरा तैयारी हो सके आगे के लिए...!
जीवन के इम्तहान तो ऐसे भी अचानक बिन पूर्व तैयारी के ही फेस करने होते हैं... कहाँ समय देता है यह सहूलियत कि जीवन में होने वाले इम्तहान का एक निर्धारित समय हो, प्रश्नपत्र हल किये जाने के तरीके पहले से प्रैक्टिस किये गए हों... यहाँ तो सब अचानक होता है... समय और नियति की ही चलती है... हमारे हाथ केवल अपना सर्वश्रेष्ठ देना ही तो होता है... सामना करने के सिवा और कोई विकल्प छोड़ती ही नहीं ज़िन्दगी...!!!
शाम ढले जब यूँ सुबह के चाँद को याद कर रहे हैं तो बाहर एक बार खिड़की से झाँक कर ये भी सुनिश्चित कर ले रहे हैं कि अन्धकार में है क्या कहीं कोई चाँद सितारे फ़लक पर या आज भी वे छुट्टी पर हैं...

नीरवता है,
अँधेरा है...
और है एकाकीपन

घर से बहुत बहुत दूर
ये एक ऐसी शाम है
जहां है बस यादों का मौसम

किससे करें बातें
किसके पास होगा हमसे बात करने का अवकाश अभी
यही सोच सोच यहाँ वहाँ विचर रहा है मन

फिर लौट कर आया जो
तो जाने क्या बात कही मन ने
आँखें हो गयीं नम

मौन रहा मुखर
बात करती रही कविता
बैठे रहे अपने साथ हम... !!



काश...!

बहुत अँधेरी है रात... आसमान में एक भी तारा नहीं... चाँद भी नहीं... हो भी तो मेरी धुंधली नज़रों को नहीं दिख रहा... बादल हैं इसलिए नीला अम्बर भी कहीं नहीं है...! दिन भर नहीं रहा उजाला तो रात तो फिर रात ही है... अभी कहाँ से होगी रौशनी...
वैसे भी मौसम ही अंधेरों का हैं... सर्दियाँ आ गयीं हैं न... यहाँ सर्दियों में नहीं होती कुछ ख़ास रौशनी... होती भी है तो जैसे छलती हुई प्रतीत होती है... कभी जो उग आये दिनमान तो उग आये नहीं तो घड़ी ही बताती है कि कब हुई सुबह और फिर घड़ी ही बताती है कि कब शाम आई...!
शाम होने को थी आज... मन उदास था... कहीं जाना था उसे... सो बस निकल गए हम यूँ ही... बिना किसी उद्देश्य के... कहीं पहुंचना नहीं था... कहीं पहुंचे भी नहीं... पर भटकना भी तो राहों की पहचान देता है... सो भटकते रहे... साथ था रास्ता इसलिए चलना नहीं खला और फिर राह ही तो मंजिल होती है कई बार!
शून्य से नीचे ही रहा होगा कुछ टेम्परेचर... अच्छा लग रहा था चलना... कोई जल्दी जो नहीं थी... कहीं पहुंचना जो नहीं था...! हवा में ठंडक होनी ही थी... थी ठंडक, पर अच्छा लग रहा था जब ठंडी हवा छूती थी... मानों कुछ कह रही हो हमसे... जो जो कहा हवा ने सब सुना हमने... और हवा से ही कहा कि हमें भी ले चले अपने संग कहीं दूर जहां ज़िन्दगी अपने सरलतम रूप में स्वयं विद्यमान हो...! हवा क्या करती... हंसती हुई बढ़ गयी... बढ़ने से पहले कहा:: जहां हो वहीँ रहो और जो क्लिष्ट कर रखा है न... करो उसे सरल... सहज... सफल... ज़िन्दगी अपने सरलतम रूप में तुम्हारे पास ही है, तुमने ही कर रखा है उसे जटिल...!
चलते हुए बहुत दूर निकल आये थे... यात्रा में होना अच्छा है पर घर लौटना ज्यादा अच्छा है... यही सोच कर अब वापसी की ट्रेन में बैठ गए थे... अब पूरा अँधेरा हो चुका था... शाम हो चुकी थी समय के हिसाब से और अँधेरा कह रहा था कि रात घिर आई है...
बहुत से अधूरे काम है... घर बिखरा हुआ है मन की ही तरह... जाने कब समेटेंगे... आने वाले मंगलवार की परीक्षा हो जाए तब शायद... या फिर बुधवार को असाईनमेंट सबमिट करने के बाद... क्या पता...? शायद समेट भी लें, पर क्या फायदा... फिर तो बिखर ही जाएगा न...!

