अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!

दोस्ती अत्यंत सुन्दर रिश्ता है...सखा भाव में ही तो सारे भावों की धाराएँ आकर तिरोहित हो जाती हैं! एक द्वन्द से घिरी कविता.., जो रिश्तों को दोस्ती का नाम देना तो चाहती है पर ठिठक जाती है! स्वार्थ के रिश्तों को आखिर दोस्ती का नाम कैसे दे दिया जाये...; दोस्ती तो कृष्ण-सुदामा के अद्भुत रिश्ते को ही कहते हैं! है न....

दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
कृष्ण-सुदामा की
अद्भुत मैत्री की झाँकी
कहाँ मिलेगी आज...
उस भाव से भिन्न
अगर है कुछ,
उससे,
कमतर अगर है कुछ,
तो-
उसे दोस्ती-
कैसे कह दी जाये?
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
जो दिव्य प्रतिमान
हैं विद्यमान
उनके अनुरूप कहाँ हैं
संबंधों की गरिमा...
कहाँ शुद्ध है हमारा आचरण,
संवरे न विचार
सरल न हो हृदय
तो-
शब्दों के व्यूह मात्र को-
प्रार्थना कैसे कह दी जाये?
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!

11 टिप्पणियाँ:

Akhtar Khan Akela 13 अक्तूबर 2010 को 12:36 pm  

shi kha aapne agr dosti he to fir kisi vyakhya ki koi aavshykta hi nhin he vese bhi yeh shbd itna mhaan he ke iski vyaakhyaa kisi ke bhi dvaara kya jaana asmbhv he . akhtar khan akela kota rajsthan

वन्दना 13 अक्तूबर 2010 को 1:03 pm  

सही कह रही हैं आप दोस्ती का रिश्ता अगर था तो सिर्फ़ एक ही था ना उससे पहले हुआ और ना उसके बाद्………………बेहद खूबसूरत भाव्।

डॉ. नूतन - नीति 13 अक्तूबर 2010 को 2:09 pm  

bahut sundar lekh...dost to vo rista hai jis kee vrihad seema koi dekh nahi saktaa... is liye dosti ki vyakhyaa sadev hee adhoori hai.. God Bless

Kailash C Sharma 13 अक्तूबर 2010 को 3:46 pm  

कृष्ण सुदामा की दोस्ती तो अपने आप में दोस्ती की एक परिभाषा है. यह तो नहीं कह सकता की आज निर्मल ,निश्छल और निस्वार्थ दोस्त नहीं होते, पर उनका मिलना कठिन अवश्य है...बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति...आभार...

Navin C. Chaturvedi 13 अक्तूबर 2010 को 5:10 pm  

true, krishn sudama jaisi mitrata aaj kahan..............

संगीता स्वरुप ( गीत ) 13 अक्तूबर 2010 को 7:42 pm  

सटीक और सुन्दर अभिव्यक्ति

राजभाषा हिंदी 14 अक्तूबर 2010 को 3:48 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

साहित्यकार-6
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

संजय भास्कर 14 अक्तूबर 2010 को 3:51 am  

निश्छल और निस्वार्थ दोस्त नहीं होते, पर उनका मिलना कठिन अवश्य है...सुंदर शब्दों के साथ.... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

मनोज कुमार 14 अक्तूबर 2010 को 4:19 am  

अनुपमा जी,

छोड़ो भी अब क़फ़स में ये अपने परों की बात
करता है मुफ़लिसी में कोई ज़ेवरों की बात ?

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

आंच-39 (समीक्षा) पर
श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ की कविता
क्या जग का उद्धार न होगा!, मनोज कुमार, “मनोज” पर!

mridula pradhan 15 अक्तूबर 2010 को 8:37 am  

wah. behad khoobsurat.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 15 अक्तूबर 2010 को 11:21 am  

आखिर तो,
अंतिम सत्य है ही राम नाम!
बड़े सत्य की
मंजिल तक पहुँचने हेतु-
पार करते हैं,
कितने ही छोटे-छोटे सत्यों के-
ताल..तलैया..नदिया..सेतु,

बहुत अच्छी प्रस्तुति ...भावों को बहुत अच्छे से बांधती हो ..

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