डूबता सूरज और रुआंसा मन
विदा करते हुए उसे
आसमान की छाती विदीर्ण हुई
इन शब्दों में निहित है
जिसे
क्या कहें
सन्नाटों की गूँज और फिर उनका भी खो जाना
चाँद सितारे
सब विदा हो गए
निस्तब्ध निस्तेज वीरान
मौन रहा आसमान
गूंजते थे सन्नाटे
जो धरा के आँचल तक पहुँच
खो जाते थे
सन्नाटों की गूँज तक के
खो जाने से
उपजी अपरिमेय रिक्तता
फिर यात्रा करती थी
नभ तक का
जाने तन्हाईयों का सफ़र
है ये कब तक का !
सूरज की कोई किरण
फिर सुबह की आहट बन खिल आनी है --
आज उगे न उगे उम्मीद कौन जाने?!
पर अनुभव तो यही कहता है न
अब तक का !
खिल आने वाली सुबह के लिए
तमाम रिक्तताओं को धीर धरे लिए चलें
कि--
हमारे सपनों का कारवाँ
है ठोस धरा से
विस्तृत नभ तक का !
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ५८ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्य भक्तियोगोनाम द्वादश अध्याये यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण!
यद्यपि १२वें अध्याय में अनेक विकल्प देते हुए साधनों सहित भक्ति का वर्णन साथ ही ज्ञान के साधन का भी वर्णन है, तथापि भक्ति वर्णन की प्रमुखता के कारण ही इस अध्याय का नाम भक्तियोग है. पहले के अध्यायों में भी निर्गुण निराकार एवं सगुण साकार दोनों प्रकार की उपासना का उल्लेख हुआ है. इस अध्याय के पहले श्लोक में अर्जुन जिज्ञासावश जानना चाहता है कि दोनों प्रकार के उपासकों में कौन सी उपासना उत्तम है--
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥
अर्थात्, अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं- उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
अर्जुन के इस प्रश्न के उत्तरस्वरूप भगवान् सगुण साकार रूप को उत्तम बतलाते हुए कहते हैं--
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥
अर्थात्, मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं.
आगे के श्लोकों में सगुण साकार की उपासना को उत्तम बतलाने के कारण निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक अनुत्तम हैं, ऐसा न समझ लिया जाये, इसलिए इस बात को स्पष्ट करते हुए भगवान् कहते हैं --
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥
अर्थात्, जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं.
यहाँ यह स्पष्ट है कि सगुण साकार एवं निर्गुण निराकार-- दोनों प्रकार की उपासना सम ही है. ज्ञान योगियों के लिए निर्गुण निराकार की उपासना उनके पूर्वाभ्यास के कारण सहज होती है, किन्तु सामान्य देहधारियों के लिए अव्यक्त अर्थात् निर्गुण निराकार ब्रह्म की प्राप्ति में कठिनाई संभव है. अतः भगवान् कहते हैं--
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
अर्थात्, उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है.
आगे के दो श्लोकों में भगवान्स यह बताते हैं कि सगुण साकार परमेश्वर की उपासना से भी परमेश्वर की प्राप्ति शीघ्र और अनायास ही संभव है--
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥
अर्थात्, जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं, उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार कर देता हूँ.
ध्यातव्य है कि यद्यपि निर्गुण निराकार एवं सगुण साकार दोनों स्वरूपों की उपासना अपने आप में श्रेष्ठ है तथापि निर्गुण उपासना की अपेक्षा सगुण उपासना सुगम है. अतः अगले श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को भी मन बुद्धि लगा कर सगुण उपासना के लिए ही प्रेरित किया है--
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥
अर्थात्, मुझमें मन और बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है.
यहाँ यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है (जिसका संकेत मैंने इस अध्याय के आरम्भ में ही किया था) कि भक्ति के विविध विकल्प साधक की क्षमता के अनुसार इस अध्याय में उपलब्ध हैं जिन्हें हमें अपनी पात्रता के अनुरूप ग्रहण करना है. यही कारण है कि मन, बुद्धि न लगा पाने की स्थिति में क्या करना चाहिए इस विषय पर भगवान् यूँ कहते हैं--
अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
अर्थात्, यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर.
भगवान् इतने कृपालु हैं तथा उन्हें यह भी ज्ञात है कि सांसारिक प्राणी नित्य अभ्यासयोग का पालन शायद न कर सके तो उसके लिए भी दसवें श्लोक में विकल्प यूँ सुझाया गया है--
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥
अर्थात्, यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा.
यह भी जिसके लिए संभव न हो उसके लिए भगवान् पुनः विकल्प सुझाते हैं--
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥
अर्थात्, यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर. मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है.
स्पष्ट है कि अगर हम बताये गए सभी साधनों के प्रति सक्षम नहीं हैं तो कर्म करते हुए कर्म फल के त्याग का अभ्यास तो डालें क्यूँकि त्याग भगवान् की दृष्टि में श्रेष्ठतम है.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्य भक्तियोगोनाम द्वादश अध्याये यात्रा भविष्यति!
यद्यपि १२वें अध्याय में अनेक विकल्प देते हुए साधनों सहित भक्ति का वर्णन साथ ही ज्ञान के साधन का भी वर्णन है, तथापि भक्ति वर्णन की प्रमुखता के कारण ही इस अध्याय का नाम भक्तियोग है. पहले के अध्यायों में भी निर्गुण निराकार एवं सगुण साकार दोनों प्रकार की उपासना का उल्लेख हुआ है. इस अध्याय के पहले श्लोक में अर्जुन जिज्ञासावश जानना चाहता है कि दोनों प्रकार के उपासकों में कौन सी उपासना उत्तम है--
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥
अर्थात्, अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं- उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
अर्जुन के इस प्रश्न के उत्तरस्वरूप भगवान् सगुण साकार रूप को उत्तम बतलाते हुए कहते हैं--
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥
अर्थात्, मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं.
आगे के श्लोकों में सगुण साकार की उपासना को उत्तम बतलाने के कारण निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक अनुत्तम हैं, ऐसा न समझ लिया जाये, इसलिए इस बात को स्पष्ट करते हुए भगवान् कहते हैं --
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥
अर्थात्, जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं.
यहाँ यह स्पष्ट है कि सगुण साकार एवं निर्गुण निराकार-- दोनों प्रकार की उपासना सम ही है. ज्ञान योगियों के लिए निर्गुण निराकार की उपासना उनके पूर्वाभ्यास के कारण सहज होती है, किन्तु सामान्य देहधारियों के लिए अव्यक्त अर्थात् निर्गुण निराकार ब्रह्म की प्राप्ति में कठिनाई संभव है. अतः भगवान् कहते हैं--
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
अर्थात्, उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है.
आगे के दो श्लोकों में भगवान्स यह बताते हैं कि सगुण साकार परमेश्वर की उपासना से भी परमेश्वर की प्राप्ति शीघ्र और अनायास ही संभव है--
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥
अर्थात्, जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं, उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार कर देता हूँ.
ध्यातव्य है कि यद्यपि निर्गुण निराकार एवं सगुण साकार दोनों स्वरूपों की उपासना अपने आप में श्रेष्ठ है तथापि निर्गुण उपासना की अपेक्षा सगुण उपासना सुगम है. अतः अगले श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को भी मन बुद्धि लगा कर सगुण उपासना के लिए ही प्रेरित किया है--
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥
अर्थात्, मुझमें मन और बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है.
यहाँ यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है (जिसका संकेत मैंने इस अध्याय के आरम्भ में ही किया था) कि भक्ति के विविध विकल्प साधक की क्षमता के अनुसार इस अध्याय में उपलब्ध हैं जिन्हें हमें अपनी पात्रता के अनुरूप ग्रहण करना है. यही कारण है कि मन, बुद्धि न लगा पाने की स्थिति में क्या करना चाहिए इस विषय पर भगवान् यूँ कहते हैं--
अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
अर्थात्, यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर.
भगवान् इतने कृपालु हैं तथा उन्हें यह भी ज्ञात है कि सांसारिक प्राणी नित्य अभ्यासयोग का पालन शायद न कर सके तो उसके लिए भी दसवें श्लोक में विकल्प यूँ सुझाया गया है--
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥
अर्थात्, यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा.
यह भी जिसके लिए संभव न हो उसके लिए भगवान् पुनः विकल्प सुझाते हैं--
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥
अर्थात्, यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर. मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है.
स्पष्ट है कि अगर हम बताये गए सभी साधनों के प्रति सक्षम नहीं हैं तो कर्म करते हुए कर्म फल के त्याग का अभ्यास तो डालें क्यूँकि त्याग भगवान् की दृष्टि में श्रेष्ठतम है.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ५७ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्यापि विश्वरूपदर्शनयोगनामेकादशध्याये यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण !
अस्माकं सर्वेषाम् गीताप्रेमीनां कृते परम सौभाग्यस्य विषयोSयं यत् अद्य मार्गशीर्ष मासस्यशुक्लपक्षस्य एकादशी तिथि वर्तते. दिवसोSयं "गीता जयंती" रूपेण मन्यते. अतः सर्वै: सर्वप्रथमद्य गीता महात्म्यं पठनीयम श्रवनीयञ्च--
गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतः पुमान्।
विष्णोः पदमवान्प्रोति भयशोकादिवर्जितः॥१॥
अर्थात्, जो मनुष्य शुद्धचित्त होकर गीताशास्त्र का पाठ करता है, वह भय और शोक आदि से मुक्त हो विष्णुधाम को प्राप्त कर लेता है.
गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च।
नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च॥२॥
अर्थात्, जो मनुष्य सदा गीता का पाठ करने वाला है तथा प्राणायाम में तत्पर रहता है, उसके इस जन्म और पूर्वजन्म में किये हुए समस्त पाप निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं.
मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने।
सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम्॥३॥
अर्थात्, जल में प्रतिदिन किया हुआ स्नान मनुष्यों के केवल शारीरिक मल का नाश करता है, परंतु गीताज्ञानजल में एक बार भी किया हुआ स्नान सांसारिक-मल को नष्ट कर देता है.
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥४॥
अर्थात्, जो साक्षात् कमलनाभ भगवान् विष्णु के मुख कमल से प्रकट हुई है, उस गीता का ही भली भाँति गान करना चाहिये, अन्य शास्त्रों के विस्तार में जाने की आवश्यकता ही नहीं है.
भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद्विनिःसृतम्।
गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥५॥
अर्थात्, जो महाभारत का सार रूप है तथा जो भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से प्रकट हुआ है, उस गीतारूप गंगाजल को पी लेने पर पुनः इस संसार में जन्म नहीं लेना पड़ता है.
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥६॥
अर्थात्, सम्पूर्ण उपनिषदें गौ के समान हैं, गोपालनन्दन श्रीकृष्ण दुहने वाले हैं, अर्जुन बछड़ा है तथा महान् गीतामृत ही उस गौ का दुग्ध है और शुद्ध बुद्धिवाला श्रेष्ठ मनुष्य ही इसका भोक्ता है.
एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव।
एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा॥७॥
अर्थात्, देवकी नन्दन भगवान् श्रीकृष्ण का कहा हुआ गीताशास्त्र ही एकमात्र उत्तम शास्त्र है, भगवान् देवकी नन्दन ही एकमात्र महान् देवता हैं, उनका नाम ही एकमात्र मंत्र है और उन भगवान् की सेवा ही एकमात्र कर्तव्य कर्म है.
***
कितना सुन्दर संयोग है कि हमारे गीता ज्ञान यात्रा के क्रम में भगवान के विराट रूप को देख कर अर्जुन द्वारा गद् गद वाणी में भगवान् की स्तुति का प्रसंग भी आज ही उपस्थित हुआ है! इस अध्याय के ३६-४६वें श्लोक तक, ११ श्लोकों में भगवान् की स्तुति विस्तार से की गयी है जिसमें भगवान् के विषद रूप की महिमा और दुर्लभता का बखान है--
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा: ॥
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।।
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥
अर्थात्, अर्जुन बोले- हे अन्तर्यामिन्! यह उचित ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं. हे महात्मन्! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता आपके लिए कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे जो सत्, असत् और उनसे परे सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह स्वयं आप ही हैं. आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं. आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं. आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं. आपको बारम्बार नमन है. आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव !' 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात् कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं- वह सब अपराध आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ. आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं. हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लोकों में आपके समान दूसरा कोई नहीं हैं. अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ. हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करें. मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए. हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए. मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ. इसलिए हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइए.
अर्जुन की प्रार्थना पर प्रसन्न हो भगवान् ने अपने चतुर्भुज रूप को दिखलाया और फिर सौम्य मूर्ती होकर भयभीत अर्जुन को धीरज देते हैं और यह भी बतलाते हैं कि -- मैंने योग शक्ति के प्रभाव से यह मेरा परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराटरूप मैंने तुझको दिखाया जिसे तुम्हारे अतिरिक्त किसी ने पहले नहीं देखा और यह भी बतलाते हैं कि मनुष्य लोक में मेरे विश्व रूप को न तो वेदाध्यन से, न यज्ञ संपादन से, न दान से और न उग्र ताप से ही तेरे अतिरिक्त मैं किसी अन्य द्वारा देखा जा सकता हूँ. कहने का भाव यह है कि वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि-- तुम मेरे प्रिय हो इसलिए इस विकराल रूप को देख कर तुम्हें व्याकुल नहीं होना चाहिए. अब तुम भयरहित होकर, प्रीति युक्त हो मेरे चतुर्भुज रूप को भी देख ! इस प्रकार श्री कृष्ण ने अपने विश्व रूप का संवरण कर चतुर्भुज रूप का दर्शन कराते हुए स्वाभाविक मनुष्य रूप में अर्जुन के समक्ष उपस्थित हुए.
अर्जुन कहता है कि प्रभु के मनोहर रूप को पुनः देख, स्थिरचित्त हो वह स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया है--
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥
पुनः भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि उनके चतुर्भुज रूप का दर्शन सर्वथा दुर्लभ है. देवता भी जिस रूप के दर्शन की आकांक्षा रखते हैं वह दुर्लभ रूप एकमात्र अनन्य भक्ति द्वारा ही प्राप्य है--
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥
इस प्रकार यह सुस्पष्ट है कि अनन्य भक्ति के द्वारा ही भगवान् को इस रूप में देखना, जानना और एकीभाव से प्राप्त करना सुलभ हो सकता है. अतः भगवान् इस अध्याय के अंत में अनन्य भक्ति का स्वरुप जानने की आकांक्षा रखने वाले हम जैसे लोगों के लिए अनन्य भक्त के लक्षणों का वर्णन करते हुए इस प्रकार कहते हैं--
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
अर्थात्, हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है.
