अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

पतझड़ की भी... मैं हो गयी सगी !

परायी है,
पर जाने क्यूँ-
मुझे दुनिया..
बिल्कुल अपनी सी लगी!

निद्रामग्न कलम में
जब सृजन की प्यास जगी,
शब्दों के संसार में..
भावनाएं विचरण करने लगी
बसंत भी जैसे था मेरा,
और पतझड़ की भी मैं हो गयी सगी
सभी स्तिथियाँ परिस्थितियाँ..
हो चली थी मिठास से पगी
तभी एक निर्मम आंधी आई..
और मैं रह गयी स्तब्ध ठगी

दिवस का अवसान
और सूरज की विदाई
अब लेने को उसकी जगह
उद्धत हुई दिया सलाई
जोड़ने बैठे शाम ढले हम
दिवस भर की कमाई
अंधियारे से बुझे मन को
चांदनी ने सूर्योदय की आस दिलाई
बाल अरुण की लालिमा
तब मन ही मन मुस्काई

फिर हो गयी भोर..
और जिंदगी पुनः चलने लगी
मृत्यु होगी अटल सत्य
पर जिंदगी ही अपनी, वह ही है सगी
कितने दर्द कितने सपने लिए..
कितने ही अरमानों से है पगी
प्रयत्न चलते ही रहेंगे, चाहे-
कितनी ही बार संभावनाएं जाएँ ठगी
और हो भी क्यों न, क्षीण हौसलों की..
सुप्त आत्मा है आज जगी

परायी है,
पर जाने क्यूँ-
मुझे दुनिया..
बिल्कुल अपनी सी लगी!

10 टिप्पणियाँ:

वीना 27 सितंबर 2010 को 1:24 pm  

कितने दर्द कितने सपने लिए..
कितने ही अरमानों से है पगी
प्रयत्न चलते ही रहेंगे,चाहे-
कितनी ही बार संभावनाएं जाएँ ठगी
और हो भी क्यों न,क्षीण हौसलों की..
सुप्त आत्मा है आज जगी
सुंदर रचना
http://veenakesur.blogspot.com/

Travel Trade Service 27 सितंबर 2010 को 1:30 pm  

जिंदगी ही अपनी,वह ही है सगी
कितने दर्द कितने सपने लिए..
कितने ही अरमानों से है पगी
प्रयत्न चलते ही रहेंगे,चाहे-
कितनी ही बार संभावनाएं जाएँ ठगी ...or
""'तभी एक निर्मम आंधी आई.. और मैं रह गयी स्तब्ध ठगी""' अनुपमा जी ...आज आप की कवीता पड़ कर अच्छा लगा आप के शब्द बाण जोरदार लगे ....भावना पूर्र्ण रचना कुछ शब्द बहुत ही सुन्दर लगे..Thanku

संजय भास्कर 27 सितंबर 2010 को 4:21 pm  

वाह !कितनी अच्छी रचना लिखी है आपने..! बहुत ही पसंद आई

Sunil Kumar 27 सितंबर 2010 को 5:57 pm  

परायी है,
पर जाने क्यूँ-
मुझे दुनिया ..
बिल्कुल अपनी सी लगी!
सुंदर रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) 22 फ़रवरी 2012 को 8:38 am  

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 23-02-2012 को यहाँ भी है

..भावनाओं के पंख लगा ... तोड़ लाना चाँद नयी पुरानी हलचल में .

Anupama Tripathi 23 फ़रवरी 2012 को 2:34 am  

परायी है,
पर जाने क्यूँ-
मुझे दुनिया..
बिल्कुल अपनी सी लगी!

अनुपम भाव अनुपमा जी ...

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 23 फ़रवरी 2012 को 3:00 am  

सुंदर रचना....

vidya 23 फ़रवरी 2012 को 4:33 am  

मृत्यु होगी अटल सत्य
पर जिंदगी ही अपनी, वह ही है सगी..
बहुत सुन्दर..

दीपिका रानी 23 फ़रवरी 2012 को 5:39 am  

यह जीवन है... इस जीवन का यही है रंग रूप

veerubhai 23 फ़रवरी 2012 को 8:08 am  

पर जिंदगी ही अपनी, वह ही है सगी
कितने दर्द कितने सपने लिए..
कितने ही अरमानों से है पगी
प्रयत्न चलते ही रहेंगे, चाहे-
कितनी ही बार संभावनाएं जाएँ ठगी
और हो भी क्यों न, क्षीण हौसलों की..
सुप्त आत्मा है आज जगी
.बहुत खूब .

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