कहते हैं-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी!
पर कुछ बातें
अटल सत्य सी
सदा उपस्थित प्रकाशवान
बहती धारा न रुकी कभी
पेड़ सदा से ही निस्वार्थ दानी!
आशीर्वाद स्वरूप
मिली जो धरा को
असीम धरोहरें
रहे उनपर श्रद्धा
हों हम भक्तहृदय आत्मज्ञानी!
पर ह्रास की
ये कैसी परिपाटी
मैला होने दिया
हा! हमने
पापनाशिनी माँ गंगे का पानी!
शाश्वत कुछ तो हो
जो दे संबल
ऐसे कैसे
चलती जाए
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!
भले ही-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी!
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
22 दिसंबर 2010
27 टिप्पणियाँ:
bahut achi rachna
"....एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी!"
बिलकुल सही कहा आपने.
सादर
शाश्वत कुछ तो हो
जो दे संबल
ऐसे कैसे
चलती जाए
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति -
अपने मन का विश्वास
ही ये जीवन को जीने योग्य बनाता है -
शुभकामनाएं -
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (23/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com
... bahut khoob !!!
पर ह्रास की
ये कैसी परिपाटी
मैला होने दिया
हा! हमने
पापनाशिनी माँ गंगे का पानी! .....आज के इन्सान को अच्छी शिख देती पक्तियां पर आत्मज्ञानी...का यहाँ लग भाग तिरस्कार होने से ये सब कुछ हो रहा है ...हमें सोचने पर मजबूर करती आप की पक्तियां ...आशीर्वाद स्वरूप जो कुछ मिला है हम को उसका भी हम ने तिरस्कार ही क्या है ....सही में मानव को जो चीजें आसानी से मिल जाती है उसके मायने हम नहीं समझ पा रहें है ....धन्यवाद आप का .एक अच्छे स्न्देश्नात्मक कविता का !!!!!!
पर ह्रास की
ये कैसी परिपाटी
मैला होने दिया
हा! हमने
पापनाशिनी माँ गंगे का पानी!
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
sundr kavita
शिक्षा और सन्देश से भरी सुन्दर रचना!
भले ही-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी
शाश्वत सत्य को कहती सुन्दर रचना ..
शाश्वत कुछ तो हो
जो दे संबल
ऐसे कैसे
चलती जाए
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!
sach kaha
बड़ी सुन्दर कविताएँ है आपकी..
पहली बार देखा आपका ब्लॉग..
मेरी शुभकामनाएं.,.
bahut achchi lagi.
शाश्वत कुछ तो हो
जो दे संबल
ऐसे कैसे
चलती जाए
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!
इस ब्रह्मन्ड मे कुछ भी शाश्वत नही। बहुत ही सुन्दर रचना है। बधाई।
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!
उत्तम प्रस्तुति. आभार...
SACH KI ABHIVYAKTI KALPNA KE AANGAN ME...
KAM SE KAM GANGA AUR VAN-UPVAN TO SHASHVAT HAIN HI...
PAVITR BHAVON KI SUNDAR RACHNA.
Anupama Ji,
Har cheez bisar jati hai, har mahatvpurn kaam hum karna bhool jate hai .....Sunder Rachna ke liye badhaai
भले ही-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी
Surinder Ratti
Mumbai
वाह एक परिपूर्ण रचना ... सुन्दर भाषा, सुन्दर वक्तव्य और सुन्दर लहजा ...
शाश्वत कुछ तो हो
जो दे संबल
ऐसे कैसे
चलती जाए
जिंदगी इतनी भी नहीं बेमानी!
...bahut sundar bhavpurn rachna...
बहुत सुंदर।
---------
मोबाइल चार्ज करने की लाजवाब ट्रिक्स।
satye hamesha sunder hota he...isliye ye kavita bhi sunder hai.
परिवर्तन ही शाश्वत है जीवन में और शायद वही सार्थक भी.
कुछ है जो कभी नहीं मिटता, और बहुत कुछ है जो समय के साथ विनष्ट हो ही जाता है, किन्तु आज धरती को मानव के लोभ और अज्ञान ने विनाश के कगार पर ला दिया है, आपकी रचना एक संदेश देती है सजग होने का !
बहुत सुंदर
भले ही-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी!
सारगर्भित पोस्ट, बहुत बहुत बधाई
किसी ने पूछा क्या बढ़ते हुए भ्रस्टाचार पर नियंत्रण लाया जा सकता है ?
हाँ ! क्यों नहीं !कोई भी आदमी भ्रस्टाचारी क्यों बनता है? पहले इसके कारण को जानना पड़ेगा.
सुख वैभव की परम इच्छा ही आदमी को कपट भ्रस्टाचार की ओर ले जाने का कारण है.
इसमें भी एक अच्छी बात है.
अमुक व्यक्ति को सुख पाने की इच्छा है ?
सुख पाने कि इच्छा करना गलत नहीं.
पर गलत यहाँ हो रहा है कि सुख क्या है उसकी अनुभूति क्या है वास्तव में वो व्यक्ति जान नहीं पाया.
सुख की वास्विक अनुभूति उसे करा देने से, उस व्यक्ति के जीवन में, उसी तरह परिवर्तन आ सकता है. जैसे अंगुलिमाल और बाल्मीकि के जीवन में आया था.
आज भी ठाकुर जी के पास, ऐसे अनगिनत अंगुलीमॉल हैं, जिन्होंने अपने अपराधी जीवन को, उनके प्रेम और स्नेह भरी दृष्टी पाकर, न केवल अच्छा बनाया, बल्कि वे आज अनेकोनेक व्यक्तियों के मंगल के लिए चल पा रहे हैं.
भले ही-
संजोयी गयी
हर एक निशानी
एक दिन
धूल धूसरित हो
हो जाती है बिसरी हुई कहानी!
behad sundar abhivyakti....
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