कविता के बारे में...!
लिखने वाले
बेवजह की बातों पर
छिन्न भिन्न हुए शब्द,
अक्षर आपस में मुँह फुलाये बैठे थे…
नींद की गोद से!
नींद पर कुछ लिखना था चिरंतन के लिए, तब लिखा था यह. आज सहेज ले रहे हैं यहाँ भी…!
जीवन का संगीत ढूंढना और मौत की कविता उकेरना चल रहा है सदियों से मनुष्य की चेतना के धरातल पर… उसी धरातल पर खड़े हो खींची गयी शब्दों की कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएं:
एक दिन ज़िन्दगी
अपना अन्तिम राग
गाएगी!
फिर,
मीठी सी नींद
आ जाएगी!
मौत भी तो नींद ही है...
एक गहरी नींद-
जिसके इस पार भी प्रकाश है
जिसके उस पार भी प्रकाश है
जैसे
एक रात की नींद
देती है नया सवेरा,
वैसे ही ज़िन्दगी जब नींद लेती है...
तब होता है नया जन्म
मिलता है नया बसेरा.
नींद के आँचल का ममत्व
हर सुबह
आँखों की ज्योति में
बोलता है,
जीवन और मौत के
कितने ही रहस्य
अनुभूति के धरातल पर
खोलता है!
सब कुछ बिसरा कर
नयी किरण के स्वागत में
नींद की गोद से
हम हर रोज़ जाग रहे हैं...,
कितने ही नींद के
पड़ाव पार कर
एक जीवन से दूसरे की ओर
मानों, हम अनंतकाल से
भाग रहे हैं...!
यूँ ही यह क्रम
चलता जाता है,
जीवन और विराम का
गहरा नाता है!
बहुत कुछ है...!
बहुत कुछ है
जो गुज़र जाता है जाते हुए समय के साथ
मगर बहुत कुछ ऐसा भी है
जो सदा पूर्ववत ही रहता है
सदियां
बीत जाने के बाद भी
जैसे कि...
कभी घटित हुआ प्रेम,
जैसे कि...
किसी सच्चे हृदय की आवाज़,
जैसे कि...
सूरज का जिस सुन्दरता से निकलना,
उसी वैभव के साथ सागर में समा जाना!
और भी
बहुत कुछ है…
जिन्हें
किया जा सकता है लिपिबद्ध
शाश्वत अव्यवों की सूची में
इसलिए,
घिर आई निराशा को
दूर हटाया जाए
जीवन को
कुछ और सजाया जाए!
उसका लिखा-लिखवाया...!
आँसुओं ने
लिखा लिखवाया...
क्या कहूँ?
भींगते हुए
मैंने क्या पाया...
अपना ही मन
फ़फ़क फ़फ़क कर
मुझसे मेरी ही
पहचान करा रहा था,
सुर ताल
कभी नहीं सीखे मैंने
पर मेरे भीतर
कोई गा रहा था!
गीतों में,बातों में, बूंदों में
है जीवन का अक्स समाया
वो कैसे जानेगा ये सब?
जो कभी
इस गली नहीं आया
एक एक लम्हा
आने से पहले ही
जैसे...
जा रहा था,
अनकहा सा
दर्द कोई...
भीतर ही भीतर
गा रहा था!
बस,
आँसुओं ने
लिखा लिखवाया...
क्या कहूँ?
भींगते हुए
मैंने क्या पाया...!
वेनिस: एक अलग सा अनुभव!
