सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३९ :: सत्यनारायण पाण्डेय


सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयानां सज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति। 
अद्य कर्मसन्यासयोगोनाम पंचमोऽध्यायः एव ध्यातव्यं विद्यते! पंचमोऽध्यायोऽपि कर्मयोगमेवानुसरणीयमिति शिक्षयति ! क्रमशः इति  क्रमे.

प्रिय बंधुगण!

भगवान् श्री कृष्ण ने इस अध्याय चौथे श्लोक में ही स्पष्ट कर दिया है कि सांख्ययोग और कर्मयोग दोनों एक ही हैं, यह ज्ञानी व्यक्ति अच्छी प्रकार समझता है. अजानकार भले संदिग्ध अवस्था को प्राप्त हो जाएँ, इसलिए निर्णय के तौर पर वे पुनः स्पष्ट करते हैं कि दोनों विधाओं में से एक में भी सम्यक प्रकार से स्थित व्यक्ति परमात्मा को अंततः प्राप्त करता ही है. अतः यह स्पष्ट हुआ अपनी अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार हमारा मार्ग जो भी हो, प्राप्त होने वाले फल की सदा एकरूपता ही रहती है. इसीलिए तो पांचवें श्लोक में भी भगवान् इसे ही पुनः रेखांकित करते हैं.

यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥
अर्थात, ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है.

ज्ञानयोगी बड़ी आसानी से अपने कर्म को करते हुए भी निर्लिप्त रहता है, ऐसी स्थिति सामान्य कर्मयोगी के लिए दुष्कर है, यद्यपि दोनों के लिए कर्म करना आवश्यक है. इसी को सरल ढंग से रखते हुए भगवान् आठवें श्लोक से आगे कहते हैं...
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌ ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌ ॥८॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌ ॥९॥
 ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥१०॥
अर्थात, तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानें कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ. जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल में कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता.

इस प्रकार ज्ञानपूर्वक कर्ममार्ग और सामान्य कर्ममार्ग, दोनों विधाओं को समझने का हमें अवसर दिया गया, अब स्वयं पर निर्भर है कि हम अपने अभ्यास के बलपर अपने को किस मार्ग के अनुरूप पाते हैं. दोनों मार्गों को समझने के उपरान्त हमें चाहिए कि हम बिना रुके उस मार्ग के अनुसरण में लग जायें. उदाहरणार्थ, वैष्णव देवी के दर्शन की कामना वाले व्यक्ति जैसे अपने सामर्थ्यानुसार हवाई मार्ग, अश्वारोहण या पैदल मार्ग का अनुसरण कर रहे हों, अभीष्ट तो एक देवी दर्शन ही है जो विविध समय अंतराल में सबों के लिए सुलभ होगा ही. इसलिए अपनी मति, बुद्धि के अनुसार हमें कर्म मार्ग का अनुसरण ही अभीष्ट होना चाहिए!

क्रमशः...

--सत्य नारायण पाण्डेय







पीले पत्तों से झाँकता जीवन

पीले पत्तों से झाँकता जीवन
राहों में सहर्ष बिछ कर
यहाँ-वहाँ बिखरे जीवन को
आह्वानित करता हुआ
एकत्र कर रहा है
अपने इर्द-गिर्द 


इस तरह
मृत्यु के सन्निकट भी
हर पीत पत्र
जीवन ही बुन रहा है
अपनी सामूहिक सरसराहट में
जो मन्त्र बुदबुदा रहे हैं पत्ते
उसे उतनी ही एकाग्रता से
काल सुन रहा है 



ये बीज-मन्त्र

आत्मसात कर 

पतझड़-गीत रचना है
जीवन को इस विश्रांति-वेला में
इन चरमराहटों में ही बचना है !!


सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३८ :: सत्यनारायण पाण्डेय


सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयानां सज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति। 
अद्य कर्मसन्यासयोगोनाम पंचमोऽध्यायः एव ध्यातव्यं विद्यते। पंचमोऽध्यायोऽपि कर्मयोगमेवानुसरणीयमिति
शिक्षयति !

प्रिय बंधुगण!
आरम्भ से अंत तक (प्रथम अध्याय से अष्टादश अध्याय तक) गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को विभिन्न प्रकार से कर्मयोग की ही शिक्षा दी है. संभव है अर्जुन ऐसे मुख्य पात्र के साथ साथ विश्व मानव को भी इसी ब्याज़ से शिक्षित करना भी उद्देश्य रहा हो. पंचम अध्याय में भी अर्जुन ज्ञानी कर्मयोगी और कर्मयोगी के विभेद को प्रकट करता हुआ प्रश्न कर बैठता है

अर्जुन उवाच -
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकंतन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१॥
अर्जुन कहते हैं - हे कृष्ण! पहले आप कर्मों के संन्यास (त्याग) की और फिर कर्मों से योग की प्रशंसा करते हैं. इन दोनों में से श्रेष्ठतर, कल्याणकारक और निश्चित साधन को मुझसे कहिए.

इससे पूर्व तीसरे अध्याय के प्रथम श्लोक में भी अर्जुन ने इसी ढ़ंग का प्रश्न भगवान् से किया था.
अर्जुन उवाचज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥३/१॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌॥३/२॥
अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं? आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं. इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ.

यह सब उद्धृत करने का मेरा तात्पर्य यह है कि दूसरे से लेकर चौथे अध्याय तक कर्मयोग की अनिवार्यता भगवान् ने स्पष्ट कर दी है, चाहे वह ज्ञानमार्गी हो या कर्मयोगमार्गी हो फिर भी पांचवें अध्याय में अर्जुन के संदिग्ध मन मे फिर वही प्रश्न उठ खड़ा होता है।

इससे स्पष्ट है कि यदि हम केवल बौद्धिक स्तर पर गीता को पढ़ें सुने अथवा अध्ययन करते रहें और तदनुरूप दैनंदिन जीवन के कर्म संपादन में उसे अपने आचरण में न लायें तो यह संदेह की स्थिति मृत्युपर्यंत हम सबों के लिए भी बनी ही रह जाएगी. अतः हम सबको चाहिए कि गीतामाता की अध्यात्मिक दृष्टि की पूजा अर्चना करने मात्र से ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री न समझ अनासक्त भाव एवं फालाकंक्षा रहित होकर मोहग्रस्त न होते हुए कर्त्तव्य कर्मों के प्रति अवश्य प्रवृत्त हों. इसके सिवा गीता को सहज ढंग से समझने का अन्य कोई उपाय भी नहीं है. निष्काम कर्म के प्रति हमारी लगन चलना सीख रहे एक नन्हे बच्चे की तरह ही होनी चाहिए. जैसे आरंभिक अवस्था में स्वयं या माता पिता के सहयोग से चलते, गिरते, उठते भली प्रकार चलना सीख जाता है वैसे ही हम सब भी निष्काम कर्म मार्ग में गीता माता की सहायता से चलते, गिरते, उठते एक दिन निश्चित दक्ष हो जायेंगे.
पंचम अध्याय के तीसरे और चौथे श्लोक में पुनः भगवान् अर्जुन को स्पष्ट करते हुए यह कहते हैं--
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥५/३॥
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥५/४॥
अर्थात, हे वीर अर्जुन! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, उस कर्मयोगी को सदा संन्यासी ही जानना चाहिए क्योंकि (राग-द्वेष, आदि) द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है. (सांख्य) कर्म-संन्यास और कर्मयोग को अज्ञानी ही अलग-अलग फल देने वाला कहते हैं न कि ज्ञानीजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी ठीक प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के ही फल को प्राप्त होता है.

जैसा कि मैंने पहले भी निवेदित किया है कि अपने नित्य के अभ्यास में उठते-बैठते, सोते-जागते, गीता की शिक्षा के अनुरूप हम अपने कर्मों में उसे नहीं अपनायेंगे तो इस प्रकार की दुविधा कर्मों के प्रति बनी ही रहेगी.

जब अर्जुन ऐसा व्यक्ति भी भगवान् के द्वारा निरंतर उपदेश दिए जाने पर भी अट्ठारहवें अध्याय तक मोह से निवृत्त नहीं हो पाता तो अट्ठारहवें अध्याय के नवें श्लोक में कर्म संपादन की सहज स्थिति बतलाते हुए कहते हैं--
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन ।
सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥
अर्थात, हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्त्तव्य है, इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है- वही सात्त्विक त्याग माना गया है.

यहाँ भी आसक्ति रहित कर्मयोग की ही महिमा रेखांकित की गयी है. यह सब होते हुए भी जब अर्जुन का मोह भंग नहीं हुआ और उसकी यह धारणा बनी रही कि अगर वह युद्ध में भाग लेता है तो पाप का भागी होगा, जबकि बताये गए मार्ग का अनुसरण करते हुए कर्म करने से पाप पुण्य का सवाल ही नहीं उठता है, और न ही वैसे कर्मफल रुपी पाप से बचने बचाने की जरुरत है. इस भाव से ही अट्ठारहवें अध्याय के ६६ वें श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को आश्वस्त करना चाहा है--

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८/६६॥
अर्थात! संपूर्ण धर्मों (तुम्हारे मन में जितने प्रकार की भावनाएं/ ऊहापोह/सोच हिलोरें ले रहे हैं) को संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा. मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर.

७२ वें श्लोक में पुनः भगवान अर्जुन से इतना ही पूछते हैं कि हे अर्जुन! क्या तुमने मेरे द्वारा कही गयी बातों (कर्मयोग सम्बन्धी) को ध्यानपूर्वक सुना है और क्या तुम्हारा अज्ञान रुपी मोह नष्ट हुआ ? इसके उत्तर स्वरुप ७३ वें श्लोक में अर्जुन विश्वस्त भाव से प्रतिउत्तर देता है कि--

अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥१८/७३॥
अर्जुन बोले- हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा.

पुनः गीता ज्ञान यात्रा के सहयात्रियों से विनम्र निवेदन करना चाहूँगा कि आज की विवेचना को हम सब अपने मन मस्तिष्क में अवश्य स्थान दें ताकि अर्जुन की तरह हम सब भी "नष्टो मोहः .... करिष्ये वचनं तव" स्थिति को प्राप्त हो सकें!

क्रमशः...

--सत्यनारायण पाण्डेय 

सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३७ :: सत्यनारायण पाण्डेय


सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयानां सज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति। अद्यापि ज्ञानकर्मसन्यासयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायेएव ध्यातव्यं विद्यते।

प्रिय बन्धुगण!
अब तक इस अध्याय में भी ज्ञानपूर्वक कर्म करने की प्रमुखता का ही वर्णन किया गया है. इस अध्याय के सोलहवें श्लोक में ही स्वयं भगवान् ने अर्जुन और उसके माध्यम से सारे संसार के मनुष्यों के लिए कर्म संपादनार्थ बहुत ही सुन्दर तथ्य को उद्घाटित किया है--

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१६॥
अर्थात्, कर्म क्या है? अकर्म क्या है? इसका निर्णय करने में बुद्धिमान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुमसे वह कर्म कहूँगा जिसे जानकर तुम अशुभ (कर्म-बंधन) से मुक्त हो जाओगे.
साधारण जन मानस के सामने कई बार ऐसा अवसर उपस्थित हो जाता है कि वह निर्णय लेने में समर्थ नहीं हो पाता कि वह कर्म संपादन करे कि कर्म से विरत हो जाए. ऐसी परिस्थिति में भगवान् कृष्ण ने तीन प्रकार के कर्मों को भली प्रकार समझने की बात अर्जुन से कहते हैं और मानते भी हैं कि कर्म की गति अति गहन है.

