अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

क्यूँ??? एक प्रश्न माला!

पूछेंगे तुमसे हम ..
एक रोज़ ... भगवन !

जीवन में खुशियों का भरम
क्यूँ है आसमान की आँखें नम
क्यूँ बिकती है दुकानों में
रखी हुई आस्था बीच सामानों के
क्यूँ जगमगा रहा है मंदिर तेरा
जब चहुँ ओर है छाया अँधेरा
काहे इतनी घी की बातियाँ यहाँ जलती हैं
और उधर दीन-हीन साँसे अंधकार की लौ में पलती हैं
शाषण क्यूँ दुशासन का दास है
किसने सौंपी नरभाग्य की कुंजी उसके पास है
तेरी मूर्ति के सत्कार में हर भक्त लगा रहता है
वहीँ मूर्तिकार भूखे ही सब सहता है
स्वार्थ जब मानव काया में प्रविष्ट हुआ
तब नियति ने अपना विरोध क्यूँ नहीं स्पष्ट किया
मोह निशा का अंधकार हर पल छलने में पारंगत है
फिर क्यूँ हमारा हृदय निर्मोही जीवन का ही शरणागत है
क्यूँ ये अंधी दौड़ न जाती थम
इतना क्लिष्ट क्यूँ है अंतर्मन

पूछेंगे तुमसे हम ..
एक रोज़ ... भगवन !

10 टिप्पणियाँ:

anju 23 अगस्त 2010 को 5:22 pm  

Bhagwan ne kahan aisa chaha tha ....log hi Bhagwan ko thag rahe hein...

anupama 23 अगस्त 2010 को 5:44 pm  

satya kaha!
क्यूँ??? एक प्रश्न माला!
is shirshak mein hi uttar sa nihit hai...
ki aakhir kyun ye prashn mala???????
aapke shabdon mein"Bhagwan ne kahan aisa chaha tha ....log hi Bhagwan ko thag rahe hein... "
we need to think!

dhanyavad anju ji:)

संगीता स्वरुप ( गीत ) 23 अगस्त 2010 को 8:55 pm  

क्यूँ ये अंधी दौड़ न जाती थम
इतना क्लिष्ट क्यूँ है अंतर्मन

बहुत खूबसूरती से प्रश्नावली बनायीं है ...
क्लिष्ट का अर्थ कठिन या मुश्किल होता है ....यहाँ कलुषित शब्द ज्यादा सही लगेगा ...यह मात्र मेरा विचार है ...

anupama 23 अगस्त 2010 को 10:17 pm  

well pointed....
will do the changes as suggested!
dhanyavad!

saralta ki talash kavita mein prayukt saral ke vilom arth mein yahaan klisht likh gaya .......
all problems arise from the complications that we nurture!again , this is merely a thought of baffled mind!
regards,

वन्दना 24 अगस्त 2010 को 9:04 am  

बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति………………सच को झकझोरती हुयी।
रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

anupama 24 अगस्त 2010 को 4:47 pm  

dhanyavad vandana ji!
aapko bhi rakshabandhan ki dher sari subhkamnayen:)

vinodbissa 10 नवंबर 2010 को 8:10 pm  

shashkt rachanaa hai ..........

अशोक कुमार शुक्ला 1 जुलाई 2011 को 4:24 am  

Yeh sawaal sachmuch bahut prasangik hai. Kaash.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 1 जुलाई 2011 को 6:24 am  

बेहतरीन .

सादर

सदा 1 जुलाई 2011 को 7:34 am  

बहुत ही अच्‍छी रचना ।

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