अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मुस्कुराती रही दुआ... !!

किस्मत का क्या है...


बनती है...
बिगड़ती है...


ज़िन्दगी...
किसी मोड़
नहीं ठहरती है...


वक़्त को फिसल जाना था...
आँखों के सामने से मंज़र बदल जाना था...


सो,
वही हुआ...


हमारे दामन में मुस्कुराती रही दुआ... !!


मन बंजारा...!

एक घर सजाया प्यार से
सब से प्रीत बढ़ाई
कितनों से होती गयी आत्मीयता
फिर भी शुरू से आखिर तक रही मैं परायी
बंधे थे तो मर्ज़ी से
तोड़ा बंधन तब भी अंदाज़ रहा न्यारा
पड़ाव का मोह बिसार
चल दिए, तो मिल ही जायेगा किनारा
गाता जाए मन बंजारा


रुके तो, आंसू समेटा, खुशियाँ बांटी
कभी हंस हंसा लिए तो कभी नयनों में बदरी छाई
जो बढ़े, तो विस्मृत कर दिया छूटता मंज़र
ख़ुशी ख़ुशी हो गयी अपनी विदाई
दर्द मिला तो दिल पर नहीं लिया
क्या दुर्भावना रखेगी बहती धारा
जो पराये हुए, जो अपने हैं
उन सबमें झलके है वही एक करतारा
गाता जाए मन बंजारा 


दो पल जिया किसी मोड़ पर
दो पल कही रैन बितायी
चार दिन की ज़िन्दगानी
उसमें क्यूँ करना संचयन? कैसी तिकड़म, मेरे भाई
गुज़रे जो पल सद्भावपूर्ण माहौल में
उन लम्हों पर हमने सदियों को वारा
शांति का अचल पैगाम लिए
चलते जाना ही है ध्येय हमारा
गाता जाए मन बंजारा 


रगड़ों झगड़ों में पड़ना क्या
अंतिम मोड़ पर सबको है अकेले ही लड़नी अपनी लड़ाई
जीवन कल नहीं रहेगा, मौत सारे आवरण छीन लेता है
तब कहाँ से चल पाएगी चतुराई?
समझ नहीं पाता अभिमान
"उसकी" महिमा अगम अपारा
अरमान यही कि खगवृन्दों  सी दुनिया हो
उड़ता रहे निर्बाध, मन मोह तोड़ कर सारा
गाता जाए मन बंजारा 



[ ६.५. २००१, पुरानी डायरी से ]

यही तो है रक्षा पर्व... !!!


