अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक पल में ही सदियाँ जी जाएँ!

कविता श्रृंखला की तरह ही तो होती है...बात शुरु होती है...शब्द तरंगित होते हैं...नितांत अकेलेपन से,पर अकेलेपन की बात करते हुए ये शब्द क्या हमे अकेला रहने देते हैं...कदापि नहीं! सृजन के इस संसार में आत्माएं एक दूसरे से आबद्ध हैं, यहाँ ऐसा होता है कि एक के दर्द से दूसरा रोता है ; ऐसी ही भावदशा में यह कविता लिखी गयी थी...एकाकी विम्बों के साथ वार्ता की संभावनाएं तलाशते हुए-


यहाँ पर
सांसारिक बातों के
पग-पग पर झमेलें हैं..
इस डगर में
हम सब तनहा हैं,
हम सब अकेले हैं..
चलो अकेलेपन में
सृजन की
अनोखी घड़ियाँ जी जाएँ
कुछ उलझनें
मिल कर
हल की जाएँ
फिर तो
सफ़र भी होगा..
और हमसफ़र भी..
ऐ! एकांत के साथी,
हमसे कुछ देर बात कर..
जरा ठहर भी..

जीवन
जितना अपना लगता है
वह उतना ही पराया भी..
वक़्त वक़्त की बात है
कभी तो साथ छोड़ जाता है
अपना ही साया भी..
इस सच की रौशनी में
साथ-प्रेम की
कुछ व्याख्याएं जी जाएँ
कुछ देर सवेरा हो
रौशनी की बातें हों
हम दीपक की लौ सा जल जाएँ
फिर तो
सफ़र भी होगा..
और हमसफ़र भी..
ऐ! एकांत के साथी,
हमसे कुछ देर बात कर..
जरा ठहर भी..

आशा निराशा से लड़ती कविता
हमारी शक्ति
हमारा विश्वास है..
अकेलेपन की रागिनी न होकर
ये तो
अपराजित प्रकाश है..
इस प्रकाश में
कितने अपने लगते हैं सब
चलो सारे भाव छंदों में सी जाएँ
जिंदगी जो है,
जैसी भी है..हमें क्या!
एक पल में ही सदियाँ जी जाएँ
फिर तो
सफ़र भी होगा..
और हमसफ़र भी..
ऐ! एकांत के साथी,
हमसे कुछ देर बात कर..
जरा ठहर भी..

8 टिप्पणियाँ:

Akhtar Khan Akela 17 सितंबर 2010 को 1:58 pm  

भाई jaan अकेले पन और अकेलेपन के बाद के हालातों के बाद इस अकेलेपन को केसे दूर करें बहुत अच्छे काव्यबद्ध अंदाज़ में प्रस्तुती हे मजा आ गया भाई ख़ास वजह हे में भी अकेला हूँ . अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 17 सितंबर 2010 को 3:18 pm  

जीवन जितना अपना लगता है..वह उतना ही पराया भी..
वक़्त वक़्त की बात है..कभी तो साथ छोड़ जाता है अपना ही साया भी..
--
सुन्दर रचना!
बहुत ही सीधी और खरी बात!

मनोज कुमार 17 सितंबर 2010 को 5:36 pm  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
मनोज कुमार 17 सितंबर 2010 को 5:37 pm  

कविता महज अकेलापन के समय का बयान भर नहीं है। इसमें ऐसा कुछ है जो इस संश्लिष्‍ट और अर्थसघन बनाता है।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
मशीन अनुवाद का विस्तार!, “राजभाषा हिन्दी” पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

अंक-9 स्वरोदय विज्ञान, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

ZEAL 18 सितंबर 2010 को 3:31 am  

.
Bitter truth of life !

Beautiful presentation .

.

राजभाषा हिंदी 18 सितंबर 2010 को 4:01 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

संजय भास्कर 19 सितंबर 2010 को 9:17 am  

तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

ana 4 नवंबर 2011 को 6:15 pm  

samajh me ata kin shabdon me tarif karoo.....ati sundar post

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