या देवी सर्वभूतेषु... !! १० :: सत्यनारायण पाण्डेय

Dr. S. N. Pandey


सुप्रभातः सर्वेषां शारदीय, बासन्तिके, वर्षपर्यन्तं वा जीवनपर्यन्तं देव्याः पूजन तत्परे सांसारिकजनानां कृते।


आज विजयादशमी के शुभावसर पर आप सभी स्नेही जनों को हार्दिक शुभकामनाएं! यह बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है. आसुरी शक्तियों के दहन और सात्विक शक्ति की स्थापना का पर्व है. लोक व्यवहार में चली आ रही प्रतिकात्मकताएं (रावन दहन इत्यादि) हमें अपनी बुराईयों पर विजय प्राप्त करने की सीख देती हैं. अपने भीतर संघर्षरत राम रुपी सात्विकता की विजय हो. रावण रुपी अहंकार ध्वस्त हो जाए, यही संदेश है. राम ने माँ जगदम्बे की आराधना की थी. शक्तिस्वरूपा की आराधना के बिना आसुरी शक्तियों पर विजय संभव कहाँ. अब वह सदेह राक्षसों पर विजय की बात हो या फिर हमारे भीतर व्याप्त अन्धकार पर विजय की बात हो. पंचम अध्याय में भक्ति, शक्ति व दर्शन की प्राप्ति हेतु माँ की स्तुति की गयी है. 


ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्‌खमुसले चक्रं धनु: सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्‌भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥

तीनों लोकों की आधारभूता देवी के ध्यान और प्रार्थना से इस अध्याय का प्रारंभ होता है.  और आगे देवी के हर स्वरुप की स्तुति की गयी है

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै॥१७॥ नमस्तस्यै॥१८॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥१९॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२०॥ नमस्तस्यै॥२१॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥२२॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२३॥ नमस्तस्यै॥२४॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥२५॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२६॥ नमस्तस्यै॥२७॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥२८॥
या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥२९॥ नमस्तस्यै॥३०॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥३१॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३२॥ नमस्तस्यै॥३३॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥३४॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३५॥ नमस्तस्यै॥३६॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥३७॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३८॥ नमस्तस्यै॥३९॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥४०॥
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४१॥ नमस्तस्यै॥४२॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥४३॥
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४४॥ नमस्तस्यै॥४५॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥४६॥
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४७॥ नमस्तस्यै॥४८॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥४९॥
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५०॥ नमस्तस्यै॥५१॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥५२॥
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५३॥ नमस्तस्यै॥५४॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥५५॥
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५६॥ नमस्तस्यै॥५७॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥५८॥
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५९॥ नमस्तस्यै॥६०॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥६१॥
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६२॥ नमस्तस्यै॥६३॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥६४॥
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६५॥ नमस्तस्यै॥६६॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥६७॥
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६८॥ नमस्तस्यै॥६९॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥७०॥
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥७२॥ नमस्तस्यै॥७२॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥७३॥
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥७४॥ नमस्तस्यै॥७५॥
नमस्तस्यै नमो नम:॥७६॥

जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है । बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, शक्ति और लज्जा रूप में हम प्राणियों में स्थित देवी को बारम्बार नमस्कार है. वही देवी हममें शांति, श्रद्धा, दया एवं माता रूप में स्थित हैं और इन स्वरूपों को बारम्बार नमस्कार है! जो जीवों के इंद्रियवर्ग की अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियों में सदा व्याप्त रहनेवाली हैं, उन व्याप्तिदेवी को बारंबार नमस्कार है। देवी ही सृष्टि, पालन और संहार की शक्तिभूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हैं। देवी चैतन्य रूप से इस सम्पूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको बारंबार नमस्कार है।

हर भाव, हर स्वरुप उस देवी का ही स्वरुप है, यहाँ तक कि हमारी भ्रांतियां भी उन्हीं का स्वरुप हैं ! दया रूप में जो देवी हमारे भीतर स्थित हैं वे हमारी सकल भ्रांतियां दूर करें और हमें शान्ति एवं दया भाव से युक्त करें. हम क्षमाशील एवं कल्याणकारी सिद्ध हो अपने परिवेश एवं समाज के लिए.

सूक्ष्मता से इन श्लोकों एवं निहितार्थ के मनन के बाद संदेह कहाँ बच जाता है. शक्तिस्वरूपा माँ हमसे अलग कहाँ, विभिन्न भावों की अधिष्ठात्री बन कर वे हममें ही तो स्थित हैं. 
***

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य ।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥ ४ / ११ 

अर्थात, शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवि! हम पर प्रसन्न हो । सम्पूर्ण जगत की माता ! प्रसन्न हों । विश्वेश्वरि ! विश्व की रक्षा करो । देवी ! तुम्हीं चराचर जगत की अधीश्वरी हो ।
शरणागत का उद्धार करने वाली माता सकल विश्व का कल्याण करें! जीवन, जीवन की तरह सुभाषित एवं सुवासित हो!
इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ
सधन्यवाद प्रेषित!
--सत्यनारायण पाण्डेय 



आसां नहीं डगर

बहुत दोहराव है


मेरी लिखे में
जीवन --
ये शब्द
कितनी ही बार आता है
और यही वो तत्व है
जो फिर भी
अनछुआ ही रह जाता है 


जीवन लिखना
कब सम्भव होगा कलम के लिए ?
जीवन जीना
कब सुलभ होगा मन के लिए ?


यही सब उधेड़-बुन
लगी रहती है 


सांसें,
अंतिम सांस तक
इन दुविधाओं की सगी रहती हैं


और
इन सबके बीच,
हम इन सबसे परे
अपनी राह चलते रहते हैं 


तारतम्य तलाशते हुए
भटक जाते हैं,
कई बार
कहाँ हम खुद के ही अपने रहते हैं.


बहुत दुराव है 


अपना आप ही खोया है
इस बात से क्लांत मन बेतरह रोया है 


अब खिली धूप में
फिर से शुरू होगा सफ़र 


अपने आप तक पहुँचने की आसां नहीं डगर !!