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७॥
अर्थात, कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्मों की गति गहन (छिपी हुई) है.

आगे अट्ठारहवें श्लोक में कर्म, विकर्म और अकर्म को स्पष्ट करते हुए भगवान् कहते हैं


कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌ ॥१८॥
अर्थात, जो मनुष्य कर्म में अकर्म (शरीर को कर्ता न समझकर आत्मा को कर्ता) देखता है और जो मनुष्य अकर्म में कर्म (आत्मा को कर्ता न समझकर प्रकृति को कर्ता) देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह मनुष्य समस्त कर्मों को करते हुये भी सांसारिक कर्मफ़लों से मुक्त रहता है.

इसके बाद भी यदि हम मनुष्य संदिग्ध स्थिति को प्राप्त होते हैं तो भगवान् ने संकेत दिया है कि तत्वज्ञानियों के संपर्क में व्यक्ति को जाना चाहिए जिससे कभी भी मोह की स्थिति न आने पाए. यहाँ विशेष रूप से ध्यातव्य है कि समसामयिक तत्वज्ञानी से संपर्क करना ही उचित होता है न कि आज के संत स्वरुपधारी विविध क्षेत्रों के मठाधीशों की शरण में जिनकी दुरावस्था हम खुद देख ही रहे हैं. यह सही है कि हमारी अध्यात्मिक एवं धार्मिक भावना इतनी सुदृढ़ और सरल है कि हम अध्यात्मिक परिवेश के प्रति बिना तर्क के सहज ही आकृष्ट हो जाते हैं. पर इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य ज्ञान संबलित अनासक्त भाव से कामना रहित हो कर्म करने की शिक्षा देना है. अतः तैंतीसवें श्लोक में स्पष्ट किया गया है कि अखिल कर्म ज्ञान के कारण ही समाप्त हो पाते हैं.

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥
अर्थात, हे परंतप अर्जुन! धन-सम्पदा के द्वारा किये जाने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान-यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा सभी प्रकार के कर्म ब्रह्म-ज्ञान में पूर्ण-रूप से समाप्त हो जाते हैं.

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ॥३४॥
अर्थात, यज्ञों के उस ज्ञान को तू गुरू के पास जाकर समझने का प्रयत्न कर, उनके प्रति पूर्ण-रूप से शरणागत होकर सेवा करके विनीत-भाव से जिज्ञासा करने पर वे तत्वदर्शी ब्रह्म-ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्व-ज्ञान का उपदेश करेंगे।
आगे ज्ञान की महत्ता बतलाते हुए भगवान् कहते हैं कि जैसे सूखी जलावन की लकड़ी के ढेर को अग्नि क्षण भर में जलाकर भस्म कर देती है वैसे ही ज्ञान रुपी अग्नि में सारे कर्म भस्म हो जाते हैं क्यूंकि ज्ञान से पवित्र इस संसार में कुछ भी नहीं है.


यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
 ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥३७॥
इस प्रकार चालीसवें, एक्तालिस्वें एवं बयालिस्वें श्लोक में भगवान् ने स्पष्ट किया है कि यह संसार अज्ञानी, श्रद्धाराहित और संशययुक्त व्यक्ति के लिए नहीं है. ऐसे व्यक्ति के लिए न तो यह लोक सुखदायी होता है और न ही परलोक. अतः योगयुक्त होकर ज्ञान धारण करते हुए संशय रहित हो आत्मतत्व को समझते हुए कर्म करने वाले व्यक्ति के लिए कर्म बंधन के कारण नहीं बनते.

बयालिस्वें श्लोक में उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि हे भारत! (अर्जुन) अज्ञान से उत्पन्न उस संशय को हृदय में स्थित ज्ञान रुपी तलवार से काटते हुए योग अर्थात कर्मयोग के लिए तुम उठ खड़े होओ! इस प्रकार हम देखते हैं कि ज्ञान संबलित कर्मयोग की परिपुष्टि ही "ज्ञानकर्मसन्यासयोगनाम" यह चतुर्थ अध्याय भी कर रहा है.


क्रमशः

--सत्यनारायण पाण्डेय 


कोई कविता सी चीज़ अनायास कढ़ रही थी

सुबह के आँचल से बंधी
कुछ यादें
शाम के सिरहाने रखीं थीं
शाम अपने ही अंधेरों में डूबी
अपना आप गढ़ रही थी
कोई कविता सी चीज़ अनायास कढ़ रही थी  


शाम और सुबह की तस्वीरों में
एक दुर्भेद्य साम्यता थी
यादों में जीने की जैसे
कोई अकथ सी बाध्यता थी 


सिरहाने रखी यादों को 
शाम ने
अपने आँचल में बाँध लिया
यूँ उसने
सुबह की सौगात को
अक्षरशः साध लिया 



सुबह के हिस्से
शाम अपनी यादों की गठरी छोड़
रात-दिन की चादर का एक छोर हो गयी
अपने अंधेरों समेत
रात्रि की राह से गुजर
अकस्मात वह ही भोर हो गयी 


यूँ यादों का ताना-बाना
एक दूसरे के हिस्से टांकते
सुबह और शाम
साथ न हो कर भी साथ हैं 


जीवन में
कितने ही मोड़ आते हैं
बिछड़ जाना यूँ ऐसे ही
ये भी कोई बात है 



वे साथ न हो कर भी साथ हैं !!



सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३६ :: सत्यनारायण पाण्डेय

सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयानां सज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति। अद्यापि ज्ञानकर्मसन्यासयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायेएव ध्यातव्यं विद्यते।


प्रिय बन्धुगण!
चतुर्थ अध्याय भी येन-केन-प्रकारेण ज्ञान संबलित कर्म करने की ही विवेचना करता है. हाँ, शर्त्त वही है अनासक्त और फलाकांक्षारहित हो कर्म करने की. तेरहवें श्लोक में भगवान् स्वयं अपने द्वारा किये गए चारो वर्ण की सृष्टि,
एवं स्वयं अकर्ता होने का उदहारण इस प्रकार प्रस्तुत किया है
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌ ॥ (१३)
अर्थात, प्रकृति के तीन गुणों (सत, रज, तम) के आधार पर कर्म को चार विभागों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) में मेरे द्वारा रचा गया, इस प्रकार मानव समाज की कभी न बदलने वाली व्यवस्था का कर्ता होने पर भी तू मुझे अकर्ता ही समझ।
इसे इस प्रकार समझा जा सकता है-- कंप्यूटर में डाटा फीडेड है, उस आधार पर वह  सारे कैलकुलेशन करता है, इस प्रक्रिया में वह कर्ता होते हुए भी अकर्ता ही है क्यूँ कि किसी जोड़-घटाव-गुणा-भाग से उसे
किसी प्रकार का कोई लेना देना नहीं है. डाटा फीड करने वाले व्यक्ति का भी परिणाम के प्रति अनासक्त भाव ही होता है, चाहे परिणाम पक्ष में हो या विपक्ष में.


चौदहवें श्लोक में उन्होंने अपने कथन की कर्म के प्रति निर्लिप्तता के भाव को भी इस प्रकार स्पष्ट किया है
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ (१४)
अर्थात, कर्म के फल में मेरी आसक्ति न होने के कारण कर्म मेरे लिये बन्धन उत्पन्न नहीं कर पाते हैं, इस प्रकार से जो मुझे जान लेता है, उस मनुष्य के कर्म भी उसके लिये कभी बन्धन उत्पन्न नही करते हैं।


पुनः कर्मयोग और ज्ञानयोग के प्रति संदेह करने वाले अर्जुन के प्रति उन्होंने पन्द्रहवें श्लोक में पुनः पूर्व में किये गए कर्मयोगियों के द्वारा कर्म करने को ही प्रेरित किया है!
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌ ॥ (१५)
अर्थात, पूर्व समय में भी सभी प्रकार के कर्म-बन्धन से मुक्त होने की इच्छा वाले मनुष्यों ने मेरी इस दिव्य प्रकृति को समझकर कर्तव्य-कर्म करके मोक्ष की प्राप्ति की, इसलिए तू भी उन्ही का अनुसरण करके अपने कर्तव्य का पालन कर।


इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कर्म अनिवार्य है, केवल करने के ढंग को भली प्रकार समझने की ज़रुरत है. जैसा कि पूर्व में संकेत किया गया था कि ज्ञान, कर्म और भक्ति तीन भागों में समझी जाने वाली गीता मुख्य रूप से डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन महोदय के मतानुसार गीता "ज्ञान संबलित कर्मयोग" शास्त्र है. इसे  हम सबको सदा ध्यान रखना चाहिए. ज्ञान पूर्वक किये गए कर्म कभी बंधन के कारण नहीं हो सकते. हमारे कोई भी कार्य पूर्व संकल्पित न हों पर संयोग से उपस्थित कर्तव्य कर्मों के प्रति दृढता हो, आसक्ति और अनासक्ति जैसी कोई दुविधा न हो. इस प्रकार कर्म करने से ज्ञान रुपी अग्नि में कर्म आहुत हो जाते हैं और ऐसे व्यक्ति को ही बुद्धिमान लोग पंडित भी कहते हैं जैसा कि उन्नीसवें श्लोक में स्वयं भगवान् ने अर्जुन को कहा है
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥ (१९)
अर्थात, जिस मनुष्य के निश्चय किये हुए सभी कार्य बिना फ़ल की इच्छा के पूरी लगन से सम्पन्न होते हैं तथा जिसके सभी कर्म ज्ञान-रूपी अग्नि में भस्म हो गए हैं, बुद्धिमान लोग उस महापुरुष को पूर्ण-ज्ञानी कहते हैं.
तात्पर्य यह कि फिर ज्ञान युक्त होकर कर्म करने की ओर संकेत करना ही है!