भक्तिमार्ग सबसे सरल मार्ग है जिसके स्वरुप की विषद व्याख्या भक्तियोगोनाम द्वादस अध्याय की यात्रा के क्रम में हम विस्तार से जानेंगे पर अभी हमें मुख्य रूप से इन बातों को मन में धारण कर लेना चाहिए कि हमें सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को भगवत्बुद्धि से, भक्तिपूर्वक, आसक्ति रहित होकर सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति बैर भाव से रहित हो कर, "सबमें परमात्मा ही है", ऐसी अनन्यता से युक्त होकर ही हम उन्हें प्राप्त कर सकते हैं.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
चूकती साँसों के हस्ताक्षर
विवशताओं की
लम्बी फेहरिस्त है
ज़िन्दगी के हिस्से
बस कुछ साँसों के घेरे हैं--
जिन्हें
स्वतः चूक जाना है इक दिन
इन घेरों के बीच होते हुए
जो चूकें हमसे होती हैं
वो
चूक रही साँसों का
हस्ताक्षर है!
चूकते-चूकते
अनेकानेक अवसर,
एक रोज़
अभीष्ट हाथ आता है
क्षण-क्षण
चूकती साँसों द्वारा
लिखा गया वो स्वर्णाक्षर है!
गिरने से
खो देने से
चूक जाने से
ज़िन्दगी नहीं चूकती
साँसे भी नहीं रुकतीं
कि
कई बार
जीवन अपने आप में
स्वयं एक मर्माहत स्वर है!
खोते-खोते
ख़्वाब बोते-बोते
होते-होते
जीवन को
जीवन होना है
सब यहीं पाना है
सब कुछ यहीं खोना है!
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ५६ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्य विश्वरूपदर्शनयोगनाम एकादश अध्याये यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण!
इस अध्याय में अर्जुन के प्रार्थना करने पर भगवान् ने अपने विराट रूप का दर्शण करवाया है अतः इस अध्याय का नाम विश्वरूपदर्शनयोग है. इस अध्याय में कुल ५५ श्लोक हैं जिसमें अधिकाँश में विश्वरूप का वर्णन और अर्जुन द्वारा भगवान् के स्तवन का ही प्रकरण है. अतः संक्षेप सार रूप में प्रमुख तथ्यों को लेकर हम यात्रा में आगे बढ़ेंगे. इस अध्याय के प्रारंभिक ४ श्लोकों में अर्जुन उनके उपदेशों की प्रशंसा करता हुआ अपने विश्वरूप का दर्शण कराने के लिए प्रार्थना करता है और कहता है--
आपने मुझ पर जो कृपा कर गोपनीय अध्यात्मिक विषय का उपदेश किया है उससे मेरा अज्ञान नष्ट हो गया है. हे परमेश्वर आपका कथन सत्य है परन्तु मैं आपके सकल तेज से युक्त विश्वरूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ. हे प्रभु! यदि ऐसा संभव है तो उस अविनाशी स्वरुप का मुझे आप दर्शण कराएं--
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥
भगवान् ने भी परम श्रद्धालु और परम प्रिय अर्जुन की प्रार्थना स्वीकारते हुए आगे के तीन श्लोकों में अपने विश्व रूप दर्शण की ओर संकेत करते हुए उसे देखने के लिए आज्ञा देते हुए कहते हैं-- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों हजारों नाना रूप, नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख. मुझमें आदित्यों अर्थात् अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारों को उनचास मरुद्गणों को तथा और भी न देखे गए आश्चर्यमय रूपों को देख. मेरे इसी शरीर में एक ही जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और जो कुछ भी देखना चाहते हो देखो--
श्रीभगवानुवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि ॥
यहाँ अर्जुन की विवशता यह है कि बार बार प्रेरित करने पर भी वह उस दिव्य स्वरुप को अपनी इन आँखों से नहीं देख पाता. अतः अंतर्यामी परमेश्वर अर्जुन को दिव्य दृष्टि देने की भी इच्छा प्रगट करते हैं--
न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
अर्थात, मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख.
हम सब भी परमेश्वर के प्रति अटूट आस्था रखते हुए अर्जुन की तरह याचना करें तो वह परमात्मा हमें भी दिव्य दृष्टि यानि ज्ञानमयी दृष्टि प्रदान करेंगे जिससे उनके विश्वरूप का दर्शण हम भी सहज कर पाएंगे. उनकी तो प्रतिज्ञा ही है--
तेषां सतत युक्तानां भजतां प्रीति पूर्वकम् ।
ददामि बुद्धि योगं तं येन मामुपयान्ति ते ।। १०/१० ।।
दिव्य दृष्टि पाकर अर्जुन ने भगवान् के विराट स्वरुप में जिन जिन आश्चर्यमय रूपों को देखा उसका विषद वर्णन करते हुए संजय कहते हैं कि आकाश में हजारों सूर्यों के एक साथ उदित होने से उत्पन्न जो प्रकाश है वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश शायद ही हो. पांडू पुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार के विभक्त अर्थात पृथक पृथक सम्पूर्ण जगत को, देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान् के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा--
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥
अर्जुन भगवान् के विराट रूप का दर्शण कर उनकी स्तुति करने लग जाता है--
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥
अर्थात, अर्जुन बोले- हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ. हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही. आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ.
विराट रूप के विस्तार को मूल ग्रथ में देखा जा सकता है. लेकिन इस अध्याय के २८वें श्लोक पर हम धयान आकृष्ट करना चाहेंगे कि युद्ध से भागने वाला अर्जुन युद्ध आरम्भ होने से पूर्व ही दोनों सेनाओं के योद्धाओं को भगवान् के विकराल मुख में प्रविष्ट होते देख रहा है ठीक वैसे ही जैसे नदियाँ तेजी से समुद्र में प्रवेश करती हैं--
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥
अर्जुन यह सब देख किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उसके मन में इस बात के जानने की इच्छा उत्पन्न होती है कि ये श्री कृष्ण वस्तुतः कौन हैं तथा इस महान उग्र स्वरुप के द्वारा ये करना चाहते हैं, इसलिए भयभीत हो विनम्र भाव से भगवान् से इस विषय में प्रश्न करता है--
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥
अर्थात, मुझे बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो. आप प्रसन्न होइए. आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता.
अर्जुन के प्रश्न करने पर अपने उग्र एवं विराट रूप धारण करने का उद्देश्य बतलाते हुए भगवान् कहते हैं--
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
अर्थात्, मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ. इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ. इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा.
यहाँ हम सबों के लिए भी ध्यातव्य है कि हमारे दैनंदिन कार्य भी पूर्वनिर्धारित हैं, रचित नाटक के अभिनेता मात्र हैं हम, हमारे सारे क्रिया कलाप और कथोपकथन पूर्व निर्धारित हैं, हमें बस अपना कर्म कुशलता पूर्वक सम्पादित कर रंगमंच से विदा ले लेना है. नाटक के विभिन्न पात्र से, जैसे होते हुए भी, कोई सम्बन्ध नहीं होता और न ही किसी प्रकार का मोह होता है. पात्र बस अपना रोल निभा कर प्रसन्नता पूर्वक मंच से उतर आता है और सम्यक अभिनय के कारण उसकी प्रशंसा भी होती है. वैसे ही हमें भी बिना मोह में पड़े निर्लिप्त रह कर संसार रुपी रंगमंच पर अपन कर्म निष्काम रूप से सम्पादित कर मुक्त हो जाना है.
यहाँ भी भगवान् अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए उसे युद्ध करने की सलाह देते हैं जो सब प्रकार से उसे लाभ पहुंचाने वाला है. चूँकि भगवान् के अनुसार युद्ध मानों संपन्न ही हो चुका है, अतः निमित्त मात्र युद्ध के लिए उत्साहित करते हुए वे अर्जुन को आदेश देते हैं--
तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
अर्थात, तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग. ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं. हे सव्यसाचिन! तू तो केवल निमित्त बन जा.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥
भगवान् ने भी परम श्रद्धालु और परम प्रिय अर्जुन की प्रार्थना स्वीकारते हुए आगे के तीन श्लोकों में अपने विश्व रूप दर्शण की ओर संकेत करते हुए उसे देखने के लिए आज्ञा देते हुए कहते हैं-- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों हजारों नाना रूप, नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख. मुझमें आदित्यों अर्थात् अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारों को उनचास मरुद्गणों को तथा और भी न देखे गए आश्चर्यमय रूपों को देख. मेरे इसी शरीर में एक ही जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और जो कुछ भी देखना चाहते हो देखो--
श्रीभगवानुवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि ॥
यहाँ अर्जुन की विवशता यह है कि बार बार प्रेरित करने पर भी वह उस दिव्य स्वरुप को अपनी इन आँखों से नहीं देख पाता. अतः अंतर्यामी परमेश्वर अर्जुन को दिव्य दृष्टि देने की भी इच्छा प्रगट करते हैं--
न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
अर्थात, मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख.
हम सब भी परमेश्वर के प्रति अटूट आस्था रखते हुए अर्जुन की तरह याचना करें तो वह परमात्मा हमें भी दिव्य दृष्टि यानि ज्ञानमयी दृष्टि प्रदान करेंगे जिससे उनके विश्वरूप का दर्शण हम भी सहज कर पाएंगे. उनकी तो प्रतिज्ञा ही है--
तेषां सतत युक्तानां भजतां प्रीति पूर्वकम् ।
ददामि बुद्धि योगं तं येन मामुपयान्ति ते ।। १०/१० ।।
दिव्य दृष्टि पाकर अर्जुन ने भगवान् के विराट स्वरुप में जिन जिन आश्चर्यमय रूपों को देखा उसका विषद वर्णन करते हुए संजय कहते हैं कि आकाश में हजारों सूर्यों के एक साथ उदित होने से उत्पन्न जो प्रकाश है वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश शायद ही हो. पांडू पुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार के विभक्त अर्थात पृथक पृथक सम्पूर्ण जगत को, देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान् के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा--
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥
अर्जुन भगवान् के विराट रूप का दर्शण कर उनकी स्तुति करने लग जाता है--
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥
अर्थात, अर्जुन बोले- हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ. हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही. आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ.
अर्थात, अर्जुन बोले- हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ. हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही. आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ.
विराट रूप के विस्तार को मूल ग्रथ में देखा जा सकता है. लेकिन इस अध्याय के २८वें श्लोक पर हम धयान आकृष्ट करना चाहेंगे कि युद्ध से भागने वाला अर्जुन युद्ध आरम्भ होने से पूर्व ही दोनों सेनाओं के योद्धाओं को भगवान् के विकराल मुख में प्रविष्ट होते देख रहा है ठीक वैसे ही जैसे नदियाँ तेजी से समुद्र में प्रवेश करती हैं--
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥
अर्जुन यह सब देख किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उसके मन में इस बात के जानने की इच्छा उत्पन्न होती है कि ये श्री कृष्ण वस्तुतः कौन हैं तथा इस महान उग्र स्वरुप के द्वारा ये करना चाहते हैं, इसलिए भयभीत हो विनम्र भाव से भगवान् से इस विषय में प्रश्न करता है--
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥
अर्थात, मुझे बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो. आप प्रसन्न होइए. आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता.
अर्जुन के प्रश्न करने पर अपने उग्र एवं विराट रूप धारण करने का उद्देश्य बतलाते हुए भगवान् कहते हैं--
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
अर्थात्, मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ. इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ. इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा.
यहाँ हम सबों के लिए भी ध्यातव्य है कि हमारे दैनंदिन कार्य भी पूर्वनिर्धारित हैं, रचित नाटक के अभिनेता मात्र हैं हम, हमारे सारे क्रिया कलाप और कथोपकथन पूर्व निर्धारित हैं, हमें बस अपना कर्म कुशलता पूर्वक सम्पादित कर रंगमंच से विदा ले लेना है. नाटक के विभिन्न पात्र से, जैसे होते हुए भी, कोई सम्बन्ध नहीं होता और न ही किसी प्रकार का मोह होता है. पात्र बस अपना रोल निभा कर प्रसन्नता पूर्वक मंच से उतर आता है और सम्यक अभिनय के कारण उसकी प्रशंसा भी होती है. वैसे ही हमें भी बिना मोह में पड़े निर्लिप्त रह कर संसार रुपी रंगमंच पर अपन कर्म निष्काम रूप से सम्पादित कर मुक्त हो जाना है.
यहाँ भी भगवान् अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए उसे युद्ध करने की सलाह देते हैं जो सब प्रकार से उसे लाभ पहुंचाने वाला है. चूँकि भगवान् के अनुसार युद्ध मानों संपन्न ही हो चुका है, अतः निमित्त मात्र युद्ध के लिए उत्साहित करते हुए वे अर्जुन को आदेश देते हैं--
तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
अर्थात, तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग. ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं. हे सव्यसाचिन! तू तो केवल निमित्त बन जा.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ५५ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्यापि विभूतियोगोनाम दशमे अध्याये यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण !
कल हमलोगों ने अर्जुन को दिए गए भगवान् के आश्वाशन को "जो मुझे सदा याद करते हैं, उनके अंतःकरण में स्थित होता हुआ स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय तत्वज्ञान रूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ". यह आश्वाशन हम सभी भगवद भक्तों के लिए भी है जो उनके मनन चिंतन में लगे रहते हैं. अतः इस सहज वृत्ति को अपनाने मात्र से परमात्मा की परम ज्ञान दान की अहैतुकी कृपा हमें भी अवश्य प्राप्त होगी, यही सत्य है. जैसा कि हम सभी जानते हैं कि यह दशम अध्याय भगवान् की विभूतियों के मुख्य वर्णन के कारण विभूतियोग नाम दशम अद्याय कहलाता है! अर्जुन का सौभाग्य था कि सगुण साकार ब्रह्म उसके सामने मनुष्य रूप में परमसखा की तरह उपस्थित थे. दुर्भाग्यवश वह उन्हें उस रूप में पहचानता नहीं था. यह स्वाभाविक भी है -- "अतिपरिचयात् अवज्ञा"!
पर अब भगवान् कृष्ण के संकेत करने पर अर्जुन को ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान् की विभूति और योग को तत्व से जानना भगवदप्राप्ति के लिए आवश्यक है. अतः वह उनकी स्तुति करता हुआ उनकी योगशक्ति और विभूतियों को भली भांति जानने के लिए विस्तार से वर्णन की प्रार्थना करता हुआ कहता है कि -- हे प्रभु! आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं और परम पवित्र हैं. आप सभी ऋषियों दिव्या पुरुषों एवं देवों के भी देव हैं. अजन्मा और सर्व व्यापी हैं, ऐसा देवर्षि नारद, महर्षि व्यास आदि भी कहते रहे हैं. स्वयं आपने भी आज मेरे प्रति इन बातों की चर्चा की है. हे केशव! मैं भी इन सारी बातों को सत्य मानता हूँ, यह भी मानता हूँ कि आपके लीलामय स्वरुप को देव, दानव और मनुष्य भी नहीं समझ पाते.