या देवी सर्वभूतेषु... !! ९ :: सत्यनारायण पाण्डेय

Dr. S.N.Pandey

सुप्रभातः सर्वेषां शारदीय, बासन्तिके, वर्षपर्यन्तं वा जीवनपर्यन्तं देव्याः पूजन तत्परे सांसारिकजनानां कृते।

प्रिय बन्धुगण! दशमीपर्यन्त मां की प्रीति एवं आपकी सेवा में कुछ निवेदन करते रहने का मेरा संकल्प है।  इसी क्रम में कुछ और श्लोकों के मनन का क्रम चलेगा आज भी! आज प्रथम अध्याय के कुछ श्लोकों का मनन होगा जहाँ मोह के कारण और उनके निवारण हेतु हमारा क्या प्रयास होना चाहिए इस विषय में कुछ चिंतन प्रस्तुत करने का प्रयास रहेगा. 

प्रथम चरित्र/अध्याय  राजा सुरथ, समाधी नाम वैश्य और मेधा ऋषि के माध्यम से सांसारिक माया और उससे निवृत्ति संकेत से आरभ्भ होती है। इसके विषय में हम पहली कड़ी में चर्चा कर ही चुके हैं. आज इसी सन्दर्भ में महामाया और सांसारिक मोह के विषय में बात होगी.

ऋषिरुवाच॥४६॥
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥४७॥
ऋषिरुवाच॥४६॥
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥४७॥
विषयश्च महाभागयाति चैवं पृथक् पृथक्।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥४८॥
केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्॥४९॥
यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥५०॥
मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः।
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥५१॥
कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥५२॥
लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्‍यसि।
तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥५३॥
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः॥५४॥
महामाया हरेश्‍चैषा तया सम्मोह्यते जगत्।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥५५॥
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।
तया विसृज्यते विश्‍वं जगदेतच्चराचरम्॥५६॥
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये।
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥५७॥
संसारबन्धहेतुश्‍च सैव सर्वेश्‍वरेश्‍वरी॥५८॥


अर्थात् :-
ऋषि कहते हैं   कि विषय मार्ग का ज्ञान सब जीवों को है।
इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग-अलग हैं। कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते, और दूसरे रात में ही नहीं देखते। तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रि में भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं, किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते। पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी भी समझदार होते हैं। समझ होने पर भी  पक्षी स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों के पोषण में निरत हैं. ठीक ऐसे ही मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये पुत्रों की अभिलाषा करते हैं! यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है, तथापि वे संसार की स्थिति (जन्म-मरण की परम्परा) बनाये रखने वाले भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिर जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान विष्णु की योगनिद्रारूपा जो भगवाती महामाया हैं, उन्हीं से यह जगत मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस संपूर्ण चराचर जगत की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिये वरदान देती हैं।

अतः यह स्पष्ट है कि मोह होना स्वाभाविक है लेकिन इस मोह से मुक्ति हेतु प्रयासरत  होना भी हमारा ही कर्तव्य है! और माता का वचन भी कि वे प्रसन्न होने पर मुक्ति का वरदान देती हैं. मोह शाश्वत सत्य है, वहीँ यह भी सत्य है कि मोह बंधन से मुक्ति संभव है. ठीक उसी प्रकार हमें इस संसार में रहना चाहिए जैसे नाव पानीं में चलती है, कमल कीचड में खिलता है! नाव निर्लिप्त भाव से पानी में चलती है लेकिन अगर पानी नाव में प्रवेश कर जाए तो इसके दुष्परिणाम से हम भली भांति परिचित हैं. ठीक वैसे ही हम इस संसार रूप मोह माया के सागर में गोते लगा रहे हैं, लेकिन हमें सचेत रहना है कि हम इस माया रुपी जंजाल को अपने भीतर प्रवेश न करने दें. निर्लिप्त भाव से कर्म करते हुए कीचड़ में कमल की भांति दीप्त रहें! इन उदाहरणों से स्पष्टता और शांतिमिलती है कि जगदम्बा की कृपा से मोह पर विजय पाना संभव है. माँ महामाया वचनबद्धभी हैं हमें राह दिखने को फिर संशय कैसा!!

सोच विचार चिंतन मनन से हम उस राह पर अग्रसर हो सकते हैं जो हमारा अभीष्ट एवं हमारे लिए कल्याणकारी है !

स्वाहा त्वं स्वधां त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका॥७३॥


सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।

अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः॥॥७४॥

देवि जो स्वाहा, स्वधा और वषट्कार हैं, स्वर भी जिनके ही स्वरूप हैं, जो जीवनदायिनी सुधा हैं. नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार – इन तीन मात्राओं के रूप में वही स्थित हैं तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी वही हैं, ऐसी महिमामयी परमेश्वरी की स्तुति कर हम धन्य होते रहें और मोह माया रुपी संसार में निर्लिप्त भाव से रहकर मोक्ष के आकांक्षी हों, देवी की कृपा हम सब पर बरसे!

सबों को महानवमी की शुभकामनाएं! 

--सत्यनारायण पाण्डेय 

किनारे तक बहते जाना है

ये
किसी अन्य क्षितिज की
बातें हैं
हार-जीत से परे
मन को मन की
सौगातें हैं 


पाने को खोना कहते हैं
खो देने को पाना 


इस धरातल पर होता है
स्वतः अपने आप से मिल पाना.


वहां तक की
राह टेढ़ी है
कंटकाकीर्ण भी 


शरीर जर्जर हमारा
जीर्ण-शीर्ण भी 


इसी अवस्था में
एक धुन पर
चलते जाना है 


जीवन के महासमर में
धैर्य का तिनका थामे
किनारे तक बहते जाना है 


बहते-बहते
कहते-कहते
खुद को ही पाना है 


कि
ये किसी अन्य क्षितिज की
बातें हैं
इस धरातल पर
जुदा-जुदा सी
सौगातें हैं.

