प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
31 दिसंबर 2015
गिन रहे थे हम
लम्हे...
गिनते-गिनते
कितने ही क्षण छिटक गए...
राह
बहुत लम्बी थी...
भावों का जंगल घना था, उलझा-उलझा सा
जाने कब हम उन राहों में भटक गए...
खो गए तब जाना
कि क्या होता है पाना...
जीवन की क्लिष्ट अवधारणाओं से
कैसे होता है, सुलझे हुए निकल आना...
उलझन-सुलझन
सब रास्तों के खेल हैं...
कितने जाने-अनजाने उद्देश्य, कितने ही सपने ढ़ोते
हम पटरियों पर सरपट दौड़ती रेल हैं... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
30 दिसंबर 2015
तुम तक आने को...
कभी
मौन सेतु बनता था...
तो कभी
कविता बनती थी पुल...
ज़िन्दगी!
उसे सरमाथे रखा सदैव
जो पाई थी, कभी हमने, तुमसे
तुम्हारी चरण धूल...
देर तक, तट पर, खेलते रहे रज कणों से
अब किनारों से आगे बढ़ चली
लहरों में है नैया
हवाओं! दिशा देना देखो न जाना भूल...
ज़िन्दगी! तेरा हौसला है हमें
हम सफ़र में हैं, हमें पता है--
चुभने ही हैं...
चुभेंगे अभी और अनगिन शूल... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
कोरा था कागज़...
मौन में, आवाज़ थी...
खाली था गगन...
कहाँ लुप्त थे नभ के सारे वैभव, बात ये एक राज़ थी...
सुबह रिक्त थी...
ये रिक्तता पावन होती है... पावन थी...
सुबहें मनभावन होती हैं... मनभावन थी...
धीरे धीरे
बढ़ने लगता है शोर
ब्राह्म मुहूर्त की शीतलता दिन चढ़ते ही लुप्त हो जाती है...
कोलाहल पसर जाता है चहुँ ओर...
ऐसे में--
जब हलकी लाली
क्षितिज पर छा रही हो...
दिन की शुरुआत
होने जा रही हो...
तब कोरेपन की गरिमा
आत्मसात करे कलम...
कागज़ के एक छोर पर
चुपके से लिख दे जीवन... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
29 दिसंबर 2015
जटिल है मन की दुनिया...
जीवन भी जटिल है...
इन तमाम जटिलताओं के बीच
एक ज़रा सी धूप है...
उपस्थिति ये स्नेहिल है...
पास ही छाँव उदास पड़ी है...
शायद मन उसका चोटिल है...
इसी धूप छाँव में
हम भी कहीं है...
कि ये दुनिया कभी उदास सूनी है
तो कभी खुशियों की महफ़िल है...
आंसू में हंसी है
हंसी में भी नमी समायी हो सकती है
विभाजन ये जटिल है...
बस इतनी ही आश्वस्ति है
बवंडरों के बीच यह विश्वास जिलाए रखता है-
जीवन के आँचल में टाँकती सितारे, कहीं न कहीं, एक किरण स्नेहिल है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
28 दिसंबर 2015
नम आँखों में
सम्पूर्ण हृदय की पीड़ा है...
आंसुओं में समाया हुआ
एक अथाह समंदर है...
न थाह है...
न राह ही...
लहरें सदा से रही हैं बेपरवाह ही...
उनका दर्द
उठते-गिरते
समंदर में गुम हो जाता है...
एक लय में
पीड़ा रागिनी बुनती है
'शोर' शोर नहीं रहता फिर धुन हो जाता है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
खो जाना...
चले जाना...
ये अचानक नहीं होता...
हर क्षण घटती रहती है ये जाने की प्रक्रिया
तमाम उपस्थितियों के बीच
अनुपस्थितियां अपने घटित होने हेतु पृष्ठभूमि रच रही होती हैं...
और रचते बसते इन पृष्ठभूमियों में...
एक दिन लुप्त हो जाते हैं हम...
खो जाने का
क्या फिर
सालता होगा गम... ?