काश...
हमारे अनुरूप ही 
चलती 
ज़िन्दगी

काश...
हम चाहते
और 
बदल जाता 
मौसम

काश...
कोई होता
हर क्षण पास
आंसू चुनने को...
जब कभी 
होती आँखें नम

काश...
हम चुन पाते
अपने अनन्य की आँखों का दर्द
तो बिन लेते एक एक कण 
मेरी विनती सुन दे देते हमें वो अपने सारे गम

काश...
ज़िन्दगी सरल होती 
यूँ न गरल होती 

काश...
ओह! कितने सारे काश...
इससे मिलेगी क्या कभी मुक्ति...?
जीवन हो गया जाने क्या क्या बिसर गयी भक्ति...?

काश...
प्रश्न चिन्हों को मिलता विराम
मन कुछ क्षण तो करता फिर विश्राम 

काश...
काश! मिलता कभी अवकाश...!
काश क्षितिज पर सचमुच मिलते धरती और आकाश...!!!

सदियों का ये नाता है...!

कहने को कितना कुछ है, और नहीं है कुछ भी
कि बिन कहे ही हो जानी हैं
सब बातें संप्रेषित 


हम नहीं समझ पाते कभी
उन अदृश्य तारों को
जो जोड़ता है हमें...
अनचीन्हे ही रह जाते हैं
स्नेहिल धागे
जो बांधते हैं हमें... 



हम ये नहीं सोच पाते कई बार
कि जिस एक ही चाँद को
निर्निमेष निहार रहे हैं हम
वह सम्प्रेषण का सदियों से अद्भुत माध्यम रहा है
एक मन का विम्ब दूसरे में बो आता है 


तेरा मेरा सदियों का नाता है... ... ...


सूरज से रौशनी लेकर चाँद जगमगाता है
धरती की खातिर दोनों का उद्देश्य एक हो जाता है 



जीवन के बीज सकल
धरती पर लहलहाये
चाँद सूरज इसी दुआ संग
सदियों से उगते आये 


उनको युगों युगों से उगना और डूबना भाता है
ये कोई आज कल की बात नहीं... सदियों का ये नाता है...!!

कुछ कुछ साकार...!

घाव भर जाते हैं...
समय सब ठीक कर देता है...


जीवन में बस एक मन का रिश्ता हो
तो बदल सकती है दुनिया
इस कदर
कि खुद अपनी नज़र में
हम बदल जाते हैं...
बेहतर हो जाते हैं...
करने लगते हैं खुद से प्यार


जीवन और जिजीविषा जैसे शब्द
हो जाते हैं
कुछ कुछ साकार


झूठी मूठी सी इस दुनिया में
फिर एक कली सा
खिल आता है
स्नेह का संसार 


यादों के अमित अतल अनन्य
अनुपम हैं संस्कार 


दर्द भरे कुछ गीत हैं गुन गुन करते से
अगाध भावों के सान्निध्य से नम सुर संसार 


एक अनूठी शीतलता का भान
और उस क्षण की महिमा अकथ अपार 


जब... ... ...


जीवन और जिजीविषा जैसे शब्द
हो जाते हैं
कुछ कुछ साकार!

कितनी ही बार ऐसा होता होगा...!

कितनी ही बार ऐसा होता होगा...
हंसती हुई डगर पर मन रोता होगा... 


मन की अपनी दुनिया है
उसके अपने किस्से हैं...
उसकी अपनी कहानियां है,
वह अपनी मर्जी से
गम के प्याले पीता होगा
कितनी ही बार ऐसा होता होगा...! 


संसार के अपने तौर तरीके हैं
मन का संसार निराला है...
कहीं कुछ गहरे तो कहीं रंग कुछ फीके हैं,
उन रंगों में इंतज़ार का अनूठा रंग
बरबस जीता होगा
कितनी ही बार ऐसा होता होगा...!