या देवी सर्वभूतेषु... !! ८ :: सत्यनारायण पाण्डेय

Dr.S.N.Pandey


सुप्रभातः सर्वेषां शारदीय, बासन्तिके, वर्षपर्यन्तं वा जीवनपर्यन्तं देव्याः पूजन तत्परे सांसारिकजनानां कृते।

प्रिय बन्धुगण! दशमीपर्यन्त मां की प्रीति एवं आपकी सेवा में कुछ निवेदन करते रहने का मेरा संकल्प है।  इसी क्रम में कुछ और श्लोकों के मनन का क्रम चलेगा आज भी!

माँ शरणागत वत्सल हैं, वे दया का  सागर हैं, जगत्जननी हैं वे. उनके पास सकल कष्टों का निवारण है. भक्तिभाव से प्रसन्न हो वे अभीष्ट वर प्रदान कर हमारा लोक परलोक तार देती हैं. ऐसी करुणामयी माँ के होते हुए हम दीन, हीन और असहाय कैसे हो सकते हैं. हमारी दीनता का कारण हम स्वयं हैं. हम अपनी क्षमताएं तो भूल ही चुके हैं. माँ के प्रति हमारा समर्पण भी इस चका चौंध में कहीं खो गया है. देवी की प्रेरणा से यह खोया हुआ सौभाग्य लौटे और हम मन से आराधना में लीन हो सकें. अगर आराधना सच्ची होगी तो हमसे दैनंदिन होने वाले कुकृत्य एवं स्वार्थपरक भावनाएं स्वतः दूर हो जाएँगी. हम माता से वरदान पाने के अधिकारी होंगे ठीक उसी तरह जैसे माँ से वैश्य ने वरदान प्राप्त किया था :-

वैश्‍यवर्य त्वया यश्‍च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः॥२४॥  १३ वां अध्याय

अर्थात्! वैश्यवर्य! तुमने भी जिस वर को मुझसे प्राप्त करने की इच्छा की है, उसे देती हूं। तुम्हें मोक्ष के लिए ज्ञान प्राप्त होगा।

कहते हैं, प्रार्थना के द्वारा वो वास्तु क्या मांगनी जो नाशवान हो. वैश्य ने अपने लिए मोक्ष माँगा. संसार से विरक्त उसके हृदय ने माता से वो निधि मांगी जो हमारे मनुष्य योनी का अंतिम सत्य व् मंजिल है.

सोऽपि वैश्‍यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः।
ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्‌गविच्युतिकारकम्॥१८॥

[ वैश्य का चित्त संसार की ऒर से खिन्न एवं विरक्त हो चुका था और वे बड़े बुद्धिमान थे अत: उस समय उन्होंने तो ममता और अहंता रूप आसक्ति का नाश करने वाला ज्ञान मांगा। ]

ज्ञान रुपी अमृत का पान करने का सुअवसर जिसे मिल जाए वह सकल तुच्छ अवधारणाओं से छूट जाता है. हम भी माँ की आराधना में यूँ लीन हों कि सांसारिक आसक्तियां हमसे छूट जायें और हम भक्तिपूर्वक देवी को हृदय में बसाये हुए सांसारिक कर्तव्यों का समुचित निर्वाह कर सकें!


--डॉ. सत्यनारायण  पाण्डेय 

द्वन्द ?!!

Skansen :: Stockholm



बुनती है
खुद फंस जाती है
मकड़ी
जाले फिर भी बनाती है 


उसका नियत कर्म
उसका स्वभाव है यह. 


अपने स्वभाव के वशीभूत
हम कितना कुछ ऐसा करते हैं
जो शायद नहीं करना चाहिए ?! 


कुछ बातें
पूर्व निर्धारित भी हो ही सकती हैं
जो जैसा घटित हो रहा है
अच्छा है 


बुरा है, तो है
ये अपना स्वभाव है
कटु-तिक्त, जैसा भी हो,
मगर सच्चा है 


एक रोज़ सब उलझनें
सुलझ जानी हैं
न भी सुलझे तो कविता में तो गा ही सकते हैं--
इसी उलझन-सुलझन का नाम ज़िन्दगानी है !!

या देवी सर्वभूतेषु... !! ७ :: सत्यनारायण पाण्डेय

डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय

सुप्रभातः सर्वेषां शारदीय, बासन्तिके, वर्षपर्यन्तं वा जीवनपर्यन्तं देव्याः पूजन तत्परे सांसारिकजनानां कृते।

प्रिय बन्धुगण! दशमीपर्यन्त मां की प्रीति एवं आपकी सेवा में कुछ निवेदन करते रहने का मेरा संकल्प है।  इसी क्रम में कुछ एक श्लोक का मनन करते हैं आज.

माँ का वचन है देवताओं की स्तुति से प्रसन्न हो कर कहती हैं --

वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ।

तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम्॥३७॥

***
देवा ऊचु:॥३८॥

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।

एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥३९॥

अर्थात्! देवी कहती हैं, "हे सुर गण! जो वर चाहे मांगों मैं जगत के उपकार के लिए वह वर प्रदान करूंगी", जिसपर देवता गण एकस्वर में कहते हैं "हे अखिलेश्वरी! तीनों लोकों के सभी संकटों का शमन करो एवं शत्रुओं से रक्षा का वर प्रदान करो".

और भी, सबसे कठिन  स्थिति  में --

भूयश्‍च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि।

मुनिभि: संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा॥४६॥

अर्थात्! बारिश न होने पर मुनियों की स्तुति के प्रभाव से अयोनिजा रूप में प्रगट होऊँगी. फिर देवी कहती हैं कि मैं बारिश न होने तक अपनी देह पर उत्पन्न प्राणदायक शाकों से सारे संसार का भरण पोषण करूंगी

ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्‌भवै:।

भरिष्यामि सुरा: शाकैरावृष्टे: प्राणधारकै:॥४८॥

अर्थात्, जगन्माता (अपने पुत्र-पुत्रियों) मात्र मनुष्यों के लिए ही नहीं अपितु "प्राणधारकै:" हर प्राणधारक को आश्वाशन दे रही हैं और वहीँ संग्रह की प्रवृत्ति वाले हम सब, अकाल पड़ने पर आपत विपत में खिलाने का दावा करने वालों के सामने, आधी आबादी भूखे सो रही है! क्या हम क्षमा के पात्र हैं जगदम्बा की नज़रों में ?!! सोचें तो सही...