बीतते समय के साथ कितना कुछ है जो बीत जाता है... ये सच है कि  इस बीतने में अपनी आस्था एवं श्रद्धा को तो बचाया ही जा सकता है पर कितनी बार ऐसा होता है कि आस टूटने लगती है और निर्मम समय सभी कोमल भावों को रौंदता हुआ अपनी गति से आगे बढ़ जाता है... ! रिश्तों के बीच नहीं आना चाहिए समय की निर्ममता को, आता भी नहीं है पर वो पहले वाली बात तो नहीं ही रह जाती है... वो बचपन तो खो ही जाता है जब बुआ लोग का आना देखा था इस दिन... पापा को राखी बाँधने... हम लोगों के साथ खूब एन्जॉय करने... !! श्रावण पूर्णिमा अब वैसे उत्साह के साथ तो नहीं ही आती है जमशेदपुर मेरे घर में... अब दूर बसी बहनें और दूर जो होती जा रहीं हैं... हो गयीं इन बीते वर्षों में... जीवन की क्षणिकता ने कितनो को हमसे छीन लिया... मम्मी से बात होती है तो यही कहती हैं... यहाँ कहाँ राखी... सच, है... मम्मी के भाई आसपास नहीं तो फिर क्या सेलिब्रेशन, अब पापा की भी राखी नहीं आती कहीं से तो यह त्योहार कम से कम मेरे घर से तो विदा सा ही हो चुका है... हम चारों भाई बहन भी चार जगह हैं... कोई घर पर नहीं है कि कभी पुराने दिन लौटें... उत्सव का कोई माहौल बने इस दिन... खैर...
*** *** ***
टाटा मर्सी हॉस्पिटल में मम्मी का ऑपरेशन हुआ था कभी, जिन्होंने उनकी देखभाल की थी... उनसे जैसे हमेशा के लिए रिश्ता सा जुड़ गया... उनका नाम मर्सी हॉस्पिटल से एसोसिएट करके ही हमलोग लेते रहे हमेशा... मम्मी के डिस्चार्ज होने के बाद भी वो हमेशा आती रहीं घर... कई वर्षों तक फिर ये तो निश्चित रहा कि और कहीं दूर से आये न आये... इनकी राखी ज़रूर सजेगी पापा की कलाई पर... समय ने इस मुंहबोली बुआ को भी हमसे छीन लिया... ! मेरी शादी में... (पांच वर्ष से ज्यादा पुरानी बात नहीं है)... उन्होंने बढ़ चढ़ कर अपनी उपस्थिति और गीतों से माहौल बनाये रखा... और देखते देखते इस कुछ ही समय में उनका प्रस्थान भी हो गया इस जग से... !
नानी भी अब नहीं है... नहीं तो उनका भी उत्साह देखा है इस दिन के लिए... उस उम्र में भी नैहर के प्रति जो ललक थी कि बस... नानी के भतीजों ने निभाया भी... नानी के अंतिम समय तक... उनकी ललक का सम्मान... और नैहर के प्रति मोह का जीवनपर्यंत मान रहा...!
*** *** ***
हम चारों भाई बहन इतनी दूर हैं कि साथ इकठ्ठा होना सपना ही है... फिर भी, थैंक्स टू फ़ेसबुक एंड स्काइप, कि एक क्लिक पर दूरी के आभास को कम करने की क्षमता तो रखता ही है... यही सब सहारा हैं हमारे समय का... दुनिया सिमट गयी है... पर समय ने हमें इतना व्यस्त कर दिया है कि हम चाह कर भी इस सिमटी दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक नहीं जा सकते... ये परिधि नापना लगभग असम्भव ही तो हो चला है... खैर, स्नेह कब बंधा  है इन बातों से... धागा तो बंधा ही हुआ है... धागे ने बाँध ही रखा है हम सबको एक ही सूत्र में!
इस पावन पर्व की भावना वसुधैव कुटुम्बकम के भाव से ही तो अनुप्राणित है... इस स्नेहसूत्र ने हम सबको बाँध ही तो रखा है एक सुन्दर भाव के अंतर्गत... ! ये भावनाएं प्रबल रहे... सभी दिनों में... प्रतिबद्धता हो सभी बहनों... सभी की बहनों... के प्रति...  तो देश दुनिया की कितनी ही सामाजिक समस्याएं स्वतः हल हो जाएँ... !
यत्र नयास्तु पूज्यन्ते वाला देश है हमारा... इसकी गरिमा के अनुरूप तो नहीं ही है वर्तमान परिवेश हमारा... बदले यह परिदृश्य... परिष्कृत हों हम... सुन्दर हो जीवन... यही तो है रक्षा पर्व... !!!

पूरा चाँद... आधे अधूरे हम... !!


मैंने चाँद को देखा... वो निर्निमेष जैसे मुझे ही निहार रहा था... या शायद मेरी उसकी ओर एकाग्र दृष्टि ये आभास करा रही थी...! जो भी हो, दोनों ही विकल्पों में से जो भी सत्य रहा हो, है तो यह एक सुन्दर संयोग ही... कि ऐसा रोज़ नहीं होता... रोज़ संभव ही नहीं कि ज़िन्दगी दे इतना अवकाश कि दसवें फ्लोर की खिड़की पर बैठा मन चाँद को निहार सके... कितनी ही कही अनकही बातें कह सके चाँद से... और आश्वस्त भी हो मन कि दूर गगन का चाँद सुन भी रहा है सब बड़ी तन्मयता से...
ये कल्पना... ये आस्था... ये विश्वास... ये पागलपन सी प्रतीत होने वाली बातें... और ये अनुभूति रोज़ कहाँ संभव है... !! कभी कभी घटित होता है यह दुर्लभ संयोग, रोज़ नहीं आता गगन के हिस्से पूरा चाँद और न ही हर रोज़ आसमान भी नील वर्ण का होता है... नीला रंग मुरली वाले का ही विस्तार है... पीताम्बरधारी प्रभु की असीम कृपा का रूप है... तभी तो "होकर भी न होने वाले" आसमान का रंग है... दिखाई तो देता है पर आसमान का वास्तव में कहाँ है वजूद... हवा नहीं दिखती, पर है वो... ईश्वर की लीला अपरम्पार है... इसे समझ पाना कहाँ हमारे वश में...!
कहाँ से कहाँ चली जाती है कलम, उसे जो लिखना है लिखे... हम कर्ता भाव से छूट कर बस अपना कर्म करें... शेष तो भवसागर है यह... यहाँ न दुखों का अंत है न ही संभावनाओं का... तो चलता चले जीवन वैसे ही जैसे चाँद चलता है गगन में... घटता बढ़ता... नित निरंतर...

चाँद!
तुमसे कहते हुए
आश्वस्त हूँ...

कि...
तुम जानते हो
घटते बढ़ते रहने का दर्द...

समझोगे तुम...
हमारी पीड़ा...

कि हम इंसानों के भी
जो हिस्से आया
सब आधा अधूरा है...

हमारा अस्तित्व
कहीं से भी
नहीं पूरा है...

हम सब
अपने अपने परमेश्वर से
बिछड़े जीव हैं...

