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| Dr. S. N. Pandey |
सुप्रभातः सर्वेषां शारदीय, बासन्तिके, वर्षपर्यन्तं वा जीवनपर्यन्तं देव्याः पूजन तत्परे सांसारिकजनानां कृते।
आज विजयादशमी के शुभावसर पर आप सभी स्नेही जनों को हार्दिक शुभकामनाएं! यह बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है. आसुरी शक्तियों के दहन और सात्विक शक्ति की स्थापना का पर्व है. लोक व्यवहार में चली आ रही प्रतिकात्मकताएं (रावन दहन इत्यादि) हमें अपनी बुराईयों पर विजय प्राप्त करने की सीख देती हैं. अपने भीतर संघर्षरत राम रुपी सात्विकता की विजय हो. रावण रुपी अहंकार ध्वस्त हो जाए, यही संदेश है. राम ने माँ जगदम्बे की आराधना की थी. शक्तिस्वरूपा की आराधना के बिना आसुरी शक्तियों पर विजय संभव कहाँ. अब वह सदेह राक्षसों पर विजय की बात हो या फिर हमारे भीतर व्याप्त अन्धकार पर विजय की बात हो. पंचम अध्याय में भक्ति, शक्ति व दर्शन की प्राप्ति हेतु माँ की स्तुति की गयी है.
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनु: सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
तीनों लोकों की आधारभूता देवी के ध्यान और प्रार्थना से इस अध्याय का प्रारंभ होता है. और आगे देवी के हर स्वरुप की स्तुति की गयी है
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै॥१७॥ नमस्तस्यै॥१८॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥१९॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२०॥ नमस्तस्यै॥२१॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥२२॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२३॥ नमस्तस्यै॥२४॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥२५॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२६॥ नमस्तस्यै॥२७॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥२८॥
या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥२९॥ नमस्तस्यै॥३०॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥३१॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३२॥ नमस्तस्यै॥३३॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥३४॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३५॥ नमस्तस्यै॥३६॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥३७॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३८॥ नमस्तस्यै॥३९॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥४०॥
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४१॥ नमस्तस्यै॥४२॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥४३॥
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४४॥ नमस्तस्यै॥४५॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥४६॥
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४७॥ नमस्तस्यै॥४८॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥४९॥
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५०॥ नमस्तस्यै॥५१॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥५२॥
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५३॥ नमस्तस्यै॥५४॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥५५॥
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५६॥ नमस्तस्यै॥५७॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥५८॥
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५९॥ नमस्तस्यै॥६०॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥६१॥
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६२॥ नमस्तस्यै॥६३॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥६४॥
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६५॥ नमस्तस्यै॥६६॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥६७॥
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६८॥ नमस्तस्यै॥६९॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥७०॥
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥७२॥ नमस्तस्यै॥७२॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥७३॥
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥७४॥ नमस्तस्यै॥७५॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥७६॥
जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है । बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, शक्ति और लज्जा रूप में हम प्राणियों में स्थित देवी को बारम्बार नमस्कार है. वही देवी हममें शांति, श्रद्धा, दया एवं माता रूप में स्थित हैं और इन स्वरूपों को बारम्बार नमस्कार है! जो जीवों के इंद्रियवर्ग की अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियों में सदा व्याप्त रहनेवाली हैं, उन व्याप्तिदेवी को बारंबार नमस्कार है। देवी ही सृष्टि, पालन और संहार की शक्तिभूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हैं। देवी चैतन्य रूप से इस सम्पूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको बारंबार नमस्कार है।
हर भाव, हर स्वरुप उस देवी का ही स्वरुप है, यहाँ तक कि हमारी भ्रांतियां भी उन्हीं का स्वरुप हैं ! दया रूप में जो देवी हमारे भीतर स्थित हैं वे हमारी सकल भ्रांतियां दूर करें और हमें शान्ति एवं दया भाव से युक्त करें. हम क्षमाशील एवं कल्याणकारी सिद्ध हो अपने परिवेश एवं समाज के लिए.
सूक्ष्मता से इन श्लोकों एवं निहितार्थ के मनन के बाद संदेह कहाँ बच जाता है. शक्तिस्वरूपा माँ हमसे अलग कहाँ, विभिन्न भावों की अधिष्ठात्री बन कर वे हममें ही तो स्थित हैं.
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हर भाव, हर स्वरुप उस देवी का ही स्वरुप है, यहाँ तक कि हमारी भ्रांतियां भी उन्हीं का स्वरुप हैं ! दया रूप में जो देवी हमारे भीतर स्थित हैं वे हमारी सकल भ्रांतियां दूर करें और हमें शान्ति एवं दया भाव से युक्त करें. हम क्षमाशील एवं कल्याणकारी सिद्ध हो अपने परिवेश एवं समाज के लिए.
सूक्ष्मता से इन श्लोकों एवं निहितार्थ के मनन के बाद संदेह कहाँ बच जाता है. शक्तिस्वरूपा माँ हमसे अलग कहाँ, विभिन्न भावों की अधिष्ठात्री बन कर वे हममें ही तो स्थित हैं.

















