तिथि बदलती है बस
वक्त कहाँ बदलता है
वैसे ही पुराने ढ़र्रे पर
जीवन चलता रहता है!
एक सुबह का आगमन
एक संध्या की विदाई
वही पुराना सिलसिला
चक्रवत चलता रहता है!
सदियों के इस मेले में
एक वर्ष की क्या बिसात
प्रचंड अग्नि की लपटों में
जीवन जलता रहता है!
समय जो बीत रहा है
वह लौट नहीं पाएगा
अंत आखिर होना ही है
दिन ढ़लता रहता है!
बीत रहा जो वर्ष
वह दे जाए आशीष
नव प्रभात सुखद रहे
सपना पलता रहता है!
नव प्रभात सुखद रहे!
एक किरण!
चुपचाप
थाह रहे थे हम
क्या कहता है तम
इस निस्तब्धता में
क्या रहस्य
खोज पायेंगे हम!
तभी
अँधेरा हुआ कम
कुछ वाचाल हुआ तम
और सहज ही कह चला
सकल प्रश्नों का हल है
एक किरण!
किरण-
जिसका मात्र आगमन
तोड़े अन्धकार का भरम
आबद्ध हो जाये श्रृंखला
प्रमुदित हो
झूमे सकल चमन!
किरण-
जो अंक में समेट ले तम
सुनहरा करे वातावरण
और समा जाए अंतस में
तो बन जाएँ स्वयं
किरण के वाहक हम!
ऐसे ही
बनें प्रकाशपुंज हम
लिए झोली में औरों के भी गम
और गतिमान रहे जीवन
फिर रहस्य
खोज लायेंगे हम!
वक़्त हो चला है...!
कहते हुए
सुनते हुए
वक़्त हो चला है
सपने बुनते हुए
अब चलने की बारी है
गति और विश्वास साथ हों
फिर निश्चित ही
जीत हमारी है!
हँसते हुए
रोते हुए
वक़्त हो चला है
साँसे खोते हुए
अब संभलने की बारी है
बीतती हुई जिंदगी में
दो पल जी लेने की
आस्था हमारी है!
सोते हुए
जागते हुए
वक़्त हो चला है
बेवजह भागते हुए
अब समझने की बारी है
अंधी दौड़ में
यूँ शामिल होना
भूल हमारी है!
मिल जाएगा प्रेम यहीं...!
मिलते हैं धरती और गगन जहाँ
वह क्षितिज ये नहीं
प्रेम पल्लवित होता है प्रतिपल जहाँ
वह चमन ये नहीं
स्वार्थ के कांटे उग आये हैं यहाँ वहाँ
खो गयी अस्मिता कहीं
आज किसी को किसी से प्रेम नहीं!!!
मनुष्यता की सुगंध बिखरी हो जहाँ
वहाँ होते नित उत्पात नहीं
प्रेम बाँध लेता है पल में ही सबको
यहाँ कहीं कोई पक्षपात नहीं
झुक गयी है कमर हौसलों की यहाँ
खो गयी कविता कहीं
आज किसी को किसी से प्रेम नहीं!!!
मिलते मिलते मिल जायेगी मंजिल यहाँ
संभावनाओं की कोई सीमा नहीं
प्रेम अंकुरित होगा स्वाभाविक रूप से
नफ़रत ने कभी मैदान जीता नहीं
खोजते रहने से मिल जायेगी भीतर ही
खो गयी इंसानियत कहीं
मिले वह मिल जाएगा प्रेम यहीं!!!
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!
कहते हैं-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी!
पर कुछ बातें
अटल सत्य सी
सदा उपस्थित प्रकाशवान
बहती धारा न रुकी कभी
पेड़ सदा से ही निस्वार्थ दानी!
आशीर्वाद स्वरूप
मिली जो धरा को
असीम धरोहरें
रहे उनपर श्रद्धा
हों हम भक्तहृदय आत्मज्ञानी!
पर ह्रास की
ये कैसी परिपाटी
मैला होने दिया
हा! हमने
पापनाशिनी माँ गंगे का पानी!
