फिर मने दिवाली...!

निर्वासन भोग कर
लौट आये प्रभु
तो मनी दिवाली
दीपों वाली!!!

आज हैं हृदयांगन
से निर्वासित वो
आनन है खाली!
ये कैसी दिवाली!!!

मन मिले नहीं हैं
दरिद्रता से है ग्रस्त
चमन का माली!
ये कैसी दिवाली!!!

कुसंस्कारों से
जूझते मन प्राण
खोयी हुई लाली!
ये कैसी दिवाली!!!

स्वार्थ के कारागार में
कैद है आत्मा और
जिद है हमने पाली
ये कैसी दिवाली!!!

पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!

12 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार 6 नवंबर 2010 को 2:57 pm बजे  

अच्छी कविता।
पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!

Yashwant R. B. Mathur 6 नवंबर 2010 को 3:04 pm बजे  

"कुसंस्कारों से
जूझते मन प्राण
खोयी हुई लाली!
ये कैसी दिवाली!!!....."

बहुत ही सच्ची और सही बात को आप ने बहुत ही खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है.

सादर

Dorothy 6 नवंबर 2010 को 3:20 pm बजे  

पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!

अपने परिवेश में मौजूद अंतर्विरोधों के झंझावातों से जूझते संवेदनशील मन की एक बेहद संवेदनशील और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

सुनीता 6 नवंबर 2010 को 3:20 pm बजे  

एक बार फिर से आपने सच्चाई को बड़े ही सहेज भाव सेएक सुन्दर रचना के रूप में प्रस्तुत किया है ,,

Kailash Sharma 6 नवंबर 2010 को 3:23 pm बजे  

पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!
.....
समाज में व्याप्त असमानताओं को व्यक्त करती बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..

संगीता स्वरुप ( गीत ) 6 नवंबर 2010 को 3:54 pm बजे  

पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!

उत्तम प्रस्तुति ...

डॉ. मोनिका शर्मा 6 नवंबर 2010 को 8:14 pm बजे  

पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!

बहुत बढ़िया.....

कविता रावत 7 नवंबर 2010 को 10:21 am बजे  

पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...

Anamikaghatak 7 नवंबर 2010 को 12:58 pm बजे  

bahut sundar prastuti

Dr Xitija Singh 9 नवंबर 2010 को 2:31 pm बजे  

पहले
आत्मा प्रकाशित हो
अंतर तो सुवासित हो
प्रभु बस जाएँ मन मंदिर में
समाप्त हो रात काली
फिर मने दिवाली
दीपों वाली!!!

वाह !! बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...
हर पंक्ति में गहराई... मैंने सुबह भी आपकी कविता पढ़ी थी.. पर नेट प्रॉब्लम की वजह से टिपण्णी नहीं कर पाई थी...

प्रेम सरोवर 10 नवंबर 2010 को 10:45 am बजे  

Bahut hi achhi prastuti. Kavita ka bhav bhi sarahaniya hai.

बेनामी 11 नवंबर 2010 को 6:19 pm बजे  

बहुत ही सुंदर रचना.

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