या खुशियों का मंज़र होता होगा
कि यहाँ से खो कर, इस जगह से गुम होकर
कहीं पा लिए जाते होंगे हम... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
श्वेत डगर...
आच्छादित धरती का आह्लाद
रच गया सुनहरे पहर...
ठूंठ पेड़ ढंका रहेगा...
रहस्य रोमांच यूँ बचा रहेगा...
फिर से रचेगी प्रकृति उत्सव...
अंधेरों के बीच उजाले का सूक्ष्म उद्भव...
ये बारिश
हम मुट्ठी में भर आए हैं...
ज़िन्दगी जहाँ नहीं
वहां ज़िन्दगी के साए हैं... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
27 दिसंबर 2015
बीतती विकटताओं के बीच
सहेज रहे हैं हम खुद को...
सहेजना ही होगा टूटती बिखरती साँसों को...
कि ये हैं तो हम हैं...
हम होंगे
तब तो संभावनाएं तलाशेंगे...
उजाले की खोज़
हमारे होने से ही तो गंतव्य पायेगी...
सहेजना है खुद को
कि हम सहेज सकें उजाले...
चाभियाँ सब हमारे पास ही हैं...
विडंबना ही है कि फिर भी उदास लटक रहे हैं ताले...
कोई झरोखा नहीं खुलता...
अंधेरों का दूर तक वर्चस्व है
या हमारी दृष्टि का ही दोष है प्रकाश नहीं खिलता... ?!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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26 दिसंबर 2015
इस शहर में
ठहरा हुआ दिसम्बर है...
उजाले नदारद हैं इन दिनों...
धूप का चेहरा
कई दिनों से नहीं देखा है उदास तरुवरों ने...
और
न ही बर्फ़ की उजली बारिश है इस बार
कि ढँक ले अँधेरे को...
रहस्यमयी श्वेत चादर से
आच्छादित रही है धरा, कभी इसी मौसम...
और निर्निमेष देखती रही है जगत के फेरे को...
सुबहें याद करती हैं...
सूरज को...
सूर्यमंत्र के उच्चारण से अँधेरे को ही अर्घ्य समर्पित हो जाता है...
चाँद तब वहीँ कहीं छुपा हुआ मुस्कुराता है...
सूरज न भी दिखे तो क्या ?
सुबहें तो होती हैं... !
लाली ऊषा की
स्मृतियों में शेष है...
उदास दिसम्बर की मिट्टी में समाहित
बिखरी पंखुड़ियों का अवशेष है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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25 दिसंबर 2015
कविता के आँगन में...
बिखरी थीं कितनी ही पंक्तियाँ...
कितने ही उद्गार...
सब अपने आँचल में समेट लिया...
ज़िन्दगी! तुमने हमें क्या क्या नहीं दिया...
भाव भाषा का वरदान
युगों युगों के दिव्य संधान
तुम हमारे प्रति,
उदार ही रही सदा...
हम शिकायतों से
जड़ते रहे परिदृश्य,
खोते रहे हर सम्पदा...
ईर्ष्या द्वेष का संसार है
जाने कब जानेंगे हम
हमारा रचा हुआ सब मिथ्या है निराधार है
शाश्वत अंश की
पहचान जिसे हो...
वो जीवन जीवन है
सहजता का संज्ञान जिसे हो...
ये नहीं तो सब व्यर्थ है...
मन ठान ले तो क्या नहीं संभव
वो सर्वसमर्थ है...
शुभ संकल्पों का आह्वान
ज़िन्दगी! तुम कविता, तुम ईश्वर, तुम मीत, तुम प्राण !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
24 दिसंबर 2015
इंतज़ार...
जिन पलों में जीया जा रहा है तुम्हें...
उसके परे संसार जाने क्या है...
ज़िन्दगी, कौन जाने कब तेरे निशाने क्या है...
हर एक पल डूबता उतराता
एक क्षण आस...
फिर मन उदास...
इंतज़ार के रंगों में निहित अनमनी उजास... !
खिलते मुरझाते मन का, संसार जाने क्या है...
इंतज़ार तो शाश्वत है, आधार जाने क्या है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
रात्रि स्नेहमयी है...