इसी लिए तेईसवें  श्लोक में भी इसी तथ्य को पुष्ट करते हुए कहा गया है कि कर्म में लगाव न हो, चित्त ज्ञान में अवस्थित हो और कर्म यज्ञ भाव से भावित हो तो वह कदापि बंधन का कारण नहीं होता!
गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ (२३)
अर्थात, प्रकृति के गुणों से मुक्त हुआ तथा ब्रह्म-ज्ञान में पूर्ण रूप से स्थित और अच्छी प्रकार से कर्म का आचरण करने वाले मनुष्य के सभी कर्म ज्ञान रूप ब्रह्म में पूर्ण रूप से विलीन हो जाते हैं।


क्रमशः 

--सत्यनारायण पाण्डेय 

सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३५ :: सत्यनारायण पाण्डेय


सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयानां सज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति। 
अद्य ज्ञानकर्मसन्यासयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायेएव ध्यातव्यं विद्यते।

प्रिय बन्धुगण!
अर्जुन द्वारा की गयी शंका "अपरं भवतो जन्म..." के उत्तर में भगवान् कृष्ण ने कहा
श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ (५)
अर्थात, श्री भगवान ने कहा - हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे अनेक जन्म हो चुके हैं, मुझे तो वह सभी जन्म याद है लेकिन तुझे कुछ भी याद नही है।

यहाँ हम सबों के लिए ध्यान देने की बात यह है कि यहाँ नारायण स्वयं श्री कृष्ण हैं और नर अर्जुन है जो परब्रह्म परमात्मा और जीवात्मा के रूप में उपस्थित है. तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में इस ओर संकेत देते हुए कहा है-- "ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि", अर्थात, जीव ईश्वर का ही अंश है और अविनाशी होते हुए मलरहित यानि निष्पाप और सूख का पूँज ही है पर इस त्रिगुणमयी संसार में लोभ और मोह के वशीभूत होता हुआ अपने स्वरुप को भूल आसक्तियुक्त कर्मों के कारण आवागमन के चक्कर में पड़ जाता है और अपने मूल स्वरुप की विस्मृति के कारण जन्म-मृत्यु-क्रम के वशीभूत हो जाता है, और इस आवागमन की उसे सुधि तक नहीं रहती! ठीक इसी ओर श्रीमाद्भाग्वदमहापुराण के महात्म्य में परमात्मा और जीवात्मा के रूप में इस संसार में भ्रमणार्थ आने की "पुरंजन-कथा" वर्णित है, जहाँ जीवात्मा संसार के सौन्दर्य से आकर्षित हो कुछ दिन यहीं रहने की लालसा प्रगट करता है और मित्र रूप परमात्मा के कहने पर भी संसार में रम जाता है. कई जन्म उसके यहाँ व्यतीत होते हैं उसके बाद मित्र रूप परमात्मा जीवात्मा को उसके स्वरुप का बार बार बोध कराते हैं. संसार में व्यतीत हुए उसके कई जन्मों का प्रत्यक्ष दर्शन भी कराते हैं, लेकिन उसे बोध नहीं हो पाता, अतः परमात्मा उसका हाथ पकड़ जैसे ज्ञान रुपी वापी (तालाब) में स्नान करवाते हैं उसे अपने शुद्ध चिरंतन स्वरुप का बोध हो जाता है और वह परमात्मा के साथ जाने को उद्यत हो उठता है.

आगे छठे श्लोक में इसी ओर स्पष्ट संकेत देते हुए भगवान् कृष्ण ने इस संसार में अपने आने के तरीके को इस प्रकार स्पष्ट किया है
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌ ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ (६)

अर्थात् यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी समस्त जीवात्माओं का परमेश्वर (स्वामी) होते हुए भी अपनी अपरा-प्रकृति (महा-माया) को अधीन करके अपनी परा-प्रकृति (योग-माया) से प्रकट होता हूँ।

तात्पर्य यह है कि ईश्वर को उस स्वरुप का समूल ज्ञान है जिसमें वे अवतरित हुए हैं, उन्हें अपने उद्देश्य का भी स्पष्ट ज्ञान है और जिस स्वरुप में अपनी योग माया से वापस लौटना है उसका भी उन्हें भान है. वहीँ जीवात्मा सांसारिक चकाचौंध में अपने मूल स्वरुप को भूल संसार में ही भटकता रह जाता है. यही रहस्य की बात है जिसे हम सबको ध्यानपूर्वक समझना है.

सातवें-आठवें श्लोक में भगवान् कृष्ण ने अपने अवतार ग्रहण करने का उद्देश्य स्पष्ट किया है--
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥ (७)
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ (८)
अर्थात, हे भारत! जब भी और जहाँ भी धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं अपने स्वरूप को प्रकट करता हूँ। भक्तों का उद्धार करने के लिए, दुष्टों का सम्पूर्ण विनाश करने के लिए तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।

यहाँ भगवान् के अवतरित होने का कारण और उद्देश्य दोनों स्पष्ट रूप से इंगित हैं. ठीक इसी तरह संसार में हम भेजे गए हों या अपने कर्मफल के अनुसार आये हों, हमारे कार्य भी सुनिश्चित हैं और यदि इस संसार के विधान के अनुसार निर्लिप्त भाव से मात्र अपने कर्तव्यों के पालन में निष्काम भाव से दिए गए दायित्व का निर्वहन करते चलें तो उस परमात्मा की तरह ही जीवात्मा के लिए भी यहाँ के कार्य बंधन के कारण नहीं होंगे और हम सब भी अपने उस सहज स्वरुप में लौट पाएंगे, इसमें कोई संदेह नहीं! हम इसे एक उदहारण से समझ सकते हैं, चाहे हम जिस संस्था, फर्म या विभाग में कार्य कर रहे हों, वहाँ के निदेशक के अनुसार दिए गए कार्यों का हम भली प्रकार संपादन कर लेते हैं तो किसी प्रकार के दोष के भागी नहीं होते पर वहीँ यदि हम उन निर्देशों की अवहेलना करते हैं तो दोष के भागी होते हैं और दंड के अधिकारी भी! संसार भी हमारा कार्यक्षेत्र है और यहाँ भी रहने के नियम निर्धारित हैं जहाँ हमें अपने वास्तविक स्वरुप का ख्याल रखते हुए सारे कार्यों को अभिनेता की तरह सम्पादित करते जाना है.
चिंतन यात्रा चलती रहेगी...

क्रमशः 
--सत्यनारायण पाण्डेय 

परिवर्तन. मौसम. जीवन

Masmovägen, Stockholm


बर्फ़ जमने लगी है
घास-पात ठिठुरने लगे हैं 


पत्तों पर
रात भर गीरे शीत के दर्शण का मौसम
बीत गया 


अब श्वेत धवल होगी धरा
बर्फ़ के फ़ाहों से आच्छादित हो
अब कुछ भी नहीं रहेगा हरा 


बिना लाग-लपेट के
प्रकृति का सन्देश
खरा-खरा 


सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३४ :: सत्यनारायण पाण्डेय


सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयानां सज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति। अद्य ज्ञानकर्मसन्यासयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायः ध्यातव्यमस्ति। ज्ञान संबलितं निष्काम कर्मं तु सर्वै: सर्वदा करणीयमिति तु सुनिश्चितमेव ! ज्ञानकर्मसन्यासयोग कथनेन निष्कामकर्मयोग्यस्यैव समर्थनं कृतं अस्ति!

प्रिय बन्धुगण!
जैसा कि हम जानते हैं कि चौथे अध्याय का नाम ज्ञानकर्मसन्यासयोग है! इसका मुख्य तत्व उस प्रकार के व्यक्ति की व्याख्या करता है जिसमें ज्ञान का अभ्युदय हो और जो अनासक्त हो कर कर्म के मार्ग का भी अनुयायी हो. इस अध्याय का मुख्य लक्ष्य ज्ञान और कर्म में सामंजस्य स्थापित करना ही है. इसे हम इस प्रकार भी समझ सकते हैं-- कर्म करते हुए कर्म फल का त्याग करने वाला और ज्ञान योग से ज्ञानी की बुद्धि का आश्रय लेने वाला व्यक्ति ही अपना और लोक का उद्धार करने में समर्थ हो सकता है.

तीसरे अध्याय में जिस कर्मयोग शास्त्र की चर्चा हुई थी उसे ही चौथे अध्याय में यह कहते हुए आरम्भ किया गया कि--
श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥
श्री भगवान बोले- मैंने इस अव्यय (अविनाशी, त्रिकालाबाधित) योग को सूर्यसे कहा था, सूर्य ने मनु को कहा और मनु ने राजा इक्ष्वाकु से कहा.

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥२॥
हे परंतप (शत्रुओं को तपानेवाले-अर्जुन) ! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षि जानते थे; किंतु वह योग लंबे काल पश्चात् इस लोक से लुप्त हुआ।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही  पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है।

इस प्रकार भगवान ने अर्जुन को स्पष्ट किया है कि मैं कोई नए योग की चर्चा तुमसे नहीं कर रहा हूँ, यह तो अत्यंत पुरातन काल से चला आ रहा है. पर अनंत काल के अंतराल के कारण यह लुप्त सा हो गया है और उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह विद्या सूर्य को बताई थी, और सूर्य ने मनु को बताया और मनु ने समस्त मानवों के बीच इसका प्रचार प्रसार किया. इस प्रकार ज्ञान और कर्म की परंपरा का अध्यात्मिक सूत्र उस समय से आजतक सर्वत्र व्याप्त है, भले लोग उसका अनुसरण या उसे धारण करना भूल गए हैं, यह स्वाभाविक भी है कि जो नित्य के अभ्यास की चीज़ न हो उसे हम दैनंदिन जीवन के क्रियाक्लापों में नित्य स्थान न दें तो उसका धीरे धीरे लुप्त होना अवश्यम्भावी है !

अर्जुन के प्रश्न गीता के प्रथम अध्याय से अट्ठारहवें अध्याय तक स्वाभाविक एवं मानवोचित हैं, और जो प्रश्न उठ सकते हैं, ऐसे संदेहों का निराकरण करते हुए भगवान ने मानव हित में स्वयं ही उसका उत्तर भी दिया है! आगे के अध्यायों में नाना प्रकार की शंकाओं को दूर करने के लिए विभूतियोग, अक्षरब्रह्मयोग, ज्ञान विज्ञान योग, गुणत्रय विभाग योग, श्रद्धात्रय विभाग योग आदि के विवेचन क्रमशः प्रस्तुत करते हुए अंततः अट्ठारहवें अध्याय में मोक्ष सन्यास योग तक की यात्रा हम सब सार रूप में तो क्रमशः करेंगे ही लेकिन हमें अब तक जो एक निष्काम कर्मयोग का अनासक्त भाव से कर्म करने का सूत्र प्राप्त हुआ है उसे विस्मृत न होने दे. यह हमारे जीवन एवं आचरण का नित्य विषय बना रहे.

मानव मन की जितनी दौड़ होती है, उसी रूप में साथ रह रहे भगवान् कृष्ण के प्रति यह आशंका करना भी अर्जुन के लिए स्वाभाविक ही है कि सूर्य कब हुए पता नहीं और आपने (कृष्ण ने) सर्वप्रथम सूर्य को बताया और सूर्य ने मनु को बताया और मनु ने राजा इक्ष्वाकु को बताया और  इक्ष्वाकु ने राज्याश्रित लोगों को बताया और इसी प्रकार यह परंपरा लोगों में विकसित हुई, यह मैं कैसे मान लूं क्यूँकि आपका जन्म तो सूर्य के बहुत बाद हुआ...
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ ४ ॥
अर्जुन बोले- आपका जन्म तो अर्वाचीन है और सूर्यका जन्म प्राचीन है; तब मैं इस बातको कैसे समझूँ कि आपने (कल्पके आदिमें) सूर्यसे यह योग कहा था ?
क्रमशः

--सत्यनारायण पाण्डेय 

सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३३ :: सत्यनारायण पाण्डेय



सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयानां सज्जनानां कृते ये गीता-ज्ञान-यज्ञे संलग्नाः सन्ति। अद्यापि कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायैव ध्यातव्यमस्ति। 
अद्य निःसन्देहेन कर्मयोगस्य  प्राधान्यमिति सुनिश्चितो भविष्यति,
तृतीयोऽध्यायस्योपसंहारोऽपि करणीयं विद्यते!