यहाँ अर्जुन के कथन का अभिप्राय यह है कि जब प्रभु के सगुण साकार लीलामय स्वरुप को देखते हुए भी वह समझ से परे होता है तो कोई भी देव, दानव या मनुज उन्हें किस प्रकार जान पायेगा! अतः अर्जुन निवेदन करता है कि प्रभु अपनी जिन विभूतियों से सम्पूर्ण लोकों को व्याप्त कर स्थित हैं उन दिव्य विभूतियों को सम्पूर्णता से कहने में भी एकमात्र वे ही समर्थ हैं. अर्जुन जानना चाहता है कि वह किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ प्रभु को जान सके. किन किन भावों में स्थित हो प्रभु चिंतन किया जा सके उन सभी योग शक्तियों और विभूतियों को विस्तार पूर्वक सुनने की आकांक्षा व्यक्त करता है अर्जुन क्यूंकि अमृतमय वाणी सुनने की उसकी उत्कंठा निरंतर बनी हुई है--
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥
इन्हीं श्लोकों (१५-१८) के भावार्थ ऊपर सन्निहित हैं. अर्जुन ने सुनने की उत्कंठा दिखलाई और भगवान् भी उसकी प्रार्थना के अनुरूप भगवान् ने अपनी विभूतियों का वर्णन करने के लिए तैयार हो जाते हैं और कहते हैं कि-- यद्यपि मेरी विभूतियों के विस्तार का कोई अंत नहीं है तथापि तुम्हारे समक्ष मैं दिव्य विभूतियों का वर्णन करता हूँ (यह स्वाभाविक बात है कि यदि कोई सुनने की इच्छा रखता हो तो सुनाने वाले की रुचि भी बढ़ जाती है पर हम जन साधारण के लिए यह विडंबना ही है कि जब कोई अच्छी बात बता रहा होता है तो हमारी रूच जाग्रत नहीं होती और जब जानने की इच्छा होती है तब बताने वाला कोई नहीं मिलता. हमें जब भी ऐसे सत्संग और सद्वाणी का सुअवसर मिले, उसे चूकना नहीं चाहिए).
भगवान् अपनी प्रमुख विभूतियों का वर्णन करते हुए अर्जुन से कहते हैं-- हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ, साथ ही सम्पूर्ण भूतों का आदि अंत मध्य मैं ही हूँ, मैं ही अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु हूँ, और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य भी मैं ही हूँ. जिन उनचास पवनों की चर्चा है उसमें मरीचि नाम का वायु देवता और नक्षत्रों का अधिपति चन्द्रमा भी मैं ही हूँ. मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवताओं में इंद्र हूँ, एकादश इन्द्रियों में मन हूँ और सम्पूर्ण प्राणियों की जीवन शक्ति भी मैं ही हूँ, मुझे ही एकादश रुद्रों में शंकर जानों, यक्ष तथा राक्षसों के बीच धन का स्वामी कुबेर भी मैं ही हूँ, आठ वसुओं में अग्नि हूँ, शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु, पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति, सेनापतियों में स्कन्द और जलाशयों में समुद्र हूँ, ऋषियों में भृगु, अक्षर में ओंकार और सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ हूँ, अचल हिमालय भी मैं ही हूँ--
श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥
जैसा कि भगवान् ने विभूति कथन के आरम्भ में ही अर्जुन को स्पष्ट कर दिया था कि उनकी विभूतियों का कोई अंत नहीं. अतः अति दिव्य और जन साधारण के दृष्टि पथ में भी आने वाली मुख्य विभूतियों को उन्होंने बताया है. गीता ज्ञान यात्रा के सुधि पाठकों से भी मेरा विनम्र निवेदन है कि मैं भी भगवान् द्वारा कही गयी कुछ और विभूतियों का वर्णन करते हुए इस अध्याय को समाप्त करूँगा. विस्तार से बताई गयी विभूतियों का अवलोकन गीता मूल से भी किया जा सकता है.
भगवान् कहते हैं-- मैं वृक्षों में पीपल हूँ, देवर्षियों में नारद हूँ, घोड़ों में उच्चै श्र्वा हूँ, हाथियों में ऐरावत, शास्त्रों में वज्र, गायों में कामधेनु, पितरों में अर्यमा, शासन करने वालों में यमराज, दैत्यों में प्रह्लाद, पशुओं में सिंह, पक्षियों में गरुड़, शस्त्र धारियों में राम हूँ, जलचरों में मगर हूँ, मैं ही सृष्टि का आदि, अंत, मध्य हूँ, मैं ही अध्यात्म विद्या हूँ साथ ही परस्पर विवाद करने वालों के बीच तत्व निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद भी मैं ही हूँ, अक्षरों में अकार हूँ, समासों में द्वन्द समास हूँ, अक्षयकाल मैं ही हूँ, मई ही स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, मेधा, स्मृति, धृति और क्षमा हूँ, मासों में मार्गशीर्ष अगहन, ऋतुओं में वसंत, तेजस्वियों का तेज मैं ही हूँ, वृष्णि वंशियों में वासुदेव और पांडवों में धनञ्जय अर्थात स्वयं तू ही हूँ, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में मैं शुक्राचार्य हूँ. अंततः भगवान् कहते हैं कि सभी भूतों की उत्पत्ति का कारण भी वे ही हैं! इसप्रकार २० वें श्लोक से ३९ वें श्लोक तक भगवान् ने दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हुए उपसंहार पूर्वक कहते हैं-- हे अर्जुन! मरी विभूतियों का अंत नहीं है. मैंने जिन विभूतियों की अभी चर्चा की है वह अत्यंत संक्षिप्त है, अतः तुम्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि जो जो विभूति युक्त अर्थात ऐश्वर्य युक्त, कान्तियुक्त, शक्तियुक्त तुम्हें संसार में दिखे, उसे तुम मेरे ही अंश की अभिव्यक्ति जानना.
पुनः वे कहते हैं इससे अधिक और वे क्या कहें-- यह समस्त जगत उनकी योग शक्ति के एक अंश मात्र से ही उत्पन्न है अर्थात वे इस सम्पूर्ण जगत को अपनी योगशक्ति के एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हैं--
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
हमें भगवान् की इस वाणी को बराबर ध्यान में रखना चाहिए कि हममें से कोई भी विशिष्ट ज्ञान, बुद्धि, शक्ति, सौन्दर्य, विवेक से युक्त दिखाई पड़े तो हमें ईश्वरीय अंश मान कर उनका सम्मान करना चाहिए और उनसे कुछ सीखना भी चाहिए. इस प्रकार विभूति योग नाम दशम अध्यम पूर्ण हुआ. अब यात्रा विश्वरूप दर्शन योग नाम एकादश अध्याय में प्रविष्ट होगी.
हरिः ॐ तत्सत् !
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥
जैसा कि भगवान् ने विभूति कथन के आरम्भ में ही अर्जुन को स्पष्ट कर दिया था कि उनकी विभूतियों का कोई अंत नहीं. अतः अति दिव्य और जन साधारण के दृष्टि पथ में भी आने वाली मुख्य विभूतियों को उन्होंने बताया है. गीता ज्ञान यात्रा के सुधि पाठकों से भी मेरा विनम्र निवेदन है कि मैं भी भगवान् द्वारा कही गयी कुछ और विभूतियों का वर्णन करते हुए इस अध्याय को समाप्त करूँगा. विस्तार से बताई गयी विभूतियों का अवलोकन गीता मूल से भी किया जा सकता है.
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
हमें भगवान् की इस वाणी को बराबर ध्यान में रखना चाहिए कि हममें से कोई भी विशिष्ट ज्ञान, बुद्धि, शक्ति, सौन्दर्य, विवेक से युक्त दिखाई पड़े तो हमें ईश्वरीय अंश मान कर उनका सम्मान करना चाहिए और उनसे कुछ सीखना भी चाहिए. इस प्रकार विभूति योग नाम दशम अध्यम पूर्ण हुआ. अब यात्रा विश्वरूप दर्शन योग नाम एकादश अध्याय में प्रविष्ट होगी.
हरिः ॐ तत्सत् !
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ५४ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्य विभूतियोगोनाम दशमे अध्याये यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण !
इस अध्याय में प्रधान रूप से भगवान् की विभूतियों का वर्णन हुआ है, इसीलिए इस अध्याय का नाम विभूतियोग रखा गया है! जैसा कि हम जानते हैं, गीता में कुल अट्ठारह अध्याय है जिसमें से नौ अध्यायों तक गीता ज्ञान यात्रा हो चुकी है. इस तरह हमने आधा सफ़र तय कर लिया है. हमलोगों ने यहाँ तक की यात्रा में यह भी महसूस किया है कि प्रकारांतर से समझने समझाने के लिए भले ही अन्य विषयों का भी समावेश हुआ है किन्तु मुख्य रूप से गीता ज्ञान संबलित कर्मयोग शास्त्र ही है जो हमारे पूर्व राष्ट्रपति परम दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन महोदय का अभिमत रहा है. अतः हम इस मुख्य बिंदु से अपने को सदा जोड़े रखें और हमें कभी भ्रम न हो.
इस अध्याय में अपनी विभूतियों का वर्णन करने के क्रम में भगवान् अर्जुन से कहते हैं-- हे महाबाहो! इतने वर्णन के बाद भी मेरे परम रहस्य और प्रभाव के बारे में सुनो क्यूंकि तुम मुझमें अतिशय प्रेम रखते हो अतः तुम्हारे हित के लिए मैं अपने विभूतियों को बतलाता हूँ.
हम सबों की भी यह प्रवृत्ति है कि किसी विशिष्टता या चमत्कार के बिना हम किसी ओर आकृष्ट नहीं हो पाते अतः कण कण में बसने वाला परमात्मा हमें सर्वत्र दिखाई नहीं पड़ता और तब किसी विशिष्ट वस्तु के उदाहरण द्वारा बताने पर बात समझ में आती है. उदहारण स्वरुप भगवान् ने इसी अध्याय में अपनी विभूतियों के वर्णन प्रसंग में अपने को "स्थावरानां हिमालयः" कहते हैं. हिमालय पर्वत की विशालता को देख हम उसे श्रेष्ठ और विशिष्ट मानने को तैयार हो जाते हैं. वह हिमालय तलहटी से चोटी तक अपने सम्पूर्ण स्वरुप में विद्यमान है. हम कहीं से भी उससे एक पत्थर का टुकड़ा उठाएं तो वह हिमालय का ही अंश है किन्तु अन्यत्र छोटे टुकड़े को पड़ा देख हम उसे हिमालय मानने को तैयार नहीं होते. अतः यहाँ भी अर्जुन के संदेहों को पूर्णरूपेण दूर करने के लिए भगवान् कहते हैं कि चूँकि तुम मुझमे प्रेम रखते हो इसलिए मैं अपने प्रभाव एवं रहस्य को तुमसे कहता हूँ. वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि जब मैं अवतार ग्रहण करता हूँ तो मेरी उत्पत्ति एवं मानवीय लीला से प्रकट होने के रहस्य को न तो देवता जान पाते हैं न कोई महर्षि जान पाते हैं क्यूंकि मैं ही सभी देवताओं और महर्षियों का आदि कारण भी हूँ--
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥
पुनः वे कहते हैं कि इस प्रकार जो मुझे जन्मरहित, अनादि और लोक का महान ईश्वर तत्व से जानता है, वह ही ज्ञानवान समस्त पापों से मुक्त हो मुझे भली प्रकार जान पाता है. इस प्रकार जिनकी बुद्धि यह समझ लेती है कि मैं वासुदेव ही समस्त जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही समस्त जगत चेष्टा करता है, इस प्रकार समझ कर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही भजते हैं तथा प्राणों को मुझमें ही अर्पित करने वाले भक्त मेरी भक्ति की चर्चा करते हुए मुझमें ही रमण करते हैं--
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
१०वाँ एवं ११वाँ श्लोक अर्जुन सहित हम साधारण लोगों के लिए भी अत्यंत संतोषजनक है क्यूंकि भगवान् ने ऊपर कहे गए भाव से भगवान् के ध्यान में निरंतर लगे होते हैं और प्रेमपूर्वक भजते हैं उन्हें भगवान् स्वयं तत्वज्ञान प्रदान करते हैं जिससे वह उनको सहज ही प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है. भगवान् यह भी स्पष्ट करते हैं कि मैं वैसे भक्तों पर कृपा करता हुआ स्वयं उनके अंतःकरण में बैठे अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय तत्वज्ञान रुपी दीपक से नष्ट कर देता हूँ--
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
इससे यह स्पष्ट ही है कि प्रेमपूर्वक भगवत सत्ता को स्वीकारते हुए उनका स्मरण, चिंतन, आपस में उनकी महिमा का कथोपकथन और भगवत बुद्धि से युक्त होकर निष्काम कर्म का संपादन अपना दायित्व है और अज्ञानरूपी हृदय के अन्धकार को तत्वज्ञानरुपी दीप से दूर करने का दायित्व स्वयं परमेश्वर का है. मात्र हमें अपने दायित्यों का निर्वहन करना है.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
१०वाँ एवं ११वाँ श्लोक अर्जुन सहित हम साधारण लोगों के लिए भी अत्यंत संतोषजनक है क्यूंकि भगवान् ने ऊपर कहे गए भाव से भगवान् के ध्यान में निरंतर लगे होते हैं और प्रेमपूर्वक भजते हैं उन्हें भगवान् स्वयं तत्वज्ञान प्रदान करते हैं जिससे वह उनको सहज ही प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है. भगवान् यह भी स्पष्ट करते हैं कि मैं वैसे भक्तों पर कृपा करता हुआ स्वयं उनके अंतःकरण में बैठे अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय तत्वज्ञान रुपी दीपक से नष्ट कर देता हूँ--
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
इससे यह स्पष्ट ही है कि प्रेमपूर्वक भगवत सत्ता को स्वीकारते हुए उनका स्मरण, चिंतन, आपस में उनकी महिमा का कथोपकथन और भगवत बुद्धि से युक्त होकर निष्काम कर्म का संपादन अपना दायित्व है और अज्ञानरूपी हृदय के अन्धकार को तत्वज्ञानरुपी दीप से दूर करने का दायित्व स्वयं परमेश्वर का है. मात्र हमें अपने दायित्यों का निर्वहन करना है.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ५३ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्यापि राजविद्याराजगुह्ययोगोनाम नवमे अध्याये एव यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण !
पूर्व के श्लोकों में भगवान् ने समस्त विश्व को अपना स्वरुप बतलाया है एवं यज्ञादि द्वारा अन्यान्य देवताओं की पूजा को अपनी ही पूजा बतलाया है और यह भी स्पष्ट किया है कि उनके द्वारा ही उन देवताओं के माध्यम से फल की प्राप्ति तो हो जाती है पर वे स्वयं उन्हें प्राप्त नहीं होते फलतः उन्हें जन्म मृत्यु रूप आवागमन के चक्र में पड़ना पड़ता है किन्तु जो उनके प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं उन्हें वे सहज ही प्राप्त हो जाते हैं जैसा कि २३वें व २४वें श्लोक में उन्होंने स्पष्ट किया है--
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥
अर्थात, हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है. क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परंतु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसी से पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं.
