अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्ते औ' जीवन

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्तों में
प्रभु स्वयं मुस्कुराता है ..
ये प्रीत कभी ख़त्म नहीं होती
जीवन ख़तम हो जाता है ...

एक बार जो
औरों के दुःख से रोना सीख लिया-
तो जीवन का
ध्येय सफल हो जाता है !

रस्ते के काँटों का भान रहे
पुष्प बिछाने का ध्यान रहे-
फिर सारा निज कष्ट
सरल हो जाता है !

रिश्ते...
सहज स्फुरित है जो,
उनका
अनंत से गहरा नाता है !

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्तों में
प्रभु स्वयं मुस्कुराता है ..
ये प्रीत कभी ख़त्म नहीं होती
जीवन ख़तम हो जाता है ...

6 टिप्पणियाँ:

राजेन्द्र मीणा 13 सितंबर 2010 को 3:55 pm  

अति सुन्दर !!! हर पंक्ति बहुत कुछ कहती हुई !!!

अथाह...

धन्यवाद !!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 13 सितंबर 2010 को 4:07 pm  

इंसानियत से अनुप्राणित रिश्तों में
प्रभु स्वयं मुस्कुराता है ..
ये प्रीत कभी ख़त्म नहीं होती
जीवन ख़तम हो जाता है ..
--
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

anupama 13 सितंबर 2010 को 4:45 pm  

dhanyavad shastri ji:)

anupama 13 सितंबर 2010 को 4:46 pm  

thanks rajendra ji:)
athaah is really nice...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 13 सितंबर 2010 को 7:16 pm  

एक बार जो
औरों के दुःख से रोना सीख लिया-
तो जीवन का
ध्येय सफल हो जाता

बहुत खूबसूरत भावों को लिए हुए अच्छी रचना

anupama 15 सितंबर 2010 को 7:49 am  

धन्यवाद!

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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