प्रियबन्धुगण!
कल का समय, वर्ष में एक बार आने वाले दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनायें स्वजन सुधीजनों से पाने और उन्हें प्रेषित करने में ही व्यतीत हो गया, कल गीता-ज्ञान-यात्रा का पड़ाव या विश्राम रहा, पर एक बात गौर करने लायक है, कि जैसे  हमनें बाहरी अन्धकार को दीप जला कर दूर कर दिया है, ठीक वैसे ही गीता-ज्ञान रूपी दीप को हृदय में धारण करते हुए हृदयगत अज्ञान रूप अंधकार को दूर करने के लिए भी प्रयत्नशील हों।

शप्तशती (दुर्गा) भी कहती है:--"ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोः विषय गोचरे। विषयश्च महाभाग यातिचैवं पृथक् पृथक्।।
अर्थात्! ज्ञान समस्त प्राणियों में होता है, मात्रा की पृथकता भले हो सकती है, इस हृदयगत ज्ञान को मलिन होने देने के बजाय, बाह्य दीपोत्सव की तरह अन्तः करण के ज्ञान दीप को भी सोत्साह उद्दीप्त करने की चेष्टा भी हम क्यों न करें। गीता के पांचवें अध्याय के पन्द्रहवें श्लोक की दूसरी पंक्ति में कहा भी गया है:--

"अज्ञानेनावृतं ज्ञानं ते न मुह्यन्ति जन्तवः।।" 
हमारे अन्तः करण में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान, हमारी ही असावधानी के कारण अज्ञान एवं मोह के वशीभूत हो अन्धकार (अज्ञान) का दास हो जाता है। अतः ज्ञान के दीप को हृदय में भी जलाए रखना हम सब का पुनीत कर्तव्य होना ही चाहिए।

तो आएं गीता-ज्ञान- यात्रा के क्रम में तीसरे अध्याय के उपसंहार एवं कर्म योग की अनिवार्यता को स्वीकारते हुए निर्द्वन्द्व एवं फलाकांक्षा रहित होकर कर्म करनेकी कला सीखें। 

इसके लिए आरम्भ के नवें श्लोक से सोलहवें श्लोक को भी ध्यान में रखना चाहिए। यहां उन सभी श्लोकों का अर्थसहित उद्धरण न देकर अपनी बुद्धि को परिपुष्ट करने के लिए भावार्थ का अनुसरण करेंगे:-
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्बन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसड़्गः समाचार ।।३/९।।

अर्थात्! यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगना ही मनुष्य समुदाय को बांधता है। इस लिए हे अर्जुन ! तू आसक्ति रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभांति कर्तव्य कर्म कर।

यहाँ यज्ञमंडप में ही हवनकुंडादि के निर्माणपूर्वक वेदमंत्रादि से सम्पन्न कराए जाने वाले  विधि-विधान  को ही यज्ञ पद से बोधित नहीं किया गया है बल्कि आप ध्यान देंगे तो नवें श्लोक में ही यह बात स्पष्ट हो गयी है कि कर्तव्य भाव से शास्त्र सम्मत सभी कर्म यदि अनासक्त भाव से लोक हित में किए जाएँ तो वैसे कर्म भी  यज्ञभाव भावित होने के कारण यज्ञ रूप कर्म कहलाते हैं, अतः बन्धन के कारण नहीं होते ।

जहाँ तक उस विधेय यज्ञ की बात है उसकी ओर भी संकेत देते हुए भगवान ने कहा है कि:-- यज्ञ द्वारा तुम सब देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नति देंगे। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से  एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त होओगे ।११।

देवान्भावयतानेन ते  देवा भावयन्तु वः। परस्परं  भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।।३/११।। 

अब यहां तक यह बात सुनिश्चित हो गयी है कि कर्म किसी भी परिस्थिति में अनिवार्य है, यज्ञ भाव भावित होकर यानि  शास्त्र विहित कर्मों का अनासक्त भाव से लोकहित में कर्म सम्पादन कर्म बंन्धन से मुक्त कर परमपद यानि मोक्ष का  अधिकारी बना देता है!
आगे बढते हुए अर्जुन के प्रश्न और भगवान् के उत्तर भी हम मनुष्यों के लिए मार्ग दर्शक होगा ।

अर्जुन कहता है कि क़ोई भी व्यक्ति न तो  पाप करना चाहता है और न तो पाप का फल ही भुगतना चाहता है, फिर  भी  बल पूर्वक किसी के द्वारा लगाए हुए की भांति किससे प्रेरित होकर वह पापाचरण में लग जाता है। अर्जुन उवाच:--"अथ केन प्रयुक्तोऽयं  पापं चरति पुरूषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।३/३६।।
श्री भगवानुवाच:--"काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्धियेनमिह वैरिणम् ।।३७।। अर्थात्!  रजो गुण से उत्पन्न  हुई कामना, न पूरी होने पर क्रोध का रूप ले लेती है। कामनाएं तो अनन्त हैं, ये "महा अशन्" बहुत बहुत खाने वाली होती हैं, अतः यह कभी संतुष्ट नहीं होने वाली है, इस काम भाव को ही इस विषय में तुम शत्रु समझो ।

काम ज्ञान को धूमिल करने वाला होता है, अतः इससे बचना ही श्रेयष्कर है।

अतएव भगवान् अर्जुन को कहते हैं कि इन्द्रियों को वश में करके अपने अन्दर के ज्ञान और विज्ञान को नाश करने वाले महान पापी काम को बलपूर्वक (प्रयत्नशील होकर) मार डाल, अर्थात् हम प्रयास करें कि वैसी नौबत ही न आये। यथः- तस्मात्वमिन्द्रिण्यादौ नियम्य भरतर्षभ। पाप्मानं प्रजहि  ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ।।४१।।

अन्तिम तैतालिसवें  श्लोक में  भगवान् अर्जुन को कहते हैं कि श्रेष्ठ आत्मतत्व को जानकर तथा बुद्धि को स्थिर रखते हुए मन को वश में कर के हे महाबाहो! इस काम रूप दुर्जय शत्रु को मार डाल!

यहां ध्यातव्य है कि कामना रहित, लगाव रहित एवं फलाकांक्षा रहित होकर कर्म करने की आवश्यकता पर आरम्भ के श्लोकों में बल दिया गया था, कर्म योग की अनिवार्यता को ध्यान में रखते हुए कर्म करने की शिक्षा के साथ वह अवधारणा हम सब स्वीकार भी करते हैं। अर्जुन के प्रश्न और भगवान् के उत्तर से अन्ततः यह बात हम सब को भी सचेत करती है कि काम यानि कामना यदि हमें अपने आगोश में ले लेती है तो, वह हमें कर्म पथ से भ्रष्ट करेगी  ही, अतः ज्ञान और बुद्धि के बल पर उसे पास फटकने ही नहीं देना है ।

चौथा अध्याय "ज्ञानकर्मसन्न्यासयोगो नाम" कहलाता है, कल गीता-ज्ञान यात्रा में इस अध्याय की भूमिका के साथ शुरूआत करेंगे ।
क्रमशः

--सत्यनारायण पाण्डेय 

सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३२ :: सत्यनारायण पाण्डेय


सुप्रभातःसर्वेषां कृते, ये गीता-ज्ञान चर्चायां संलग्नाः सन्ति।अद्यापि तृतीयोऽध्यायैव हि चिन्तनस्य विषयः।
प्रियबन्धुगण ! 
तृतीय अध्याय में भी ४३ श्लोक हैं, कल तक हमारी यात्रा ८वें श्लोक तक हुई थी, मैं पहले भी विनम्र निवेदन कर चुका हूँ कि गीता ऐसे शास्त्र में स्वयं भगवान् की वाणी है, उसमें एक अक्षर भी व्यर्थ नहीं, फिर भी  सुगमता के लिए कम समय में हम अपने मन-मस्तिष्क  में बैठाने वाली बातों पर ग़ौर करेंगे । इतनी बात तो तृतीयोऽध्याय के अब तक के विवेचन से तो स्पष्ट हो गया है कि --
ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करना ही श्रेष्ठ है, कर्म न करने के हठ की अपेक्षा ज्ञानवान पुरूष को लोक संग्रह के लिए भी कर्म करना चाहिए, जिसकी चर्चा कल इसी बीसवें श्लोक "कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।" के क्रम में की जा चुकी है। आगे २१ वें श्लोक में कहा गया है कि:--

यद्यदाचरति  श्र्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनाः।
स यत्प्रमाणं कुरूते लोकस्तदनुवर्तते।।३/२१।।

अर्थात्, श्रेष्ठ पुरूष जो जो आचरण करता है, अन्य लोग देख कर वैसा ही  आचरण करते हैं। वह जो भी आचरण करता है लोक यानि जन समुदाय उसी का अनुकरण करने लग जाते हैं। हम आप आज की सर्वत्र फैलती कुव्यवस्था या दुरावस्था का कारण सहज ही समझ  सकते हैं, आज अध्यात्म का क्षेत्र हो, राजनीति का क्षेत्र हो, या फिर सामाजिक अन्य क्षेत्र की बात हो सर्वत्र  हमारे भ्रष्ट जननायकों को ही, आप पाएंगे, क़ोई भी श्रेष्ठपद की मर्यादा निर्वहण करता नहीं दिखता, जन सामान्य तो जन सामान्य है ही।

मेरा मानना है कि अभी भी हमारे शास्त्र परम उपयोगी हैं और धूर्तों, पाखंडियों को छोड़कर बाकी भोला  जनमानस विल्कुल पवित्र बुद्धि सम्पन्न है । अतः किसी भी क्षेत्र में नेतृत्व करने वाले के प्रति ईश्वर बुद्धियुक्त व्यक्ति को सरल जन मानस के हित में यथा काल सहयोगी बनना ही चाहिए ।
   देखें अगले २२, २३ और २४वें श्लोक में स्वयं भगवान् यह उत्तरदायित्व लेते हुए कह रहे हैं:--

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं  वर्त एव कर्मणि ।।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। 
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः   पार्थ सर्वशः।।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।
अर्थात्:-
हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ, क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं ! इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ!

