अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जिंदगी कैसे कैसे... अनुभूति के रंग सजाती है !

बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !

बीत गया,
भले बीत गया...
पर टीस उसकी
आज भी रुला जाती है !

तुम्हारी अपनी सोच,
अपने तर्क तरीके है
हम ही ग़लत, अभागे है
हमे तो शीतलता जलाती है !

जब ढह रहे थे सारे संबल तब
काश ! तुमने हमारा पक्ष लिया होता
ऐ जिंदगी ! ये व्यथा-
हमें सदा सताती है !

आधारहीन नहीं हैं
हमारे कष्ट...हमारी शिकायतें
ये बात और है, कि-
तेरी हर शाम हमें लुभाती है !

तू जरा सा संवेदनशील होती
हमारी भावनाओं के प्रति
तो क्या बात होती,
ये बात हमे भावविभोर किये जाती है !

लाचार सी आँखों से
सपने जो दूर हुए
संबंधों की सकल सच्चाई
ओझल सी हुई जाती है !

क्या कहें...
किसे दोष दें...
उलझे हुए हैं सब लोग ...
साँसें बोझिल हुई जाती है !

अब जाना
सब मतलब के रिश्ते हैं
जिंदगी कैसे-कैसे
अनुभूति के रंग सजाती है !

बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !

11 टिप्पणियाँ:

ओशो रजनीश 27 सितंबर 2010 को 9:37 pm  

अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

जाने काशी के बारे में और अपने विचार दे :-
काशी - हिन्दू तीर्थ या गहरी आस्था....

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प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 27 सितंबर 2010 को 9:57 pm  

बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !
- बहुत सुंदर अनुपमा जी

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 27 सितंबर 2010 को 10:02 pm  

बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !
- बहुत सुंदर अनुपमा जी

Udan Tashtari 28 सितंबर 2010 को 12:47 am  

बहुत बढ़िया है..

अनुपम ध्यानी 28 सितंबर 2010 को 4:43 am  

bahut umda Anupama jee

Nitindra 28 सितंबर 2010 को 5:37 am  

जब ढह रहे थे सारे संबल तब
काश ! तुमने हमारा पक्ष लिया होता
ऐ जिंदगी ! ये व्यथा-
हमें सदा सताती है !

सुन्दर पंक्तिया.. सुन्दर रचना...

Travel Trade Service 28 सितंबर 2010 को 5:43 am  

बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !...वाह ......आप की इसी तरह की लिखने की शेली का मैं दीवाना हूँ ......आप इसी शाली के लिये जानी जाती है जिसमें कुछ कर गुजर ने की बात मुझे लगती है ....बहुत .बहुत सुन्दर....

सत्यप्रकाश पाण्डेय 28 सितंबर 2010 को 11:33 am  

सुन्दर प्रस्तुति

यहाँ भी पधारें:-
ईदगाह कहानी समीक्षा

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 28 सितंबर 2010 को 12:36 pm  

आधारहीन नहीं हैं
हमारे कष्ट...हमारी शिकायतें
ये बात और है, कि-
तेरी हर शाम हमें लुभाती है !
--
बहुत सुन्दर रचना है!

babanpandey 28 सितंबर 2010 को 5:25 pm  

BAHUT HI UMDA ...
"बातें जो हृदय की
दीवारों से टकराती है
गूँज उसकी देर तक
सुनी जाती है !"......THIS IS ECHO OF OUR DEEDS ...

राजभाषा हिंदी 29 सितंबर 2010 को 4:57 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
काव्य प्रयोजन (भाग-१०), मार्क्सवादी चिंतन, मनोज कुमार की प्रस्तुति, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

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