सधन्यवाद प्रेषित !

--सत्यनारायण पाण्डेय 

या देवी सर्वभूतेषु... !! ६ :: सत्यनारायण पाण्डेय

डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 


सुप्रभातः सर्वेषां शारदीय, बासन्तिके, वर्षपर्यन्तं वा जीवनपर्यन्तं देव्याः पूजन तत्परे सांसारिकजनानां कृते।
प्रिय बन्धुगण! दशमीपर्यन्त मां की प्रीति एवं आपकी सेवा में कुछ निवेदन करते रहने का मेरा संकल्प है। प्रथम, मध्य और उत्तर देवी के चरित्र की क्रमशः प्रस्तुति के बाद मातारानी की प्रेरणा से जो उल्लिखित हो जाय हम सब उनकी ही कृपा मान स्वीकार कर अवश्य अनुगृहीत करेंगे ऐसा मेरा विश्वास है।
हम सबों ने देखा ,तीन प्रमुख पात्र ही सप्तशती की कथा के विस्तारक हैं--राजा सुरथ, समाधि नाम वैश्य और मेधा नाम ऋषि।
केवल कुंजिका के तौर पर--"यथा नाम तथागुण" को ध्यान में रखें---ऋषि मेधा हैं (मेधा, बुद्ध, संसिद्ध ज्ञान के मूर्तरूप)
राजा सुरथ (जिनका सु+रथ है--धर्मानुकूल शासन व्यवस्था वाला)
समाधिनाम वैश्य (सम्यक्+धी=बुद्धि युक्त)
यही लोक कल्याण के तीन मुख्य आस्पद हैं।
आज की दुरावस्था के कारणों को हम खुद समझें और निवारण के आस्पद हम खुद बनने की चेष्टा भी करें तो, जगदम्बा अपनी प्रतिज्ञानुसार तो सहायतार्थ खड़ी ही हैं--
तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम्।
आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गपवर्गदा।। ५/१३।।
हे राजन्! उन्ही (जगदम्बा) के शरण में जाओ ,वही आराधना, पूजन से मनुष्य मात्र को भोग, ऐश्वर्य, यहां तक कि धर्मपूर्वक संयमित जीवन धारण करने वाले को स्वर्ग, अपवर्ग भी सहज ही प्रदान करती हैं।
अब देखें राजा सुरथ और समाधिनाम वैश्य ने, जो राज्य और घर से निष्कासित हैं, जंगल में साधन हीन होकर भी देवी का सात्विक पूजन कर कैसे स्वाभीष्ट प्राप्त कर लिए--
तौ तसन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम्।
अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः ।।
***
निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ सहाहितौ।
***
ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुगुक्षितम्।
एवं समायाराधतोस्त्रिभिवर्षैर्यतात्मनोः ।।
परितुष्टा प्राह चण्डिका--
यत्प्रार्थयते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन।।
मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि ते।।
( श्लोक--१० से १५ तक अध्याय १३ / सप्तशत्या:)
अर्थ सुगम है, विस्तार भय से, नहीं लिख रहा हूं।
पर ध्यान रहे, जगदम्बा दिखावे से परितुष्ट नहीं होतीं। धूप दीप पुष्प से पूजा ही अभीष्ट है उन्हे। निराहार रहकर उनकी आराधना हो या आहार लेकर, बलि भी अपने रक्त की ही देनी है और अगर बलि देनी ही है, तो जगदम्बा के चरणों में महीषरूप अहं की, इर्ष्या की, द्वेष की, लोभ की, मोह की, मद की और मात्सर्य की बलि दें।
अन्यथा अल्प परिश्रम और अल्पकाल में प्राप्त ही प्राप्त होनेवाली कृपा से अपनी नादानी के कारण हम मनुष्य आने वाले करोड़ों वर्षों तक उनकी कृपा पाने में विफल ही हैं और आगे भी रहेंगे।
पर हमें विश्वास है, एक दिन हम अपने शुद्ध और सात्विक कर्मों का महत्व समझेंगे। और अभीष्ट प्राप्ति में महामाया की कृपा से सफल भी होंगे।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

भगवती सबका कल्याण करें !!

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

या देवी सर्वभूतेषु... !! ५ :: सत्यनारायण पाण्डेय




सुप्रभातः सर्वेषाम् देव्याः भक्तानाम कृते! नमस्कारश्च!
सबों के लिए शुभकामनाएं!

मां जगदम्बा का देवों के प्रति यह आश्वासन कि:--
"एवं यदा यदा बाधादानवेत्था भविष्यति।
तदा तदा अवतीर्याऽहं करिष्यामि अरि संक्षयम्।

अर्थात् जब जब इस प्रकार दानव प्रबल हो आपके सत्कार्य सम्पादन में बाधक होंगे, आपकी पुकार पर भविष्य में भी अवतरित हो शत्रुओं का संहार करूंगी।

आज हमारी (मां के प्रति उपासना) मां के प्रति पूजा हार्दिक कम, दिखावे की ज्यादा हो गई है।
आज हम एक पंडाल दस करोड़ की बनाने की क्षमता रखते हैं, पूरे देश में आकलन किया जाय तो सब मिलाकर अरबों खरबों की राशि प्रति वर्ष खर्च होती होगी। पर देवी के क्षुधा रूप का दर्शन ऐसे लोगों द्वारा,  शोसित पीड़ितों में न कर पाना, मां की भक्ति से विमुख होना नहीं है क्या !!
देवी दया रूप में हमारे अन्दर क्यों नहीं बसतीं, क्षमा रूप में हम में क्यों नहीं भाषित होतीं।
आज "या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता" क्यो हमें नहीं दिख पातीं। उनका श्रद्धारूप हम से आज दूर क्यों है।

माना पंडाल बनाने एवं अन्यान्य के समायोजन मे भी कुछ लोगों को रोजगार मिलता है, पर ये क्षणिक रोजगार ही दे पाते हैं और नन्प्रोडक्टिभ ही कहलाएंगे।
क्या ही अच्छा हो अगर उस अपार धनराशि से लघु, कुटीर उद्योग से लेकर फूडप्रसेसिंग की, एवं अन्य बड़े उद्योगों का जाल पूरे देश मे बिछ जाय कि "या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता" का मां का मूर्तिमान स्वरूप देश के आकाश के पंडाल में सदा के लिए विराजित हो जांय जिसके विसर्जन की हम बात सोच भी न सकें।

शान्ति का मतलब सुख शान्ति! भला कौन इसका विसर्जन करना चाहेगा।

"या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता"
की ओर भी हमारा ध्यान हो, मां की कृपा से "महामाया" की प्रेरणा से हमारी बुद्धि विमल हो-"या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
अब भी हम मोह निद्रा त्यागें!!!

