अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

आपसी सौहार्द ... इंसानियत... औ ' प्यार

अम्बर की गोद में बिखरी चंदा की चांदनी ...
ज्यूँ अंधकार पे विजय पाती है
अनगिनत बिखरे तारों के बीच केवल एक अकेला चाँद जब अपनी चांदनी के साथ होता है -
तो कितने ही बुझे उम्मीदों की ज्योति जग जाती है

वैसे ही अगर साथ हो हम
तो हर अन्धकार से लड़ लेंगे
धरती माँ का सारा दर्द -
हम अपने हिय में भर लेंगे

फिर देखना -
कैसे नहीं छूमंतर होता है ये दुनियावी दर्द का व्यापार
जब दीप बन कर जल रहा हो... आंसू के मोती सा निर्मल -
आपसी सौहार्द ... इंसानियत... औ ' प्यार

3 टिप्पणियाँ:

राजभाषा हिंदी 12 सितंबर 2010 को 4:30 am  

वैसे ही अगर साथ हो हम
तो हर अन्धकार से लड़ लेंगे
धरती माँ का सारा दर्द -
हम अपने हिय में भर लेंगे
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति!

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

देसिल बयना – 3"जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे !!", राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी की प्रस्तुति, पधारें

संगीता स्वरुप ( गीत ) 12 सितंबर 2010 को 12:05 pm  

अच्छी सोच ..पर क्या सब ऐसा कर पाएंगे ...यह एक यक्ष प्रश्न है ..

मनोज कुमार 12 सितंबर 2010 को 8:04 pm  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
काव्यशास्त्र (भाग-1) – काव्य का प्रयोजन, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की प्रस्तुति पढिए!

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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