एक ज़िन्दगी मिली है
और वह भी
क्षणिक निरीह है...

तमाम अधूरेपन
और कालिमा के होते हुए
तुम कवियों की कल्पना हो...

हम सबकी प्रेरणा हो...

वैसा ही हौसला हमें भी देना...
चाँद! यूँ ही चमकते रहना... ... ... !!



दर्द और दवा... !

भाप से जल कर...
मन, रह गया, मचल कर...


ओह!
क्यूँ नहीं रहती तू संभल कर...
ज़िन्दगी! दे सज़ा
कर, फिर से, कोई छल कर...


फिर से बिखर...
और फिर फिर समेट खुद को...
जीत ले विडम्बनाएं...
संकल्पों के सांचे में ढ़ल कर...


ज़िन्दगी!
दौड़ते हुए सरपट...
कभी रुक जा तू, चिंतन की गली में भी,
पल भर...


हम
नहीं हारेंगे अँधेरे से...
हृदय से लग जायेंगे रौशनी के
कदम दर कदम चल कर...


सब समाधान कब मांगे हैं...


अरे! कुछ प्रश्नों को तो हल कर...
संभावनाओं के सांचे में ढ़ल कर...


ओह!
मन, रह गया, मचल कर...
भाप से जल कर...

तभी
अवतरित हुई दवा...
दुआ सी कविता बनकर... !!


अथाह की कुछ तो थाह मिले...!

वो सागर के समीप होने का दिन था... वो लहरों से खेलने का दिन था... वो उस तट पर खो जाने का दिन था... समय की परवाह न करते हुए लम्हों को जी लेने का दिन था... सब से दूर अपने करीब होने का दिन था... लहरों से खेलते हुए अपने अपनों के लिए अहर्निश चल रही प्रार्थनाओं से एकाकार हो जाने का दिन था... ये कुछ ऐसा था कि शब्दों में ढ़लते हुए अनुभूतियों को महीनों बीत गए... अब भी लिखना जो प्रारंभ किया है तो संशय में ही है कलम...

अनुभूतियों को लिख पाना इतना भी सरल नहीं... लिखना ही कहाँ सरल है... कितने ही अव्ययों को सहजता की ज़मीन पर रोपना होता है... तब घटित होता है लेखन!

मन में अजीब सी घबड़ाहट है, खूब रोने का मन है, अकेला मन चीखना चाहता है... शोर करती लहरें तब आकर बाहें थाम लेती हैं... अभी भी लहरों ने ही हाथ थामा  और ले गयीं मुझे सागर किनारे... वो दिन सजीव हो उठा... लहरों ने ही कहा... स्थिर करो मन को... लिखो हमें... कि तुम्हें अथाह की कुछ तो थाह मिले...!

समंदर पर रेत के घरौंदे बनाते हुए... चुने हुए पत्थरों से कोई प्यारा सा नाम उकेरते हुए... सूरज को उगते और डूबते हुए देखा...! सुबह से शाम तक की अविरत यात्रा थकाती होगी न सूरज को भी... तभी तो वो ओझल हो जाता है... सागर में विलीन होता हुआ प्रतीत होता है... अपने लिए विश्रामगृह तलाशता अस्ताचलगामी सूर्य कितना अकेला सा प्रतीत होता है न...

मन भी अजीब है, अन्तःस्थितियों का प्रतिविम्ब प्रकृति में  देख लेता है... ! सूरज कहाँ डूबता है, उसकी यात्रा तो अनवरत ज़ारी है... ये तो हम हैं कि अपनी अपनी दशा और दिशा के अंतर्गत अपना अपना सूर्य और अपनी अपनी सुबह पाते हैं... वो तो समस्त चराचर जगत पर एक सा बरसता है... अपनी अपनी क्षमता के तहत ही उसे अपने भीतर समाहित कर पाती है हमारे अपने हिस्से की माटी...

यूँ चाँद का आना भी हमने देखा और आसमान का रंग बदलता हुआ हमें बता गया कि यूँ तट पर बैठ जीवन नहीं बिताया जा सकता... ये बालू के घरोंदे टूटने के लिए ही बनते हैं...

चांदनी बोल उठी--

तोड़ो ये अपनी कारीगरी और जाओ... जीवन का महासागर है... वहां हौसले के साथ चल कर दिखाओ... पूरी क्षमता लगा दो... रचो... और सारी टूटन बिखरन समेट कर फिर बढ़ चलो... कि गति ही जीवन है... लहरें किनारों पर बार बार टकड़ा कर यही तो दोहरा रही है... ज़िन्दगी बही जा रही है... जिजीविषा के गीत गा रही है... !



हो सके तो यकीं करना...!

तुम यकीं नहीं करोगे
हमें पता है...


पर हो सके तो यकीं करना...