भगवान् अपने दायित्व का निर्वहन करना उचित समझते हैं, क्योंकि उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अगर मैं ऐसा न करूं तो मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएंगे और उनकी वर्णसंकरता और समस्त प्रजा के नष्ट करने का जिम्मेदार मैं ही कहलाऊंगा । आज अपनी तिजोरी और अपना पेट भरने के सिवा लोक रक्षण की बात  सोचता ही कौन है ?
उस मूढ को  इस संसार में भी  सुख नहीं मिल पाता है और न उसका परलोक ही बन पाता है । क्या हम सब प्रत्यक्ष नहीं देख रहे, अनुभव नहीं कर रहे उन दम्भियों को, जो मोह के वशीभूत आज सलाखों के पीछे या दैवी प्रकोप से आक्रान्त हो भुगत रहे हैं, चाहे वे अध्यात्म से खिलवाड़ करने वाले हों, या राजनैतिक क्षेत्र अथवा समाज सुधार का ढोंग करने वाले हों ।

इसीलिए भगवान् ने अर्जुन के साथ साथ हम सब को इसी अध्याय के पच्चीसवें श्लोक में सहज निर्देश दिया है कि:--
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसड़्ग्रहम्।।
अर्थात्! हे भारत (अर्जुन) कर्म में आसक्त हुए अज्ञानी जन जिस प्रकार कर्म में लगे होते हैं, ज्ञानी व्यक्ति को भले कर्म करने की आवश्यकता न हो, फिर भी लोक शिक्षण के लिए आसक्तिरहित कर्म कर , आसक्ति रहित कर्म का उदाहरण अवश्य प्रस्तुत करे ।

हम सब का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि ऐसे सद् शास्त्र के होते हुए भी " जल बीच मरत प्यासा रे धोबिया "
के उदाहरण बने हुए हैं ।

क्रमशः--------!
धन्यवाद प्रेषित ।

--सत्यनारायण पाण्डेय 

शुभ दीपावली !!

हरे पत्तों पर
नहीं उकेरे जा सकते अक्षर

पतझड़ है
झरे हुए पत्तों पर
सहर्ष सज गयी कविता उर्वर 


वो हरा हो तो भरा है
झर गया तो भी खरा है 


पत्तों की नियति का
मर्म पहचानना हो
जो जीवन को
ज़रा करीब से जानना हो


तो 

पत्तों का सौन्दर्य निहारें

उनकी धमनियों में बहती जिजीविषा पर 

मन प्राण वारें !! 

***




स्वप्न   से  स्मृति   तक  से  एक  कविता सूखे  पत्तों  पर उकेरी हुई !!
यही शुभकामना है कि हर कोई अपने अपनों के साथ दीप पर्व ख़ुशी ख़ुशी मनाये !
सौहार्द का दीप रोशन हो !!

शुभ दीपावली !!

सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३१ :: सत्यनारायण पाण्डेय

डॉ सत्यनारायण पाण्डेय 


सुप्रभातः सर्वेषां प्रथमोऽध्यायतः अष्टादशोध्यायपर्यन्तं
 गीतोज्ञानयात्रायां सहयात्रीणां कृते। 
कर्मयोगोनामतृतीयोऽध्याये समुपस्थितो वयम्।

प्रियबन्धुगण!
इस अध्याय के पांचवें श्लोक तक में यह स्पष्ट हो चुका है कि इस पृथ्वी लोक में कर्म अनिवार्य है, जो हठपूर्वक कर्म न करने की भी ठान लें तो प्रकृति उनसे बलात् कार्य करा लेती है, फिर शरीर यात्रा भी कर्म न करने वाले के लिए सम्भव नहीं।

अब कर्म की अनिवार्यता सिद्ध होने पर कर्म करते हुए कर्मबन्धन से मुक्ति का तरीका हमें समझना है, जो इस अध्याय का मुख्य प्रतिपाद्य है। छठे श्लोक से आवश्यकतानुसार हम क्रमशः आगे बढेंगे, पर इसी अध्याय के बीसवें श्लोक को हम देखें:---

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसड्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि।।३/२०।।

राजा जनक से बढकर कोई योगी (ब्रह्मज्ञानी) नही हुआ, जनक सदृश अन्य ज्ञानियों ने भी अनासक्त भाव से कर्म करते हुए ही परमसिद्ध (मोक्ष) को प्राप्त हुए हैं। जिस ब्यक्ति को कुछ भी पाने की लालसा न भी हो, तो भी लोकसंग्रह अर्थात् लोक शिक्षण के लिए भी कर्म करना चाहिए। तात्पर्य कर्म किसी भी परिस्थिति में अनिवार्य है, करने की युक्ति पर सदा ध्यान होना चाहिए, फिर तो यह संसार सुख का सागर बन जाये यदि सारे लोग इस ओर प्रवृत्त हो जाएँ। दुखद है कि सब साधन रहते हम सब ने "श्रीमद्भगवद्गीता" ऐसे ग्रन्थ की पूजा आरती कर ही अपने कर्तव्य की वर्षों से "इतिश्री" समझ लिया है और स्वयं एवं औरों के जीवन को नारकीय बना रहे हैं।

भुख भी है और भोजन भी साथ में है, फिर अगर भोजन को उदरस्थ करने की विधि कोई न अपनाय और भूख से तड़पे तो पास मे स्थित भोजन का क्य दोष। हम मुख्य चिन्तन धारा से विमुख हो जानबुझकर दुःख भोग रहे हैं।

तो आइए तृतीय अध्याय की कर्म करने की रीति जान लें:---
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।३/६।।

अर्थात् जो भी मनुष्य कर्मेन्द्रियों को हठ पूर्वक रोक तो लेता है पर उनके भोग्य विषयों का मन ही मन चिंतन करता ही रहता है, यह मिथ्याचार ही है।

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।। ३/७।।

किन्तु हे अर्जुन! जो पुरूष मन से इन्द्रियों को वश में कर अनासक्त भाव सेसमस्त इन्द्रियों द्वारा कर्म का आचरण करता हुआ भी (कर्मबंधन का भागी नहीं होता) वह विशिष्ट कर्मयोगी है।

तात्पर्य यह है कि हमारी अपनी सामान्य या विशिष्ट कोई इच्छा नही, किसी कर्म के प्रति लगाव या विरोध नहीं, शास्त्र विहित कर्मों का सम्पादन कर्मयोग की विशेषता होती है। हम जिस क्षेत्र जिस संस्था या विभाग में काम करते हों, यदि वहां अपने जिम्मे आए कार्यों का हम बिना लागलपेट के सम्पादन करते हैं, तो वह योजना तो सफल होती ही है, हम खुद भी दोष के भागी नहीं बनते, यही तो निष्काम कर्मयोग है।
क्रमशः--

--सत्यनारायण पाण्डेय 

जली हुई माचिस की तिल्लियों ने मुझसे कहा--



जली हुई माचिस की तिल्लियों ने
मुझसे कहा--


सहेजो न मुझे भी
जैसे तुम शब्दों को सहेजती हो
कविताओं को पूजती हो


गौर से देखो--


संध्या दीप जला कर
लौ को मुझसे ही प्रज्वलित कर
त्याग देती हो मुझे


मैं त्याज्य नहीं!!


कविताएं सहेजती हो न
मुझे भी सहेजो


मैं भी कविता ही हूं 


कई बार
उन कई कविताओं से श्रेष्ठ
जिन्हें तुमने सर आंखों पर बिठाया.

***
तो इन तिल्लियों की बात मान कर
मैंने उन्हें
हटाया नहीं इधर कुछ समय से


रहें ये भी


कि सच कहती हैं ये
ये भी कविता ही हैं


प्रज्वलित कर लौ को खुद त्यक्त !!


ज़िन्दगी !! तू भी कैसी है?!!


पास पास
फिर भी हर क्षण जीवन और मृत्यु में विभक्त


कब किसका पलड़ा भारी हो जाए
कौन जानता है !


बचपन की ओर निर्निमेष ताकते लम्हे-- २


दुनिया के
कितने कोनों में बंट गए हम


ज़िन्दगी की रफ़्तार में
खो गए कितने ही गम


आँख
बेवजह भी रही नम


जोड़े हुए हैं पर उस मिटटी के संस्कार हमें
जुड़ा हुआ है हम सबका मन


भूले नहीं भूलेगा बचपन का वह आँगन !!


School photograph :: Std 7 A :: 1995, Jamshedpur






सुप्रभातम्! जय भास्करः! ३० :: सत्यनारायण पाण्डेय

डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 


सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदयाणां ये गीताज्ञानयात्रायां सहयोगिनः सन्ति।अद्याऽपि "कर्मयोगो नाम"तृतीयोऽध्यायैवसावधानतयावलोकनीयम्।
प्रिय बन्धुगण!
"व्यामिश्रेणेव वाक्येन-----"कह कर ज्ञानयोग एवं कर्मयोग को अलग अलग समझता हुआ अर्जुन यह कह रहा हो--"तदेकं वद निश्चित्य" पर आगे जाकर यह बात भगवान कृष्ण के मुखारविन्द से निकली वाणी से पूर्णतः सुस्पष्ट है कि किसी भी परिस्थिति में कर्म अनिवार्य हैं, चाहे कोई ज्ञानयोग के आश्रय में हो, भक्तियोग के आश्रय मे हो और कर्मयोग तो कर्म करने का स्वतः परिचायक है ही।


तीसरे श्लोक से थोड़ी मानसिक सतर्कता हम सबों के लिए आवश्यक होगी।इतना तो हमे स्वीकार करना ही होगा कि कर्म करना किसी भी परिस्थिति में अनिवार्य है और हम कर्म नहीं करने की दृढ इच्छा के बाद भी कर्म करने से बच नहीं सकते।क्या आप को यह नहीं पता?चुप बैठना भी आज एक क्रिया है।
किसी ने अपनें पांच साल के बेटे से पूछा "श्याम कहां हो?
श्याम :--अपने कमरे में।
क्या कर रहे हो?, श्याम:--बैठा हूं।
वह बैठने का काम तो कर ही रहा है,फिर हम कमर कस कर बैठ भी जांय तो हमारी जो पांच ज्ञानेन्द्रिय हैं ---आंख,नाक,कान,जिह्वाऔर त्वचा तो अपना काम क्रमशः-देखने,सुंघने,सुनने,स्वादऔर स्पर्शरूप कार्य चाहे अनचाहे करेंगे ही।अगर हम हठ पूर्वक सब कुछ बन्द करने की जिद्द में सांस लेना बन्द कर दें तो यह भी एक क्रिया ही कहलाएगी और मृत्युरूप परिणाम और फिर आवागमन का चक्कर।


इसी अध्याय के आठवें श्लोक की दूसरी पंक्ति में भगवान कृष्ण ने अर्जुन के भ्रम को दूर करते हुए कहा :----
"शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः"
कर्म न करने वाले व्यक्ति की जन्म से मृत्यु तक की यात्रा भी सहज रूप से सम्भव नहीं हो पाती।अतः इसी श्लोक की पहली पंक्ति यह स्पष्ट संदेश देती है कि:--
"नियतं कुरू कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।"इसलिए हे अर्जन तुम कर्म में लग जा,क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना ही श्रेष्ठ है।इन सब बातों को इस अध्याय के तीसरे श्लोक से आगे बढने से पहले रखनें का मेरा मात्र उद्देश्य यह है कि हम सब यह भली प्रकार समझ लें कि किसी योग को क्यों न अपनावें कर्म न करने का कहीं कोई विकल्प नहीं है। यही विकल्प बचता है कि हम शास्र विहित कर्मों को, कर्मकरने की कला को,कर्म करने की विधि को भली भांति समझ कर करें!


