अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सच्ची एक कलम चाहिए!

उन्मुक्त गगन में उड़ पायें पंछी की भांति...
इसके लिए एक स्वाभाविक सी लगन चाहिए!

लिख सके अपने समाज की व्यथा...
इसके लिए धड़कता हृदय औ' सच्ची एक कलम चाहिए!

बरसे तो ऐसा बरसे, कि अंतस्तल भिगो जाये...
धरा की ख़ामोशी को समझने वाला गगन चाहिए!

परहित की खातिर स्वहित का मोह बिसार दे...
सार्थक जीवन यज्ञ को स्वार्थ का हवन चाहिए!

सुनने वाले का मन-प्राण बाँध सके जो...
ऐसी विचारों की प्रगल्भता औ' भावनाएं सघन चाहिए!

दृढ़ता ऐसी कि स्तिथियाँ-परिस्थितियाँ डिगा पाए न...
समस्यायों की भूमि पर रोपे अंगद से चरण चाहिए!

होता है सबकुछ हासिल..पत्थर भी पिघलते हैं...
बस हौसलों में सच्ची एक तपन चाहिए!

उन्मुक्त गगन में उड़ पायें पंछी की भांति...
इसके लिए एक स्वाभाविक सी लगन चाहिए!

लिख सके अपने समाज की व्यथा...
इसके लिए धड़कता हृदय औ' सच्ची एक कलम चाहिए!

12 टिप्पणियाँ:

Rakesh Jain 18 सितंबर 2010 को 2:00 pm  

सुन्दर पंक्तिया...

दीपक 'मशाल' 18 सितंबर 2010 को 2:03 pm  

आज आपका ब्लॉग चर्चा मंच की शोभा बढ़ा रहा है.. आप भी देखना चाहेंगे ना? आइये यहाँ- http://charchamanch.blogspot.com/2010/09/blog-post_6216.html

वीना 18 सितंबर 2010 को 2:25 pm  

होता है सबकुछ हासिल..पत्थर भी पिघलते हैं...
बस हौसलों में सच्ची एक तपन चाहिए !

बहुत सुंदर पंक्तियां...वाकई में लिखने के लिए सच्ची कलम ही चाहिए...

C. P. Sharma 18 सितंबर 2010 को 5:12 pm  

परहित की खातिर स्वहित का मोह बिसार दे...
सार्थक जीवन यज्ञ को स्वार्थ का हवन चाहिए !
.........................
लिख सके अपने समाज की व्यथा...
इसके लिए धड़कता हृदय औ' सच्ची एक कलम चाहिए !

काव्य कला में पारंगत एक धड़कते हुए दिल और सच्ची कलम से रचना.

Nitindra 18 सितंबर 2010 को 7:14 pm  

परहित की खातिर स्वहित का मोह बिसार दे...
सार्थक जीवन यज्ञ को स्वार्थ का हवन चाहिए !....


होता है सबकुछ हासिल..पत्थर भी पिघलते हैं...
बस हौसलों में सच्ची एक तपन चाहिए !

बहुत प्रेरणादायी... सशक्त शब्द शक्ति से रचित सुंदर रचना ... आत्मीय बधाई

मनोज कुमार 18 सितंबर 2010 को 9:43 pm  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस कुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातें और दो क्षणिकाएं, मनोज कुमार, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

डॉ. मोनिका शर्मा 19 सितंबर 2010 को 12:35 am  

होता है सबकुछ हासिल..पत्थर भी पिघलते हैं...
बस हौसलों में सच्ची एक तपन चाहिए !

बहुत ही प्रभावी और प्रेरणात्मक पंक्तियाँ हैं......
अच्छी लगी आपकी रचना अनुपमाजी...

संजय भास्कर 19 सितंबर 2010 को 9:16 am  

प्रभावी और प्रेरणात्मक पंक्तियाँ हैं......

संगीता स्वरुप ( गीत ) 19 सितंबर 2010 को 12:26 pm  

बहुत सुन्दर ...अच्छी रचना .

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 17 नवंबर 2011 को 7:06 am  

कल 18/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

मनीष सिंह निराला 18 नवंबर 2011 को 11:14 am  

सचमुच एक सच्ची कलम चाहिए ...
बहुत सुन्दर रचना ..

मेरी नै पोस्ट के लिए आपका हार्दिक स्वागत है

रश्मि प्रभा... 18 सितंबर 2015 को 12:42 pm  

सच्ची लगन न हो, सत्य न हो तो कलम जय नहीं बोलती

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