सधन्यवाद प्रेषित्।

-सत्यनारायण पाण्डेय 

या देवी सर्वभूतेषु... !! ४ :: सत्यनारायण पाण्डेय

Dr. S.N.Pandey

सुप्रभातः सर्वेषाम् देव्याः भक्तानाम कृते! नमस्कारश्च! 
दुर्गा सप्तशती के अंतर्गत देवी  के  तीन चरित्रों की चर्चा क्रमशः   संक्षेप में की गयी !
तृतीय चरित्र  के अंतर्गत  राक्षस शुम्भ निशुम्भ   के   मारे   जाने   पर  एकादश   अध्याय  में   देवों    के    द्वारा  देवी की वृहद् स्तुति की गयी है. उनमें  से  कुछ श्लोकों की व्याख्या नवरात्रि के दौरान लोकानुकरण के लिए किया जायेगा.
आज इसी क्रम में इन दो श्लोकों को देखें :-

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिया: समस्ता: सकला जगत्सु
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरापरोक्ति:
अर्थात :
देवि! सम्पूर्ण विद्याएं तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरुप हैं. जगत में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारा ही रूप हैं. 

हे जगदम्ब! एकमात्र आपसे ही सारा विश्व व्याप्त है. ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस नवरात्रि के मध्य सारा देश माँ की आराधना में लगा है और इस मान्यता की स्वीकृति अपने मन-मस्तिष्क में सारे लोग बिठा लें तो स्वतः ही स्त्री जाति के प्रति नित हो रहे दुर्व्यवहार एवं उठने वाले कुत्सित भाव विलीन हो जायेंगे. इस श्लोक में इंगित किया गया है कि इस भाव से बढ़ कर माँ की कोई स्तुति नहीं हो सकती. हे माँ! तुम स्तवन करने योग्य पदार्थ वाणी से भी परे हो अर्थात वाणी से माँ की स्तुति संभव नहीं है! ध्यातव्य हो कि हमारे सद् व्यवहार व सदाचरण ही माँ की वास्तविक स्तुति हैं !!
***

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान् सकलानाभीष्टान्
त्यामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता श्रयतां प्रयान्ति
अर्थात :
हे देवि ! तुम प्रसन्न होने पर सभी भक्तों के रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो. जो लोग तुम्हारी शरण में आ जाते हैं उन पर कोई विपत्ति नहीं आती एवं वे दूसरे मनुष्य को शरण देने वाले बन जाते हैं. 

यहाँ इस श्लोक और श्लोकार्थ पर अगर हम गंभीरता  से विचार करें तो यह स्पष्ट ज्ञात हो जायेगा कि हम सब रोग शोक से क्यूँ पीड़ित हैं. हमें अपने अभीष्ट की सिद्धि में इतनी कठिनाईयां क्यूँ झेलनी पड़ रही है. दूसरे को आश्रय देने की बात तो दूर, हम स्वयं की उदरपूर्ति में भी असमर्थ हो रहे हैं. 

देवी की आराधना हम सब हजारों हज़ार वर्षों से करते चले आ रहे हैं फिर भी हमारी समस्याएं क्यूँ यथावत हैं, सब मिल इस पर विचार एवं चिंतन करें तो उत्तर स्वमेव प्राप्त हो जायेगा! चरित का मतलब चरित्र है और भक्तों द्वारा देवी की आराधना का अर्थ केवल धूप दीप नैवेद्य समर्पण ही नहीं अपितु उन भावों एवं संस्कारों का अनुकरण ही वास्तविक आराधना है.

अगर हम सचमुच रोग शोक से मुक्ति और दूसरे के लिए आश्रयदाता बनना चाहते हैं तो इस   रूप     में   अपनाएं एवं स्वयं परीक्षण कर लें !
सधन्यवाद प्रेषित!

--सत्यनारायण पाण्डेय 

ज़हर हूँ, मुझे अमृत होना है !!

एक डोर होती है
वो दिखती बहुत मज़बूत है
पर दिखने में ही
वस्तुतः बहुत नाज़ुक होती है 


टूट गयी तो टूटन भी अपनी
खुद सी लेती है


किसी पर जाहिर नही होने देती !


ऐसी डोरें अमृत  हैं
जो हुईं आपके जीवन में
आपको अमृतमय करती हैं.


एक डोर होती है
वो दिखती बहुत कमज़ोर   है
पर दिखने में ही
वस्तुतः बहुत मज़बूत होती है


टूट गयी
तो टूटन अपनी जगजाहिर करती है 


तोड़ने वाले कारण को ही फिर तोड़ देती है 


ऐसी डोरें ज़हर होती हैं
जो हुईं आपके जीवन में
तो आपका जीवन अभिशप्त सा कुछ होगा.


मैं शायद दूसरे तरह की डोर हूँ 


ये सब उकेरते हुए
विश्रांत मेरे नभ का, कोना कोना है
ज़हर हूँ, मुझे अमृत होना है !!