तो चलें हम इसी मनःस्थिति में गीताज्ञानयात्रा की आगे की यात्रा करें:-
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साड़्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।३/३।।
अर्थात् हे अर्जुन! इस मनुष्यलोक में दो प्रकार से होने वाली निष्ठा मेरे द्वरा दो प्रकार की कही गई है।उन में ज्ञानियों (सांख्यानां) की निष्ठा ज्ञानयोग से और योगियों(कर्मयोगियों) की निष्ठा कर्मयोग से है।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरूषोऽश्नुते।
न च सन्नयासनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।।३/४।।
अर्थात्, मनुष्य न तो कर्मों को आरम्भ किए बिना निष्कर्मता को प्राप्त होता है और न कर्मों के त्यागमात्र से ही सिद्धि को प्राप्त होता है।
आगे जाकर ये दोनों निष्ठा सांख्ययोगाश्रयी एवं कर्मयोगाश्रयी की कार्यपद्धति और स्पष्ट होगी,सांसारिक तौर पर सांख्ययोगी एवं कर्मयोगी के क्रिया कलाप एक जैसे प्रतीत हो सकते हैं,पर बारिकी से विचार करने पर पता चलेगा जहां एक ज्ञानयोगी"इन्द्रियाणीइन्द्रियार्थेभ्यः", "गुणागुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते" की स्थिति में निष्कामभावना के कारण कर्म और कर्मफल के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं, वहीं कर्मयोगी आसक्त भाव और फलाकांक्षा से कर्म करने के कारण बन्धन में पड़ जाता है।


अतः अगर कोई यह सोचता हो चलो हम कर्म करेंगे ही नहीं, फिर कर्मफल उदित होने का प्रश्न ही नहीं, यह निष्कर्मता नहीं है और न तो कर्मों के त्यागमात्र से कोई सिद्धि लाभ ही कर पाता है।


फिर कर्म करने की बाध्यता या अनिवार्यता का उल्लेख करते हुए इसी अध्याय के पांचवे श्लोक में भगवान कहते हैं:--


हे अर्जुन! सृष्टिगत या प्राकृत यह दृढ नियम है कि बिना कर्म किये कोई भी प्राणी क्षण भर भी रह ही नही सकता। क्योंकि हठपूर्वक बैठे व्यक्ति को भी नियति बलपूर्वक काम करा लेती है या प्रकृतिजन्यगुणों के अधीन हो वह कार्य करने को विवश हो जाता है:---
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।३/५।।
फिर समझदारी पूर्वक कर्म करने की प्रवृत्ति क्यों न अपनावें।


क्रमशः--
धन्यवादेन सहितः प्रेष्यते।

--सत्यनारायण पाण्डेय 

बचपन की ओर निर्निमेष ताकते लम्हे-- १


एक शांत सहज सी रफ़्तार में
गिरते फ़ाहे
जता रहे थे
जीवन का होना 


उन्ही के बीच
किसी दिसंबर की दोपहर
था हमारा भी एक कोना 


वहीँ कहीं
हम जी रहे थे
अपना  होना 


कान्हा !!

ममत्व को
आयाम मिला


कृष्ण ने जब अवतार लिया


धरा को
लीलाओं से सधा
दृश्य नयनाभिराम मिला

सुप्रभातम्! जय भास्करः! २९ :: सत्यनारायण पाण्डेय


सुप्रभातः सर्वेषां गीताज्ञानयात्रायां विषादयोगोनामप्रथमोऽध्यायतः मोक्षसंन्यासयोगोनामष्टादशोध्यायपर्यन्तयात्रायं दत्तचित्तसुहृदाणां कृते!

प्रियबन्धु गण! 
हमारी गीता ज्ञान यात्रा क्रमशः विषाद पूर्णमनःस्थिति को स्वस्थ करने हेतु सांड़्ख्ययोग जिसे ज्ञानयोग भी कहते हैं, लगाव रहित हो कार्य कर कर्मबन्धन से बचने का उपाय सहजता से बताया गया।

अब जब कर्म करना सुनिश्चित हुआ तो "कर्मयोग" नामक तीसरे अध्याय में आज प्रवेश करेंगे। इससे पहले हम इन बातों को भी ध्यान में रखें---गीता का विभाजन भले कुछ अध्यात्मिक चिन्तकों नें तीन मुख्य कर्म-ज्ञान-भक्ति में विभक्त किया है, पर यह मुख्य रूप से "ज्ञानसंबलितकर्मयोगशास्त्र" ही है, जिसके उद्घोषक दर्शनशास्त्र के मूर्धण्य विद्वान देश के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली डाॅ राधाकृष्णन जी हैं। यह ही सर्वथा उचित भी है, क्योंकि ज्ञान और भक्ति भी क्रियायोग बिना प्रत्यक्ष परिलक्षित कैसे हो सकेंगे। कहा भी है "ज्ञान भारं क्रियां बिना" क्रिया के अभाव में ज्ञानी का ज्ञान भी भार स्वरूप होता है।भक्ति भी कर्म की सहायता के बिना सम्भवतः दृश्यमान नहीं हो पाती।

इस तरह कर्मयोग की अनिवार्यता सिद्ध होती है, जिसकी चर्चा ही तृतीय अध्याय का मुख्य विषय है। गीता का मुख्य श्रोता अर्जुन भगवान कृष्ण से जो उपदेशक, सलाहकार, काऊंसलर सब कुछ हैं, तरह तरह की शंकाओं को उपस्थित् करता हुआ निःसंदिग्ध रूप से अपने लिए निर्णय की मांग करता है।

अर्जुन के प्रश्न ही आज हम सब के प्रश्न हो गए हैं, इसी लिए तो गीता का उपदेश देश काल से परे और शाश्वत है। पर हठी मानव अज्ञानी होता हुआ भी ज्ञान के गुमान में तब तक कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं होता जबतक वह विषादग्रस्त न हो जाय। विषाद के कारण ही ज्ञानपूर्ण कृष्ण की बातों से भ्रमित हो पूछ बैठता है:--
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मनस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।3/1।। 

अर्थात् हे केशव!यदि आपके अनुसार भी कर्म की अपेक्षा ज्ञान ही श्रेष्ठ है, तो मुझे इस युद्धरूप घोर कर्म में लगने की शिक्षा या प्रेरणा क्यों दे रहे हैं।

अर्जुन अपने पराए के भेद से भ्रमित हो, गुरूजनों एवं अपने लोगों की हत्या कर राज्यसुख भोगने के बजाय भीख मांग कर जीवनयापन का निश्चय कर चुका है, अतः कर्म करने की अनिवार्यता को भली भांति न समझ पाने के कारण श्रीकृष्ण से कहना चाहता है कि आपके अनुसार भी ज्ञान कर्म से ज्यादा श्रेष्ठ है, तो मुझे ज्ञान मार्ग की ही शिक्षा दें, जिससे मैं मरो मारो वाले घोर युद्ध कर्म से भी बच जाऊं और ज्ञानमार्ग का अनुसरण कर परमश्रेय भी पा लूं।
हे केशव! तुम्हारी मिली जुली बातों से मैं भ्रम में पड़ गया हूं।
अतः अर्जुन कह उठता है:---
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकः वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम ।।3/2।।

हे कृष्ण !आपकी मिली जुली बातों से मेरा मन मोहित
(भ्रमित) सा हो गया है, अतः आप मेरे लिए एक बात का निश्चय कर बतायें जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो सकूं।
तृतीय अध्याय की यह आधार भूमि को हम ध्यान में रखेंगे तो आगे की बातें सहज प्रतीत होंगी। जय श्रीकृष्णः!
क्रमशः

--सत्यनारायण पाण्डेय 

मन पतवार हो जाए


उन्हें सहारा देने को
दीवार हो जाए


मन
डूबती हुई आस की ख़ातिर
पतवार हो जाए


पर्वत सा
अटल अचल रहे कभी


कभी कल-कल बहती
धार हो जाए


मन
डूबती हुई आस की खातिर
पतवार हो जाए


बूंदों में
झिलमिल इन्द्रधनुष


जिजीविषा का
एकनिष्ठ सूत्रधार हो जाए 


मन
डूबती हुई आस की खातिर
पतवार हो जाए

स्वप्न और स्वप्न में खिली कविता

जो समाधान जागते हुए बड़े प्रयास के बाद भी नहीं मिलते, कभी कभी वो सारे हल स्वप्न दे जाता है... वास्तव में वह स्वप्न स्वप्न नहीं होता... उसकी तरलता इतनी वास्तविक होती है कि आँखें बहने लगती हैं. ये रोना कुछ अलग ही होता है कि हम अवचेतन रूप से रो रहे होते हैं, खुद आँख बेगानी होती है, भीगती है तब उसे एहसास होता है कि बह रही है. ऐसे ही आँखों से नींद के किसी द्वार पर खाड़ी मिल जाती है कविता... जग कर उसे जैसा देखा वैसा हम कागज़ पर उतार देते हैं और पहले से ही उपस्थित अस्तित्ववान उस कविता को अपनी रचना कह देते हैं... जगत व्यवहार सी बात है, ऐसे ही चलती है पर स्वप्न देखने वाली आँखें जानती हैं कि उसने बस देखी कविता रचित होती हुई, उसने बस देखे हल यूँ ही अनायास आँचल में खिलते हुए...
समस्यायों का निर्जन वन क्या कभी स्वप्न और कविता के उस धरातल तक जा पायेगा... क्या समझ पायेगी यह स्थूल दुनिया उस सूक्ष्मता का  मर्म!


***
सपने में देखा तुम्हें. तुम्हारी मुस्कराहट भी. तसल्ली हुई कि सब ठीक है. अच्छे हो तुम और संवाद की कोई सम्भावना न होते हुए भी हमने खूब  बातें की. स्वप्न ने हमें वो ज़मीं दी, जहाँ हम दो घड़ी बैठ जीवन को थाह सकें.
***


रात्रि का अन्धकार ममत्व से परिपूर्ण होता है. वह सबके लिए एक सी करुणा बरसता है कि सकल आत्माएं स्नेहमयी गोद में विश्राम कर सुबह की तपन झेलने का ताब खुद में जज़्ब कर सकें. दिन के हिस्से तो कई भेद भाव हैं. सबके हिस्से एक सी सुबह कहाँ आती है, न ही संतोष शांति की धूप ही हर छत एक सी खिलती है.
***

सुप्रभातम्! जय भास्करः! २८ :: सत्यनारायण पाण्डेय

सुप्रभातः सर्वेषां श्रीमद्भगवद्गीताज्ञानयज्ञयात्रायां संलग्नानांसुचिन्तनरतां सुहृदाणां कृते।


प्रिय बन्धुगण!
क्रमशः गीता ज्ञान यात्रा क्रम में सांख्ययोगो नाम द्वितीय अध्याय के उपसंहार की ओर बढ चले हैं, आज अन्तिम चार श्लोक ६९-७२वें श्लोक तक की सहज ज्ञान गरिमा को अपने मन मस्तिष्क हृदय में धारण करते हुए आगे की यात्रा में बढने की चेष्टा होगी।