शाश्वत कुछ तो हो
जो दे संबल
ऐसे कैसे
चलती जाए
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!
भले ही-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी!
चलते चलते इन राहों में...!
चलते चलते
इन राहों में
दो प्रेम की बातें
कर लें!
न मिलेगा
ये अवसर फिर
एक दूजे की पीर
हर लें!
संध्याबेला आ जायेगी
विदा का सन्देश लिए
भावसुधा का प्याला
भर लें!
सहज प्रेम और भक्ति से
संभव है
हम यह भवसागर
तर लें!
चलते चलते
इन राहों में
दो प्रेम की बातें
कर लें!
समय!
वाक्य में विराम सा
विस्मृत किसी नाम सा
गढ़ता नयी कहानी कोई
समय चलायमान रहा!
कब कितने पड़ाव छूटे
कुछ हुए पूरे कुछ सपने टूटे
सारे जोड़ घटाव के बीच
समय ही बलवान रहा!
कितना प्रभु के हैं समीप
कितनी आस्था से जला दीप
आडम्बर के खेल सभी
समय सब पहचान रहा!
बीतते हैं प्रतिपल हम
लिखते हुए हैं आँखें नम
इन आत्मीय उद्गारों में
समय अंतर्ध्यान रहा!
क्या हार क्या जीत
सभी भुलावे के हैं गीत
इनकी कब परवाह उसे
समय गतिमान रहा!
वाक्य में विराम सा
विस्मृत किसी नाम सा
गढ़ता नयी कहानी कोई
समय चलायमान रहा!
संकट बढ़ता ही रहा!
कभी यहाँ कभी वहाँ
जीवन चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!
कहीं अभावों का समुद्र
कहीं समृद्धि के पर्वत
प्रकृति रहस्यमयी है
अपनी ही धुन में रत
सृष्टि के आरम्भ से
चक्र चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!
युगों का अनुभव लिए
बढ़ रहें हैं हम सतत
विकास की गति ने
न छोड़ा कुछ भी पूर्ववत
इंसानियत का पाठ
क्षीण होता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!
सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!
मेरे सपने!
अथाह सागर को
एक नन्ही सी
नाव के सहारे
नाप आये...
मेरे सपने!
विस्तार कितना है
जीवन का
सब सत्य
भांप आये...
मेरे सपने!
विशाल अम्बर पर
विचरण कर
वहाँ अपनी शब्दावली
छाप आये...
मेरे सपने!
सारी घृणा
सकल कृत्रिमता को
इकठ्ठा कर
ताप आये...
मेरे सपने!
आशान्वित हो
दुर्गम राहों को
बड़ी सुगमता से
नाप आये...
मेरे सपने!
कविता कभी ख़त्म नहीं होती...!
अनवरत चलता है
भावों का बहना
जी लिए जाते हैं
अनेकानेक शब्द
अक्षरों के मेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!
आते जाते रहते हैं
कई विम्ब
कुछ ठहर कर
ठोस हो जाते हैं
जीवन के खेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!
छन छन कर
आज भी आती है चांदनी
देने को कुछ
बेहद सजीव पल
इस रेलमपेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!
निश्चित
ज्योत जलेगी
हृदय की बाती
आकंठ है डूबी
भावों के तेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर...!
बहती
चली आ रही है
अविरल धारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!
बूंद बूंद कर
बरसे बादल
हो धरती का रंग न्यारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!
बाँध कर रखना क्या
कहो सच्चा स्नेह
कहाँ कभी हारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!
हमेशा साथ ही होता है
दूर होकर भी
वो जो है आँखों का तारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!
संवेदना की
बहुत बड़ी पहचान है
बहती हुई अश्रुधारा!
जीवन के उन्मुक्त गगन पर
खग वृन्दों सा
विचरे प्रेम सारा!
सांत्वना के स्वर!
मेरे चारो ओर अँधेरे
हर पल कटु सत्य है घेरे!