भारमुक्त करती है...
सुबह के संघर्ष हेतु पुनः
आस विश्वास की गगरी भरती है...
दिन भर में
फिर रीत जाता है पात्र...
कहीं पहुँचते नहीं
हम भागते ही तो रहते हैं मात्र...
वो साक्षी होती हमारी हार की
वो महसूसती है संतोष हमारी हर जीत का...
वो सहेजती है हमें
और हमारे साथ सहेजा जाता है सबसे अनूठा रंग प्रीत का...
पहले शाम को भेजती है...
और फिर खुद आती है...
रात्रि स्नेह से...
सर पर हाथ फेर जाती है...
स्वप्न खिला रहे
निद्रा का आशीष मिलता रहे सदा...
दिन!
तुम्हारी महिमा...
तब ही तो हम गा पायेंगे यदा कदा... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
23 दिसंबर 2015
समझ से परे होती हैं
कितनी ही बातें...
बस अनुभूतियों के आकाश होते हैं...
और ये कहाँ कभी भी स्पष्ट होते हैं...
हो ही नहीं सकते...
बदलता रहता है परिदृश्य...
प्रगल्भ होते हैं भावों के मेघ...
अक्षरशः ऐसे हम हो ही नहीं सकते...
कितने ही अनुभूत सत्य हैं...
जो हम शब्दों में कह ही नहीं सकते...
तो इनके लिए निर्दिष्ट एक आकाश...
और वहीँ से होता रहे दैदीप्यमान प्रकाश...
राह दिखाए...
हमारा हो जाए... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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20 दिसंबर 2015
खूब रोई थीं आँखें...
अब
हंसने की कोशिश
कर रहे थे
आँखों में उभर आये इन्द्रधनुष...
पर
रूदन ही झलक रहा था...
भरा हुआ मन
आँखों से छलक रहा था...
देखने वाली नज़रों ने महसूस कर ली नमी...
आँखों में समाया हुआ था सारा आकाश
थी वहीँ आसमान तकती ज़मीं...
फिर धीरे से
आंसुओं ने खटखटाया पलकों का दरवाज़ा...
और बेतरह आँखें बरस पड़ीं...
हंसने की कोशिश में
आँखें एक बार फिर रो पड़ीं... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
18 दिसंबर 2015
हमारे पास एक दूसरे से कहने को दुनिया भर की बातें होतीं
पर अवकाश नहीं होता...
कभी अवसर होता भी
तो ऐन वक़्त पर सारी बातें गुम हो जाती थीं...
या कही भी जातीं
तो सबसे आवश्यक बात ही अनकही रह जाती थी...
और फिर असीम उद्विग्नता
अगले अवसर का बेतरह इंतज़ार
ये जानते हुए भी
कि फिर वही होगा...
जीवन का ये जोड़ घटाव
वैसे ही पुनः घटित होगा... !
अब जब एक उम्र जी चुके हैं हम...
थोड़ा तो समझते ही हैं क्रम...
सो हमने छोड़ दिया है राह तकना...
मिलेंगे सभी जोड़ घटाव से दूर एक दिन न होगी कोई परिस्थितिजनित प्रवंचना...
कहीं जाने की जल्दी नहीं होगी कि हमें यहीं पहुंचना था...
उस क्षण हम शुरू करेंगे दुनिया भर की बातें एक दूसरे से बांटना...
तब साथ मिल हम महसूसेंगे मौन का बोलना...
कोई जल्दी नहीं होगी...
हमारे पास समय ही समय होगा...
कि जहाँ पहुंचना था वहां पहुँच चुके होंगे हम... !!
शायद... !!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
फूल
ख़ुशबू बिखेर कर बिखर गया...
मौसम बीता
फिर मुस्कुरायी कली...
दीये की लौ
अपनी शक्ति भर जली...
उस
उजले प्रकाश में...
रहस्यमय अँधेरे की
उपस्थिति खली...
ठहर कुछ क्षण
दीये की ओट में...
ज़िन्दगी अपनी धुन में
पर्वत पोखर नापती चली...