किसी के मन में यह सहज प्रश्न उठ सकता है कि अन्य देवताओं के उपासक आवागमन के चक्र में पड़ जाते हैं और भगवान् के भक्त आवागमन से मुक्त हो कर परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं-- इसका क्या कारण है. इस जिज्ञासा की पूर्ती के लिए भगवान् २५वें श्लोक में स्पष्ट करते हुए कहते हैं--
यह उपास्य के स्वरुप और उपासक के भाव के अनुरूप उपासना के फल भेद के कारण ही होता है. यह स्वाभाविक भी है कि जिन जिन कामनाओं के वशीभूत उपासक जिन देव, पितर या भूतों की उपासना करते हैं वे अपनी उपासना के अनुरूप वह फल और उन उन देवता पितर आदि को प्राप्त तो हो जाते हैं पर उन्हें मैं नहीं प्राप्त होता पर जो सर्वतो भावेन मेरी उपासना करते हैं उनकी आवश्यकता के अनुरूप उन्हें सांसारिक सुख सुविधा भी प्राप्त हो जाती है और अंततः वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता.
यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
परमात्मा की भक्ति एवं भगवदप्राप्ति रूप महान फल होने पर भी उसके साधन में कोई कठिनाई नहीं होती बल्कि उस परमात्मा की प्राप्ति के लिए साधन बहुत ही सुगम और सरल है. भगवान् २६वें श्लोक इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम और भक्ति से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीती पूर्वक ग्रहण करता हूँ--
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
यहाँ यह स्पष्ट है कि विभिन्न देवताओं की पूजा के लिए विहित यज्ञ कामना की पूर्ती के लिए ही संकल्पित होते हैं जैसे पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ, युद्ध में विजय प्राप्ति हेतु यज्ञ, सुख ऐश्वर्य की प्राप्ति हेतु यज्ञ इत्यादि और इन कामनाओं की अधिष्ठात्री देवी देवताओं के लिए यज्ञ संपादन होता है. तदनुरूप भक्त फल प्राप्त करता और उसकी यात्रा उन उन देवताओं तक ही सीमित रह जाती है और आवागमन का चक्र पूर्ववत चलता रहता है. दूसरी ओर भगवान् के मुखारविंद से निकली हुई वाणी से ही स्पष्ट है कि अनन्य भाव से एकमात्र परमात्मा को भजता हुआ भक्त आवश्यकता के अनुसार सुखोपभोग प्राप्त करता हुआ परमात्मा को प्राप्त हो जाता है अतः आवागमन के चक्र से बच कर वह सर्वथा मुक्त ही हो जाता है. पहले के अध्यायों में स्पष्ट हो चूका है कि निष्काम कर्मयोग भी उसी परमात्मा की आराधना है.
अर्जुन सहित हम जैसे जिज्ञासुओं की जिज्ञासा पर भगवान कर्तव्य करने की अत्यंत सहजता का वर्णन २७वें श्लोक में इस प्रकार करते हैं--
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
अर्थात, हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर.
पहले के अध्यायों में कर्म करते हुए कर्म फल की आकांक्षा से अपने को मुक्त रखने का निर्देश ही तो बार बार दिया गया है, यही तो कर्म करते हुए कर्म के शुभाशुभ फलों से मुक्ति का सरल उपाय है. इसी लिए किसी के मन में यह सहज प्रश्न हो सकता है कि समस्त कर्मों को भगवद अर्पण करने का फल क्या हो सकता है. इसके उत्तर स्वरुप भगवान् कहते हैं कि जब भक्त अपने समस्त शुभ अशुभ फल वाले कर्मों को मुझ भगवान् के लिए अर्पित कर देता है एवं सन्यास योग से युक्त वह व्यक्ति निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त हो जाता है--
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबंधनैः ।
सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥
आगे के श्लोकों में भगवान् यह स्पष्ट कर देते हैं कि-- मैं सभी प्राणियों में सम भाव से स्थित हूँ, न मेरा कोई अप्रिय है और न ही कोई प्रिय है परन्तु जो भक्त मुझको प्रेम से भजता है वह मुझमें ही स्थित होता है और मैं भी उसमें प्रत्यक्ष रूप से प्रकट रहता हूँ. इससे आगे बढ़कर भी भगवान् आश्वस्त करते हुए कहते हैं-- यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त हो कर मुझको भजता है तो वह दुराचारी भी साधू ही कहलाने योग्य है क्यूँ कि अब वह यथार्थ निश्चय वाला बन गया है अर्थात उसने भली भांति यह निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन से बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है. अतः ऐसा व्यक्ति पापी होते हुए भी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शांति को प्राप्त होता है. अर्जुन से भगवान् कहते हैं -- तू निश्चय पूर्वक सत्य जान मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता.
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
इस प्रकार भगवान् ने सदाचारिता और दुराचारिता के कारण होने वाले विभेद को समाप्त करते हुए दोनों के लिए अनन्य भाव से प्रभु को भजने की प्रमुखता पर बल देते हुए आगे के श्लोकों में यह भी स्पष्ट कर देना चाहा है कि भगवान् के लिए कोई अच्छी या बुरी जाति / योनि नहीं है बल्कि सबों की अनन्य शरणागति ही उन्हें अभीष्ट है और वैसे भक्तों के लिए वे सहज सुलभ हैं. इसीलिए भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शुद्र तथा पाप योनि-- चांडाल आदि जो कोई भी हों वे भी मेरी शरण में अनन्य भाव से आने के कारण परम गति को ही प्राप्त होते हैं फिर पून्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि अथवा अन्य भक्तजन के मुक्त होने में कहाँ संदेह है. तू इस क्षणभंगुर एवं सुख रहित संसार को प्राप्त हो मुझे ही भज क्यूंकि तुम्हें प्राप्त यह शरीर भी सुख रहित और क्षणभंगुर है. अतः मेरे भजन में लीं रह!
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
यहाँ हमसभी सामान्य जनों को भी यह सदा ध्यान रखना चाहिए कि चाहे हम इस संसार में अपने कर्मफल के अनुसार आये हों या परमात्मा ने हमें अपनी विशाल लीला में एक लघु आस्पद बना कर भेजा हो. हम सबों के पास भी एक ही सरल उपाय बच जाता है--अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ! इस प्रकार भगवान् ने अनन्य चिंतन मनन और ईश्वर भजन का महत्त्व बतलाते हुए इस अध्याय के अंतिम श्लोक में अर्जुन को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा है कि -- हे अर्जुन! तुम सब प्रकार से मेरे मनन चिंतन भजन में इस प्रकार लग जा-- तू मुझमें मन वाला हो जा अर्थात तुम्हारा मन मुझमें ही लगा रहे. तू मेरा ही एकनिष्ठ भक्त बन जा. केवल मेरा ही पूजन कर और केवल मुझ परमात्मा को ही प्रणाम कर. इस प्रकार हर तरह से आत्मा को मुझमें ही लगाते हुए मेरे परायण होकर अंत में मुझे ही निःसंदेह प्राप्त हो जाओगे--
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: ॥
यह सब भग्वद्बुद्धि वाले के लिए अत्यंत सरल है जिसे रामायण की यह पंक्ति भी स्पष्ट कर रही है--कर से कर्म करहु विधि नाना , मन राखहु जहाँ कृपा निधाना! इस प्रकार भग्वद्बुद्धि से निष्काम कर्म संपादन ही तो गीता का भी अभीष्ट है.
अब कल हम लोगों की यात्रा विभूतियोग नाम दशम अध्याय में प्रवेश करेगी.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्यापि राजविद्याराजगुह्ययोगोनाम नवमे अध्याये एव यात्रा भविष्यति!
पूर्व के श्लोकों में भगवान् ने समस्त विश्व को अपना स्वरुप बतलाया है एवं यज्ञादि द्वारा अन्यान्य देवताओं की पूजा को अपनी ही पूजा बतलाया है और यह भी स्पष्ट किया है कि उनके द्वारा ही उन देवताओं के माध्यम से फल की प्राप्ति तो हो जाती है पर वे स्वयं उन्हें प्राप्त नहीं होते फलतः उन्हें जन्म मृत्यु रूप आवागमन के चक्र में पड़ना पड़ता है किन्तु जो उनके प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं उन्हें वे सहज ही प्राप्त हो जाते हैं जैसा कि २३वें व २४वें श्लोक में उन्होंने स्पष्ट किया है--
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥
अर्थात, हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है. क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परंतु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसी से पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं.
किसी के मन में यह सहज प्रश्न उठ सकता है कि अन्य देवताओं के उपासक आवागमन के चक्र में पड़ जाते हैं और भगवान् के भक्त आवागमन से मुक्त हो कर परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं-- इसका क्या कारण है. इस जिज्ञासा की पूर्ती के लिए भगवान् २५वें श्लोक में स्पष्ट करते हुए कहते हैं--
यह उपास्य के स्वरुप और उपासक के भाव के अनुरूप उपासना के फल भेद के कारण ही होता है. यह स्वाभाविक भी है कि जिन जिन कामनाओं के वशीभूत उपासक जिन देव, पितर या भूतों की उपासना करते हैं वे अपनी उपासना के अनुरूप वह फल और उन उन देवता पितर आदि को प्राप्त तो हो जाते हैं पर उन्हें मैं नहीं प्राप्त होता पर जो सर्वतो भावेन मेरी उपासना करते हैं उनकी आवश्यकता के अनुरूप उन्हें सांसारिक सुख सुविधा भी प्राप्त हो जाती है और अंततः वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता.
यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
परमात्मा की भक्ति एवं भगवदप्राप्ति रूप महान फल होने पर भी उसके साधन में कोई कठिनाई नहीं होती बल्कि उस परमात्मा की प्राप्ति के लिए साधन बहुत ही सुगम और सरल है. भगवान् २६वें श्लोक इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम और भक्ति से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीती पूर्वक ग्रहण करता हूँ--
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
यहाँ यह स्पष्ट है कि विभिन्न देवताओं की पूजा के लिए विहित यज्ञ कामना की पूर्ती के लिए ही संकल्पित होते हैं जैसे पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ, युद्ध में विजय प्राप्ति हेतु यज्ञ, सुख ऐश्वर्य की प्राप्ति हेतु यज्ञ इत्यादि और इन कामनाओं की अधिष्ठात्री देवी देवताओं के लिए यज्ञ संपादन होता है. तदनुरूप भक्त फल प्राप्त करता और उसकी यात्रा उन उन देवताओं तक ही सीमित रह जाती है और आवागमन का चक्र पूर्ववत चलता रहता है. दूसरी ओर भगवान् के मुखारविंद से निकली हुई वाणी से ही स्पष्ट है कि अनन्य भाव से एकमात्र परमात्मा को भजता हुआ भक्त आवश्यकता के अनुसार सुखोपभोग प्राप्त करता हुआ परमात्मा को प्राप्त हो जाता है अतः आवागमन के चक्र से बच कर वह सर्वथा मुक्त ही हो जाता है. पहले के अध्यायों में स्पष्ट हो चूका है कि निष्काम कर्मयोग भी उसी परमात्मा की आराधना है.
अर्जुन सहित हम जैसे जिज्ञासुओं की जिज्ञासा पर भगवान कर्तव्य करने की अत्यंत सहजता का वर्णन २७वें श्लोक में इस प्रकार करते हैं--
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
अर्थात, हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर.
पहले के अध्यायों में कर्म करते हुए कर्म फल की आकांक्षा से अपने को मुक्त रखने का निर्देश ही तो बार बार दिया गया है, यही तो कर्म करते हुए कर्म के शुभाशुभ फलों से मुक्ति का सरल उपाय है. इसी लिए किसी के मन में यह सहज प्रश्न हो सकता है कि समस्त कर्मों को भगवद अर्पण करने का फल क्या हो सकता है. इसके उत्तर स्वरुप भगवान् कहते हैं कि जब भक्त अपने समस्त शुभ अशुभ फल वाले कर्मों को मुझ भगवान् के लिए अर्पित कर देता है एवं सन्यास योग से युक्त वह व्यक्ति निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त हो जाता है--
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबंधनैः ।
सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥
आगे के श्लोकों में भगवान् यह स्पष्ट कर देते हैं कि-- मैं सभी प्राणियों में सम भाव से स्थित हूँ, न मेरा कोई अप्रिय है और न ही कोई प्रिय है परन्तु जो भक्त मुझको प्रेम से भजता है वह मुझमें ही स्थित होता है और मैं भी उसमें प्रत्यक्ष रूप से प्रकट रहता हूँ. इससे आगे बढ़कर भी भगवान् आश्वस्त करते हुए कहते हैं-- यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त हो कर मुझको भजता है तो वह दुराचारी भी साधू ही कहलाने योग्य है क्यूँ कि अब वह यथार्थ निश्चय वाला बन गया है अर्थात उसने भली भांति यह निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन से बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है. अतः ऐसा व्यक्ति पापी होते हुए भी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शांति को प्राप्त होता है. अर्जुन से भगवान् कहते हैं -- तू निश्चय पूर्वक सत्य जान मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता.
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
इस प्रकार भगवान् ने सदाचारिता और दुराचारिता के कारण होने वाले विभेद को समाप्त करते हुए दोनों के लिए अनन्य भाव से प्रभु को भजने की प्रमुखता पर बल देते हुए आगे के श्लोकों में यह भी स्पष्ट कर देना चाहा है कि भगवान् के लिए कोई अच्छी या बुरी जाति / योनि नहीं है बल्कि सबों की अनन्य शरणागति ही उन्हें अभीष्ट है और वैसे भक्तों के लिए वे सहज सुलभ हैं. इसीलिए भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शुद्र तथा पाप योनि-- चांडाल आदि जो कोई भी हों वे भी मेरी शरण में अनन्य भाव से आने के कारण परम गति को ही प्राप्त होते हैं फिर पून्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि अथवा अन्य भक्तजन के मुक्त होने में कहाँ संदेह है. तू इस क्षणभंगुर एवं सुख रहित संसार को प्राप्त हो मुझे ही भज क्यूंकि तुम्हें प्राप्त यह शरीर भी सुख रहित और क्षणभंगुर है. अतः मेरे भजन में लीं रह!
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
यहाँ हमसभी सामान्य जनों को भी यह सदा ध्यान रखना चाहिए कि चाहे हम इस संसार में अपने कर्मफल के अनुसार आये हों या परमात्मा ने हमें अपनी विशाल लीला में एक लघु आस्पद बना कर भेजा हो. हम सबों के पास भी एक ही सरल उपाय बच जाता है--अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ! इस प्रकार भगवान् ने अनन्य चिंतन मनन और ईश्वर भजन का महत्त्व बतलाते हुए इस अध्याय के अंतिम श्लोक में अर्जुन को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा है कि -- हे अर्जुन! तुम सब प्रकार से मेरे मनन चिंतन भजन में इस प्रकार लग जा-- तू मुझमें मन वाला हो जा अर्थात तुम्हारा मन मुझमें ही लगा रहे. तू मेरा ही एकनिष्ठ भक्त बन जा. केवल मेरा ही पूजन कर और केवल मुझ परमात्मा को ही प्रणाम कर. इस प्रकार हर तरह से आत्मा को मुझमें ही लगाते हुए मेरे परायण होकर अंत में मुझे ही निःसंदेह प्राप्त हो जाओगे--
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: ॥
यह सब भग्वद्बुद्धि वाले के लिए अत्यंत सरल है जिसे रामायण की यह पंक्ति भी स्पष्ट कर रही है--कर से कर्म करहु विधि नाना , मन राखहु जहाँ कृपा निधाना! इस प्रकार भग्वद्बुद्धि से निष्काम कर्म संपादन ही तो गीता का भी अभीष्ट है.
