अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

.....कहो तो, अपना ऊर दिखलाऊं !

प्रकृति में कितने सुन्दर विम्ब बसे हैं..
किसे लिखूं..क्या कह जाऊं
इतनी विविधता है धरा की गोद में
मैं किसकी महिमा गाऊं

झर झर झरते पानी में
इतनी शीतलता झलकती है
माटी की सौंधी खुशबू से
मेरी हृदय धरित्री महकती है

समेट सकूँ ऐसे दुर्लभ उपहार
इतना बड़ा आँचल कहाँ से लाऊं
ऐसी समृद्धि से प्रतिपल सुगन्धित है
शब्दों में कैसे यह भाव कह पाऊं

नीड़ का निर्माण करती..उड़ती है
आह्लादित हो चहकती है
चिड़िया आसमान की होती हुई भी
धरा से सच्चा प्रेम करती है

ऐसी व्यवहारिकता..ऐसा अनुशासन
कैसे अपने मानव समाज में पाऊं
इतना मीठा...इतना कोमल-
कलरव सी तान..कैसे गीतों में लाऊं

इश्वर का ही विम्ब सर्वत्र है
परमात्म शक्ति हर कण में बसती है
हर डाली उसकी कलाकारी...
मानवता को आशीषती रहती है

इन आशीर्वादों के योग्य बन सकें
ऐसी पात्रता कहाँ से लाऊं
सब की एक ही व्यथा है
कहो तो,अपना ऊर दिखलाऊं

प्रकृति में कितने सुन्दर विम्ब बसे हैं..
किसे लिखूं..क्या कह जाऊं
इतनी विविधता है धरा की गोद में
मैं किसकी महिमा गाऊं

8 टिप्पणियाँ:

Dr.J.P.Tiwari 20 सितंबर 2010 को 10:03 am  

अच्छी रचना पढ़ने को मिलीं
धन्यवाद

Udaya 20 सितंबर 2010 को 10:05 am  

विविध नेमतें बसी यहाँ हैं
किस किस को गले लगाऊं
सबको बस सिमटकर उर में
मैं जीवन की महिमा गाऊँ

Udaya 20 सितंबर 2010 को 10:06 am  

विविध नेमतें बसी यहाँ हैं
किस किस को गले लगाऊं
सबको बस सिमटाकर उर में
मैं जीवन की महिमा गाऊँ

राजभाषा हिंदी 20 सितंबर 2010 को 10:21 am  

ऐसी व्यवहारिकता..ऐसा अनुशासन
कैसे अपने मानव समाज में पाऊं
इतना मीठा...इतना कोमल-
कलरव सी तान..कैसे गीतों में लाऊं
यह सोच बहुत आशावान है। जब आप सोच रही हैं तो सब आ ही जाएगा, जाएगा क्या आ ही चुके हैं सारे बिम्ब। बहुत सुंदर!

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
समझ का फेर, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वरूप की लघुकथा, पधारें

मनोज कुमार 20 सितंबर 2010 को 11:37 am  

एक सच्चे, ईमानदार कवि के मनोभावों का वर्णन। बधाई। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

और समय ठहर गया!, ज्ञान चंद्र ‘मर्मज्ञ’, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

Ghulam Kundanam 20 सितंबर 2010 को 1:35 pm  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Ghulam Kundanam 20 सितंबर 2010 को 1:37 pm  

बहुत ही ह्रदय-स्पर्शी कविता है अनुपमा बहन. ऐसा लगा जैसे खुदा-भगवान के बीच बैठ कविता पढ़ रहा हूँ।

GK,
Citizen of Azad Hind Desh,
(PK+IN+BD).

राकेश पाठक 20 सितंबर 2010 को 2:45 pm  

बहन अनुपमा
बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति ......
कवियों सी कुछ भी, बहुत ही सरल तरीके से व्यक्तय करने की तुममे अद्भुत क्षमता है. मेरा सौभाग्य है की वर्षो बाद... वापस तुम्हारी कविताये पढने को मिल रही है ...हमेशा कुछ ऐसा मर्मस्पर्शी लिख जाती हो जिसे पढना सिर्फ आनंदायक ही नहीं सुकून देने वाला होता है ...देखो न इन पंक्तियों में कितना सार छिपा है....
समेट सकूँ ऐसे दुर्लभ उपहार
इतना बड़ा आँचल कहाँ से लाऊं
ऐसी समृद्धि से प्रतिपल सुगन्धित है
शब्दों में कैसे यह भाव कह पाऊं
तुम्हे तुम्हारे उर दिखाने की कोई जरुरत नहीं कविता खुद इसे बयां कर रहा है . शव्दों की गरिमा देना कोई तुमसे सीखे.
बहुत बहुत बधाई मेरी "अनंत संभावनाओ वाली " बहन
राकेश

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