जो थी
पलकों पर पली...
वही ज़िन्दगी एक दिन
सांझ की चादर ओढ़ ढ़ली...
सफ़र ज़िन्दगी...
मौत आख़िरी गली...
ठीक वहीँ से अगले वाक्य का
आगाज़ हो गया...
जैसे ही
विराम की बात चली... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
वो छत थी...
चारदिवारी थी उसका आधार
मगर वो हर संकुचन से विरत थी...
हम उसे एकटक देखते रहे...
वो देखती रही आकाश...
सीमित रहा
हमारी दृष्टि का फ़लक...
वो देखती रही निर्निमेष
सृष्टि का विस्तार दूर तलक...
देखते देखते
खो गयी...
मन की चारदिवारी पर टिकी ज़रा सी छत
जाने कब आसमान हो गयी...
मिट कर शायद
सब दुःख भी मिट जाते हैं...
आज वो आसमान हो कर नत थी...
कल तक जो केवल एक छत थी... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
17 दिसंबर 2015
एक ज़रा सी बूँद थी...
पर अथाह थी...
वो स्वयं सागर ही थी...
कि वो हर लहर के हृदय में उठती बेचैनियों की गवाह थी...
समय का सहज प्रवाह थी...
नन्ही सी बूँद अपने आप में अथाह थी... !!
अथाह थी...
अथाह है...
ज़िन्दगी पहेली ही होगी...
हल हो न हो इस बात की उसे कब परवाह है...
वो रुदन से शुरू होती है...
अंत भी एक कराह है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
15 दिसंबर 2015
उस
धुंधले से नज़र आते पेड़ की आड़ में
हम खड़े हों...
खेल ये आँख-मिचौनी के
जीवन के लिए अवश्यम्भावी हों
कहीं न कहीं बहुत बड़े हों...
किस्मत के साथ...
अपने साथ...
अपने अपनों के साथ...
ये आँख-मिचौनी का खेल ही तो चल रहा है...
कभी "होनी" खल रही है, कभी अपना यूँ होना खल रहा है...
एक आग है जिसमें जीवन हर क्षण जल रहा है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
14 दिसंबर 2015
बर्फ़ की
पतली चादर से ढँक कर...
धरती का मौन
जैसे हुआ मुखर...
आसमान ने
जो लिखे पत्र...
सब बांचे गए
गंतव्य तक पहुंचकर...
अक्षर-अक्षर
पढ़ा गया...
धरती के आँचल में
जीवन मढ़ा गया...
कहते-कहते
जब गला रुंध गया...
तब मौन में
फिर सब कहा गया...
फिर एक
ऐसा मौसम आया...
कहना-सुनना
सब पीछे रह गया...
आत्मीयता की वो गाँठ बंधी
बिन कहे सब संप्रेषित हो गया... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
13 दिसंबर 2015
बस तस्वीरों में है न...
वो बचपन...
तस्वीरों में ही बच कर रह गए हैं कितने ही एहसास
कितने ही पल...
सब रिश्ते नाते
बस खूंटियों पर टंगी शय होकर रह जायेंगे...
"बीते कल" ने सपने में भी नहीं सोचा होगा
ऐसा भी हो सकता है "आने वाला कल"... !
"आज" की आँखों से आँख मिलाता हुआ
"बीता कल" शर्मशार हो जाता है...
आँखों का पानी अब कहीं
नज़र जो नहीं आता है...
शुष्कता है...
बेरुखी है...
सबके अपने तराने हैं...
उसी ओर बढ़ रहे हैं
हर जीवन को उसी अंतिम मोड़ पर होना है एक दिन...
आश्चर्य! इस बात से फिर भी सब अनजाने हैं... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
12 दिसंबर 2015
वो
अपने समय पर आएगी...
और स्नेह से संग ले जाएगी...
ज़िन्दगी की तरह
वो अंतहीन इंतज़ार नहीं करवाएगी...
वो
हर क्षण संग चल रही है
उपस्थित होती हुई भी बस दिखती नहीं है...
वो आकर
बस बढ़ जाती है आगे
नेपथ्य में ही रहती है सदैव
मौत घड़ी भर भी रूकती नहीं है...