फूलों का मुरझाना औ' पुनः खिलना
हारे थके मुरझाये हुए मन को जैसे...
साक्षात किसी ज्योत का मिलना
कितने तार-तार अरमानों को वह फिर
अनगढ़ प्रयास से सीता होगा
कितनी ही बार ऐसा होता होगा...! 



हंसती हुई डगर पर मन रोता होगा...
कितनी ही बार ऐसा होता होगा...

श्रद्धा की राह में...!

ये किस द्वन्द में
पड़ गए हम...
कौन भक्त
कौन भगवन...?


श्रद्धा की राह में
होता है...
दो अव्ययों का
एक ही मन...



कभी कृष्ण
पाँव पखारते हैं,
कभी सुदामा की
आँखें नम...



दोनों में
भेद ही नहीं है,
सखा भाव के समक्ष
सारे भाव गौण... 



आईये
मन की आँखों से देखते हैं-
ये अद्भुत लीला,
ये दिव्य आयोजन... 



और ये सत्य जान कर
मान कर...
इसी क्षण
हो जाएँ अभिभूत हम 



कि... ... ...



श्रद्धा की राह में होता है,
दो अव्ययों का एक ही मन... !!


***

कुछ एक शब्द... कुछ एक भाव... और वही 'प्रेरणा' जो लिख गयी यह पंक्तियाँ...
'प्रेरणा' को नमन करते हुए, कह रहा है मन, भक्त और उनके भगवान की जय...!!!





जीवन की डगर पर...!


रहता है कुछ अँधेरा ही... ठीक ठीक सुबह नहीं कह सकते, हाँ भाग रहा समय निश्चित ही घड़ी की सुईयों को सुबह की दहलीज़ पर ला खड़ा करता है... और घडी की सुईयों से ही तो नियंत्रित हैं हम तो सुबह तो हो ही जाती है भले ही क्षितिज पर सूर्यदेव का नामोनिशान न हो दिन चढ़ आने तक...!
आधे अँधेरे में गंतव्य तक की राह पकड़ते हुए जाने क्या क्या सोचते हुए हम चलते हैं... पेड़ों के संग चलते हुए कई बार बी एच यु कैम्पस याद हो आता है... रविन्द्रपूरी से सेंटल लाइब्रेरी तक पैदल ही तो चले जाते थे हम... वो भी क्या दिन थे... हैरान परेशान से... पर कहीं न कहीं सुकून भी तो होता ही था... नम घास पर खाली पाँव चलने का सुकून... घर से दूर तपती धूप से झुलसने का एहसास साथ होता था, तो वहीँ पेड़ के नीचे छांव भी थी... वह छांव जो रास्ते भर मेरे साथ चलती थी... और साथ मेरे बैठ भी जाती थी कभी कभी... उस पेड़ के नीचे जहां बैठ कर कितने ही पाठ पढ़े हमने, बायो-इन्फार्मेटिक्स के भी और जीवन के भी.
आज जब यहाँ आधे अँधेरे में सुबह निकलते हैं... घास पर जमी हुई एक परत बर्फ दिखती है तो ओस की बूंदें याद हो आती हैं... आधी राह तय करते हुए किसी किसी रोज़ आसमान पर अद्भुत छटा बिखरी दिख जाती है... सूरज के आने के पूर्व का महात्म्य जो रच रहा होता है अम्बर...! इधर मौसम ऐसा है कि बादल ही बादल हैं... बारिश ही बारिश है तो बादलों से आच्छादित अम्बर ने ये चमत्कार कम ही दिखाए... बरसने में ही व्यस्त है वह तो! पेड़ों पर से पत्ते गायब हो रहे हैं अब... राह में बिछी हुई चादर सी पत्तियां पैर पड़ने पर जैसे कहती है... "जी ली हमने एक पूरी ज़िन्दगी अब अगले मौसम हम फिर लौटेंगे, तब तक के लिए अलविदा... यादों में सहेजे रखना हमें कि हमारी स्मृति बर्फीले माहौल में हरापन बन कर उगी रहे तुम्हारे मन में"...!
यूँ ही चलते हुए हम अपने आप से ही, अपने माहौल से ही बात करते हुए चलते हैं... अकेला रास्ता होता है... कोई आगे पीछे नहीं होता तो खुल कर बात हो सकती है... होती भी है... बूंदों से, बिखरे पत्तों से, और उन पत्तों से भी जो अभी तक बचे हुए हैं टहनियों पर... बात बादल से भी होती है... हवा जब तेज़ बहती हुई मेरा छाता उड़ा ले जाने का प्रयास करती है तो उसे भी कुछ कह लेते हैं यूँ ही, भले ही वह सुने, न सुने... मेरी बात माने, न माने...! इन सबसे बात करते हुए अपने अपनों से भी बात होती ही है... जो साथ न होकर भी साथ ही तो चल रहे होते हैं...
इतना कुछ होते होते रास्ता तय हो जाता है और हम अपने गंतव्य तक पहुँच जाते हैं... जहां एक व्यस्त और लगभग सुन्दर दिन मेरा इंतज़ार कर रहा होता है!