यहाँ की सुबहों में उजाला नहीं है
बस इसलिए
कि तुम्हारी मुस्कराहट
कितने दिन हुए
नहीं दिखी...


उजाला क्या?
यहाँ तो सुबह ही नहीं होती...


रात ही रात है...
बोलो, ये भी कोई बात है...!


कभी-कभार तो
हो ही जानी चाहिए न सुबह...
ऐसे कैसे चलेगी ज़िन्दगी
कोई तो होनी चाहिए न वजह...


सूरज बन कर
उग आओ न...
हमने कब से बढ़ा रखा है
तुम भी हाथ बढ़ाओ न...


हाथों में
हाथ होगा...
देखना, गोधुलि की इस बेला में
दिन और रात का साथ होगा...


तुम
एक मुस्कराहट दे जाना...
जाते जाते
मेरी सारी दुनिया हो जाना...


तुम्हारे लिए


हमने अपने हाथों से
कागज़ पर
रंगों से
सूरज बनाया है...


पता है
एक फूल भी
रंगों ने मिल कर
खिलाया है...


पत्थरों पर
की है चित्रकारी...
ये सब
प्रेरणा है तुम्हारी...


प्रार्थना यही है
पल पल...
जीवन हो
बहता जल...


उस निर्मल धारा संग
तुम भी बहना...
यूँ ही मन के बागों को
सुवासित किये रहना...


हम माटी को सर माथे लगायेंगे
देखना, आस्था के दीप जगमगायेंगे... !!

हो सके तो...!

मन का पंछी...
जीवन का आकाश...
धरा की बेचैनियाँ...
और समंदर!


समंदर के अथाह में तैरती
आस विश्वास की
तसल्लियाँ... 


धैर्य की अनगिन मछलियाँ...!


तटों पर एक बार हो आओ...
मन! हो सके तो समंदर हो जाओ...!!

आना-जाना...!


जाने को उद्धत हो न
चले जाना...


कौन रोक सका है समय को...
किसने बांधा धारा को...
ये बेकार ही न जिद्द ले बैठते हैं कि आधे आधे न हों हम
जो हो वो सारा हो...


सब तो बिखरन ही है यहाँ
फिर हम कैसे साबूत बच जायेंगे...
जाना है न... जाओ...
दरके हुए हैं टूट ही जायेंगे...


पर इससे क्या
जो है सो है नियति यही है
क्या सोचना व्यर्थ
सारी बात तुम्हारी अक्षरशः सही है 


गति का नाम जीवन है
पर कभी कहीं रुक जाना भी जीवन ही होता है
कभी कभी जीतते जीतते हार जाने का भी मन होता है... !! 

कौन नाता...?

तेरा मेरा
कौन नाता...?


कभी आंसुओं से
तो कभी ओस से
है सींचा जाता...??


कभी
कह देते हैं
दर्द समंदर...
कभी
इस नाते को कर लेते हैं
ज़िन्दगी का पक्षधर... 


कभी नदिया बहती है
कभी हम स्वयं
भावों संग बह जाते हैं...
अनगिन जन्मों में से
इसे किसी पूर्व जन्म के
संस्कार कह जाते हैं...


एक ही
गगन के नीचे हैं
तो पास ही हुए न...
रिश्तों ने
रिश्ता जोड़ लिया
हमने कोई क्षितिज छुए न... 


कैसे कैसे भाव
गढ़ जाती है नमी...
सबकुछ तो है
फिर है किस बात की कमी... 


क्यूँ ये
छाई हुई उदासी है...?


ज्यादा
नहीं सोचना,
बात ये ज़रा सी है... !!



उसने कहा --


बहुत
बेचैन था मन


बेहद
उदास थे हम


कविता की ऊँगली थामी
वो कहती रही, हम बस भरते रहे हामी 



उसने कहा -- 


हो जाओ
गुम
कोरे कागज़ पर
बस
लिखकर


"तुम" 

ये साथ है अनूठा...!!


तालों से पटा पुल...


समय सहेजता है
आस्था के अनगिन फूल...


साथ की परिभाषा जाने क्या होती है...
जाने क्या होता है प्रेम...


ताला लटका रह जाता है अंकित नामों का विम्ब बनकर
और ताले की अभिन्न
चाभी
फेंक दी जाती है
अथाह जल में
हमेशा के लिए ताले से जुदा हो जाने को
खो जाने को...

***

ताले और चाभी का दर्द
चुभने लगा बन कर शूल 


तभी कह उठे दोनों -- 


"जाने दो...
बातें ये निर्मूल...

ये साथ है अनूठा...
कि हम औरों के लिए कुर्बान हुए...
प्रेम की प्रतिमा की हम चरण धूल...!!"

*** *** ***
तस्वीर :: Pedestrian bridge named "Passarelle des Arts" which crosses the River Seine 

कथ्य आपका, कलम मेरी... !!