यह तो पहली शर्त होती ही है "शास्त्रेषु चिन्तितमपि परिचिन्तनीयम्", "अनभ्यासे विषम विद्या"।
शास्र चिन्तन की प्रक्रिया, आचरण में समाहित करने की प्रतिबद्धता होनी ही चाहिए, क्योंकि अभ्यास के बिना विद्या विषम कठिन या विषम=विषसमम्=विष के समान हो जाती है।
अतः दैनन्दिन अपनी अपनी कार्यव्यस्तता से कुछ क्षण अध्यात्म के लिए भी हमें जरूर निकालना चाहिए। यह इस लिए भी जरूरी है कि एक पीढी यदि सुधर गई तो भावी पीढी स्वतः अध्यात्म मार्ग की प्रेमी और पथिक होती चली जाएगी।


तो अब चलें द्वितीय अध्याय के उपसंहार की ओर--
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।६९।।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापःप्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।७०।।विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निः स्पृहः।निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति।।७१।।

एषा ब्राह्मी स्थिति पार्थःनैनां प्राप्य विमुह्यति।स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।७२।।

अब चारों श्लोकों के सरल और विशिष्ट संकेतों पर हम अपनी बुद्धि लगायें--यहां ६९वें श्लोक में कहा गया है कि जो सभी प्राणियों के लिए रात्रि के समान है, उसमें संयमित पुरूष जाग रहे होते हैं और जिस सांसारिक वस्तुओं के संकलन में लोग अज्ञान के कारण मोहग्रस्त हो लगे रहते है, उस समय मननशील मुनि "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" के तौर सब कुछ देख समझ रहा होता है। और संसार में जीने की कला इस तरह हमारे नित्य के अभ्यास में आ जाय तो कबीर दास के शब्दों में "जस के तस रख दिन्ही चदरिया" की स्थिति हो जाती है। हम प्रायः आरती में गाते हैं, पर शायद मर्म नहीं समझते-------"तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा" यह सहज उच्चारण हम सब के समझ का भी विषय बन जाय तो मैं, मेरा--तैं, तेरा का भाव तिरोहित हो जाय। और बन्धन का कारण भी तो यही हो जाता है।


७०वें श्लोक में यह उदाहरण प्रस्तुत किया गया कि समुद्र अपने आप में अचल और परिपूर्ण है, उसमें नदियां मिले न तो उसकी आकांक्षा होती है और न सैकड़ों नदियों के मिलने पर उसमे कोई अव्यवस्था या विकार ही उत्पन्न होता है वैसे ही हममें भी सारी कामनाएँ बिना विकार या हलचल के समा जाए तो परम शान्ति मिल जाय क्योंकि कामनाओं के वशीभूत हुआ व्यक्ति कभी शान्ति पा ही नहीं सकता।
७१वें और ७२वें श्लोक में कहा गया कि उन अनन्त कामनाओं से अलग होता हुआ जो स्वभाव से प्राप्त कर्मों को लगाव रहित, ममता और अहंकार रहित होकर करता चला जाता है, वही शान्ति प्राप्त करता है।

हे पार्थ! (अर्जुन) यही ब्राह्मीस्थिति यानि ब्रह्म को प्राप्त हुए व्यक्ति की स्थिति होती है, जो एक बार इस स्थिति को प्राप्त कर लेता है ,कभी भी मोह में नहीं पड़ता और इस स्थिति को प्राप्त व्यक्ति संसार में सांसारिक कर्मों को करता हुआ ब्रह्म और निर्वाण को ही प्राप्त होता है।


इस तरह द्वितीय अध्याय की यात्रा पूरी किए कल से हम सब "कर्मयोगोनाम्" तृतीय अध्याय की यात्रा करेंगे।
क्रमशः।

--सत्यनारायण पाण्डेय 

यात्रा के आयाम

यात्रा के
उस मोड़ पर
पंछी थे, पानी था, गहराई थी



हम
होकर भी कहीं नहीं थे
ये भी एक सच्चाई थी


आँखों का पानी
आँखों में झिलमिल कर
बरस जाता था


एक वो भी क्षण आया

कभी न कभी
आता ही है 


जब नयनों का कोर
उन बूंदों को
तरस जाता था 


यूँ ही
यात्रा के आयाम
तलाशते है 


कभी हम
जीवन को तरसते हैं
कभी उसे तराशते हैं !!

सुप्रभातम्! जय भास्करः! २७ :: सत्यनारायण पाण्डेय

सुप्रभातः सर्वेषां श्रीमद्भगवद्गीयायाः क्रमशः विषादयोगोनाम प्रथमोध्यायतः मोक्षसंन्यासयोगअष्टाध्यायपर्यन्तं सहयात्रायां ये यात्रिणः सहयोगिनः सन्ति तेषां कृते!

प्रिय बन्धु!
मैं प्रथमतः पुनः निवेदन करना चाहता हूं कि गीता के प्रत्येक शब्द व्याख्येय और धारण करने योग्य हैं, केवल समयाभाव और विस्तृतफलक की कमी और कम समय में मुख्य शिक्षा को ध्यान में सहेजने की दृष्टि से सार संक्षेप का अनुसरण किया जा रहा है।
कल तक द्वितीय अध्याय के ५७वें श्लोक तक की यात्रा कर चुके और कर्म की अनिवार्यता लगावरहित करने के निर्णय तक तो हम पहुंच चुके। स्थितप्रज्ञ की चर्चा आगे के श्लोकों में भी है:--
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरूषस्य विपश्चितद। इन्द्रियानि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनृ।।६0।।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।६१।।


यहां यह अगाह किया गया है कि कर्म मार्ग में प्रवृत्त व्यक्ति भी यदि इन्द्रिय सुख के प्रति थोड़ा भी आकर्षित हुआ तो उसके मन को भी इन्द्रियां प्रभावित कर देती हैं। अतः इन्द्रियों को प्रयत्नपूर्वक संयमित करते हुए परमात्मबुद्धि होकर विषयों के चिन्तन से अपने को मुक्त रखने वाला ही स्थितप्रज्ञता को प्राप्त होता है यह स्मरण रखना चाहिए।
यहां हम सब के लिए ध्यान देने योग्य बात यह है कि, हमे अपने को सत्कर्मों मे व्यस्त रखना चाहिए क्योंकि खाली मन ही तो शैतान का घर कहा गया है!


मन बड़ा बलशाली होता है, पर यह निर्मल आईने की तरह भी है, इसके सामने से जो चीज गुजरेगी उसका बिम्ब उसपर बनना ही बनना है, तो ऐसे स्वच्छ और बलशाली मन को अच्छी ही चीजों से जोड़नें का प्रयास ही किया जाये। 

आगे के ६२ वें एवं ६३ वें श्लोक में यही तो स्पष्ट किया गया है-- अगर हम विषयभोग के चिन्तन में लगते हैं तो,संगता के कारण प्राप्ति की प्रबलता होगी, इच्छा पूरी न हुई तो क्रोध उत्पन्न होगा, क्रोध सम्मोहन पैदा करेगा, सम्मोहन से स्मृतिविभ्रम की स्थिति में बुद्धि का नाश होने से तो मनुष्य का पतन की गर्त में जाना सुनिश्चित है।

अतः  ६४ वें एवं ६५ वें श्लोक में एक सुगम मार्ग बतलाते हुए कहा गया कि "यदृच्छालाभ संतुष्टः" की तरह राग द्वेष से परे होकर इन्द्रिय से विषयों के प्रति आचरण करता हुआ अपने आप को वश में रखने वाला परम प्रसाद (प्रसन्नता) को प्राप्त हो जाता है।

यहां स्पष्टीकरण के लिए एक यह उदाहरण ले सकते हैं:--प्रजा की वृद्धि एवं पितृ ऋण से एक संतान के लिए सामाजिक व्यवस्था सराहनीय है, पर मन मानी बलात्कार है, निन्दनीय है, बन्धन का कारण है। भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा भी है:--

"धर्माविरूद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।।७/११
अर्थात् धर्म के अविरूद्ध (धर्मसम्मत) काम (विषय ) भी सभी प्राणियों के अन्दर मेरा ही रूप है।

अतः तय हुआ शास्त्रसम्मत कर्मो का अभ्यास करते हुए सर्वत्र लगावरहित होकर यह इन्द्रियां ही इन्द्रियों में बरत रही हैं ! ऐसा मान कर चलने वाला व्यक्ति स्थिर प्रज्ञा वाला कहलाता है। यहां यों समझा जाये-- हमारी आंख रूप इन्द्रिय का काम है देखना, जैसे स्वच्छ दर्पण के सामने जो वस्तु जाएगी उसका उसमें विम्ब बनेगा, पर दर्पण की कोई इच्छा नहीं कि कौन सी वस्तु सामने लायी जाये, कौन सी नही, ठीक वैसे ही अपने सभी ज्ञानेन्द्रियों के प्रति सहज होते हुए आत्मवशी होकर विहित कर्मो में प्रवृत्त हों। मुक्तिमार्ग प्रशस्त होगा।

द्वितीय अध्याय समाप्ति पर है --६९ से ७२ चार श्लोंको की व्यख्या के साथ कल के आलेख में उपसंहार प्रस्तुत किया जाएगा।


जय श्रीकृष्ण!
क्रमशः---------

--सत्यनारायण पाण्डेय 

सुप्रभातम्! जय भास्करः! २६ :: सत्यनारायण पाण्डेय

डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय

सुप्रभातःसर्वेषांसहृदयानांकृतेये गीतायाः विषादयोगनाम प्रथमध्यायतः मोक्षस-न्यास योगाष्टादशाध्याय पर्यन्त यात्रायां रूचिं धारयन्ति।

कल की चर्चा यहां तक थी "योगस्थः कुरू कर्माण..."
हे अर्जुन! तुम लगाव रहित होकर कर्म में लग जा। कर्म की सफलता असफलता के बारे में व्यर्थ चिन्तन कर समय नष्ट न करजहां तक कर्म फल का प्रश्न है तो इस विषय में शास्र ही प्रमाणित करते हैं कि "नभुक्तं क्षीयते कर्म  कल्प  कोटिशतैरपि" अर्थात् करोड़ों कल्पों के बाद भी भुगते बिना समाप्त नहीं होते चाहे हमारे शुभकृत्यों के शुभ फल हों या कुकर्मजनित कुफल हों।
अबतक कर्म और कर्मफल दोनों की अनिवार्यता सिद्ध हुई। आगे  द्वितीय अध्याय के अगले श्लोकों में भगवान् कृष्ण अर्जुन से कार्यसम्पदन की कला की विवेचना के क्रम में कहते हैं कि--हे अर्जुन!बुद्धिमान व्यक्ति अपने अनासक्त भाव के कारण अपने सुकृत और दुष्कृत्य  दोनों को यहीं छोड़ देते हैं, इसलिए तुम भी योग युक्त होकर कर्म में लग जा। यह योग और कुछ नहीं "योगः कर्मसु कौशलम्" अर्थात्, कर्म की कुशलता ही तो योग है।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्मातद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु  कौशलम्।।५०।।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं  गच्छन्त्यनामयम् ।।५१।।
इक्यानवें श्लोक में यह स्पष्ट कर दिया गया कि कर्म के प्रति समर्पित व्यक्ति कर्म फल का यहीं त्याग करता हुआ, जन्म मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो दोष रहित हो सात्त्विक लोक  को  प्राप्त होता है।