रास्ते नहीं चलते साथ
चलना तो हमें ही है...
पर राह के दृश्य साथ ही तो चलते हैं
भले ही वे एक स्थान पर थमें ही हैं...
कि राही का सफ़र आसान हो!
कोई न हो तो भी किसी अपने के साथ का ही भान हो!! 



एकाकी होते हैं हम सफ़र में
पर कोई है जो सदा हमारे साथ चलता है...
हममें से हर एक के पास एक मन है
वहाँ कितने ही सपनों का स्वप्न पलता है...
उन्हीं में से किसी सपने का रूप अभिराम हो!
साथ चले जो हाथ थामे तो राह कुछ आसान हो!! 



जीवन की डगर पर
फूल भी हों, हों कांटे भी...
खुशियाँ दे या दर्द, जो भी दे ज़िन्दगी
उसे हम अपने अपनों संग बांटें भी...
कि कह दी जाए बात और दर्द अंतर्ध्यान हो!
कोई न हो तो भी किसी अपने के साथ का ही भान हो!!



चलते हुए तो साथ चलती ही है कविता, हवाएं ले आती हैं दूर देश से उन्हें और गुन गुन कर उठता है शांत सा वातावरण, अभी जब लिख रहे हैं वृत्तांत तो भी कविता जैसा ही कुछ घटित हो रहा है... कौन जाने!
कुछ देर में पांच बजने को है अब... और दो घंटे में पुनः रास्तों संग हो लेना है हमें... तब तक कितने ही काम निपटाने हैं... कितनी ही बातें करनी हैं अपने आप से और अपने अपनों से...!!!

भाव भाषा का अद्भुत स्नेहिल नाता...!


सुने, समझे जाने वाले शब्द, आखर के जोड़ भर हैं...
जो कह दी जाए, जो कहलवाए कोई, तो कविता हुई... ... ... !! ~ सुरेश चंद्रा ~


कितनी सुन्दर बात कही गयी है इन पंक्तियों में... यही क्यूँ उनकी हर पंक्ति, उनके हर शब्द सटीक और सुन्दर होते हैं... मंत्रमुग्ध कर जाते हैं और हम शब्दों का चमत्कार देख विस्मित हुए बिना नहीं रहते... हर बार, बार बार...!!!
इन दो पंक्तियों का आशीष मेरी किसी कविता को टिपण्णी स्वरुप दे गए थे सुरेश जी... ऐसी ही कई अनमोल पंक्तियाँ उनकी मेरे पास सहेजी हुई है... 
शब्दों की सुन्दरता, भावों के सौन्दर्य ने यूँ बाँधा कि आजीवन इनकी महिमा गाते रहेंगे हम... पढ़ते रहेंगे और उनकी लिखी बातों का सार समझने का प्रयास करते रहेंगे... !!
कहते हैं..., मन से लिखे गए भाव मन तक पहुँचते हैं, जो नम आँखों से लिखा गया हो... वो पढने वालों की भी आँखें नम करता है... स्नेह और श्रद्धा से आपके समक्ष झुकी हुई मेरी लेखनी सभी भावों को यथावत प्रगट करने में असमर्थ है... आपकी कलम की तरह प्रतापी जो नहीं है...
सुन रहे हैं न, सुरेश जी!