कविता सी है...
पता ही नहीं चलता कब घटित हो गयी... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
हर एक पन्ने पर
अंकित है
शब्दों का तारतम्य...
और जो सफ़हे रिक्त हैं
उनमें है अंकित
मौन की भाषा अगम्य...
पलटती हुई
सुख दुःख के हर पृष्ठ को
हर मोड़ से आगे निकल जाती है ज़िन्दगी
विस्मित
देखती ही रह जाती है नियति
ये साहस अदम्य...
निराश हताश मंज़र हो...
पूरा का पूरा वातावरण
स्याह बंज़र हो...
वो वहीं कहीं
चुपके से उग जाती है...
दूब, तेरी जिजीविषा प्रणम्य... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
कविते !
तुम्हारा आँगन वो अनूठा संसार है
जहाँ जितना भी हताश पहुँचें
कोई न कोई सिरा अपना सा मिल जाता है
शब्दों के झिलमिल प्रकाश में मन का उपवन खिल जाता है
तुम नहीं जानती कि आँखों की चमक हो तुम
जिए कितने ही पल हमने अक्षर अक्षर बुन
यहाँ ईर्ष्या द्वेष का कारोबार है
चलते चलते हमने जाना यही संसार है
तुम्हारे सान्निध्य में छाँव हो लिए
तुम थी आसपास तो हमने गीली मिटटी में कुछ ख़्वाब बो लिए
कविते !
ऐसे ही रहना सदैव...
जीवन आलोकित रहेगा स्वमेव... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
11 दिसंबर 2015
वो
कोई ठोस आकार
नहीं था...
जिसे छूकर
महसूस किया जा सके...
वो थी
बस एक याद ही...
जो मुस्कुरा रही थी
अरसे बाद भी...
ये लम्हा वक़्त की शाख़ से टूट रहा है...
हर क्षण अपना ही एक अंश हमसे छूट रहा है...
ये सब कहीं न कहीं
किसी न किसी रूप में यहीं आबाद होगा...
समय का हर किस्सा
जीवन का एक एक हिस्सा
अब जैसा है, यथावत, हमारे बाद होगा... !
हर विदाई के बाद
ज़िन्दगी फिर चल देती है अपनी लय में...
कितनी ही बार देखा होगा न इसी जीवनकाल में
उगते हुए, जीवन को, बीच प्रलय में...
शायद, तुम्हें याद होगा... ?!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
9 दिसंबर 2015
ये अंतहीन सफ़र...
दृश्य बदलते हर घड़ी, हर पहर...
देखा हर रंग का हरा...
प्राकृतिक हर रंग था खरा...
आसमान पूछ रहा था बड़े स्नेह से...
"कहो, कैसी हो धरा... ?!!"
क्या कहती ??
वो भावविभोर थी... !
आसमान ने हाल पूछा है,
बस इतने से ही धन्य हुई धरा...
दर्द भी मुस्कुराया
ये देख आसमान का भी मन भर आया... !!
फिर देखा हमने
बादलों को
उमड़ते-घुमड़ते...
आपस में
कितनी ही आकृतियों को
टूटते-जुड़ते...
उन
टूटते-जुड़ते विम्बों में
खोये हुए
हमने अपना एक क्षितिज तराशा...
बारिश में भींगते
तरुवरों के सान्निध्य में
अपनी अंजुरी में भर लिया हमने
आसमान से टपकती बूंदों का दिलासा... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
शब्द कई बार बहुत कठोर होते हैं
और उनकी कठोरता तब और असह्य होती है
जब वो शब्द किसी अपने ने कहा हो
जो खूब प्रिय रहा हो... !
कितना रोये
कितने आंसू खोये
तब जाना--
वो इतना कठोर हो पाया
जो भी कहा, वह ऐसी निर्ममता से कह पाया
तो, बस इसलिए
कि हम सचमुच उसके अपने हैं...
साम्य हो मनःस्थितियों में
इसके लिए कितने मनके और जपने हैं...
सदियों से चल रहे हैं...