स्वयं को ही दे रहे हैं सांत्वना
ये मन प्राण मेरे!
क्यूँ तेरी आँखें नम है
अरे! लोग औरों को-
उजाला इस लिए नहीं दे सकते
क्यूंकि..
उन्हें खुद घेरे हुए तम है!
उम्मीदों से
दुःख ही होगा हासिल-
जहां औरों को मुरझाता देख
खिल जाएँ लोग..
ऐसी राह में हम है!
मिल बाँट कर सहजता से
सहेज लिया जाये जीवन को-
पर ये क्या? यहाँ तो
सब अलग थलग है..
जुदा जुदा सबका ग़म है!
इसलिए अपने सिद्धांतों पर
बिना हारे चल-
विडम्बनाओं से
लड़ना ही..
जीवन में संतोष परम है!
निराशा के भंवर में
डूबना क्या-
यहाँ ऐसे ही
चलता है व्यापार..
विश्वास मात्र भरम है!
शांत है हृदय,
अब यह स्वीकार-
ऐसे ही हैं जगत के फेरे
हर पल कटु सत्य है घेरे!
स्वयं को ही दे रहे हैं सांत्वना
ये मन प्राण मेरे!
सरलता की खोज!
इस जगत के खेल
सभी निराले हैं!
ऊपर से सब स्वच्छ निर्मल
भीतर से सब काले हैं!
सत्य के मुख पर
जड़े हुए ताले हैं;
हँसना भूल गया है मन
यहाँ सब लोग..
रुलाने वाले है!
आओ सब मिल
खोजें उस सरलता को,
जो अतीत में कहीं
दफन हो गयी!
हमारे भोले-भाले बाल मन की-
कफ़न हो गयी!
नयनो में
कितने सुन्दर सपने पाले हैं!
तब भी अंधकार ही क्यूँ स्पष्ट है
और खोये से उजाले हैं!
प्रसाद के अभाव में
सूनी मंदिर की थालें हैं;
भावविहीन पूजा है
भगवन भी चकित..कहाँ गए वे
जो भक्ति का रूप सजाने वाले हैं!
आओ सब मिल
खोजें उस भावना को,
जो बिछड़ा हुआ
वतन हो गयी!
कब वाष्प बन कर उड़ गयी सरलता-
जमीं रेगिस्तान की तपन हो गयी!!
जिए गए पल!
खुले खुले
अम्बर तले..
जो दो-चार कदम
हम चले..
वही जिंदगी में
असल जिए गए पल है!
शेष सब कुछ मिथ्या
सब कुछ अनर्गल है!!
नन्हें सपनों के
आँचल तले..
जो अनुभूति के पुष्प
हम समेटते चले..
वही जिंदगी में
असल जिए गए पल है!
शेष सब कुछ मिथ्या
सब कुछ अनर्गल है!!
एक संभावित तस्वीर!
नये विचारों का
प्रादुर्भाव हो!
सहज सा
सुन्दर जुड़ाव हो!!
फिर काव्य भी होगा
और
कहानी भी..!
आंसू ही कहेंगे उसे,
जिसे आज-
लोग कह जाते हैं..
आँखों का पानी भी..!!
नया कुछ सृजित हो
निर्मल स्वभाव हो!
जीवन में
सच्चा कोई पड़ाव हो!!
फिर बात बनेगी
हृदय होगा
बिरले सपनों का मानी भी..!
आंसू ही कहेंगे उसे,
जिसे आज-
लोग कह जाते हैं..
आँखों का पानी भी..!!
रुकी रहे कबतक धारा
अब शाश्वत बहाव हो!
सबके प्रति सहिष्णुता
सहज हृदय का भाव हो!!
फिर होंगे हम
सौम्य विनीत
अद्भुत दानी भी..!
आंसू ही कहेंगे उसे,
जिसे आज-
लोग कह जाते हैं..
आँखों का पानी भी..!!
समय की धारा पर
बहती जीवन की नाव हो!
सुख दुःख की आवाजाही को
झेलने का कौतुकपूर्ण चाव हो!!