सपने की आँख मे, पलते हुए हम...
मद्धम सी आंच मे, जलते हुए हम...



स्वभाव है, सुनना, बुनना, गुनना...
स्वभाव के साँच मे, ढलते हुए हम...



वो सब जिनके लिए हम मर खपे...
उनकी ही आँख मे, खलते हुए हम...   ~ सुरेश चंद्रा ~



आपकी इन पंक्तियों ने आगे कुछ अनायास हमसे भी लिखवाया, जैसे आपने ही कहलवाया हो... देखिये तो कविता घटित हुई क्या...
आपकी और आपकी पंक्तियों से उत्प्रेरित मेरी कलम की धृष्टता सहेज लेते हैं आज यहाँ एक साथ... अनुशील के पन्नों के अनुपम सौभाग्य स्वरुप अंकित रहेगा यह पड़ाव सदा मन में भी और इन पन्नों में भी...



सपने की आँख मे, पलते हुए हम...
मद्धम सी आंच मे, जलते हुए हम...


स्वभाव है, सुनना, बुनना, गुनना...
स्वभाव के साँच मे, ढलते हुए हम...



वो सब जिनके लिए हम मर खपे...
उनकी ही आँख मे, खलते हुए हम...



कदम बढ़ते नहीं अब विराम चाहिए...
बोझ ये मन में लिए, चलते हुए हम...



धुंधला गयी है नज़र, आंसूओं से...
कुछ तो दिखे, आँख मलते हुए हम...



दर्द जो भी हुआ सह लिया मन पर...
बाग़ की खातिर, फलते फूलते हुए हम...


कितनी देर जब्त रहे, कब तक रुके नीर...
आंच में बर्फ की तरह, पिघलते हुए हम... 


वो सब जिनके लिए हम मर खपे...
उनकी ही आँख मे, खलते हुए हम...


***

जीवन बहुत बड़ी पहेली है... और शब्दों का संसार बहुत वृहद् है... अथाह है भावों का सागर... इस सागर के किनारे तक हमारी चेतना को ले जाने के लिए आपका कोटि कोटि आभार प्रिय कवि!!!

प्रेरणा बन प्रभात सा है खिल आता
भाव भाषा का अद्भुत स्नेहिल नाता... ... ... !! 

कुछ इस तरह...!

अपनी बेचैनी का
कारण
खोज रही है...
मन के कोने में बैठी
अनचीन्ही
एक भाषा...


वह भाषा
जो शायद कह पाये
सबसे सुन्दर शब्दों में
तुमसे...
सुख दुःख की परिभाषा 


कि तुम
बुन सको फिर अक्षरों से शब्द
शब्द से भाव
और भावों में
बह आये समाधान
कुछ इस तरह... 


लेते रहते हैं
जीवनपर्यंत
हे जीवन!
हम
तुम्हारा नाम
जिस तरह!  


अपने अनमनेपन का
कारण
खोज रही है…
बड़े आस से
भोली भाली
जिज्ञासा... 


वह जिज्ञासा
जो अपनी आत्मीयता से
कर भावविभोर तुम्हें
कह जाए तुमसे...
जीवन है आशा 


कि तुम
सुन सको फिर
अपने होने का संगीत
खिल जाए मन के क्षितिज तुम्हारे
पावन प्रात औ' प्रीत
कुछ इस तरह...  


लेते रहते हैं
जीवनपर्यंत
हे जीवन!
हम
तुम्हारा नाम
जिस तरह!!  

ज़िन्दगी हर कदम एक जंग है...!

ये एक तस्वीर ::
नितिन्द्र बड़जात्या जी ने एक दिन यूँ ये तस्वीर हमें दी थी… इस विश्वास के साथ कि हम कुछ लिख पाएंगे इस पर… 
उनके शब्द::
आपके रचनाधर्मिता हेतु एक बहुत संजीदा विषय दे रहा हूँ..... दीपोत्सव के अवसर विद्यालय के विशिष्ट प्रज्ञाचक्षु बच्चों का रंगोली बनाते हुए चित्र…
***
ये उनका विश्वास ही फलित हुआ कि कुछ पंक्तियाँ यूँ ही आंसुओं की तरह बह आयीं, सोचा था कुछ सजा संवार कर लिखेंगे पर ऐसा कभी हमसे हुआ नहीं, शायद कभी हो भी नहीं.... इसलिए जो जैसे बह गए थे भाव वैसे ही सहेज लें यहाँ… यूँ हमारी नगण्य सी क्षमता पर विश्वास करने के लिए, आभार नितिन्द्र जी!
आपकी कर्तव्यनिष्ठा को नमन एवं विद्यालय को अनंत शुभकामनाएँ!