या देवी सर्वभूतेषु... !! ३ :: सत्यनारायण पाण्डेय




सुप्रभातःसर्वेषां मंगलकामनारतां विद्वद्वरां स्रीणां सम्मानरक्षणाय बद्धपरिकरां सत्यार्थे मावान प्रति।


धन्यवादाः! अद्यप्राप्तावसरोऽहं दुर्गासप्तशत्याः तृतीयचरित्रमवलम्य किञ्चित् निवेदनं करोमि:--


तृतीय चरित्र "उत्तरचरित्र" कहलाता है, यह नौ अध्यायों का है। इस चरित्र की देवता महासरस्वती हैं। उपसंहार रूप में समाधि नाम वैश्य को उसकी कामना के अनुसार संसिद्ध ज्ञान का वरदान दिया है।

यहां तृतीय चरित्र की संक्षिप्त कथा संकेत से पूर्व आप सभी को मैं विशेष रूप से निवेदन करना चाहता हूं, कि-- हमारी सारी धार्मिक पुस्तकें एवं उत्सव, पूजन सोद्देश्य ही हैं, सामाजिक स्वस्थ संरचना ही मुख्य उद्देश्य आरम्भ से रहा है, अतः हमें बराबर उस दृष्टि से भी समय समय पर मूल्यांकन करना चाहिए, कहां हम भटक गए हैं।


तीसरे चरित में स्त्री की महिमा आरम्भ के पंचम अध्याय मे उभर कर सामने आती है---


पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भुता यथाभवत् ।
वधायदुष्ट दैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयो:।।


देवी के आश्वाशन पर देवगण मां की स्तुति दैत्यों के वध के लिए हिमालय प्रांत में कर रहे थे, इसी बीच देवी गौरी गंगास्नान के लिए जा रहीं थी, शिवा नाम की शक्ति देवकार्य के लिए गौरी के शरीर से ही सम्भूत हुईं।


वे अत्यन्तसुनदरीं थीं, हिमालयप्रांत उनके तेज से द्योतीत हो उठा।चण्ड मुण्ड नामक दूतों अपने स्वामी शुम्भ निशुम्भ को सूचना देते हैं---ऐसी सुन्दर स्त्री आज तक देखी नहीं गई, अभी आप तीनो लोक के स्वामी हैं, वह आपके योग्य है।


शुम्भ निशुम्भ ने उन्ही दूतों से अम्बिका के सम्मुख प्रस्ताव भेजा, तीनों लोक की सारी महत्वपूर्ण वस्तुओं पर मेरा ही अधिकार है, तुम्हे भी हम स्त्रीरत्न मानते हैं, हम दोनों में जिसे चाहो वरण कर त्रिलोक स्वामिनी बन जाओ।


दूतों ने हु-बहु अम्बिका के सामने वैसा ही निवेदित किया। देवी भी उनकी बातों को मुस्कुराती हुईं सुनती हैं और कहती हैं---तुम्हारे स्वामी ने ठीक ही कहा है, पर मैने बचपन में खेल-खेल में यह प्रतिज्ञा कर ली है--


"यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति।।


अर्थ सहज है अतः विस्तार भय से संकेत ही स्वीकार्य हो। देवी ने कहा जाओ अपने स्वामी से बोलो मुझे संग्राम मे जीत अपनी इच्छा पूरी करें। दूतों ने उत्तर दिया, हे देवी! इन्द्रादि देवता सामने खड़े नहीं हो पाते, युद्ध तो दूर की बात है। तुम अकेली औरत क्या लड़ पाओगी। सीधे चलो नही तो स्वामी आ गए तो--


"केशाकर्षण विनिर्धूत गौरवामागमिष्यसि"

वे तुम्हारा गर्व चूर करते हुए केश पकड़ खीच कर ले जाएंगे।
देवी ने स्पष्ट कहा--वे इतने बलवान हैं, तो मैं क्या करूं? वे जैसा चाहें करें। अम्बिका तो जगदम्बा हैं, अपारशक्तिशालिनी! अपार शक्ति क्रोध नहीं करती, उसे तो परिणाम भलि प्रकार ज्ञात होता है।
आगे के अध्यायों में युद्ध का वर्णन है क्रमशः धुम्रलोचन, चण्ड मुण्ड, असिलोमा, रक्तबीज आदि राक्षस मारे जाते हैं और फिर मुख्य शुम्भ निशुम्भ से युद्ध की चर्चा है।


देवी इन्द्रणी, रूद्राणी, शिवानी आदि अपनी शक्तियों को प्रकट कर युद्ध करती हुईं निशुम्भ का वध कर देती हैं। शुम्भ सामने आता है और ललकारता हुआ कहता है--


"अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी"


देवी कहती हैं:-


"एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः।।


अर्थात, मेरे सिवा संसार में और क्या है, ये मेरी ही विभूतियां हैं, जो मुझमें प्रवेश कर रहीं हैं। शुम्भ का भी वध हो जाता है।


यहां जरूरत के अनुसार एकता में अनेकत्व और अनेकता में शीघ्रातिशीघ्र एकता की स्थापना का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत् हुआ है।
एकादश अध्याय देवों द्वारा देवी का स्तुति गान है जिसपर विस्तार से क्रमशः आगे चर्चा होगी।


अध्याय बारह फलश्रुति और तेरहवें अध्याय में राजा सुरथ एवं समाधिनाम वैश्य को देवी आराधना से प्रसन्न हो, उनका अभीष्ट दूसरे जन्म में राज्य प्राप्ति और वैश्य के अभीष्ट संसिद्ध ज्ञान प्रदान करती हैं।


इस से यह स्पष्ट हुआ मां की भक्ति करने वाले अपना अभीष्ट अवश्य पाते हैं।


अन्ततः निवेदन है---मातृशक्ति अपना स्वरूप पहचानें। षुरूष भी आद्याशक्ति की महिमा जानें और महाकाली--महालक्ष्मी--महासरस्वती की अनुकम्पा के पात्र बनें। जगदम्बा की कृपा से सम्पूर्ण विश्व में सुख शान्ति हो।


सर्वस्यार्ति हरे देवी नारायणी नमोऽस्तुते।।


--सत्यनारायण पाण्डेय 

चिड़िये रँ सुख-दुख :: अंगिका अनुवाद : डॉ. अमरेन्द्र


आज अपनी एक पुरानी कविता फ़ेसबुक पर शेयर किया हमने और कविता का सौभाग्य कि डॉ. अमरेन्द्र जी ने कविता को अंगिका में अनूदित कर दिया! 
इसे सहेज लें यहाँ भी ! बहुत बहुत आभार, डॉ. अमरेन्द्र जी !!