उठते गिरते... रोते सँभलते... चलते चलते अब अनुशील पर ५०० पोस्ट्स हैं... ये यात्रा कलमबद्ध हो... लौट कर आने को ऐसी जगह रच रही है निरंतर मेरे लिए... जिसका होना कभी कभी अनिवार्य सा जान पड़ता है... जब कहीं नहीं होता कुछ, तो अवलंब बनती हैं कवितायेँ ही... बीता हुआ कोई पल आस विश्वास बुनकर जीवन के प्रति आस्था दृढ कर जाता है... और लौट आते हैं हम... वापस जीवन की ओर...
जीवन! शुक्रिया तुम्हारा... तुम जो हो वो होने के लिए... !!
*** *** ***

हमारी प्लानिंग के अनुरूप सब होता तो आप यहाँ होते अभी... स्टॉकहोम में... हम यहाँ सेलिब्रेट कर रहे होते आपका "हैप्पी वाला बड्डे"... है न... ? उम्मीदों से भरी गुल्लक ख़ुशी ख़ुशी तोड़ कर उससे कितने सपने बुन लिए गए थे यहाँ... सब धराशायी...; कोई बात नहीं... फिर नयी गुल्लक ले आये हैं... नए शहर से... अब उसमें भरेंगे उम्मीदें...  बीतेगा समय और समय के साथ गुल्लक फिर भर जाएगी... अबकी बार समय भी शायद दे साथ और हमारी प्लानिंग सफल हो जाये... आपका यहाँ आना हो... आपके साथ इस शहर का आकाश देखें हमलोग...
*** *** ***

आपकी फ़ेसबुक कवर फोटो पर "नामालूम"जी की सुन्दर पंक्तियाँ उद्धृत हैं न...
[ रोज़ रोज़ गिर कर भी मुकम्मल खड़ा हूँ /
ज़िन्दगी देख मैं तुझसे कितना बड़ा हूँ ]
इसके आगे ऐसे ही कभी कुछ जुड़ गया था... आज पन्नों के बीच मिला... सहेज लेते हैं इधर फिर से :: कथ्य आपका, कलम मेरी...!


राहें तराशता
बढ़ रहा हूँ आगे...


औरों के लिए भी हो सफ़र आसां 

इस हेतु परिस्थितियों से लड़ा हूँ मैं...


कितनी ही हताश आँखों का नूर हूँ...
आस विश्वास बनकर
हर कठिन राह पर, हर किसी के लिए, खड़ा हूँ मैं...


ज़िन्दगी! देख तुझसे कितना बड़ा हूँ मैं... !!


Many many happy returns of the day, Bhaiyya... :)

कितने छली हैं ये एहसास भी...!

दूरी है
और है वो
पास भी...
कितने
छली हैं
ये एहसास भी...


हमने देखी
टूटती हुई
अंतिम आस भी...
ज़िन्दगी दूर नहीं थी
पर ये भी सच है
वो नहीं थी पास भी...


कहने को जीवित हैं
कि है जीवन
आती जाती सांस ही...
लय संगीत सब अधूरे
शोर है ज़िन्दगी
है कोई फांस ही...


कितने आधे हैं
कितने अधूरे हैं हम
पल पल रहे जिंदा यह एहसास भी...
दर्ज़ करता रहे समय
सारी उपलब्द्धियां
और गिनता रहे वह सकल ह्रास भी...



चलो,
जैसी हो
हंस कर स्वीकारते हैं तुम्हें,
अन्तःस्थितियाँ लड़ लेंगी अपनी लड़ाई
ज़िन्दगी! तुम लगी रहो
प्रस्तुत करने में परिस्थितियों का संत्रास ही...

खलते हुए सबको
खेलते खिलते हुए इन राहों में
हम कल बीता कल हो जायेंगे,
जाओ ले लो सब
अभी के लिए रहने दो
मेरे पास एक "काश" ही... ... !!









...और यूँ दूर हो गए हम...?!!

बीतते रहे
क्षण...
दूर होते गए
हम...


ज़िन्दगी
कई पड़ावों से
होकर गुजरी...
अघाती रही
देख राहों में
भावों की मंजरी...


कभी खुशियाँ
अचानक मिल गयीं
कभी रहीं थोड़ी कम...
आँखें
वक़्त बेवक़्त
होती रहीं नम... 


कितने ही
एहसास
बुने...
वक़्त के
कितने ही
ताने सुने... 



किस किस चीज़ हेतु
राहों में
ललका मन...
कितनी बार रोया
और रो कर
हुआ हल्का मन...


कैसे कैसे
मंज़र
आये...
वक़्त ने
कैसे कैसे
खंज़र चुभाये... 


पर चलता रहा
जीवन का
क्रम...
रोज़ टूटता
और रोज़ बनता रहा
बना रहा भ्रम... 


इसी बीच
रुला गया ये ख्याल... 