हमारी आँखें
नहीं देख पाएंगी
वो सौन्दर्य कभी
जो मन की आँखें रचती हैं 


कितने कोमल हैं ये रंग
कितनी दिव्य है यह रंगोली
इसका अनुमान भी नहीं लगा सकते हम
हमसे कहीं अधिक रंगीन होती है इनकी दिवाली इनकी होली 



आँखें जो भ्रम रचती हैं
उससे कोसों दूर हैं ये
निष्कपट निर्दोष है इनका भाव संसार
स्वयं साक्षात नूर हैं ये 



ये रंग
ये रंगोली
ये दिए...
ये रौशनी
ये सब आयोजन
एक शुभ त्योहार के लिए...



राम वनवास पूरा कर लौटे जो हैं घर
क्यूँ न रौशनी में डूबे फिर सारा धाम पूरा शहर
क्यूँ न शोर हो
क्यूँ न फिर जागते हुए ही भोर हो 



कि दीपावली है
दीपों की कतार है आत्मा के प्रकाश से झूम रही सारी गली है 



और राम
उस रंगोली पर मुग्ध हैं
जो मन की आँखों ने
मन से है बनाया
राम उस दीप पर
अपनी दिव्य मुस्कान बिखेर रहे हैं
जो उन नन्हें हाथों ने
है जलाया 



काश देख पातीं
वो आँखें रौशनी की किरण
जो प्रभु की आँखों की ज्योत बन
चमक रही है...!
विडम्बना तो है
पर उसके खेल निराले हैं...
शरणागतवत्सल की करुणा ही तो
रंगोली के रंगों में झलक रही है...!!



ये लिखते हुए
शब्द मेरे मौन हैं...
और आँख मेरी भर आई है...
ज़िन्दगी हर कदम एक जंग है...
ज़िन्दगी हर मोड़ पर तन्हाई है...!

ललित, आपके लिए...!

पहले भी लिखा है इसी शीर्षक से आज फिर यूँ ही कुछ लिख जाने का मन है... आपकी प्रेरणा से आपके लिए...


विचलित हो जाता है मन
रो पड़ता है
समस्यायों का एक समूचा व्यूह
मुझे जब तब जकड़ता है 


सबसे हो दूर कहीं खो जाने की
इच्छा होती है
वजह बेवजह
आँखें बेतरह रोती हैं 



दिशा कोई नज़र नहीं आती
पथ की पहचान नहीं हो पाती 


तब, जो
खिल आता है
समाधान बन कर...
गूँज उठता है
स्वयं
हरि नाम बन कर...
वह
पावन प्रभात हैं आप
भईया, नेह आशीषों की
हमको मिली
अनुपम सौगात हैं आप 


यूँ ही लिख जाना था
बस शब्दों को आप तक आना था
सो लिख गयी
कविता ओझल ही रहती है हमेशा
बस आज एक झलक सी उसकी दिख गयी 


सदा सर्वदा रहें आप
यूँ ही उज्जवल दैदीप्यमान
मिलती रहे दिग दिगंत तक
पथ को आपसे पहचान!

हृदय से बहता निर्झर!

बह रहे हैं अविरल आंसू
उद्विग्न है मन...
कहीं न कहीं
खुद से ही नाराज़ हैं हम... 


भींगते हुए बारिश में
बस यूँ ही दूर निकल जाना है कहीं...
यूँ भींग जाएँ-
आँखों से बहता आंसू दिखे ही नहीं... 


आसमान से गिरती बूंदों में
समा जाएँ अश्रुकण...
और ये भ्रम सच हो जाए-
रोते हुए चुप हो गए हैं हम... 


आंसू में ही है कोई कविता
या है कविता में आंसू का होना...
उधेड़बुन में है मन, जाने क्या क्या खो दिया-
जाने कितना अभी और है खोना... 