अब कल हम लोगों की यात्रा विभूतियोग नाम दशम अध्याय में प्रवेश करेगी.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
उनकी तरह होने का मर्म
पेड़ों के पास जो भाषा होती हमारी तरह
जो उनके पास अभिव्यक्त होने की सहूलियतें होती
तो क्या वे भी उस भाषा में रोते-चिल्लाते
शिकायत करते ?!
या सुख दुःख के प्रति
उनकी तटस्थता यूँ ही बनी रहती ?!
जब बसंत की सुषमा विभोर करती तब भी
और जब पतझड़ सब छीन लेता तब भी
निर्विकार ही रहते
जो कहना हो खामोश ही कहते ?!
क्या होता
जो उनके पास
प्रतिकार करने का विकल्प होता ?!
जाने क्यूँ मुझे लगता है--
वे तब भी निर्विकार कट जाते
नियति के सकल प्रहारों को
मौन ही मौन आत्मसात कर मुस्कुराते
वे तब भी विलाप नहीं करते
कि
समाधिस्थ चेतनायें
विलग होती हैं
समस्त सांसारिकताओं से
उनकी तटस्थता
उनकी सहज प्रकृति है
सहज प्राप्त है उन्हें वह धैर्य असीम
सच है, कि
हम उन जैसे नहीं हैं
पर हमारी क्षमताओं की सीमा भी तो निस्सीम
चाह लें तो
पेड़ सा होने की ओर
प्रवृत्त हो सकते हैं
हम भी उनकी तरह
समस्त विडम्बनाओं को
सहज स्वीकारने वाला वृत्त हो सकते हैं !
कि भटकन राह ही है.
वहाँ कई छोर हैं
हृदयाकाश बादलों से पटा रहता है
यदा-कदा ही
साफ़ होता है आसमान
विचारों का पंछी
कितने ही छोर नापता है
भटकन उसकी आत्मा का राग है
और सबसे सुन्दर राग
कि भटकन ही
राह भी है.
आसमान में भी
ठोकरें होती ही होंगी
कि चोटें विचारों के हिस्से भी आती हैं
भटकन
उस दर्द से उपजी
कराह भी है.
ऐसा भी होता है--
कई छोरों वाला आसमान
किसी डाल पर सिमट आता है
विचारों के पंछी
वहाँ फिर चिर प्रतीक्षित आश्रय पाते हैं
उस सघनता में एक सुकून है
खूब यात्रा किये हुए पंछी
या कि विचार
फिर स्वयं सुलझ जाते हैं
तब जान पाते हैं हम--
भटकाव एक तरह से
अपनी, अपने होने की
थाह भी है.
कि भटकन राह ही है.
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ५२ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्यापि राजविद्याराजगुह्ययोगोनाम नवमे अध्याये एव यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण ! जैसा कि विदित है इस अध्याय में विज्ञान सहित ज्ञान का उपदेश पूर्ववत किया जाना है जो राज विद्या और राजगुह्य के नाम से अभिहित है. उसी के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए भगवान् चौथे और पाँचवें श्लोक में अपने प्रभाव एवं अव्यक्त स्वरुप का वर्णन करते हुए कहते हैं--
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः ॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
अर्थात, मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत् जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ. वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है.
भगवान् की यह वाणी समझने जैसी है. पूर्व श्लोक में भगवान् समस्त भूत प्राणियों को अपने अव्यक्त रूप से व्याप्त और उसी में स्थित बतलाया अतः इस विषय को और स्पष्ट करते हुए आगे के श्लोक में उसे दृष्टान्त दे कर समझाते हुए कहते हैं --
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
अर्थात, जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं.
यहाँ तक विज्ञान सहित ज्ञान का वर्णन करते हुए भगवान् ने प्रभाव सहित अपने निराकार स्वरुप का तत्व समझाने के लिए उसकी व्यापकता, असंगता और निर्विकारता का वर्णन किया. अब अपने भूत भावन स्वरुप का स्पष्टीकरण करते हुए सृष्टि रचना आदि कर्मों का तत्व सहज ढंग से समझाने के लिए अगले दो श्लोकों में कल्प के अंत में सभी भूत प्राणियों का प्रलय और कल्प के आदि में उनकी उत्पत्ति का प्रकार बतलाते हुए कहते हैं --
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
अर्थात, हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ. अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ.
यहाँ यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भूत समुदाय को भगवान् उनके कर्मों के अनुसार रचते हुए भी कर्मों के बंधन में क्यूँ नहीं पड़ते, इसी बात को समझाते हुए ९वें व १०वें श्लोक में इस प्रकार कहते हैं--
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
अर्थात, हे अर्जुन! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते. मुझ अधिष्ठाता के साथ से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है.
यहाँ हमने देखा भगवान् प्राणियों के कर्मानुसार उनकी सृष्टि करते हुए भी अनासक्त एवं उदासीन भाव के कारण कर्म बंधन में नहीं पड़ते. यह ठीक उसी तरह हम भी अगर दैनंदिन कर्म कर्तव्य समझ कर अनासक्त और उदासीन भाव से सम्पादित करते हैं तो उनसे उत्पन्न होने वाले कर्म फल रुपी बंधन से मुक्त ही हैं. अतः हमें निष्काम कर्म में प्रवृत्त होना चाहिए.
अब आगे भगवान् ने अपने सगुण साकार रूप का महत्त्व, उसकी प्राप्ति के प्रकार, तथा उसके गुण और प्रभाव का तत्व समझाने के लिए प्रथमतः आसुरी प्रकृति के मनुष्य कैसे होते हैं, यह बतलाया है--
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥
अर्थात, मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान् ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं. वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किए रहते हैं.
उपर्युक्त भाव आसुरी प्रकृति के लोगों के लिए प्रयुक्त है. आगे १३वें व १४वें श्लोक में सगुण रूप की भक्ति का तत्व समझने वाले दैवी प्रकृति के आश्रित उच्च श्रेणी के भक्तों का लक्षण यूँ बतलाया गया है--
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम् ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥
अर्थात, हे कुन्तीपुत्र! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते हैं. वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं.
इस प्रकार इस अध्याय का मुख्य विषय सगुण निर्गुण और विराट रूप की उपासनाओं की विधि का वर्णन करते हुए भगवान् समस्त विश्व को अपना ही स्वरुप बतलाते हैं अतः मनुष्यों के द्वारा अन्य इन्द्रादि देवताओं की उपासना प्रकारांतर से उनकी ही उपासना है पर सांसारिक इच्छा पूर्ती के लिए पृथक पृथक भाव से उपासना करने वाले देवताओं के माध्यम से फल की प्राप्ति तो कर लेते हैं पर उन्हें भगवद प्राप्ति नहीं होती. इसी अध्याय में आगे जाकर यह भी स्पष्ट किया गया है कि जो प्राणी भगवान् के प्रति अनन्य भाव रखता हुआ उनकी उपासना करता है, उनके योग और क्षेम का वहन वे स्वयं करते हैं--
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥२२॥
अर्थात, जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ.
ध्यातव्य है कि फलाकांक्षा से विभिन्न अन्य देवताओं की आराधना करने वाले फल की प्राप्ति तो कर लेते हैं किन्तु वे परमात्मा को प्राप्त नहीं हो पाते. जो निष्काम भाव से भक्तिपूर्वक परमेश्वर को भजते हैं उनके अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा की जिम्मेदारी स्वयं भगवान् वहन करते है, फलतः वे मुक्ति के अधिकारी स्वतः बन जाते हैं. यह भाव निष्काम कर्म योग संपादन से ईश्वर की प्राप्ति की सुगमता को ही स्पष्ट करता है.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः ॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
अर्थात, मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत् जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ. वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है.
भगवान् की यह वाणी समझने जैसी है. पूर्व श्लोक में भगवान् समस्त भूत प्राणियों को अपने अव्यक्त रूप से व्याप्त और उसी में स्थित बतलाया अतः इस विषय को और स्पष्ट करते हुए आगे के श्लोक में उसे दृष्टान्त दे कर समझाते हुए कहते हैं --
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
अर्थात, जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं.
यहाँ तक विज्ञान सहित ज्ञान का वर्णन करते हुए भगवान् ने प्रभाव सहित अपने निराकार स्वरुप का तत्व समझाने के लिए उसकी व्यापकता, असंगता और निर्विकारता का वर्णन किया. अब अपने भूत भावन स्वरुप का स्पष्टीकरण करते हुए सृष्टि रचना आदि कर्मों का तत्व सहज ढंग से समझाने के लिए अगले दो श्लोकों में कल्प के अंत में सभी भूत प्राणियों का प्रलय और कल्प के आदि में उनकी उत्पत्ति का प्रकार बतलाते हुए कहते हैं --
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
अर्थात, हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ. अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ.
यहाँ यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भूत समुदाय को भगवान् उनके कर्मों के अनुसार रचते हुए भी कर्मों के बंधन में क्यूँ नहीं पड़ते, इसी बात को समझाते हुए ९वें व १०वें श्लोक में इस प्रकार कहते हैं--
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
अर्थात, हे अर्जुन! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते. मुझ अधिष्ठाता के साथ से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है.
यहाँ हमने देखा भगवान् प्राणियों के कर्मानुसार उनकी सृष्टि करते हुए भी अनासक्त एवं उदासीन भाव के कारण कर्म बंधन में नहीं पड़ते. यह ठीक उसी तरह हम भी अगर दैनंदिन कर्म कर्तव्य समझ कर अनासक्त और उदासीन भाव से सम्पादित करते हैं तो उनसे उत्पन्न होने वाले कर्म फल रुपी बंधन से मुक्त ही हैं. अतः हमें निष्काम कर्म में प्रवृत्त होना चाहिए.
अब आगे भगवान् ने अपने सगुण साकार रूप का महत्त्व, उसकी प्राप्ति के प्रकार, तथा उसके गुण और प्रभाव का तत्व समझाने के लिए प्रथमतः आसुरी प्रकृति के मनुष्य कैसे होते हैं, यह बतलाया है--
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥
अर्थात, मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान् ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं. वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किए रहते हैं.
उपर्युक्त भाव आसुरी प्रकृति के लोगों के लिए प्रयुक्त है. आगे १३वें व १४वें श्लोक में सगुण रूप की भक्ति का तत्व समझने वाले दैवी प्रकृति के आश्रित उच्च श्रेणी के भक्तों का लक्षण यूँ बतलाया गया है--
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम् ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥
अर्थात, हे कुन्तीपुत्र! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते हैं. वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं.
इस प्रकार इस अध्याय का मुख्य विषय सगुण निर्गुण और विराट रूप की उपासनाओं की विधि का वर्णन करते हुए भगवान् समस्त विश्व को अपना ही स्वरुप बतलाते हैं अतः मनुष्यों के द्वारा अन्य इन्द्रादि देवताओं की उपासना प्रकारांतर से उनकी ही उपासना है पर सांसारिक इच्छा पूर्ती के लिए पृथक पृथक भाव से उपासना करने वाले देवताओं के माध्यम से फल की प्राप्ति तो कर लेते हैं पर उन्हें भगवद प्राप्ति नहीं होती. इसी अध्याय में आगे जाकर यह भी स्पष्ट किया गया है कि जो प्राणी भगवान् के प्रति अनन्य भाव रखता हुआ उनकी उपासना करता है, उनके योग और क्षेम का वहन वे स्वयं करते हैं--
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥२२॥
अर्थात, जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ५१ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्य राजविद्याराजगुह्ययोगोनाम नवमे अध्याये एव यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण !
हमारी यह सामान्य जिज्ञासा हो सकती है कि यह राजविद्या क्या है, तो हमें यह ध्यान में रखना है कि इस अध्याय में भगवान् कृष्ण ने जो उपदेश दिया है वह सब विद्यायों का और समस्त गुप्त रखने योग्य भावों का राजा कहलाता है इसीलिए इस अध्याय का नाम राजविद्याराजगुह्ययोग रखा गया है.
हम सब यह भी जानते हैं कि कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच विषादग्रस्त अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण उपदेश दे रहे हैं वही उपदेश प्रथम अध्याय से अट्ठारहवें अध्याय तक श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में संकलित हैं.
जैसा कि वर्णन है दोनों पक्षों के सेनाओं की संख्या अट्ठारह अक्षौहिनी थी एवं वहाँ उपस्थित जनसामान्य भी भारी संख्या में रहे होंगे फिर भी श्रोता एकमात्र अर्जुन ही था और वक्ता श्रीकृष्ण!
अर्जुन अपने स्तर पर भगवान् कृष्ण के सामने तर्क रखने में बेहद सजग एवं सफल था, शायद वह भी भगवान् कृष्ण के उपदेश की ओर हमारी आपकी तरह ध्यान देने को तैयार नहीं होता किन्तु दोनों सेनाओं के बीच अपने पराये के भेद से ग्रसित पार्थ पूर्ण विषाद की स्थिति में किंकर्तव्यविमूढ़ होकर अपने सखा श्रीकृष्ण से पूछ बैठता है कि "स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव"; और भी युद्ध न करने के बहुत सारे अकाट्य तर्क (अपनी दृष्टि में) प्रस्तुत भी करता है.
भगवान् की दृष्टि में कर्तव्य कर्म की अनिवार्यता अपने पराये के भेद से ऊपर एवं सर्वोपरि है. भगवान् की यह प्रतिज्ञा भी है "धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे". अतः अर्जुन को कहते हैं--अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे (अर्थात्, एक ओर तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है वहीँ दूसरी ओर पण्डितों के से वचनों को भी कहता है).
कुछ कुछ हममें से बहुतों की यही स्थिति है, अपने को हम ज्ञानी तो समझ बैठे हैं, मगर भ्रम की स्थिति में ही जी रहे हैं. अतः गीता ज्ञान दर्शन हमारे लिए निःसंदेह प्रयत्नपूर्वक धारण करने योग्य है. किसी श्रेष्ठ ज्ञान को धारण करने की प्रतिबद्धता न हो तो उस ओर रुचि भी संभव नहीं.
हमें यह भी ध्यान रखना है कि धृतराष्ट्र ने गीता के प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक में दिव्य दृष्टि प्राप्त संजय से प्रश्न किया है-
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥
१८वें अध्याय के अंतिम श्लोक में कुरुक्षेत्र की सम्पूर्ण गतिविधि का वर्णन करते हुए संजय ने स्पष्ट शब्दों में धृतराष्ट्र को निष्कर्ष देते हुए कहा --
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
अर्थात्,जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है, ऐसा मेरा दृढ मत है.
