अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जल श्रोतों की खोज!

"ठाकुर का कुआँ"
प्रेमचंद की कहानी का
वह गाँव
कुछ कुछ सजीव होता है !
जब बात उठती है जल श्रोतों की
तो भरी भीड़ की
प्यास के आगे
बूंदों का अभाव सजीव होता है !

कहाँ है जल...
यहाँ तो
केवल
प्यासी आत्माएं खड़ी हैं
कौन बताएगा
कि
आखिर कैसे
जीवन "शव" से "शिव" होता है?!!!

अभाव के संकट से ...
कैसे उबरा जाये ...
मिलते हैं प्रभु तभी... जब
उन तक पहुचने का संकल्प अतीव होता है !
प्रकृति छेड़-छाड़ से तंग आ चुकी है ...
सुख रहे हैं जलश्रोत
मनुष्यता का यूँ तार तार हुआ जाना ...
क्या चेतन जगत
इस कदर निर्जीव होता है?!!!

हम समस्यायों और प्रश्नों से
वैसे ही घिरे हुए हैं ...
जिस तरह
किसी जलश्रोत को घेरे भीड़ खड़ी हो
समाधान भी होगा जरूर....
आखिर
हममे से ही तो कोई
दृढ उत्तर सा सजीव होता है!

एक अकेला सरल सा उत्तर
सारे प्रश्नों का हल होगा ....
हौसले की बात हो...
पानी का क्या ...
अरे! क्या हर पल
हमारी आँखों में ही नहीं
उनका अक्स आंसू बन कर
सजीव होता है ?!!!

अश्रु ढलते दृगों को
हास से परिचीत कराना है
झिलमिल बूंदों से ही
तो इन्द्रधनुषी संसार सजीव होता है !
ज़रा सी संवेदना जागे...
एक दुसरे के सुख दुःख के प्रति सरोकार हो
जीवन इन छोटे छोटे उपादानो से ही तो
सांस लेता है... चलता है ... सजीव होता है !

3 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) 4 सितंबर 2010 को 3:34 pm  

बहुत सुन्दर भावों को संजोये हुए अच्छी रचना

राजभाषा हिंदी 5 सितंबर 2010 को 4:44 am  

सुंदर प्रस्तुति
मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाँव ।
मूल नाम गुरु वचन है, मूल सत्य सतभाव ॥

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

anupama 5 सितंबर 2010 को 8:52 am  

dhanyavad!

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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