ज़िन्दगी! जितना रुलाना है
आज जी भर कर रुला ही ले...
कितनी रातों के जागे हैं
अब गहरी नींद हमें सुला ही ले... 


ज़िन्दगी! तेरा कोई दोष नहीं है
कोई-कोई सुबह ही ऐसी होती है...
तेरे अपने कितने सरोकार हैं
हमारे लिए तू सदा आशीष ही तो पिरोती है... 


अब कभी-कभी क्या बरसेगा नहीं अम्बर
आँखें हैं तो, आंसू भी तो होने हैं न...
इसमें ऐसी कौन सी बड़ी बात है?
बादलों को धरती के सारे कष्ट धोने हैं न... 


तो बरसो, जितना है तुम्हें बरसना
बादलों! उपस्थिति तुम्हारी प्रीतिकर है...
इस अजीब से मौसम में-
आंसू हृदय से बहता निर्झर है... 


और यही है हमारी
एक मात्र सांत्वना...
जीवन हमेशा से ऐसा ही है-
थोड़ा अजीब... थोड़ा अनमना...!

कल ये हमारा नहीं रहेगा...!

तुम्हारे लिए ही

अस्त हो रहा है...

कल तुम्हारे लिए ही

पुनः उदित होगा...


बस रात भर रखना धैर्य

ये जो अँधेरा है न...

बीतते पहर के साथ

यही उजाला पुनीत होगा...


ये जो डूबती हुई

लग रही है न नैया...

रखना विश्वास,

किनारे लगेगी...


सोयी हुई जो

लग रही है न किस्मत...

वह तुम्हारे पुरुषार्थ से

निश्चित जगेगी...


अपने लिए जितने दुःख दर्द

लिखवा लाये हैं हम विधाता से...

वह सब हमें

परिमार्जित ही करेगा...


बीत रहा है हर क्षण जीवन

समय रहते समझें, इसका महत्व हम...

ये आज है...

कल ये हमारा नहीं रहेगा!!!

हम भूल गए बंदगी...?

पुरानी डायरी से १९९८ में लिखी गयी रचना::


अगर न होते नैन, जिह्वा और श्रवण शक्ति...
तो, निर्विघ्न चल सकती थी भक्ति...
दरवाज़े सब होते बंद... बस खुला रहता मन का द्वार
शांत हृदय से जुटते हम करने आत्मा का जीर्णोद्धार
भटकाव से परे आत्मलीन होता चिंतन
मन ही मन बस चलता रहता हरिनाम का संकीर्तन


जुटा दिए क्रोध, मद, मोह, लोभ के सारे सामान
और हो गए वो दूर क्षितिज पर अंतर्ध्यान...?
जिससे कोई बिरला ही शान्ति पा सके
करे ठोस प्रयास तब अमृतकलश तक जा सके
यूँ तो बस लहरों में खो जाते हैं
आने वाले जीव यहाँ बस माया के होकर रह जाते हैं!


खूब बनायी दुनिया उसने
मोह ममत्व की खूबियाँ उसमें
दीं चरम शक्तियां इंसानों को
अपनी आसक्तियों की खातिर जलते परवानों को
देने को तो उसने दिया ज्ञान विवेक
पर अविवेकी होने के संबल भी जुटा दिए अनेक....


दिए उसने दो नेत्र ललाम
चहुँ ओर भागे, जो होकर बेलगाम
यही सत्य है...
ये आँखें खूब नाच नचाती हैं
बाह्य सौन्दर्य के आगे-पीछे दीवानों की तरह मंडराती हैं...


श्रवण शक्ति भी है कम बैरन नहीं
जो अशांत किये रहती है हर पल, ये है वही...
भला बुरा सुन सुन कर आक्रोश जगेगा
इधर उधर व्यस्त रहेगा... मन की बातें यह नहीं सुनेगा


जिह्वा सारी पशुता की होती है जड़
स्वाद पर पक्की उसकी पकड़
कटु वचन कहवा कर कई पाप करवाती है
भाषा के चक्रव्यूह में आत्मा को फंसाती है



यही होता है... यही होता रहेगा
सब अपना अपना राग अलापेंगे
अपनी अपनी ही ऐषणा के मन्त्र जापेंगे


घाटे में आखिर कौन रहेगा..?
अरे! इस संसार के फेरे में अन्दर का इंसान ही मरेगा!