इन दो श्लोकों के बीच के भाव को समझते हुए हमें भी अपने अपने जीवन संग्राम में इस बात का ख्याल रखना है कि हममें से परमकल्याण चाहने वाले व्यक्ति को भगवदबुद्धि संपन्न हो अर्जुन की तरह निष्काम कर्म की ओर प्रवृत्त होने की निरंतर चेष्टा करनी चाहिए. यों हम सभी जानते हैं कि संसार में रुचि की भिन्नता के साथ ज्ञान की कमी बेसी का होना भी स्वाभाविक है और सभी मुक्तिलाभ के लिए प्रयत्नशील हो जाएँ यह भी संभव नहीं.
अब नवम अध्याय के विषयवस्तु पर हम गीता ज्ञान यात्रा के क्रम में दृष्टिपात करें. हमने देखा है सातवें अध्याय में विज्ञान सहित ज्ञान का विषद वर्णन किया गया है. उसी विषय को भली भांति स्पष्ट करने के उद्देश्य से भगवान् नवम अध्याय में पुनः विस्तार से उसी विषय को प्रतिपादित करते हैं. इससे स्पष्ट है कि सातवें अध्याय और नवें अध्याय के प्रतिपादन में साम्यता है इसीलिए इस अध्याय के प्रथम एवं द्वितीय श्लोक में विज्ञान सहित ज्ञान के वर्णन की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं --
वर्णन की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं --
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥
अर्थात्,दोषदृष्टिरहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा.यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है.
जानने की प्रबल इच्छा रखनेवाले के लिए यह विज्ञान सहित ज्ञान सुगम और जो इस ओर प्रवृत्त नहीं होते उनके लिए सहज ज्ञान की प्राप्ति भी दुष्कर है. अतः स्पष्ट हुआ कि किसी विषयवस्तु तो तत्वतः जानने और समझने के लिए श्रद्धा एवं प्रबल की इच्छा की नितांत आवश्यकता होती है, इसीलिए तीसरे श्लोक में इसी भाव को भगवान् ने स्पष्ट कर दिया है--
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
अर्थात्: हे परंतप! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते हैं.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
अर्थात्,जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है, ऐसा मेरा दृढ मत है.
इन दो श्लोकों के बीच के भाव को समझते हुए हमें भी अपने अपने जीवन संग्राम में इस बात का ख्याल रखना है कि हममें से परमकल्याण चाहने वाले व्यक्ति को भगवदबुद्धि संपन्न हो अर्जुन की तरह निष्काम कर्म की ओर प्रवृत्त होने की निरंतर चेष्टा करनी चाहिए. यों हम सभी जानते हैं कि संसार में रुचि की भिन्नता के साथ ज्ञान की कमी बेसी का होना भी स्वाभाविक है और सभी मुक्तिलाभ के लिए प्रयत्नशील हो जाएँ यह भी संभव नहीं.
अब नवम अध्याय के विषयवस्तु पर हम गीता ज्ञान यात्रा के क्रम में दृष्टिपात करें. हमने देखा है सातवें अध्याय में विज्ञान सहित ज्ञान का विषद वर्णन किया गया है. उसी विषय को भली भांति स्पष्ट करने के उद्देश्य से भगवान् नवम अध्याय में पुनः विस्तार से उसी विषय को प्रतिपादित करते हैं. इससे स्पष्ट है कि सातवें अध्याय और नवें अध्याय के प्रतिपादन में साम्यता है इसीलिए इस अध्याय के प्रथम एवं द्वितीय श्लोक में विज्ञान सहित ज्ञान के वर्णन की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं --
वर्णन की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं --
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥
अर्थात्,दोषदृष्टिरहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा.यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है.
जानने की प्रबल इच्छा रखनेवाले के लिए यह विज्ञान सहित ज्ञान सुगम और जो इस ओर प्रवृत्त नहीं होते उनके लिए सहज ज्ञान की प्राप्ति भी दुष्कर है. अतः स्पष्ट हुआ कि किसी विषयवस्तु तो तत्वतः जानने और समझने के लिए श्रद्धा एवं प्रबल की इच्छा की नितांत आवश्यकता होती है, इसीलिए तीसरे श्लोक में इसी भाव को भगवान् ने स्पष्ट कर दिया है--
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
अर्थात्: हे परंतप! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते हैं.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
मन कुरेदते शब्दों में जीवन का वितान
पीड़ा
कविता में पैठती है, तो-
पीड़ा,
पीड़ा मात्र न हो
पीड़ा से वृहद्
कुछ और हो जाती है
कविता भी
केवल कविता नहीं रह जाती
उसका वितान
रह-रह कर टूटता है
विवशता परिभाषित करते हुए
उसका भी दिल दुखता है
ऐसे में
तथ्य यह
अनुभूत सत्य सा चमकता है
कि
दुःख की तीव्रता का
समय के साथ
कम से कमतर होना भी
एक दुःख ही है!
जीवन कितना जटिल है
अपनी साँस का चलते रहना
किसी की
बंद हो चुकी साँसों के प्रति
अन्याय सा लगता है
ऐसे स्वतः संरचित पाप
घटित होते हुए
जीवन को स्थगित किये रहते हैं
राह में
असमय जुदा हो जाने वाले
जुदा होकर भी साथ रहा करते हैं !!
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ५० :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्यापि अक्षरब्रह्मयोगोनाम अष्टमे अध्याये एव यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण !
कल हमलोगों के इस अध्याय के १३वें श्लोक तक निराकार सगुन परमेश्वर के और निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक योगियों की अन्तकाल में प्राप्त होने वाली गति और फल को जाना पर हमें यह भी जानना चाहिए कि इस प्रकार का साधन उन व्यक्तियों के लिए ही सुगम हो सकता है जो पहले से ही योग का अभ्यास करते हुए अपने मन को अपने वश में कर लिए हों. हमारे आपके जैसे जनसाधारण अन्तकाल में इस प्रकार सगुण निराकार और निर्गुण निराकार की साधना में सक्षम नहीं हो सकते. अतः १४वें-१६वें श्लोक में हमारे आपके जैसे लोगों के लिए सुगमतापूर्वक परमेश्वर की प्राप्ति कैसे हो सकती है यह बतलाते हुए भगवान् ने कहा है--
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ॥
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
अर्थात्, हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ. परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते. ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं.
इस प्रकार ८वें और १०वें श्लोक में अधियज्ञ की उपासना का फल, परम ब्रह्म की प्राप्ति, १३वें श्लोक में परमअक्षर निर्गुण ब्रह्म की उपासना का फल, परम गति की प्राप्ति और १४वें श्लोक में सगुण साकार भगवान् श्री कृष्ण की उपासना का फल, भगवान् की प्राप्ति है-- यह हम लोगों ने जाना. इन तीनों में किसी को किसी प्रकार भ्रम न हो इसी उद्देश्य से तीनों भेदों की एकरूपता का प्रतिपादन करते हुए साधक के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति और पुनर्जन्म का अभाव दिखलाते हुए २१ श्लोक में भगवान् कहते हैं--
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
अर्थात्, जो अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है.
२२वें श्लोक में सनातन अव्यक्त पुरुष की और परम धाम की एकता बतलाते हुए यह भी स्पष्ट करते हैं कि वह सनातन अव्यक्त परमपुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य हैं--
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥
अर्थात्, हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है.
यहाँ परमात्मा की अनन्य भक्ति से अभिप्राय यह है कि "न अन्यः = अनन्यः " अर्थात्, परमात्मा के सिवा और कोई नहीं, यही परमात्मा के प्रति साधक का अनन्य भाव कहलाता है. प्रायः हम सबों की मानसिक स्थिति यह होती है कि हम परमात्मा को तब याद करते हैं जब सब तरह से हार गए होते हैं जबकि अहर्निश हमें उस परमात्मा को याद करते हुए निष्काम कर्म में रत रहना चाहिए क्यूंकि स्थूल रूप से जन साधारण के लिए मुक्ति का सरल मार्ग यही है. आगे भगवान् ने उत्तरायण के ६ महीने और दक्षिणायन के ६ महीने में क्रमशः ब्रह्मवेत्ता योगीजन की एवं सकाम कर्म करने वाले योगी की गति का वर्णन किया है जिसे शुक्ल और कृष्ण अर्थात् देवयान और पितृयान कहा है. देवयान से गया हुआ व्यक्ति वापस नहीं लौटता क्यूंकि उसे परम गति प्राप्त हो जाती है और दूसरा सकाम कर्म करने वाला ब्रह्मादी लोकों में सुखोपभोग करता हुआ वापस आ जाता है अर्थात् जन्म मृत्यु का चक्र चलता रहता है--
शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ॥२६॥
इस अध्याय के अंतिम श्लोकों में भगवान् दोनों मार्गों को जानने वाले या दोनों में से किसी एक मार्ग का अनुसरण करने वाले योगी की प्रशंसा करते हुए अर्जुन को योगी बनने के लिए प्रेरित करते हुए कहते हैं कि हे पार्थ! इस प्रकार दोनों मार्गों को तत्व से जानकर कोई योगी मोहित नहीं होता, इसलिए तुम सब काल में समबुद्धि रूप योग से युक्त होकर निरंतर मेरा ही स्मरण करते हुए मेरी प्राप्ति के लिए ही साधन करने वाला बन जाओ. तात्पर्य यह है कि परमात्मा और उनका लोक, दोनों एक ही हैं. इससे फलित यह हुआ कि सारे ऊहापोह से अपने मन मस्तिष्क को अलग करते हुए ईशस्मरणपूर्वक निष्काम कर्म सम्पादन ही परमात्म प्राप्ति का सहज मार्ग है--
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥
इस प्रकार २७वें श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को योगयुक्त होने को कहा और योगयुक्त पुरुष की महिमा बतलाते हुए २८ वें श्लोक में कहते हैं--
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
अर्थात्, समस्त दान, धर्म, तप, वेदाध्यन जो पूण्य प्राप्त होता है उन सबसे कहीं अधिक पूण्य की प्राप्ति निष्काम कर्म योगी को होती है और वह सनातन परम पद को प्राप्त हो जाता है.
अब कल से हमलोगों की यात्रा राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवं अध्याय में प्रवेश करेगी.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्यापि अक्षरब्रह्मयोगोनाम अष्टमे अध्याये एव यात्रा भविष्यति!
कल हमलोगों के इस अध्याय के १३वें श्लोक तक निराकार सगुन परमेश्वर के और निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक योगियों की अन्तकाल में प्राप्त होने वाली गति और फल को जाना पर हमें यह भी जानना चाहिए कि इस प्रकार का साधन उन व्यक्तियों के लिए ही सुगम हो सकता है जो पहले से ही योग का अभ्यास करते हुए अपने मन को अपने वश में कर लिए हों. हमारे आपके जैसे जनसाधारण अन्तकाल में इस प्रकार सगुण निराकार और निर्गुण निराकार की साधना में सक्षम नहीं हो सकते. अतः १४वें-१६वें श्लोक में हमारे आपके जैसे लोगों के लिए सुगमतापूर्वक परमेश्वर की प्राप्ति कैसे हो सकती है यह बतलाते हुए भगवान् ने कहा है--
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ॥
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
अर्थात्, हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ. परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते. ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं.
इस प्रकार ८वें और १०वें श्लोक में अधियज्ञ की उपासना का फल, परम ब्रह्म की प्राप्ति, १३वें श्लोक में परमअक्षर निर्गुण ब्रह्म की उपासना का फल, परम गति की प्राप्ति और १४वें श्लोक में सगुण साकार भगवान् श्री कृष्ण की उपासना का फल, भगवान् की प्राप्ति है-- यह हम लोगों ने जाना. इन तीनों में किसी को किसी प्रकार भ्रम न हो इसी उद्देश्य से तीनों भेदों की एकरूपता का प्रतिपादन करते हुए साधक के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति और पुनर्जन्म का अभाव दिखलाते हुए २१ श्लोक में भगवान् कहते हैं--
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
अर्थात्, जो अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है.
२२वें श्लोक में सनातन अव्यक्त पुरुष की और परम धाम की एकता बतलाते हुए यह भी स्पष्ट करते हैं कि वह सनातन अव्यक्त परमपुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य हैं--
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥
अर्थात्, हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है.
यहाँ परमात्मा की अनन्य भक्ति से अभिप्राय यह है कि "न अन्यः = अनन्यः " अर्थात्, परमात्मा के सिवा और कोई नहीं, यही परमात्मा के प्रति साधक का अनन्य भाव कहलाता है. प्रायः हम सबों की मानसिक स्थिति यह होती है कि हम परमात्मा को तब याद करते हैं जब सब तरह से हार गए होते हैं जबकि अहर्निश हमें उस परमात्मा को याद करते हुए निष्काम कर्म में रत रहना चाहिए क्यूंकि स्थूल रूप से जन साधारण के लिए मुक्ति का सरल मार्ग यही है. आगे भगवान् ने उत्तरायण के ६ महीने और दक्षिणायन के ६ महीने में क्रमशः ब्रह्मवेत्ता योगीजन की एवं सकाम कर्म करने वाले योगी की गति का वर्णन किया है जिसे शुक्ल और कृष्ण अर्थात् देवयान और पितृयान कहा है. देवयान से गया हुआ व्यक्ति वापस नहीं लौटता क्यूंकि उसे परम गति प्राप्त हो जाती है और दूसरा सकाम कर्म करने वाला ब्रह्मादी लोकों में सुखोपभोग करता हुआ वापस आ जाता है अर्थात् जन्म मृत्यु का चक्र चलता रहता है--
शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ॥२६॥
इस अध्याय के अंतिम श्लोकों में भगवान् दोनों मार्गों को जानने वाले या दोनों में से किसी एक मार्ग का अनुसरण करने वाले योगी की प्रशंसा करते हुए अर्जुन को योगी बनने के लिए प्रेरित करते हुए कहते हैं कि हे पार्थ! इस प्रकार दोनों मार्गों को तत्व से जानकर कोई योगी मोहित नहीं होता, इसलिए तुम सब काल में समबुद्धि रूप योग से युक्त होकर निरंतर मेरा ही स्मरण करते हुए मेरी प्राप्ति के लिए ही साधन करने वाला बन जाओ. तात्पर्य यह है कि परमात्मा और उनका लोक, दोनों एक ही हैं. इससे फलित यह हुआ कि सारे ऊहापोह से अपने मन मस्तिष्क को अलग करते हुए ईशस्मरणपूर्वक निष्काम कर्म सम्पादन ही परमात्म प्राप्ति का सहज मार्ग है--
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥
इस प्रकार २७वें श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को योगयुक्त होने को कहा और योगयुक्त पुरुष की महिमा बतलाते हुए २८ वें श्लोक में कहते हैं--
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
अर्थात्, समस्त दान, धर्म, तप, वेदाध्यन जो पूण्य प्राप्त होता है उन सबसे कहीं अधिक पूण्य की प्राप्ति निष्काम कर्म योगी को होती है और वह सनातन परम पद को प्राप्त हो जाता है.
अब कल से हमलोगों की यात्रा राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवं अध्याय में प्रवेश करेगी.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ४९:: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्यापि अक्षरब्रह्मयोगोनाम अष्टमे अध्याये एव यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण!
