अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हे! जगदीश्वर .... हे! कृष्ण

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
केवल इतनी शक्ति दो कि हम दर्द सबका समझ सकें ..
क्या पीड़ा है ...क्या दारुण व्यथा, सब खुलकर तुझसे कह सकें ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
तेरे भक्तों की परिधि में मेरा भी एक नाम रहे ..
इतना तो करना प्रभु ...कि आ जाना सुदर्शन लेकर जब अकेली गम की शाम रहे ..

हे! जगदीश्वर...हे! कृष्ण
तेरी लीला से भिन्न कुछ भी नहीं, ये समझा दे ..
सकल आत्माओं की समस्त व्यथा मेरे भीतर आज जगा दे ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
तेरी छवि अभिराम है, फिर आँखों में मेरे रूप अनंत क्यूँ नहीं ..
मुट्ठी में मेरे केवल पतझड़ ...सावन या बसंत क्यूँ नहीं ..

हे! जगदीश्वर....हे! कष्ण
तुम कहवा रहे हो हमसे प्रभु ...प्रज्ञा को यह आभास हो ..
तुम तक पहुँचने का ...अच्युत मेरा प्रयास हो ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
देखना शक्ति तुम्हारी नए आयाम पायेगी ..
भक्ति का प्रसाद दे दो ...आत्मा तेजपूर्ण प्रकाशमय हो जायेगी ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
सभी प्रार्थनारत हैं, मेरी भी विनती सुनना ..
आशीषों का हाथ हमारे सर हो ...हो हमारा काम औरों की राह के कांटे चुनना ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
जो भी शक्ति दी ...उसका हमको भान करा दे ..
जो भूल गया है इस चक्र में पड़कर ...वो पावन ध्येय ध्यान धरा दे ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण
आत्मविश्वास की वह धारा निकले जिससे ...ब्रह्माण्ड प्रकाशित हो जाये ..
थोडा तो कमाल दिखा प्रभु.. ये कलयुग बैठा है कबसे तेरी दयालुता पर नजर टिकाये ..

हे! जगदीश्वर....हे! कृष्ण

8 टिप्पणियाँ:

Dr.J.P.Tiwari 1 सितंबर 2010 को 2:57 pm  

bahut hi sundar rachna. Badhai.

महेन्द्र मिश्र 1 सितंबर 2010 को 3:37 pm  

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...
जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये
जय श्रीकृष्ण

वन्दना 1 सितंबर 2010 को 3:43 pm  

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...
जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये

Virendra Singh Chauhan 1 सितंबर 2010 को 4:16 pm  

Bahut bhaktipurna kavayrachna .....Apki ye rachna padhkar Main aur mere varisth patrakaar aur kavi mitra Krishnmay ho gaye hain

Virendra Singh Chauhan 1 सितंबर 2010 को 4:20 pm  

AApko naur aapke parivaarvaalon ko Krishna janmastmi ki shubhkaamnaayen....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (ਦਰ. ਰੂਪ ਚੰਦ੍ਰ ਸ਼ਾਸਤਰੀ “ਮਯੰਕ” - "در. روپ چندر شاسترے "مینک) 1 सितंबर 2010 को 5:30 pm  

मुस्टण्डों को दूध-मखाने,
बालक भूखों मरते,
जोशी, मुल्ला, पीर, नजूमी,
दौलत से घर भरते,
भोग रहे सुख आजादी का, बेईमान मक्कार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।
--
"कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्!"
--
योगीराज श्री कृष्ण जी के जन्म दिवस की बहुत-बहुत बधाई!

कौशल तिवारी 'मयूख' 2 सितंबर 2010 को 8:02 am  

सुन्दर प्रस्तुति

anupama 2 सितंबर 2010 को 8:43 am  

shabdashish hetu aap sabhi ka dhanyavad!
subhkamnayen:)

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