निर्वासन भोग कर
लौट आये प्रभु
तो मनी दिवाली
दीपों वाली!!!
आज हैं हृदयांगन
से निर्वासित वो
आनन है खाली!
ये कैसी दिवाली!!!
मन मिले नहीं हैं
दरिद्रता से है ग्रस्त
चमन का माली!
ये कैसी दिवाली!!!
कुसंस्कारों से
जूझते मन प्राण
खोयी हुई लाली!
ये कैसी दिवाली!!!
स्वार्थ के कारागार में
कैद है आत्मा और
जिद है हमने पाली
ये कैसी दिवाली!!!
पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!
फिर मने दिवाली...!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
6 नवंबर 2010
12 टिप्पणियाँ:
अच्छी कविता।
पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!
"कुसंस्कारों से
जूझते मन प्राण
खोयी हुई लाली!
ये कैसी दिवाली!!!....."
बहुत ही सच्ची और सही बात को आप ने बहुत ही खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है.
सादर
पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!
अपने परिवेश में मौजूद अंतर्विरोधों के झंझावातों से जूझते संवेदनशील मन की एक बेहद संवेदनशील और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति. आभार.
सादर,
डोरोथी.
एक बार फिर से आपने सच्चाई को बड़े ही सहेज भाव सेएक सुन्दर रचना के रूप में प्रस्तुत किया है ,,
पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!
.....
समाज में व्याप्त असमानताओं को व्यक्त करती बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..
पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!
उत्तम प्रस्तुति ...
पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!
बहुत बढ़िया.....
पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!
बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...
bahut sundar prastuti
पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!
वाह !! बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...
हर पंक्ति में गहराई... मैंने सुबह भी आपकी कविता पढ़ी थी.. पर नेट प्रॉब्लम की वजह से टिपण्णी नहीं कर पाई थी...
Bahut hi achhi prastuti. Kavita ka bhav bhi sarahaniya hai.
बहुत ही सुंदर रचना.
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