अभी सदियों और चलना है...
तब जाकर कहीं
अपने होंगे...
अभी कितने युग और
संस्कार तपने होंगे... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
8 दिसंबर 2015
जब टूटने लगें
सहज से सिलसिले...
जब जुटने लगें गम...
बिखरने लगें
एक के बाद एक टुकड़ों में हम...
तब थमना
थामना...
रे मन !
ख़ुशी ख़ुशी करना
कटु यथार्थों का सामना...
तट पर
रेत से लिखना मिटाना...
जीवन कुछ नहीं बस क्षण भर का टिमटिमाना
फिर, खो जाना... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
अंततः तो
सचमुच कोई किसी का नहीं...
सब साथ हैं
पर हैं तो अजनबी...
अपनी अपनी राह
चले जा रहे हैं...
यूँ ही दो बातें हो गयीं
ज़िन्दगी से कभी...
पर सच है
है तो वो अजनबी...
ज़िन्दगी हठात हाथ छुड़ा कर चल देती है
कठोरता उसकी चुभ गयी अभी...
कहने सुनने की बातें हैं
सब खोखली बरसातें हैं
झूठे सब नाते हैं
यहाँ ठहरना नहीं कभी...
अपना अपना किरदार अदा कर चल देंगे सभी...
हम थे, हैं, रहेंगे अजनबी... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
सो कर बीते या जाग कर,
रात बीत ही जाती है...
पर रौशनी हमेशा कहाँ हाथ आती है... !!
यूँ ही उजाला भरमाये है...
उलझा उलझा प्रश्न एक
उगा हुआ यूँ मिल गया रात के साये में--
क्या बीत कर वह हमेशा सुबह की दहलीज़ तक पहुँचाती है... ??
या रात ठहरी रहती है वैसे ही दिन भर
हमारे सिरहाने... ??
किसी न किसी बहाने... !
ज़िन्दगी, तुझसे कितने हम अनजाने... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
7 दिसंबर 2015
धागे नहीं थे शेष...
सिये जाने को कितना कुछ शेष था...
आँखों में गंगा यमुना थी
दूर सपनों का देश था...
जाने क्यूँ ऐसा ही अक्सर होता है...
धागे छूट जाते हैं...
चलते चलते पता ही नहीं चलता
कब सपने रूठ जाते हैं...
गतिमान तो हैं पर बढ़ते हम कहाँ हैं
ये बस चलते रहने का भ्रम है...
हम वहीँ तो ठहरे हुए हैं
हर दिवस सांझ के बाद वही तो व्यतिक्रम है...
ज़रा सा टूटा है
कहीं से धागों का कोई सिरा छूटा है...
धागे मिले तो देखा
सूई का एक हिस्सा टूटा है...
सो--
सीने से रह गए...
गुज़र गयी तो जाना
हम जीवन जीने से रह गए... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
नदी नदी पर्वत पर्वत
मन अन्यमनस्क जड़वत
चलता जाता है उदास
हमें कहाँ उसकी सतह का भी अंदाज़
कब डूब जाए
कब वहां सूरज उग आये
मन के क्षितिज पर
कितने तो बादल हैं छाये
कोहरा भी घना हैं
यहाँ आँखों से ओझल हर दृश्य अनमना है
ऐसे में यूँ ही कुछ लिख रहे हैं...
कोई अर्थ नहीं होने का फिर भी दिख रहे हैं... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
6 दिसंबर 2015
ज़िन्दगी सफ़र...
गुज़रते पहर...
पीछे छूटते
एक के बाद एक शहर...
समय के साथ
सब ठौर ठिकाने
विस्मृत हो जाने हैं...
एक ही है विम्ब
जो स्मृतियों में अंकित हो
हमेशा के लिए जायेगा ठहर...
उस एक विम्ब में
परिलक्षित होंगे
यादों के कई शहर... !
हमें पता है...
हर शहर से जुड़ी होगी
तुम्हारी ही
किसी न किसी कविता की याद...
जहाँ गए वहां रोप आये हम बीज रूप में
साथ चलने वाली कविताओं को
कि वे रहे वहां हमारे भी बाद...
