अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कलम आज तू मेरी सुनना...

कलम आज तू मेरी सुनना
सुन्दर ही सुन्दर सपने बुनना!

आये जब कोई बात अतुकान्त
क्रोध से जूझ रहा हो मन प्रान्त
तब शांत कर हृदय को...
राह में बिखरे सब कांटे चुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

मरुस्थली में कैसी सिक्तता
जीवन में हर क्षण रिक्तता
ये सत्य गहन जानकर...
करना चिंतन.., गूढ़ अर्थ गुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

शब्द व्यथित, अक्षर सारे शान्त
कैसे कहा जाये सकल वृतान्त
ऐसी दुविधा में भी, गुनगुनाते हुए...
अभिव्यक्ति के नए आयाम बुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

संध्याबेला में प्रातपहर की यादें चुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

31 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर 25 सितंबर 2010 को 7:07 am  

संध्याबेला में प्रातपहर की यादें चुनना
कलम आज तू मेरी सुनना !

बहुत सुन्दर अभियक्ति ...
रचना की हर पंक्तियों में बहुत गहराई है...सन्देश है ...

संजय भास्कर 25 सितंबर 2010 को 7:09 am  

आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
बधाई.

अनुपमा पाठक 25 सितंबर 2010 को 7:11 am  

धन्यवाद!

संजय भास्कर 25 सितंबर 2010 को 7:15 am  

ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

राजभाषा हिंदी 25 सितंबर 2010 को 7:20 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-बाबा नागार्जुन, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Udaya 25 सितंबर 2010 को 7:29 am  

कलम जब आपकी बात सुनेगी तो वो भी यही कहेगी वाह वाह!

anju 25 सितंबर 2010 को 7:29 am  

वाह अनुपमाजी....हर मुश्किल मैं भी तू अच्छा ही ढूँढना ....

sada 25 सितंबर 2010 को 7:48 am  

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना, भावमय प्रस्‍तुति ।

आमीन 25 सितंबर 2010 को 8:06 am  

अनुपमा जी, कहने को ज्यादा कुछ नहीं है। जितनी अनुपम ये कविता है, उतनी ही अनुपम आपकी हिन्दी। आपके ब्लॉग पर शायद पहली बार आया हूँ, और अब आता ही रहूँगा। धन्यवाद।

मेरा नया ब्लॉग भी देखें...
http://tikhatadka.blogspot.com

अजय कुमार 25 सितंबर 2010 को 9:41 am  

अच्छी प्रस्तुति ।

Navin C. Chaturvedi 25 सितंबर 2010 को 9:51 am  

अभिव्यक्ति के नए आयाम बुनना

बहुत ही अच्छी तरह मनोभावों को व्यक्त करती पंक्तियाँ हैं ये अनु| अगर अभिव्यक्ति को नये आयाम न मिले तो सृजन नीरस हो जाता है| बधाई| प्लीज़ टेग किया करो|

ZEAL 25 सितंबर 2010 को 9:55 am  

शब्द व्यथित,अक्षर सारे शान्त
कैसे कहा जाये सकल वृतान्त
ऐसी दुविधा में भी,गुनगुनाते हुए...
अभिव्यक्ति के नए आयाम बुनना
कलम आज तू मेरी सुनना !

Awesome !

.

Akanksha~आकांक्षा 25 सितंबर 2010 को 10:35 am  

बहुत गहरे भाव सजोती कविता....हार्दिक बधाई.
______________
'शब्द-शिखर'- 21 वीं सदी की बेटी.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 25 सितंबर 2010 को 11:52 am  

`बहुत सुन्दर ...कलम को निर्देशित करते भाव ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 25 सितंबर 2010 को 2:53 pm  

शब्द व्यथित,अक्षर सारे शान्त
कैसे कहा जाये सकल वृतान्त
ऐसी दुविधा में भी,गुनगुनाते हुए...
अभिव्यक्ति के नए आयाम बुनना
कलम आज तू मेरी सुनना !

संध्याबेला में प्रातपहर की यादें चुनना
कलम आज तू मेरी सुनना !
--
रचना के सभी छंद बहुत सुन्दर हैं!

अजय कुमार झा 25 सितंबर 2010 को 4:22 pm  

बहुत ही खूबसूरत रचना ....आभार आपका

वीना 25 सितंबर 2010 को 4:23 pm  

मरुस्थली में कैसी सिक्तता
जीवन में हर क्षण रिक्तता
ये सत्य गहन जानकर...
करना चिंतन..,गूढ़ अर्थ गुनना
बहुत खूब अभिव्यक्ति

kunwarji's 25 सितंबर 2010 को 4:36 pm  

bahut badhiya.....

kunwar ji,

mahendra verma 25 सितंबर 2010 को 4:50 pm  

कलम ने आपकी बात सुन ली है तभी तो कविता में इतने गहरे भाव हैं। ...बहुत सुंदर।

वन्दना 25 सितंबर 2010 को 5:25 pm  

बहुत गहरे भाव भरे हैं।

Lalit Kumar 25 सितंबर 2010 को 6:25 pm  

tum wakai mein Anupama ho!

Akshita (Pakhi) 25 सितंबर 2010 को 10:23 pm  

आपने तो बहुत अच्छी कविता लिखी...बधाई.


_________________________
'पाखी की दुनिया' में- डाटर्स- डे पर इक ड्राइंग !

राजभाषा हिंदी 26 सितंबर 2010 को 5:53 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
कहानी ऐसे बनी– 5, छोड़ झार मुझे डूबन दे !, राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी की प्रस्तुति, पधारें

अनुपमा पाठक 27 सितंबर 2010 को 12:45 pm  

shabdashish hetu sabhi ka aabhar!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 13 अक्तूबर 2011 को 2:43 pm  

शब्द व्यथित, अक्षर सारे शान्त
कैसे कहा जाये सकल वृतान्त
ऐसी दुविधा में भी, गुनगुनाते हुए...
अभिव्यक्ति के नए आयाम बुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

कल्म ज़रूर सुनेगी आपकी हर बात !

सादर

सदा 15 अक्तूबर 2011 को 9:39 am  

शब्द व्यथित,अक्षर सारे शान्त
कैसे कहा जाये सकल वृतान्त
बहुत ही बढि़या ।

ana 15 अक्तूबर 2011 को 11:10 am  

bahu bahut bahut hi badhiya

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 15 अक्तूबर 2011 को 1:12 pm  

कलम आज तू मेरी सुनना!
सुन्दर सार्थक गीत...
सादर बधाइयां...

रजनीश तिवारी 15 अक्तूबर 2011 को 6:35 pm  

कलम आज तू मेरी सुनना ....बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

Mukesh Pandey 30 अक्तूबर 2013 को 5:30 am  

शब्द व्यथित, अक्षर सारे शान्त
कैसे कहा जाये सकल वृतान्त
ऐसी दुविधा में भी, गुनगुनाते हुए...
अभिव्यक्ति के नए आयाम बुनना
कलम आज तू मेरी सुनना!

कलम आपकी बात हर दिन सुनती है
aap बहुत खूब लिखती हैं..:)

रश्मि प्रभा... 30 अक्तूबर 2015 को 9:38 am  

आमीन

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