एकटा छोटो रँ चिडियाँ छेलै
दूर जैतें आरो छोटो होते जाय छेलै
एत्ते छोटो क़ि फेनू अलोपित होय गेलै
सरंग के विस्तार में
जना होबें नै करे संसार में ।


सुख रहे आक़ि दुःख
ई छोटो रँ चिड़िये नांखी ते छै
नगीच छूवै छै ते अपनों चहचहैबो से
अपनों उपस्थिति इ किसिम भरी जाय छै हमरो भीतर
कि ओकरे प्रभावो में छूवै छै हमरो वजूद
मजकि छै ते पंछिये वाला सोभाव नी ।


नै सुख टिकै छै
नै दुक्खे टिके पारे छै
चुनी के कुछु चुगा हमरो धैर्य रो
वहां पंछी रँ फुर्र होय जाय छै
उड़ते होले अलोपित
ई सरंग के विस्तार में
जेना कभियो
रहले नै रहे हमरो संसार में ।


--डॉ. अमरेन्द्र
(२१ .९ .२०१७)

या देवी सर्वभूतेषु... !! २ :: सत्यनारायण पाण्डेय




सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदां लोककल्याणे तत्परां दुर्गायाः भक्तानां कृते!
सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते।।
(मंगल्ये ही उच्चारण है मांगल्ये नहीं)
नवदुर्गायाः पूजनेमतिमतां सज्जनाः अद्यावधि नवदिवसपर्यन्तं नवदुर्गायाः आराधनां कुर्वन्ति, परिवारकल्याणाय सम्पूर्णविश्वस्य कल्याणाय च।
कथं न भवेत् "सा जगदम्बा सर्वेषां मंगलकारिणी, नास्ति कश्चित्संदेहः"।
कल मैं ने सप्तशती में वर्णित देवी के प्रथम चरित्र की चर्चा की थी, वह प्रथम अध्याय में ही समाहित है। 
द्वितीय चरित्र, द्वितीय अध्याय से चतुर्थ अध्याय तक वर्णित है। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली कही गईं हैं और द्वितीय चरित्र की महालक्ष्मी, ऐश्वर्य देने वाली।

इस द्वितीय चरित्र में महिषासुर की सेना और महिषासुर के वध की कथा प्रमुख है। जैसा मैने संकेत दिया था प्रथम चरित्र "बुद्धिं यस्य बलं तस्य निर्बुद्धिस्तु कुतो बलम्" का उद्घोषक है, वहीं द्वितीय चरित "संघेशक्ति" की शिक्षा  हम भक्तों के लिए ईंगित करता है।

संक्षिप्तकथानुशीलन क्रम में हम यहां पाते हैं--
महिषासुर सभी इन्द्रादिदेवताओं को पराजित कर स्वयं इन्द्र बन बैठा था:--
"जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः।"
देवगण भयभीत हो जंगलों में भटकने को विवश थे।
एक दिन सभी ब्रह्मदेव के पास समाधान के लिए जाते हैं और ब्रह्मा सभी देवों के लेकर भगवान विष्णु के पास इस समस्या के समाधान के लिए पहुंचते हैं:---
"ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम्"
***
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरूडध्वजौ।
***
यथावृत्तं कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम्।

विष्णु के समक्ष देवों ने अपने पराजय और महिषासुर के आतंक की कथा विस्तार से सुनायी तथा महिषासुर के वध का निवेदन किया।
भगवान विष्णु क्रोधित होते हैं, उनसे एक तेज निकल कर आकाश में चमक उठता है, फिर क्या था ब्रह्मा, शिव, इन्द्रादि देवता सभी उत्साहित हो क्रोध करने लगे और सबों के निःसृत तेज इखट्ठे हो परम सुन्दरी, परम शक्ति शालिनी दुर्गा रूप में प्रकट हो गईं, सबों ने अपने अपने आयुध उनको भेंट किए, प्रकृति ने शृंगारादिप्रसाधन दिए और उस पूंजीभूत अपराजेय शक्तिस्वरूपा मां दुर्गा ने दुर्दान्त महिषासुर का वध किया।

इसके बाद चतुर्थ अध्याय में सभी देवों ने माता की विस्तार से स्तुति की है।

यहां निश्चित रूप से संगठित शक्ति की महिमा गायी गई है, देवता डर से भाग रहे थे, ब्रह्मा की अगुआई में विष्णु के पास गए विष्णु को इस असहज स्थिति पर क्रोध का आना और सबमें उत्साह तथा शक्ति का संचार संगठ विजय की पराकाष्ठा तक पहुंचना।

हम भी जगें पूजन के साथ मनन भी हो।

फिर "संघे शक्ति कलियुगे(वर्तमानेऽस्मिन्युगे)" तो आवश्यक ही है।

जयन्ती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

--सत्यनारायण पाण्डेय 

या देवी सर्वभूतेषु... !! १ :: सत्यनारायण पाण्डेय



सुप्रभातम्! मंगलकामना !
महालया (पितृ विसर्जन) के उपरान्त मां नवदुर्गा की आराधना के लिए नवरात्रि की सबों को हार्दिक शुभकामनाएँ !
कल आश्विन शुक्लपक्ष प्रतिपदा से कलश स्थापन पूर्वक मां दुर्गा की विधिवत आराधना आरम्भ हो जाएगी। मां की स्तुति के लिए "दुर्गासप्तशती" का पाठ भी आरम्भ हो जाएगा।
शप्तशती का अर्थ ही है सात सौ श्लोक युक्त मां की स्तुतिगायन करती पुस्तक। यह देवी के तीन चरित्र का गायन करता हुआ तेरह अध्यायों में विभक्त है। 

प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तर चरित्र।
प्रथम चरित्र राजा सुरथ, समाधी नाम वैश्य और मेधा ऋषि के माध्यम से सांसारिक माया और उससे निवृत्ति संकेत से आरभ्भ होती है।