चमकती होंगीं उनकी सुषमा अब भी स्नेहिल धूप में...
यात्रा के पड़ावों को याद करते हैं हम कभी ऐसे भी रूप में... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
5 दिसंबर 2015
बादल... धूप... पवन...
बारिश... छाँव... सिहरन...
प्रार्थना... दीप... वंदन...
समर्पण... बाती... चन्दन...
ये सब सफ़र के साथी हैं...
ज़िन्दगी इन्हें अपना सगा बताती है...
राही के साथ चलते हैं
ये हमें ढालते हैं, हममें ढलते हैं
चलते-चलते
ढलते-ढलते
एक रोज़ ऐसा भी आये...
हम बादल, धूप, पवन हो जायें... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
एक वो दिसम्बर था
बर्फीली सफ़ेदी से नहाया हुआ
एक ये दिसम्बर है
धुंध, उदास बारिश और स्याह रंगों से भरा...
तब कितना सुन्दर था दृश्य
बर्फ़ के फ़ाहों से पटी थी धरा
अब फुहारों की बाहों में
नमी को है उसने वरा...
दिसम्बर
देख रहा है निर्निमेष
प्रकृति के स्वरुप को हर पल
रचते हुए जीवन का कोई रंग खरा
अंतिम पायदान पर
खड़ा साल सोच रहा है--
कितने भूले बिसरे घावों को
समय फिर से कर गया हरा... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
छूटते हुए दृश्यों की तरह...
एक दिन छूट जाना है खुद से ही...
इतनी छोटी सी है ये ज़िन्दगी
और अनंत हैं राहें...
जहाँ से गुज़र रहे हैं
फिर शायद ही कभी गुजरें... !
प्रबल हो सकती है चाह
लौटने की
पुनः उस राह तक...
होगी भी...
पर
अवसर नहीं होगा...
कदम कदम पर जीवन ने
विवशता का दर्द ही तो है भोगा... !!
इसलिए कदम रोप कर
जीते हुए चलें हर पग...
कौन जाने ?
कब छूट जाना है ये जग...
रूठते हुए लम्हों की तरह...
एक दिन रूठ जाना है खुद से ही...
छूटते हुए दृश्यों की तरह...
एक दिन छूट जाना है खुद से ही... !!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
4 दिसंबर 2015
देहरी पर
एक दीप जलाया...
मन के कोने में
लौ जगमगाई...
ऐसा भी होता है
हो भी
और न भी हो
तन्हाई... !
सूरज नहीं गगन में...
चाँद तारे भी नहीं...
सबको कर विदा खाली तो है आसमान...
सूरज को तरसती धरती होगी न कहीं... !
हर आँगन को
निर्द्वंद है धूप छाँव से सरोकार...
कितने लम्हों में
बंटा होगा इंतज़ार... !
कभी कभी
धीर धरे प्रतीक्षा करना ही
समुचित कर्म है...
आश्वस्ति रहे
कि वो एक जैसा नहीं रहेगा,
बदल जाना समय का धर्म है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
3 दिसंबर 2015
खुद को ढूंढ़ते हुए
बहुत दूर निकल आये थे...
कुछ कवितायेँ मिली हमें राह में...
उन कविताओं को सहेज लाये हैं... !
शायद एक दिन
मिल जाये हम भी खुद को
ऐसे ही किसी खोयी कविता की तरह...
पर हमें पता है...
ऐसा ही होगा--
खुद को पाकर फिर खो देंगे हम
इस बात पर फिर अनायास रो देंगे हम... !!
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खो जाना है धुंध में...
इन विराट विसंगतियों को...
आसन्न आपदाओं को...
सकल विपत्तियों को...
और खुद तुम्हें और मुझे भी इसी धुंध में मिल जाना है एक रोज़...
अनिश्चितताओं के इस समुद्र में
दो कदम जो साथ हैं...
कुछ क्षण जो हमारे पास हैं...
उन्हें जी लें... ?!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
अपने ही स्वभाव के ही कारण
छले जाते हैं हम...