कैसी
विचलित करने वाली है
ज़िन्दगी की यह चाल... 


क्यूँ
वो बीत गए क्षण...?
और यूँ दूर हो गए हम...?!! 

शहर, हम और कविता सा कुछ...!!


सुशील जी का होम टाउन सिंदरी है... सिंदरी, मेरी ससुराल... सिंदरी और जमशेदपुर में अक्सर तकरार होती रहती है कि कौन बेहतर... और निश्चित ही हममें से कोई नहीं हारता... हम जमशेदपुर की रट लगाये रहते हैं और सुशील जी सिंदरी की... निश्चित ही दोनों शहर अपनी अपनी  जगह विशिष्ट हैं... और हम दोनों अपनी अपनी जगह सही :) बचपन जहां बीता हो उससे प्रिय कोई शहर हो ही नहीं सकता कभी... कहीं भी रहे हम... दिल तो अपने बचपन के शहर के लिए ही धड़केगा हमेशा... 
इतनी भूमिका इसलिए कि बहुत दिनों से पेंडिंग पड़ी एक पोस्ट पूरी करनी है... सिंदरी के लिए कुछ लिखना है... आशीष कुमार मिश्र जी से बातों बातों में सिंदरी पर कुछ लिखने की बात हुई थी... और इतने दिनों से टलता जा रहा था यह... आज जो कुछ प्रवाह में लिख गया तो पढ़ने के बाद पाया कि इतने समय बाद लिखे भी तो वैसा कुछ नहीं लिख पाए जो लिखना चाहा होगा... खैर, जो लिख गया वही अभी के लिए प्रेषित हो जाये... फिर कभी कुछ लिखवाया प्रेरणा ने तो वो भी लिख ही जायेगा... हम सारी जिम्मेवारी लेखनी को सौंप खुद मौन हो जाते हैं... जो लिखती है वही लिखती है... जो लिखा वो उसी की प्रेरणा ने लिखा... !!


शहर...


शहर इंसानों की तरह होते हैं...
एक की जगह
कभी दूसरा नहीं ले सकता...



हर एक शहर की अपनी आत्मा है...
अपने समीकरण...
अपना व्याकरण...


रोज़
भले एक सी ही पड़ती हो उनपर...
सूरज की किरणें
एक सी ही होती हो सुबह...


पर,
जगता हर शहर
अपने अपने अलग अंदाज़ में ही है...



जुदा होता है
सूरज के अभिवादन का तरीका
हर एक शहर की
अपनी एक लय होती है...


और हर एक शहर से
रिश्ता भी कुछ एक दिनों का ही होता है...
कहाँ कितना बीतेगा वक़्त
ये बात भी तय होती है...



जन्मे कहाँ...
अध्ययन कहाँ...
अध्यापन कहाँ...
और कहाँ  कर दिए गए विदा--
ये समय समय की बात है... 


क्या कहें...?
कैसा उदास दिन है...
कैसी रीती रात है...
हम कहीं के नहीं हैं
और यही सबसे सच्ची  बात है... !!


क्या लिखें आपकी सिंदरी के लिए...
हमने अभी कहाँ है इस शहर को इतने पल दिए...


कि...
लिख सकें
उसकी मिट्टी की महिमा...


पर विश्वास है
एक दिन निश्चित लिख जायेंगे
अपने भाग्य से जुड़े इस शहर की गरिमा ...!!

***



शब्दों को आवाज़ मिले... ये सौभाग्य है...
थैंक्स प्रीता जी !!

बस ऐसे ही...!!


ये विचित्र लोग हैं... ये जगह विचित्र है... यहाँ केवल लोगों को टांग अड़ाने से मतलब है... दूसरों की शान्ति भंग करना... ये फ़ेवरेट हॉबी है लोगों की... और बेहद सिद्दत के साथ प्रैक्टिस में भी है ये हॉबी यहाँ...
कहाँ की बात कर रहे हैं हम... ??? अरे भई! यहीं की... हमारे आसपास की... हमारी दुनिया की... हमारे समाज की... हमारी आपकी और हमारी इस आभासी दुनिया और यहाँ के मित्रों की... आभासी है तो क्या... रियल वर्ल्ड को तगड़ा कॉम्पिटीसन देती है... और कहीं कहीं तो बहुत पीछे छोड़ देती है हमारी असल दुनिया को...
सबकी अपनी स्पेस है... सबकी अपनी समझ... अपनी अपनी क्षमताएं हैं... ये बात खूब समझते हैं हम... लेकिन लिखे हुए को पढने की सामान्य तमीज और एक मिनिमम शिष्टाचार तो होना ही चाहिए... जरूरी नहीं कि हर बात समझ में आ ही जाये... हर एक बात समझनी आवश्यक भी नहीं... उसी तरह हर एक पोस्ट पर अपनी उपस्थिति और बुद्धि दिखाने के लिए बे सर पैर के कमेंट करना भी जरूरी नहीं... ! हम सबके पास लिमिटेड समय है... सब तक तो पहुंचा भी नहीं जा सकता... न सब पढ़ा ही जा सकता है और न ही ये कोई लेन देन की परिपाटी निभाने हम इधर हैं कि आप आये तो हम भी आये हीं... अपनी उपस्थिति जताने...!
अपनी रुचि के अनुरूप लिखें पढ़ें हम... जिन्हें पहुंचना होगा वो पहुंचेंगे हम तक... जहाँ पहुंचना होगा अपनी रुचि और समय के अनुरूप हम पहुंचेंगे... इस सामान्य सी बात में कितना बड़ा गणित है कि किसी को समझ ही नहीं आता...
शायद हममें ही कोई समस्या होगी... तो हमसे दूर रहा जाये... अपनी अपनी शान्ति... अपना अपना स्पेस हम सबको मुबारक हो...!!!
*** *** ***
हे जीवन!