फिर तो संभव है
अंकित हो जाए
अमिट निशानी भी..!
आंसू ही कहेंगे उसे,
जिसे आज-
लोग कह जाते हैं..
आँखों का पानी भी..!!
ध्येय चाहिए!
बहती रहे कविता
सरिता की तरह
बने यह
कई लोगों के लिए
जुड़ने की वजह
मानव जीवन को
और क्या
श्रेय चाहिए!
जीने के लिए बस हमें
पावन एक
ध्येय चाहिए!!
अकेले
चले थे हम
शब्दों की
मशाल लेकर!
मिले राह में हमें
ऐसे भी लोग
जो
इस ठहराव में
स्वयं
गति की पहचान हैं;
सजाये शब्द हमने
उनसे ही
हौसलों की ताल लेकर!
इस ताल पे देखो अब
कितने भाव नाच उठते हैं
आपकी आवाज़ जुड़ी
तो कितने ही छन्द
स्वयं
कविता से आ जुड़ते हैं;
ऐसे ही चलें हम
स्वच्छ मन
और कुछ सवाल लेकर!
साथ
अनेकानेक कड़ियाँ
जुड़ती जाए
और उत्तर की भी
सम्भावना जन्मे;
स्वस्थ विचारों का
आदान प्रदान हो
समझ की
वृहद् थाल लेकर!
चलते
चलें हम
शब्दों की
मशाल लेकर!
बहती रहे कविता
सरिता की तरह
बने यह
कई लोगों के लिए
जुड़ने की वजह
मानव जीवन को
और क्या
श्रेय चाहिए!
जीने के लिए बस हमें
पावन एक
ध्येय चाहिए!!
एक बर्फीली सुबह!
आसमान के
कोमल एहसास
बरस रहें हैं धरती पर
जाने इस उजली बारिश से
क्या देना चाहता है सन्देश अम्बर!
कुछ दिव्य सी
ज्योति लिए हुए
सूर्य की किरणों से तर
चमकते रजकणों से धवल कण
आ रहें हैं धीरे से धरती पर उतर!
ठिठुर रहा है
पूरा वातावरण
बेख़ौफ़ खड़े हैं तरुवर
बहता पानी ठोस हो गया है
जम सा गया है गतिमान समंदर!
ऐसे में
ऐसी बारिश में
जहां दूर तक उजली हो डगर
आसमान कुछ कहना चाह रहा है
जैसे लेनी हो उसे धरती की पीड़ा हर!
ऐसे दृश्य
अपने प्रभाव से
कुछ लिखवाना चाहते हैं अगर
तो लेखनी तैयार है बर्फ में चलने को
अनुभूति की स्याही से निकलेगी वाणी प्रखर!
ऋतुपरिवर्तन
सुख दुःख की आवाजाही सा
सिखा रहा कि जीवन एक समर
इस चक्र के साथ यूँ घुल मिल जाना है
विचलित कर न पाए कोई भी उदास पहर!
सौंदर्य
और सन्देश लिए
पंछी लौट आयेंगे घर
खुशी खुशी बीतने दो ये मौसम
कह कह कर भावविभोर किये हुए है अम्बर!
अभी कहाँ...!
खाली पहर
फिर भी
रीता कहाँ!
बीतता जीवन
अभी है
बीता कहाँ!!
जश्न का ये दौर
अधूरा सा
लगता है
अभी हमने
मन को है
जीता कहाँ!!
ग्रंथों में
सिमट कर रह गए
उज्ज्वल चरित्र
नर में राम नहीं
नारियों में
सीता कहाँ!!
ये तो नदियाँ हैं
आकर
मिल जाती हैं गले
अथाह सागर भला
जल कभी
पीता कहाँ!!
अरे अभी और
झंझनाहट महसूसना
शेष है, पतन की
शुरुआत है ये तो
फल अभी
तीता कहाँ!!
खाली पहर
फिर भी
रीता कहाँ!
बीतता जीवन
अभी है
बीता कहाँ!!