ह्रास के ऐसे माहौल से उम्मीद भी क्या करनी...
भावनाओं का मान रखा जाना तो बीते समय की बात है...
अब सर्वोपर्री अगर कुछ है तो स्वार्थ है...
ऐसी अजीब स्थिति में
अपने आप से ही नाराज़गी होती है
और छलने वाला तो इस सबसे अनभिज्ञ
मग्न ही रहता है...
एहसास की सीमाओं से बहुत दूर उसका आशियाँ जो है...
वहाँ स्वार्थ के सिवा कुछ होता भी कहाँ है... !!
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एक वक़्त आता है
जब मन उदारता से
माफ़ कर देता है हर चोट पहुँचाने वाले को...
औरों के दोष न निकाल
मन अपना ही दोष देखता है
कि कोई कमी होगी
जिसकी सजा में
अवांछनीय मनःस्थितियों का सामना करना पड़ा... करना पड़ता है...
दुःख बढ़ता ही जायेगा जो आगे न बढ़े तो...
मन की गाँठ खोल माफ़ करना ही उचित है...
अपने ही स्वार्थ के लिए...
क्रोध से मुक्ति के लिए...
मन की शान्ति के लिए...
ढ़ोते रहने से अपने ही मन का भार बढ़ना है... !!
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जहाँ स्नेह है
वहां सारे तर्क वितर्क
नेपथ्य में चले जाते हैं...
स्नेह
किसी अगर मगर के लिए
कोई स्थान ही नहीं छोड़ता...
जीवन! जीवन रहते स्नेहविहीन न होने देना...
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ख़ुशी बहुत सारी गिरहें खोलती है...
उदार बनाती है कई अर्थों में...
दुःख भी कई स्तरों पर हमें मांजता है...
अंतर्दृष्टि देता है...
सुख दुःख जब आएँ तो
तराशे जाने को प्रस्तुत हों हम...
चोट तो सहनी ही होगी
तभी तो पत्थर आकार ले पाएगा कोई... !!
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एग्यारह महीनों का छल
ढ़ोता हुआ
ठिठुरता दिसम्बर
अपने साथ दर्द न लाये
तो और क्या लाये...
जाते जाते
शायद दे जाये
नए समय में
नए सपनों की...
नयी दृढ़ताओं की सौगात... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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2 दिसंबर 2015
अक्षर अक्षर हो सुकून
जैसे स्वर लहरियों में तैरता राम धुन...
अपनी दिशा पा जायेगा
मन, सुन कभी अपनी भी आवाज़ सुन...
नहीं ज़ख्मी होंगे पाँव
कुछ दूर के कांटे तो तू ले चुन...
यहाँ के अजब हैं तौर तरीके
दुनिया है, खुशियाँ यहाँ न्यून...
आँखों में जो झिलमिल बूंदें हैं
उनसे ही कोई प्रकाशवृत्त बुन...
कैसा भी भयावह हो दृश्य
कभी शेष न होने पाए जीवन धुन...
जिजीविषा के तीरे, उगता रहे सुकून... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
1 दिसंबर 2015
ये सफ़र लम्बा है,
अंतहीन भी...
खुशियाँ छलती हैं,
अच्छा है रंग ग़मगीन ही...
इतना दर्द हो
कि कई दर्द स्वतः भूल जायें...
कभी जो सुख के पल हों
वे बस यादों में मुस्कायें...
पाँव के छाले हों
या मन की दरारें हों...
पीड़ा हो मर्मान्तक
और जीतते हुए हम हारे हों...
ज़िन्दगी!
तुझसे रूठें हम
तेरे ही सहारे हों... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
शोर और मौन का
जाने ये कैसा गणित...
रुक गया हो धमनियों में जैसे
बहते हुए शोणित...
कुछ तो टूटा है ऐसा
जिसका शोर मौन में ध्वनित है...
बिखरे काँच के टुकड़ों में
टूटी हुई आस प्रतिविम्बित है...
चुनते चुनते बिखरन
फिर टूटना है...
क्या शिकायत किसी से
इन राहों में खुद पर ही है खीझना, खुद से ही रूठना है... !!