थोड़ा रुका करो...
थोड़ा ठहरा करो...

कभी तो वक़्त दो...
कभी तो बात हो...

बस भागते रुठते ही बीत जाओगे...
ये अनमने से गीत कबतक गाओगे... ??


सागर, नीलगगन और मन की उड़ान...!!


पहाड़ों की ऊंचाई से
देखना समंदर...
सुनना लहरों का शोर...


और देखना
विलीन होते हुए
समंदर को नीलगगन में
उस छोर पर...


कहाँ है
इस नीले और उस नीले के बीच की
विभाजन रेखा...?
हमने तो नहीं देखा...!


उस ऊंचाई से
महसूसना तट का कलरव...
सागर का अपार वैभव...


और...
स्मृति के गलियारों में
टहलते हुए...
पहुंचना
किसी खोयी हुई स्मृति तक
किसी गुज़रे हुए पल तक
किसी बीत चुके कल तक 



और देखना
जीवन को विलीन होते हुए
मृत्यु के आगोश में
किसी अजाने छोर पर...


किसे पता
कब आ जाये
विदा का सन्देश लिए कोई झोंका...


कहाँ है
जीवन और मृत्यु के बीच की
विभाजन रेखा...?
हमने तो नहीं देखा...!


धीरे धीरे
घटित होती है
हर पल मृत्यु... 


वैसे ही
जैसे
हर पल जीवन है 


सुख दुःख का ये कैसा अनूठा संगम है... !!



ये दिन और कुछ यादें...!

वाराणसी कैंट रोड स्थित भारत माता मंदिर  में बैठ दीवारों पर अंकित वन्दे मातरम् गीत कागज़ पर उतारना याद आता है...
भारत माँ की दिव्यता की प्राणप्रतिष्ठा मंदिर को विशिष्ट बनाती है... यहाँ कई बार जाना हुआ... भारत का मानचित्र देख खो जाते थे... मानचित्र पर बनी नदियों और पहाड़ों की यात्रा पर निकल जाता था मन... आज भी तो यात्रारत ही हैं हम... भले कहीं भी हो... मन से तो वहीँ हैं... अपनी माटी के पास और जहाँ हैं वहां बसा रखा है हमने अपने मन आँगन में अपना भारत...!!!

*** *** ***

रानी लक्ष्मी बाई की जन्मस्थली है काशी... उनके जन्मस्थान पर अभिलिखित है "काशी की कन्या, झाँसी की रानी"... यह इन्स्क्रिप्सन उनके इस स्थान से सम्बन्ध की कथा कहता है...
काश! इन धरोहरों को सहेज कर रखने का समुचित प्रयास भी हो...!
इस स्थान के बहुत पास ही रहते थे हम... अस्सी का किनारा... गौरवशाली इतिहास की अनुगूंज और इस सबके प्रति हमारी जब तब गहराती उदासीनता भी देखी है..., माँ गंगे का प्रवाह और लहरों में डगमग करती नौकाओं को खेते नाविक भी देखे... उनका अडिग विश्वास और संघर्ष भी देखा...
लहरें कहती हैं... बहाव जीवन है... गति न रुके तो वो सब हासिल हो सकता है जो अप्राप्य लगता हो किसी एक क्षण में...! लहरों की बातों पर विश्वास किये ही तो चले जा रहे हैं हम अजानी राहों पर... अजानी यात्राओं और गंतव्यों की ओर...
प्रवाह बना रहे... पवित्रता बनी रहे... गंगा बहती रहे... हमारी आस्था बनी रहे... जीवन बना रहे...!