यहां हम जनसामान्य के लिए ध्यान देने योग्य बात यह है कि कर्म और कर्म फल दोनों अनिवार्य हैं। अनासक्त यानि लगाव रहित एवं  फलाकांक्षा से रहित कर्म, बन्धन के कारण नहीं होते और प्रत्येक व्यक्ति इस भाव से कर्म करता हुआ "पदं गच्छन्त्यनामयम्" अनामयं =पवित्र स्थान प्राप्त कर लेता है। बस हमें कर्तव्यभाव से भावित हो कर्म पथ पर बढते जाना है ।

आगे अर्जुन नें भगवान् कृष्ण से स्थितप्रज्ञ का लक्षणा जानना चाहा है:-
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किंतु प्राप्त किमासीत व्रजेत किम्।।५४।।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की सहज पहचान अर्जुन करना चाहता है ताकि सहज ढंग से वह भी स्थितप्रज्ञता को अपनाने की कोशिश कर सके ।यह हम सब के लिए भी सहजता से समझने की जरूरत है। अर्जुन  पूछता है, हे कृष्ण! मुझे बताएं स्थितप्रज्ञ का लक्षण क्या है, समाधिस्थ व्यक्ति कैसा  होता है ? जो व्यक्ति बुद्धियुक्त हो गया है--वह कैसे बोलता है ? कैसे खाता है ? और कैसे चलता है ? बड़े सहज ढ़ंग से वह स्थितप्रज्ञ का लक्षण जानना चाहता है, जिससे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की पहचान जन साधारण भी  कर सकते हैं-- बोलने की शैली, भोजन का ढ़ंग, और फिर चलने के ढ़ंग के आधार पर।  
          
श्रीभगवानुवाच 
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।।५५।।
दुःखेष्वनुद्वग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः        स्थितधीमुनिरूच्यते।।५६।।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।५७।।

अर्थात!

श्री भगवान्‌ बोले, हे अर्जुन! जिस काल में मनुष्य, मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भली भाँति त्याग देता है, और मन से आत्म-स्वरुप का चिंतन करता हुआ उसी में संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है.

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिर-बुद्धि कहा जाता है.

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ यदृछ्या (प्रारब्धवश) प्राप्त शुभ या अशुभ से न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है!

सुगमता के लिए स्थितप्रज्ञ की मन:स्थिति हम सभी समझ सकें इसी दृष्टि से यहाँ अर्थसहित द्वितीय अध्याय के उपर्युक्त तीन श्लोक अर्थसहित दिए गए! यहाँ स्पष्ट है कि हमें केवल कामनाओं से विमुख होना है, कर्म से नहीं, दुःख-सुख में सामान होने का अभ्यास होना चाहिए भय और क्रोध कभी पास फटकने न पाए और उसी तरह शुभ के प्रति लगाव और अशुभ के प्रति दुराव हममे नहीं होना चाहिए, इसी मानसिक स्थिति को तो स्थितप्रज्ञता कहा गया है!

अंततः यह बात स्पष्ट होती है कि हमें लगावरहित होकर कर्म में ही निरत रहना है. हमारे द्वारा किया गया संयमित कर्म ही हमारा भाग्य/प्रारब्ध बनता है, अतः स्पष्ट है, कि भविष्य के निर्माण या मुक्ति मार्ग के लिए कर्म संपादन में सतर्कता और कर्मकुशलता ही  स्थितप्रज्ञता की पहचान है!
क्रमशः 
सधन्यवाद!

--सत्यनारायण पाण्डेय


वो सागर हो जाती है




रास्ता
चलता रहा 


चलते-चलते
रास्ते का एक सिरा समंदर से जा मिला.


यूँ ही तो
अपना सफ़र तय कर
नदियाँ भी समंदर से मिल जाती होंगी !


जहाँ से समंदर शुरू होता है
ठीक उसकी दहलीज़ तक पहुँच कर
रास्ता रुक जाता है 



मगर
नदी के सन्दर्भ में
कुछ और ही बात है 


वह जहां समाप्त होती है
वहीं से उसका वास्तविक जीवन शुरू होता है 


सागर से एकाकार हो
वह सागर सी हो जाती है
फिर उसकी यात्रा कभी नहीं थमती 


वह
कई नदियों को फिर थामती है
लहरों की हो जाती है 


नदी खोती नहीं
न ही मिटता है उसका वज़ूद 


बस इतना ही यात्रा है--


नदी, नदी नहीं रहती
सागर हो जाती है !!



*** *** ***

[[ एक रास्ता पकड़ कर चलते रहे, रास्ता समंदर तक पहुंचा कर, रुक गया. वहां से पीछे लौटना था, वही रास्ता पकड़ कर हम वापस लौटने लगे और चेतना के धरातल पर एक नदी करवट लेती रही. उसी नदी ने लिखवाया यह कविता-सा-कुछ ]]

ऐसा भी होता है

रिश्तों की जितनी परिभाषाएं थीं
सबकी अपनी सीमा थी

जो नाम दिए जा सकते थे
वो सब कहीं न कहीं बौने थे

जुड़ाव अनजान था
अनाम था

हमने उसे
वैसा ही रहने दिया

जब ख़ामोशी थी तो खामोशियाँ सुनी,
ख़ामोशियों को कहने दिया

यूँ चलते-चलते सफ़र में
रिश्तों के गगन पर
अपनेपन के कई सितारे टांके

जीवन के सुनसान में
कितने ही
मर्मान्तक अनुभूतियों के दंश आंके

इस तरह
कविता का आँगन हमें मिला

प्रेरणा के प्रताप से
सुमन खिला.

हमने जाना-


बियाबान 

ख़ाली पांवों के दर्द से 

रो पड़े-
ऐसा होता भी है

बहुत दुःख दंश है यहाँ
पर यही वो संसार है
जहाँ एक दूजे के दुःख को
अपना मान-
मन रोता भी है.

सुप्रभातम्! जय भास्करः! २५ :: सत्यनारायण पाण्डेय



सुप्रभातःसर्वेषां गीतायाः विषादयोगोनां प्रथमोऽध्यायतः मोक्षसंन्यासयोगोनामष्टादशाध्यायपर्यन्तं यात्राक्रमे संलग्नानां सुहृदाणां कृते!


मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने।
सकृद् गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम्।।

तात्पर्य स्पष्ट है कि शारीरिक मलशुद्धि के लिए नित्य स्नान की आवश्यकता होती है पर गीता रुपी जल में एक बार स्नान कर लेने से भी चित्त में व्याप्त सांसारिक मल सदा के लिए धुल जाते हैं. 

आगे मोहग्रस्त अर्जुन को उद्बोधित करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं :-

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌ । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ (४४)
भावार्थ:: जो मनुष्य इन्द्रियों के भोग तथा भौतिक ऎश्वर्य के प्रति आसक्त होते हैं, उनमें ईश्वर निर्धारित व्यवस्था के प्रति दृड़-संकल्पित बुद्धि नहीं होती और वह सांसारिक हानि-लाभ को ही सत्य मानता हुआ श्रेय की ओर प्रवृत्त नहीं हो पाता. आगे ४५वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, हे अर्जुन! वेद भी तीन गुणों (सत्व, रज, तम) की ही व्याख्या करते हैं  तुम इन तीन गुणों से ऊपर उठ कर द्वन्द रहित हो नित्य ही सतोगुण में स्थित होकर योग और क्षेम के प्रति चिंता मुक्त हो आत्म परायण हो जाओ, अर्थात् आत्मबुद्धि से कर्तव्यपरायण हो जा! 

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌ ॥ (४५)

आगे कर्मफल के प्राप्ति के प्रति संदिग्ध अर्जुन को समझाते हुए कृष्ण कहते हैं कि-- 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ (४७)

भावार्थ:: तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में अधिकार नहीं है, इसलिए तू न तो अपने-आप को कर्मों के फलों का कारण समझ और न ही कर्म न करने में तेरी आसक्ति ही हो। यह श्लोक सामान्य जनसमुदाय में यह संदेह उत्पन्न करता रहा है कि जब हमारा फल में अधिकार ही नहीं है तो हम कर्म में प्रवृत्त क्यूँ हों. यहाँ विशेष रूप से इस श्लोक की दूसरी पंक्ति पर भी ध्यान जाना चाहिए "मा कर्मफलहेतु:भू:" अर्थात् तुम कर्म संपादन में अपने को कारण मत समझो, तात्पर्य यह हुआ कि तुम मात्र माध्यम हो, और न तो तुम्हें कर्मों के न करने के प्रति ही लगाव हो. पहली पंक्ति में जो यह कहा गया "कर्मण्येवाधिकारस्ते" यानि कर्म मात्र में ही तुम्हारा लगाव होना चाहिए, फल में नहीं ! यहाँ अधिकांश लोग भ्रमित हो जाते हैं कि जब फल प्राप्ति में अधिकार ही नहीं होगा तो कोई कर्म करने के लिए प्रवृत्त ही क्यूँ हो. यहाँ हमें एक उदहारण से इसे समझना चाहिए-- मान लें एक फलदार वृक्ष ही हम लगाना चाहते हैं तो उसे भूमि में आरोपित कर सुरक्षा प्रदान करना हमारे कार्यक्षेत्र में आता है, अगर हम फल की चिंता न भी करें और नित्य यह न भी दोहराते रहे कि "पेड़ में फल लग जाए, फल लग जाए", तो भी समय पर वृक्ष अवश्य ही फलेगा, यह सुनिश्चित है. ठीक उसी प्रकार कृषक का काम बीजवपण करना है, और फसल की सेवा और सुरक्षा रूप कर्तव्य का पालन ही उसके अधिकार क्षेत्र में है. फल स्वतः मिलेगा साथ ही वह फल कई अन्य बातों पर निर्भर है जिसपर मनुष्य का कोई वश नहीं, लेकिन कर्म करना निश्चित रूप से प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में है, इसमें कोई संशय नहीं. इसलिए कृष्ण अर्जुन को स्पष्ट करते हुए कहते हैं, कि तुम्हारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में है, फल के व्यर्थ चिंतन में नहीं. न तो तुम्हे अपने को कर्म संपादन का हेतु मानना है, और न ही कर्म न करने के प्रति लगाव ही तुम्हे होना चाहिए. इस प्रकार जनसाधारण के लिए भी यह तथ्य सहज सुगम है.

आगे ४८वें श्लोक में कृष्ण कहते हैं, कि हे अर्जुन! तुम आसक्ति (लगाव) रहित होकर कर्म की सिद्धि अथवा असिद्धि में समान भाव रखते हुए कर्म करने में प्रवृत्त हो जा. यही समत्व योग है.

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय । सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ (४८)

अब यहाँ किसी संशय की गुंजाईश नहीं है कि हमें क्या करना चाहिए. कर्म करने की अनिवार्यता प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुनिश्चित है. वह कर्म किये बिना रह भी नहीं सकता. मात्र इतना ही ध्यान रखना चाहिए कि हमें जो कुछ करना है लगाव रहित हो कर, कर्तव्य भाव से, विहित कर्मों को करते जाना है. इस प्रकार निर्द्वंद भाव से कर्म करना ही हमारे अधिकार क्षेत्र में आता है, यह स्पष्ट है!!

क्रमशः 
सधन्यवाद!

सत्यनारायण पाण्डेय

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