कल हमलोगों ने इस अध्याय के सातवें श्लोक में भगवान् कृष्ण के द्वारा अर्जुन को दिए गए आदेश को जाना था कि-- हे अर्जुन, तुम सब समय में निरंतर मेरा स्मरण करता हुआ युद्ध कर. इसका लाभ तुम्हें यह होगा कि निःसंदेह मरणोपरांत भी तुम मुझे ही प्राप्त होओगे. यहाँ हम सांसारिक प्राणियों के लिए संकेत यह है कि ईश स्मरण करते हुए निष्काम कर्मयोग में संलग्न रहते हुए अंततोगत्वा हम उस परमात्मा को ही प्राप्त होने, इसमें संशय नहीं. इस अध्याय में अर्जुन की जिज्ञासा के अनुरूप अक्षर ब्रह्म, ब्रह्म के सगुण एवं निर्गुण रूप या यूँ कहें दिव्य और अव्यक्त रूप का वर्णन भगवान् ने किया है. यह प्रसंग तकनिकी (तात्विक दृष्टियुक्त) होने के कारण जनसामान्य के लिए कठिन हो सकता है जिसे धैर्यपूर्वक समझने की आवश्यकता है. १२वें अध्याय के पाँचवे श्लोक में भगवान् ने यह स्पष्ट संकेत भी दिया है कि--
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
अर्थात्, उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है.
यही कारण है कि समय समय पर शास्त्रकारों ने उन कठिन विषयों को आसान करते हुए कम जानकार एवं कम परिश्रम करने वालों के लिए भी उसी मार्ग को सार संक्षेप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ताकि ज्ञानी से लेकर जनसामान्य के लिए परमात्मा सुलभ हो जायें. हम सभी जानते हैं पुराणों की संख्या अट्ठारह है और प्रत्येक में हजारों श्लोक हैं. सभी पुराणों को पढ़ पाना हर किसी के लिए संभव नहीं है. इसीलिए किसी विज्ञ पुरुष ने यह संकेत दिया कि--
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
अर्थात् : महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं-- परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरों को दुःख देना ही पाप है.
जनसामान्य भी यह जानता है कि पुण्य से स्वर्ग और पाप से नरक की प्राप्ति होती है अतः स्वर्गिक सुख की कामना करने वाला परोपकार की ओर ही प्रवृत्त होगा न की पाप की ओर.
गीता की भी मूल शिक्षा निष्काम कर्मयोग ही है. अपने और पराये के भेद से ऊपर उठकर कामनारहित होकर कर्म करना ही मुक्ति का मार्ग है और यह निश्चित रूप से इस लोक में भी सुख प्रदान करते हुए परलोक की प्राप्ति कराने में सहायक होता है. अतः मूलरूप से हमें इसपर ही दृढ होना है.
अब हम अष्टम अध्याय के आगे के प्रकरणों पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे. इस अध्याय के ५वें श्लोक में भगवान् का निरंतर चिंतन करते हुए मरने वाले मनुष्य की गति का वर्णन किया गया था. अब उसी विषय को विस्तार देते हुए अभ्यासयोग के द्वारा मन को वश में करते हुए सगुण, निराकार, दिव्य स्वरुप का चिंतन करने वाले योगी जनों की गति का वर्णन करते हुए ८वें-१०वें श्लोक में भगवान् ने कहा है--
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥
कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥
प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥
अर्थात्, हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है. जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है, वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है.
यहाँ इन तीन श्लोकों में हम सबों ने सगुण निराकार दिव्य अव्यक्त स्वरुप के चिंतन करने वाले योगियों की अन्तकालीन गति के सम्बन्ध में जाना, अब ११ वें से १३ वें श्लोक तक में परम अक्षर निर्गुण निराकार परम ब्रह्म की उपासना करने वाले योगियों की अन्तकालीन गति को हम जानेंगे--
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
अर्थात्, वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परम पद को अविनाश कहते हैं, आसक्ति रहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन, जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा. सब इंद्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्यापि अक्षरब्रह्मयोगोनाम अष्टमे अध्याये एव यात्रा भविष्यति!
कल हमलोगों ने इस अध्याय के सातवें श्लोक में भगवान् कृष्ण के द्वारा अर्जुन को दिए गए आदेश को जाना था कि-- हे अर्जुन, तुम सब समय में निरंतर मेरा स्मरण करता हुआ युद्ध कर. इसका लाभ तुम्हें यह होगा कि निःसंदेह मरणोपरांत भी तुम मुझे ही प्राप्त होओगे. यहाँ हम सांसारिक प्राणियों के लिए संकेत यह है कि ईश स्मरण करते हुए निष्काम कर्मयोग में संलग्न रहते हुए अंततोगत्वा हम उस परमात्मा को ही प्राप्त होने, इसमें संशय नहीं. इस अध्याय में अर्जुन की जिज्ञासा के अनुरूप अक्षर ब्रह्म, ब्रह्म के सगुण एवं निर्गुण रूप या यूँ कहें दिव्य और अव्यक्त रूप का वर्णन भगवान् ने किया है. यह प्रसंग तकनिकी (तात्विक दृष्टियुक्त) होने के कारण जनसामान्य के लिए कठिन हो सकता है जिसे धैर्यपूर्वक समझने की आवश्यकता है. १२वें अध्याय के पाँचवे श्लोक में भगवान् ने यह स्पष्ट संकेत भी दिया है कि--
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
अर्थात्, उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है.
यही कारण है कि समय समय पर शास्त्रकारों ने उन कठिन विषयों को आसान करते हुए कम जानकार एवं कम परिश्रम करने वालों के लिए भी उसी मार्ग को सार संक्षेप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ताकि ज्ञानी से लेकर जनसामान्य के लिए परमात्मा सुलभ हो जायें. हम सभी जानते हैं पुराणों की संख्या अट्ठारह है और प्रत्येक में हजारों श्लोक हैं. सभी पुराणों को पढ़ पाना हर किसी के लिए संभव नहीं है. इसीलिए किसी विज्ञ पुरुष ने यह संकेत दिया कि--
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
अर्थात् : महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं-- परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरों को दुःख देना ही पाप है.
जनसामान्य भी यह जानता है कि पुण्य से स्वर्ग और पाप से नरक की प्राप्ति होती है अतः स्वर्गिक सुख की कामना करने वाला परोपकार की ओर ही प्रवृत्त होगा न की पाप की ओर.
गीता की भी मूल शिक्षा निष्काम कर्मयोग ही है. अपने और पराये के भेद से ऊपर उठकर कामनारहित होकर कर्म करना ही मुक्ति का मार्ग है और यह निश्चित रूप से इस लोक में भी सुख प्रदान करते हुए परलोक की प्राप्ति कराने में सहायक होता है. अतः मूलरूप से हमें इसपर ही दृढ होना है.
अब हम अष्टम अध्याय के आगे के प्रकरणों पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे. इस अध्याय के ५वें श्लोक में भगवान् का निरंतर चिंतन करते हुए मरने वाले मनुष्य की गति का वर्णन किया गया था. अब उसी विषय को विस्तार देते हुए अभ्यासयोग के द्वारा मन को वश में करते हुए सगुण, निराकार, दिव्य स्वरुप का चिंतन करने वाले योगी जनों की गति का वर्णन करते हुए ८वें-१०वें श्लोक में भगवान् ने कहा है--
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥
कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥
प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥
अर्थात्, हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है. जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है, वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है.
यहाँ इन तीन श्लोकों में हम सबों ने सगुण निराकार दिव्य अव्यक्त स्वरुप के चिंतन करने वाले योगियों की अन्तकालीन गति के सम्बन्ध में जाना, अब ११ वें से १३ वें श्लोक तक में परम अक्षर निर्गुण निराकार परम ब्रह्म की उपासना करने वाले योगियों की अन्तकालीन गति को हम जानेंगे--
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
अर्थात्, वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परम पद को अविनाश कहते हैं, आसक्ति रहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन, जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा. सब इंद्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
कि पहुंचना कहीं नहीं है
सूखे पत्ते
बर्फ़ के फ़ाहों से
ढँक चुके हैं
मन की ज़मीं पर
जमी परत
कितना कुछ सहेज रही है
क्या कुछ छुपा रही है
ये बादलों में उभरती
आकस्मिक आकृतियों सा
रहस्यमय संसार है
भावों की
विरल व्याख्या का
अदृष्ट आयतन है
जितनी कह दीं जाती हैं
उससे कहीं अधिक
कही जानी शेष बच जाती हैं
पीड़ा का अध्याय वृहदाकार है
इस अध्याय के विश्राम तक की यात्रा
दुष्कर है, तो है
चलते चलना ही
एकनिष्ठ आधार है
कि
पहुंचना कहीं नहीं है
रास्तों के डाढ़-पात की सन्निधि ही
जैसे सार है
यूँ लुके-छिपे पात
रह जाने हैं
मौसम के अनछुए विम्बों में व्यक्त
हृदय के कई घाव
अजाने हैं !
कागज़ का मन भींग रहा है
लिखते रहने की
सम्भावना का
बचे रहना
साँसों के बचे रहने की गवाही है
दुःख का
अनुभूति में
बने रहना
जीवित होने की पुष्टि है
दर्द की
सम्यक उपस्थिति
गति का ही स्पष्ट मानक है
पत्थर हो चुके आँसू
आँखों का खारापन जीते हैं
शब्द
खो से गए हैं
टो-टो कर
उन्हें समेट रहे हैं
और कागज़ का मन भींग रहा है
शायद
दर्द को मिटने की मनाही है
ये गतियाँ ही वस्तुतः
जीवन के होने की गवाही है
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ४८ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्य अक्षरब्रह्मयोगोनाम अष्टमे अध्याये एव यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण!
इस अध्याय का मुख्य विषय अक्षर और ब्रह्म, क्रमशः भगवान् के सगुण और निर्गुण स्वरुप के वाचक तथा भगवान् के "ॐ" कार रूप अक्षर ब्रह्म का वर्णन ही है. इसी लिए तो इस अध्याय का नाम अक्षर ब्रह्म योग रखा गया है. भगवान् को जानने के रहस्य को भली भांति न समझ पाने के कारण अर्जुन इन्हीं विषयों की जानकारी के लिए भगवान् से प्रश्न करता हुआ कहता है--
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
अर्थात्, अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं. हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जाने में जाते हैं.
अर्जुन के इन्हीं सात प्रश्नों में से भगवान् पहले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म विषयक तीन प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार देते हैं--
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
अर्थात्, श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है.
भागवान चौथे श्लोक में अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ विषयक अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हैं--
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥
अर्थात्, उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, ब्रह्मा इत्यादि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ.
अर्जुन के सातवें प्रश्न "प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः" (अर्थात् अन्तकाल में नियतचित्त व्यक्ति के द्वारा आप किस प्रकार जाने जाते हैं) का उत्तर देते हुए भगवान् ने कहा है--
अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
अर्थात्, जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है. मनुष्य अंतकाल में जिस-जिसभाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उस को ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है.
तात्पर्य यह है कि अन्तकाल में मनुष्य जिसका भी स्मरण करते हुए शरीर त्याग करता (मरता) है, उसी स्वरुप को प्राप्त हो जाता है. ध्यातव्य है कि अन्तकाल में प्रायः वही भाव ध्यान में आते हैं जिसका जीवन में अधिक स्मरण किया गया होता है. अतः भगवतप्राप्ति की इच्छा रखने वाले हर मनुष्य को प्रारंभ से ही भगवान् के स्मरण का निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए. महाभारत के युद्ध के क्रम में दोनों सेनाओं के बीच रथ पर बैठे हुए अर्जुन के सामने युद्ध के सिवा कोई विकल्प नहीं था. ठीक उसी तरह जीवन संग्राम में भाग लेने वाले हम लोगों के लिए भी संघर्षरत होने के सिवा और कोई विकल्प शेष नहीं ही है. युद्ध में यह अनिश्चित रहता है कि कौन मारा जायेगा और कौन सुरक्षित बचेगा. ठीक उसी तरह हम मनुष्यों की भी मौत कब आ जाएगी यह सर्वथा अनिश्चित ही है. इसी लिए भगवान् अर्जुन को कहते हैं--
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥
अर्थात्, तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर. इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा.
हम सांसारिक प्राणियों के लिए भी यहाँ सन्देश यही है कि अहर्निश ईश्वर का स्मरण करते हुए अपने दैनंदिन कार्यों एवं निर्धारित कर्मों के प्रति निष्काम भाव से रत रहें. इस तरह भगवतप्राप्ति सहजता पूर्वक निष्काम कर्म संपादन मात्र से ही संभव हो जाएगी.
क्रमशः
--डॉ सत्यनारायण पाण्डेय
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
अर्थात्, अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं. हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जाने में जाते हैं.
अर्जुन के इन्हीं सात प्रश्नों में से भगवान् पहले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म विषयक तीन प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार देते हैं--
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
अर्थात्, श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है.
भागवान चौथे श्लोक में अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ विषयक अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हैं--
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥
अर्थात्, उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, ब्रह्मा इत्यादि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ.
अर्जुन के सातवें प्रश्न "प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः" (अर्थात् अन्तकाल में नियतचित्त व्यक्ति के द्वारा आप किस प्रकार जाने जाते हैं) का उत्तर देते हुए भगवान् ने कहा है--
अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
अर्थात्, जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है. मनुष्य अंतकाल में जिस-जिसभाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उस को ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है.
तात्पर्य यह है कि अन्तकाल में मनुष्य जिसका भी स्मरण करते हुए शरीर त्याग करता (मरता) है, उसी स्वरुप को प्राप्त हो जाता है. ध्यातव्य है कि अन्तकाल में प्रायः वही भाव ध्यान में आते हैं जिसका जीवन में अधिक स्मरण किया गया होता है. अतः भगवतप्राप्ति की इच्छा रखने वाले हर मनुष्य को प्रारंभ से ही भगवान् के स्मरण का निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए. महाभारत के युद्ध के क्रम में दोनों सेनाओं के बीच रथ पर बैठे हुए अर्जुन के सामने युद्ध के सिवा कोई विकल्प नहीं था. ठीक उसी तरह जीवन संग्राम में भाग लेने वाले हम लोगों के लिए भी संघर्षरत होने के सिवा और कोई विकल्प शेष नहीं ही है. युद्ध में यह अनिश्चित रहता है कि कौन मारा जायेगा और कौन सुरक्षित बचेगा. ठीक उसी तरह हम मनुष्यों की भी मौत कब आ जाएगी यह सर्वथा अनिश्चित ही है. इसी लिए भगवान् अर्जुन को कहते हैं--
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥
अर्थात्, तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर. इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा.
हम सांसारिक प्राणियों के लिए भी यहाँ सन्देश यही है कि अहर्निश ईश्वर का स्मरण करते हुए अपने दैनंदिन कार्यों एवं निर्धारित कर्मों के प्रति निष्काम भाव से रत रहें. इस तरह भगवतप्राप्ति सहजता पूर्वक निष्काम कर्म संपादन मात्र से ही संभव हो जाएगी.
