अब तक था
मूक खड़ा
पर आज
वह
अनुभवी पेड़
बोला-
हे विचारशील प्राणियों!
कुछ पल ठहर
अपने मानव जीवन का
भान कर
ये जन्म हुआ किस अर्थ
जरा यह
ध्यान धर
और फिर बढ़ जा
संकरी गलियों से
चौड़ी सड़कों तक!
जहां जीत ही नहीं
सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!
अब तक था
मूक खड़ा
पर आज
वह
अनुभवी पेड़
बोला-
हे विचारशील प्राणियों!
कहाँ चले हो
अमृत कलश को
बिसार कर
जैसे मैं सबको छाया देता हूँ
वैसे ही, तू
निर्विकार सबसे प्यार कर
जड़ों से जुड़े रहे कदम
फिर विचरण हो
विस्तृत फ़लक तक!
जहां जीत ही नहीं
सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!
अब तक था
मूक खड़ा
पर आज
वह
अनुभवी पेड़
बोला-
हे विचारशील प्राणियों!
धरा को आने वाले
कल की खातिर तो
जरा इत्मीनान कर
कुछ परमार्थ की भी
बातें हो लें, न केवल
स्वार्थ का गान कर
और फिर बढ़ जा
संकरी गलियों से
चौड़ी सड़कों तक!
जहां जीत ही नहीं
सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!
संकरी गलियों से चौड़ी सड़कों तक...!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
26 नवंबर 2010

19 टिप्पणियाँ:
"...सच्ची हार के माथे पर भी
लगता हो विजय तिलक!!....."
सार्थक सन्देश देती कविता!
सादर
जैसे मैं सबको छाया देता हूँ
वैसे ही, तू
निर्विकार सबसे प्यार कर
जड़ों से जुड़े रहे कदम
फिर विचरण हो
विस्तृत फ़लक तक!...प्रकृति का एक सच्चा प्राणी..इन्सान को बहुत सुन्दर बात बोलता हुआ .....शायद उसको पता है अभी भी देर नहीं हुई है ..और मानो आप के शब्द स्याम पेड़ से ही अभी अभी निकले हो .....आप ने भी बहुत ही खूब संजोया है इस पेड़ की व्यथा को इन्सान के प्रति उसके प्रेम के सन्देश को !!!!!!!!!!!!!
bahut sundar kavita.. jiwan ka sandesh de rahi hai.. prerit kar rahi hai...
कविता में गवेषणा!
पढ़कर आनन्द आ गया!
बहूत ही प्रेरणादायक कविता. कविता की हर पंक्ति दुहराने लायक है.
shi khaa jnaab purane ped ka anubhv bhut khub hota ahe . akhtar khan akela kota rajsthan
shaandaar prastuti....badhai sweekar karein.
बहुत अच्छी सीख देती सुनदर रचना ..
हे विचारशील प्राणियों!
धरा को आने वाले
कल की खातिर तो
जरा इत्मीनान कर
कुछ परमार्थ की भी
बातें हो लें, न केवल
स्वार्थ का गान कर .....rightly said...
bahut sundar sandesh deti kavita .swarth se parmarth ki or prerit karti rachna .badhai .
हितोपदेश ;)
जारी रखिये ....
पेड़ -पौधे इंसान से हर पल बहुत कुछ कहते है, लेकिन इंसान की फितरत है कि वह उनकी आवाज़ को अनसुना कर देता है. आपकी यह छोटी-सी कविता आज के इंसान को इंसानियत की राह पर चलने का पैगाम देती है. आभार .
बेस्ट ऑफ लक … जड़ों से जुड़े रहे कदम फिर विचरण हो विस्तृत फ़लक तक!!!! उम्दा सोच। अच्छी रचना।
मनोज .... फ़ुरसत में ..
राजभाषा हिन्दी-पुस्तक चर्चा – हिंद स्वराज
मेरे दादाजी की लिखी एक कविता है "बूढ़ा पीपल " जिसमे पीपल को प्रतीक बनाकर जीवन के कई कड़वी सच्चाई बताई गयी थी जिसमे क्षोभ ,दुःख, ख़ुशी, व्यथा, आशा ,उम्मीद के बात कही गयी थी ....इस कविता में भी ऐसा ही कहा गया है ...ये पंक्ति देखिये उम्मीद से भरी एक अनुग्रह है इसमें ...
हे विचारशील प्राणियों!
कुछ पल ठहर
अपने मानव जीवन का
भान कर
ये जन्म हुआ किस अर्थ
जरा यह
ध्यान धर
और फिर बढ़ जा
संकरी गलियों से
चौड़ी सड़कों तक!.........
कविता की सारी पंक्तियों में ऐसा ही कुछ उम्मीद मानव व मानवीय ह्रदय से की गयी है........बहुत सुन्दर भाव........
prerna dayak rachna...
ummido bhari...")
bahut khub...
प्रकृति के माध्यम से जिंदगी की सच्चाईयों को खूबसूरती से उकेरती, सुंदर प्रेरक प्रस्तुति. आभार.
सादर
डोरोथी.
hope..is life//
there is hope ,there is life
प्रतीक्षारत नयनों में
आशा की लाली है!
क्या हुआ जो दूर तक
फैली रात काली है!!
अतिसुन्दर भावाव्यक्ति , बधाई के पात्र है
घर के बुज़ुर्ग भी तो आज ऐसे ही हैं ... मौन पेड़ की तरह ... छाया तो देते हैं ....
अछे भाव संजोय्र हैं ..
एक टिप्पणी भेजें