फंसा कर ज्योति, ध्वनि और स्वाद के जाल में
ढलते देखती है इंसानों को भेड़ियों की खाल में
कैसी अद्भुत ये सत्ता तेरी ईश्वर...?
भ्रम यथावत बना रहता है, इंसान है कितना विवश नश्वर...??


भ्रामक शक्तियों को इतना स्पष्ट सजाया
फिर क्यूँ आत्मा को इतना सूक्ष्म अस्पष्ट बनाया...?
कि बिना दिव्य प्रयास के, साधारण जन
पहचान सके नहीं, अपना ही अंतर्मन


काहे इतनी क्लिष्ट बनायी ज़िन्दगी
कि अहम् मोह के फेरे में हम भूल गए बंदगी...!!

मनें दीपावली... दीपों वाली!

स्वप्न में,
स्वप्न सा...
दीखता है जगमग
एक दीप उम्मीदों का
एक ज्योति खुशियों की 


स्वप्न के धरातल से
वास्तविकता की ठोस ज़मीन तक का सफ़र
इसी क्षण तय हो 

और दिखे दीप

जगमगाता
मन की देहरी पर 


बस इतनी सी ही
प्रार्थना है...

दीप का जलना मात्र जलना ही नहीं है
यह एक साधना है... 

विपरीत हवाओं के विरुद्ध

मौन संघर्ष...
जलती लौ की दिव्यता
विशुद्ध भावों का चरमोत्कर्ष... 


चलती रहे यात्रा अनंत
लौ को कोटि कोटि प्रणाम है
जीवन कुछ और नहीं
सत्य का संधान है !!!

***

मनें दीपावली... दीपों वाली!

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया !
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुख:भाग भवेत् !!

शब्दों की प्रेरणा, प्रेरणा से उपजे शब्द!

"अपना ख्याल रखना"... आत्मीयता से पगे ये स्नेहपूर्ण शब्द प्रेरणा बन कर बहुत कुछ लिखवाना चाहते हैं... पर कलम चुप सी है...! अचानक अभी आधी नींद में लिखा गया यह... कविता तो नहीं है... यूँ ही कुछ है, आधी जागी आँखों द्वारा बुना गया ताना बाना!

यूँ ही कुछ कहना है हमें...
बेचैन सा है मन
पर फिर कहीं चुप चुप सा
खामोश भी...


लगा कि
पहला अवकाश मिलते ही लिख जायेंगे
वह सब जो लिखा जाना शेष है
कह जाने को
मन में कितने ही
स्मृतियों के अवशेष हैं



पर
अवकाश है कहाँ
और अब तो शब्द भी नहीं है
हम हैं कहीं
और आजकल
हमारी कलम और कहीं है 


बड़ी आत्मीयता से
कह जाता है कोई
"अपना ख्याल रखना"
तो बस मन भर आता है
हो न हो
ये आवाज़ हमारी अपनी है
इस आत्मीयता से हमारा
सदियों पुराना नाता है 



वो नाता जो साथ रोती आँखें
पल में बना लेती हैं
यूँ ही घट जाता है अँधेरा
सांझ यादों के दीप जला लेती है 


बातें हो... या कि हों रहस्य...
सब कहाँ हमें ज्ञात हैं
मन के आकाश पर उगने वाले चन्द्र अरुण
सदियों से अज्ञात हैं 


उन्हें जान लेने के उपक्रम में

सदियाँ खोती हैं 

पहेलियाँ गढ़ती भी वही है सुलझाये भी वही
सुख दुःख की गति नियति के हाथों होती है 


राह बड़ी संकरी भी है

और जीवन 

बहुत छोटा है
कहीं कुछ भी पूर्णरूपेण निर्दोष नहीं 

हम सबकी जेब में 

कोई एक न एक सिक्का तो है ही जो खोटा है 

इसमें बेवजह
तर्क वितर्क को
क्यूँ जगह दी जाए
आईये आज धूप में हो रही
इस बारिश में भींगें हम
और भींगते हुए बात कोई अनूठी की जाए... !!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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