क्रमशः
--डॉ सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातम्! जय भास्करः! ४७ :: सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्य ज्ञानविज्ञानयोगोनाम सप्तमअध्याये एव यात्रा भविष्यति!
प्रिय बंधुगण!
आरम्भ में ही इस अध्याय के विवेच्य विषय पर संकेत देते हुए स्पष्ट कर दिया गया था कि यह अध्याय ज्ञान विज्ञान के विषय की व्याख्या के लिए कथित है. यहाँ मैं अपनी ओर से एक दृष्टान्त रखना चाहता हूँ-- १. मान लिया जाए हम सभी हृदय की संरचना को हम न जानते हुआ भी अहर्निश श्वास की प्रक्रिया से अहर्निश प्राणवायु ग्रहण करते हुए जीवंत रहते हैं.
२. ठीक इसी तरह कैमरे के मैकेनिज्म को न समझने वाला व्यक्ति भी प्रक्रिया के अनुरूप फोटोग्राफी कर लेता है.
ऐसे ही सृष्टि, प्रलय, कर्म बंधन, कर्म से मुक्ति, आत्मा परमात्मा, बंधन मोक्ष आदि विविध विषयों को भली प्रकार न समझता हुआ व्यक्ति भी अब तक के बताये गए निष्कामकर्मयोग सिद्धांत का भ्रमरहित होकर अनुसरण करता जाए तो भी उसे परम तत्व यानि परमात्मा में लीन होने की सहजता स्वतः प्राप्त हो जाती है.
फिर भी जिज्ञासा के अनुरूप चाहे हृदय के बारे में जानना हो, कैमरे के विषय में जानना हो अथवा आत्मा परमात्मा, कर्म, अकर्म, विकर्म-- जिस किसी विषय की जानकारी की इच्छा हो जाए तो तो ज्ञान और विज्ञान के माध्यम से यह सहज ही संभव है. इसी क्रम में भगवान् ने सातवें अध्याय में ज्ञान और विज्ञान की चर्चा के संकल्प के साथ यह भी स्पष्ट कर दिया है-- हे अर्जुन! इस विज्ञान सहित ज्ञान को जान लेने के बाद तुम्हारे लिए कोई अन्य ज्ञातव्य वस्तु शेष रह ही नहीं जाएगी.
कल हमलोगों ने इसी अध्याय के १९वें श्लोक में यह जाना कि भगवान् वासुदेव ही सबकुछ हैं. इनके सिवा इस अनंत कोटि ब्रह्माण्ड में कुछ भी नहीं है, ऐसी मति वाले व्यक्ति संसार में दुर्लभ हैं. इसी अध्याय के तीसरे श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को यह स्पष्ट कर दिया था कि हजारों हज़ार लोगों में कोई कोई सिद्धि लाभ के लिए प्रयत्नशील होता है, और प्रयत्न करने वालों में भी कोई कोई मुझे तात्विक दृष्टि से जान पाता है--
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ॥
आज के सांसारिक मनुष्य गीता ज्ञान के प्रति बहुतायत में सजग नहीं हैं तो यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है. प्रयत्न करने वालों में भी कोई कोई ही परमेश्वर को तात्विक दृष्टि से जान पाते हैं, इस कथन से भी हम सबों को निराश नहीं होना चाहिए क्यूँकि इस गीता के अंतर्गत ही भगवान् की यह प्रतिज्ञा भी है--
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १०/१०॥
अर्थात्, निरंतर मेरे ध्यान में लगे हुए, मुझे प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं.
रामायण में भी इस तरह का उल्लेख है--
सोई जानही जेहि देई जनाई।
जानत तुम्हहि-तुम्हहि होइ जाई॥
इससे यह स्पष्ट है कि हमें ईश्वरबुद्धियुक्त हो कर परमात्मा का स्मरण करते हुए दैनंदिन निष्काम कर्मयोग का प्रतिपालन करते रहना चाहिए. परमात्मा तो स्वयं वैसी बुद्धि से जोड़ देने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं जिससे उन्हें सहज प्राप्त किया जा सकता है.
परमात्मा भी एक कुशल प्रशिक्षक की तरह अपने प्रशिक्षुओं को भले बुरे का, खाद्य और अखाद्य का, संग्रह और त्याग का, कर्म व् अकर्म का सुनियोजित ज्ञान उपलब्ध करा देते हैं. अब प्रशिक्षु के विवेक पर निर्भर है कि वह किसे अपनाता है.
यहाँ भगवान् उसी बात को २०वें से २४वें श्लोक तक कामना के वशीभूत अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म और उपासना के प्रति आकृष्ट होने वाले लोगों की चर्चा करते हुए कहते हैं--
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
अर्थात, भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं. जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ. वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है. परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं. बुद्धिहीन पुरुष मेरे अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्मे व्यक्ति की तरह मानते हैं, जबकि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ.
ऊपर के अध्यायों में भी यह बात स्पष्ट कर दि गयी है कि हमें किसी भी परिस्थिति में निष्काम कर्म के प्रति सजग रहना ही है न कि कामनाओं के वशीभूत हो अधोगति को प्राप्त होना है. जहाँ हम कामनाओं के वशीभूत होते हैं, हमारी कामनाएं तो पूर्ण होती हैं लेकिन परमात्म तत्व की प्राप्ति नहीं होती. यहाँ किसी के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि जब भगवान् दया के सागर कहलाते हैं और जिस किसी प्रकार से भी "भाव कुभाव अनख आलसहूँ, नाम जपत मंगल दिशि दसहूँ" उन्हें
भजा जाए, वे अपने स्वरुप की प्राप्ति अर्थात् अपनी कृपा उन सब पर करते हैं फिर भी लोग अहैतुकी कृपा करने वाले उस परमात्मा का भजन क्यूँ नहीं करते !! इसका उत्तर २४वें श्लोक में स्पष्ट दिया गया है. और २७वें व २८वें श्लोक भगवान् कहते हैं-- हे भरतवंशी अर्जुन! इस संसार में जो प्राणी इर्ष्या और द्वेष से उत्पन्न सुख दुःख आदि द्वन्द मोह के कारण अत्यंत अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं वे सहज ढंग से मुझे समझने में समर्थ नहीं हो पाते. अतः ऐसे भ्रम की निवृत्ति के लिए निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों के पाप नष्ट हो जाते हैं वैसे ही लोग राग द्वेष से उत्पन्न द्वन्द रुपी मोह से मुक्त होकर दृढ निश्चय के साथ किसी भी परिस्थिति में मुझे ही भजते हुए मुझे ही प्राप्त होते हैं.
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
यहाँ भी निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों के आचरण की प्रतिबद्धता ही दोहराई गयी है. इससे गीता के प्रमुख रूप से कर्मयोग शास्त्र कहा जाना ही सार्थक है.
अंतिम २९ एवं ३०वें श्लोक में भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव के सहित तथा अधियज्ञ के सहित मुझे अन्तकाल में भी जानते हैं वे युक्तियुक्त वाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात मुझे प्राप्त हो जाते हैं. जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को एवं सम्पूर्ण कर्म को जानने में समर्थ हो जाते हैं--
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥
यहाँ इन दो श्लोकों में अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ, अध्यात्म और कर्म व्याख्येय पद हैं जिसकी व्याख्या अक्षर ब्रह्म योगनाम आठवें अध्याय के आरम्भ में ही दी गयी है, जिसे हम क्रमशः अगले अध्याय में जानेंगे.
यहाँ ज्ञान विज्ञान योग सातवें अध्याय की यात्रा पूर्ण हुई.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयसज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति. अद्य ज्ञानविज्ञानयोगोनाम सप्तमअध्याये एव यात्रा भविष्यति!
आरम्भ में ही इस अध्याय के विवेच्य विषय पर संकेत देते हुए स्पष्ट कर दिया गया था कि यह अध्याय ज्ञान विज्ञान के विषय की व्याख्या के लिए कथित है. यहाँ मैं अपनी ओर से एक दृष्टान्त रखना चाहता हूँ-- १. मान लिया जाए हम सभी हृदय की संरचना को हम न जानते हुआ भी अहर्निश श्वास की प्रक्रिया से अहर्निश प्राणवायु ग्रहण करते हुए जीवंत रहते हैं.
२. ठीक इसी तरह कैमरे के मैकेनिज्म को न समझने वाला व्यक्ति भी प्रक्रिया के अनुरूप फोटोग्राफी कर लेता है.
ऐसे ही सृष्टि, प्रलय, कर्म बंधन, कर्म से मुक्ति, आत्मा परमात्मा, बंधन मोक्ष आदि विविध विषयों को भली प्रकार न समझता हुआ व्यक्ति भी अब तक के बताये गए निष्कामकर्मयोग सिद्धांत का भ्रमरहित होकर अनुसरण करता जाए तो भी उसे परम तत्व यानि परमात्मा में लीन होने की सहजता स्वतः प्राप्त हो जाती है.
फिर भी जिज्ञासा के अनुरूप चाहे हृदय के बारे में जानना हो, कैमरे के विषय में जानना हो अथवा आत्मा परमात्मा, कर्म, अकर्म, विकर्म-- जिस किसी विषय की जानकारी की इच्छा हो जाए तो तो ज्ञान और विज्ञान के माध्यम से यह सहज ही संभव है. इसी क्रम में भगवान् ने सातवें अध्याय में ज्ञान और विज्ञान की चर्चा के संकल्प के साथ यह भी स्पष्ट कर दिया है-- हे अर्जुन! इस विज्ञान सहित ज्ञान को जान लेने के बाद तुम्हारे लिए कोई अन्य ज्ञातव्य वस्तु शेष रह ही नहीं जाएगी.
कल हमलोगों ने इसी अध्याय के १९वें श्लोक में यह जाना कि भगवान् वासुदेव ही सबकुछ हैं. इनके सिवा इस अनंत कोटि ब्रह्माण्ड में कुछ भी नहीं है, ऐसी मति वाले व्यक्ति संसार में दुर्लभ हैं. इसी अध्याय के तीसरे श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को यह स्पष्ट कर दिया था कि हजारों हज़ार लोगों में कोई कोई सिद्धि लाभ के लिए प्रयत्नशील होता है, और प्रयत्न करने वालों में भी कोई कोई मुझे तात्विक दृष्टि से जान पाता है--
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ॥
आज के सांसारिक मनुष्य गीता ज्ञान के प्रति बहुतायत में सजग नहीं हैं तो यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है. प्रयत्न करने वालों में भी कोई कोई ही परमेश्वर को तात्विक दृष्टि से जान पाते हैं, इस कथन से भी हम सबों को निराश नहीं होना चाहिए क्यूँकि इस गीता के अंतर्गत ही भगवान् की यह प्रतिज्ञा भी है--
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १०/१०॥
अर्थात्, निरंतर मेरे ध्यान में लगे हुए, मुझे प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं.
रामायण में भी इस तरह का उल्लेख है--
सोई जानही जेहि देई जनाई।
जानत तुम्हहि-तुम्हहि होइ जाई॥
इससे यह स्पष्ट है कि हमें ईश्वरबुद्धियुक्त हो कर परमात्मा का स्मरण करते हुए दैनंदिन निष्काम कर्मयोग का प्रतिपालन करते रहना चाहिए. परमात्मा तो स्वयं वैसी बुद्धि से जोड़ देने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं जिससे उन्हें सहज प्राप्त किया जा सकता है.
परमात्मा भी एक कुशल प्रशिक्षक की तरह अपने प्रशिक्षुओं को भले बुरे का, खाद्य और अखाद्य का, संग्रह और त्याग का, कर्म व् अकर्म का सुनियोजित ज्ञान उपलब्ध करा देते हैं. अब प्रशिक्षु के विवेक पर निर्भर है कि वह किसे अपनाता है.
यहाँ भगवान् उसी बात को २०वें से २४वें श्लोक तक कामना के वशीभूत अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म और उपासना के प्रति आकृष्ट होने वाले लोगों की चर्चा करते हुए कहते हैं--
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
अर्थात, भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं. जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ. वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है. परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं. बुद्धिहीन पुरुष मेरे अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्मे व्यक्ति की तरह मानते हैं, जबकि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ.
ऊपर के अध्यायों में भी यह बात स्पष्ट कर दि गयी है कि हमें किसी भी परिस्थिति में निष्काम कर्म के प्रति सजग रहना ही है न कि कामनाओं के वशीभूत हो अधोगति को प्राप्त होना है. जहाँ हम कामनाओं के वशीभूत होते हैं, हमारी कामनाएं तो पूर्ण होती हैं लेकिन परमात्म तत्व की प्राप्ति नहीं होती. यहाँ किसी के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि जब भगवान् दया के सागर कहलाते हैं और जिस किसी प्रकार से भी "भाव कुभाव अनख आलसहूँ, नाम जपत मंगल दिशि दसहूँ" उन्हें
भजा जाए, वे अपने स्वरुप की प्राप्ति अर्थात् अपनी कृपा उन सब पर करते हैं फिर भी लोग अहैतुकी कृपा करने वाले उस परमात्मा का भजन क्यूँ नहीं करते !! इसका उत्तर २४वें श्लोक में स्पष्ट दिया गया है. और २७वें व २८वें श्लोक भगवान् कहते हैं-- हे भरतवंशी अर्जुन! इस संसार में जो प्राणी इर्ष्या और द्वेष से उत्पन्न सुख दुःख आदि द्वन्द मोह के कारण अत्यंत अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं वे सहज ढंग से मुझे समझने में समर्थ नहीं हो पाते. अतः ऐसे भ्रम की निवृत्ति के लिए निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों के पाप नष्ट हो जाते हैं वैसे ही लोग राग द्वेष से उत्पन्न द्वन्द रुपी मोह से मुक्त होकर दृढ निश्चय के साथ किसी भी परिस्थिति में मुझे ही भजते हुए मुझे ही प्राप्त होते हैं.
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
यहाँ भी निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों के आचरण की प्रतिबद्धता ही दोहराई गयी है. इससे गीता के प्रमुख रूप से कर्मयोग शास्त्र कहा जाना ही सार्थक है.
अंतिम २९ एवं ३०वें श्लोक में भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव के सहित तथा अधियज्ञ के सहित मुझे अन्तकाल में भी जानते हैं वे युक्तियुक्त वाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात मुझे प्राप्त हो जाते हैं. जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को एवं सम्पूर्ण कर्म को जानने में समर्थ हो जाते हैं--
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥
यहाँ इन दो श्लोकों में अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ, अध्यात्म और कर्म व्याख्येय पद हैं जिसकी व्याख्या अक्षर ब्रह्म योगनाम आठवें अध्याय के आरम्भ में ही दी गयी है, जिसे हम क्रमशः अगले अध्याय में जानेंगे.
यहाँ ज्ञान विज्ञान योग सातवें अध्याय की यात्रा पूर्ण हुई.
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
क्रमशः
--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय















