दोस्ती अत्यंत सुन्दर रिश्ता है...सखा भाव में ही तो सारे भावों की धाराएँ आकर तिरोहित हो जाती हैं! एक द्वन्द से घिरी कविता.., जो रिश्तों को दोस्ती का नाम देना तो चाहती है पर ठिठक जाती है! स्वार्थ के रिश्तों को आखिर दोस्ती का नाम कैसे दे दिया जाये...; दोस्ती तो कृष्ण-सुदामा के अद्भुत रिश्ते को ही कहते हैं! है न....
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
कृष्ण-सुदामा की
अद्भुत मैत्री की झाँकी
कहाँ मिलेगी आज...
उस भाव से भिन्न
अगर है कुछ,
उससे,
कमतर अगर है कुछ,
तो-
उसे दोस्ती-
कैसे कह दी जाये?
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
जो दिव्य प्रतिमान
हैं विद्यमान
उनके अनुरूप कहाँ हैं
संबंधों की गरिमा...
कहाँ शुद्ध है हमारा आचरण,
संवरे न विचार
सरल न हो हृदय
तो-
शब्दों के व्यूह मात्र को-
प्रार्थना कैसे कह दी जाये?
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
दोस्ती की क्या व्याख्या की जाये!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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13 अक्टूबर 2010

10 टिप्पणियाँ:
shi kha aapne agr dosti he to fir kisi vyakhya ki koi aavshykta hi nhin he vese bhi yeh shbd itna mhaan he ke iski vyaakhyaa kisi ke bhi dvaara kya jaana asmbhv he . akhtar khan akela kota rajsthan
सही कह रही हैं आप दोस्ती का रिश्ता अगर था तो सिर्फ़ एक ही था ना उससे पहले हुआ और ना उसके बाद्………………बेहद खूबसूरत भाव्।
bahut sundar lekh...dost to vo rista hai jis kee vrihad seema koi dekh nahi saktaa... is liye dosti ki vyakhyaa sadev hee adhoori hai.. God Bless
कृष्ण सुदामा की दोस्ती तो अपने आप में दोस्ती की एक परिभाषा है. यह तो नहीं कह सकता की आज निर्मल ,निश्छल और निस्वार्थ दोस्त नहीं होते, पर उनका मिलना कठिन अवश्य है...बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति...आभार...
true, krishn sudama jaisi mitrata aaj kahan..............
सटीक और सुन्दर अभिव्यक्ति
निश्छल और निस्वार्थ दोस्त नहीं होते, पर उनका मिलना कठिन अवश्य है...सुंदर शब्दों के साथ.... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....
अनुपमा जी,
छोड़ो भी अब क़फ़स में ये अपने परों की बात
करता है मुफ़लिसी में कोई ज़ेवरों की बात ?
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
आंच-39 (समीक्षा) पर
श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ की कविता
क्या जग का उद्धार न होगा!, मनोज कुमार, “मनोज” पर!
wah. behad khoobsurat.
आखिर तो,
अंतिम सत्य है ही राम नाम!
बड़े सत्य की
मंजिल तक पहुँचने हेतु-
पार करते हैं,
कितने ही छोटे-छोटे सत्यों के-
ताल..तलैया..नदिया..सेतु,
बहुत अच्छी प्रस्तुति ...भावों को बहुत अच्छे से बांधती हो ..
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