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आशीष, आज आपका जन्मदिन है न... १५ अगस्त २००६ की वह शाम कभी नहीं भूलेगी... जुबानरी, जेनिटा दी, और हम सब साथ थे... वो शाम कितने रिश्ते जोड़ गयी न... आज भी अक्षुण्ण... !! सच, कई बार कुछ एक क्षण का परिचय ही हमें जीवन भर की निधि दे जाता है... जेनिटा दी याद आती हैं... उनकी भेजी राखी हमने यहाँ आने से पहले आपको बाँधी थी... वो क्षण भी याद आता है... कैसा संयोग था न... हम लास्ट जब मिले तो वो रक्षा बंधन का दिन था... शोर्ट नोटिस पर आप दीदी को विदा करने दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँच आये थे... जेनी दी की भेजी राखी भी साथ लाये थे... २००९ की बात है न ये... तस्वीरें नहीं हैं तब की पर मन में तो सजीव होंगे ही वो पल... याद तो होगा ही न...!
जन्मदिन की अशेष शुभकामनाएं... खूब खूब आशीर्वाद... !!

देखो, भूल न जाना...

पुल को
पार कर...
उसे
भूल न जाना...


क़दमों के निशान
रह जाते हैं...
ज़रा सोच समझ कर
कदम बढ़ाना...



नाज़ुक से बंधन
तोड़ न जाना...
देखो, मिले हो किस्मत से
छोड़ न जाना...


अक्सर ऐसा होता है --



सामने वाले की आँखों के आगे
अँधेरा छा जाए...
इस ख़ातिर
जारी रखते हैं वो धूल उड़ाना...


ये रीत है यहाँ की
राहों में रोड़े अटकाए जाते हैं...
राही! उन रोड़ों से ही
तुम पुल बनाना...


अँधेरी राहों में
अंजुरी भर रौशनी हेतु...
अपनी समस्त पूँजिया लगाकर भी
दीये जलाना...  


हारती हुई आशा की
बढ़कर बाहें थाम लेना...
डूबती नैया की
तुम पतवार हो जाना...


राही! यूँ चलना राहों में...
व्यष्टि से समष्टि, समष्टि का सार हो जाना...


यहीं रहना और यहीं रहकर इस दुनिया से पार हो जाना... !! 


वो तुम्हें अपना कहेगी... !!

प्रतिविम्बों में,
ढूंढ़ी हमने ज़िन्दगी...
मन ही मन,
चलती रही बंदगी...


प्रतिपल प्रतिक्षण,
रौशनी ठगती रही...
अँधेरे को जीतना था,
कविता जगती रही...


वो भी है
मझधार की सगी...
जो नाव
किनारे है लगी...


सुबह
फिर से
चल पड़ेगी...

तुम कहो न कहो
वो तुम्हें
अपना कहेगी... !!


क्या कहें,
कितना रोता है...
किन किन बातों पे,
दिल उदास होता है...


हारता है, गिरता है,
पुनः उठता है...
शुक्र है, मन से मन का रिश्ता
कभी नहीं टूटता है...


बस कुछ क्षण के लिए ही
सूरज ओझल है...
बदल जाएगा
जो ये माहौल बोझिल है...


ये घना अँधेरा
कहता है--
सुबह होकर रहेगी...


तुम कहो न कहो,
वो तुम्हें
अपना कहेगी... !!



सफ़र के साथी...!

बादल...
धूप...
पवन...


बारिश...
छाँव...
सिहरन...



प्रार्थना...
दीप...
वंदन... 


समर्पण...
बाती...
चन्दन...


आंसू...
आस...
कविता...


ओस...
विश्वास...
क्षणिकता --


ये सब
सफ़र के साथी हैं... 



ज़िन्दगी इन्हें
अपना सगा बताती है...

राही के साथ चलते हैं...
ये हमें ढालते हैं, हममें ढ़लते हैं...


ऐसे ही ढ़लते ढ़लते
चलते चलते 


शायद
एक रोज़
वह भी आये...


हम
बादल, धूप, पवन हो जायें...!!

तुम...

तुम
नेह हो...


तुमसे मिलती है प्रेरणा...

कितनी ही बार
डूबती हुई आस को
तुमने ही बचाया है... 


तुम कभी नहीं जान पाओगे
कि क्या हो तुम मेरे लिए...


ठीक वैसे ही जैसे कभी न जान पाऊं मैं शायद
कि क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए...


शायद
अभिन्नता ऐसे ही
एक दूजे को पहचानती हो...
बिन पहचान

अनसुना अनकहा सब

अंतर्यामी सा जानती हो...


पता है... ?


कितनी ही बार
आंदोलित हुआ है हताश मन
कितनी ही बार
उठ खड़ा हुआ है जीवन


केवल तुम्हारे पास होने के एहसास से


क्या कहूं इसे... ?


मैं इसे
ईश्वरीय प्रताप से
जोड़ देती हूँ...


दिशा का संज्ञान
सौंप तुम्हारे हाथों में...


तुम्हें नाविक समझ लेती हूँ
और फिर निश्चिंत हो
अपनी जीवन नाव खेती हूँ... !!


इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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