राजा सुरथ शत्रुओं से पराजित हो घोर वन में विचरते हुए समाधि नाम वैश्य को चिन्तित मनःस्थिति मे पाते हैं, जिसे धनलोभ के कारण स्त्री और पुत्र ने अपमानित कर घर से निकाल दिया है। 
राजा और वैश्य आपस में अपनी अपनी व्यथा-कथा कहते सुनते चलते हुए एक आश्रम में पहुंचते हैं, जहां मेधा ऋषि विराज रहे हैं।
राजा ही मेधा ऋषि से समाधि वैश्य को ईंगित कर ऋषि से प्रश्न करता है, इस प्रश्न में राजा का मानसिक उलझन भी समाहित है--
राजा कहते हैं-- हे ऋषि! यह समाधि नाम वैश्य अपनी स्त्री पुत्रों के द्वारा अपमानित कर घर से निकाल दिया गया है, फिर भी उनकी ही सुख सुविधा के लिए चिन्तित है, ऐसा क्यों? इसे तो उनके अनिष्ट की कामना करनी चाहिए थी।
यहां स्वाभाविक स्थिति की ओर संकेत करते हुए ऋषि कहते हैं --"लोभात्प्रत्युपकाराय" लोभ के वशीभूत प्राणी ऐसा सोचते हैं कि कल के दिन बुढापे में मेरा पुत्र सहायक होगा।
आश्रम के एक भूभाग में माता चिड़ियां द्वारा घोसले में बैठे अपने बच्चे के चञ्चु में चावल कण डालते हुए दिखने पर ऋषि ने कहा -- देख नहीं रहे चिड़ियां स्वयं भूखी रहकर भी प्रत्युपकार के लोभ मे अन्न के कण को अपने बच्चे के मुख मे डाल रही है।
राजा और वैश्य दोनों ऋषि से पूछते हैं, आखिर ऐसा क्यों होता है?मनुष्य तो मनुष्य हिंस्र पशुपक्षी भी बच्चों के हित साधन में अपनी चिन्ता छोड़ लगे रहते हैं।
यह महामाया का प्रभाव है। ज्ञान तो कम या ज्यादा सभी प्राणियों में होता है :--

ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोः विषयगोचरे
विषयश्च महाभाग यातिचैवं पृथक् पृथक्
दिवान्धः प्राणिणः केचित् रात्रान्धः तथापरे
केचिद्विवास्तथारत्रौ प्राणिणः तुल्यदृष्टयः ।।
भावार्थ यह है कि मात्रा कि कमी बेसी भले हो पर मनुष्य, पशु, पक्षी यहां तक कि सभी जीवों को ज्ञान होता है, पर महामाया बलपूर्वक मोह से जोड़ देती हैं।

ये महामाया कौन हैं? क्या हैं? कब अवतार लेती हैं? आदि के उत्तर में मेधाऋषि देवी की (महामाया की) कथा आरभ्भ करते हैं--"प्रलयके बाद क्षीरसागर में महामाया के प्रभाव से योगनिद्रा में शेषशय्या पर शयन कर रहे थे, उनके नाभिकमल पर ब्रह्माजी ध्यानस्थ बैठे हैं।ई धर भगवान विष्णु के कान के मैल से दो दुर्दान्त राक्षस उत्पन्न हो ऊपर की ओर देखते हुए ब्रह्माजी को मारना चहते हैं- 

विष्णुकर्णमलोद्भूतः असुरौ मधुकैटभौ।
दुरात्मानौतीर्यौ ब्रह्माणं जनितोद्यमौ।।

ब्रह्मा ने योगमाया की स्तुति की, उन्हे प्रसन्न किया और भगवान विष्णु को योगनिद्रा से मुक्त करने का निवेदन किया ताकि वे प्रबोधित हो दुर्दान्त मधु-कैटभ से उनकी रक्षा कर सकें:-

"नमोदेव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियता:प्रणताम।।

विष्णु योगनिद्रा के अलग होते ही प्रबोधि हो मधुकैटभ से युद्ध करते हैं:--

"पञ्चवरष्रसहस्राणि बाहु:प्रहरणो विभु"

पांच हजार वर्ष तक बहु युद्ध मधु-कैटभ और भगवान विष्णु से होता रहा, राक्षस परास्त नहीं हुए, अन्त में विष्णु भी महामाया की शरण में गए और प्रार्थना किया कि हे महामाया! कुछ ऐसा करें कि ये मारे जा सकें, मैं शरणागत हूं। 

महामाया के प्रभाव से मोहित हो दोनों राक्षसों ने भगवान विष्णु से कहा :-- हम दोनों तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं। अकेला लड़कर भी जीवित हो! वरदान मांगों।

महामाया के वशीभूत हो गये थे दोनो अतः ऐसा प्रस्ताव भगवान विष्णु के सामने रखा और भगवान ने कहा तुम दोनो खुश होकर वरदान देना ही चाहते हो तो हमें वरदान दो कि, अभी अभी दोनों मेरे हाथ मारे जावो!

राक्षस वचनबद्ध थे मुकर तो नहीं सकते थे, बुद्धि दौड़ायी और कहा पृथिवी जहां जलमग्न न हो वहां हमे वध करो।

विष्णु ने जल से ऊपर अपनी जांघपर गर्दन रखने को कहा और एक एक कर सुदर्शन चक्र से दोनों का वध कर दिया।

यहां दो बातें ध्यातव्य हैं वुद्धि बल से बड़ी होती है:--
"बुद्धिं यस्य बलं तस्य निर्बुद्धस्तु कुतो बलम्।"
बुद्धि के बलपर ही विष्णु अपने लक्ष्यसिद्धि में सफल हुए।

दूसरी बात की हम सफेदपोशों से ज्यादा वचन के पक्के वे राक्षस हुआ करते थे, यदि वे दोनों चाहते तो वचन से मुकर जाते और लड़ते,प र वे दिए गए वचन के प्रति दृढ हैं, जबकि जीवन मरण का प्रश्न था, और एक  हम हैं सार्वजनिक रूप से शपथ लेकर भी चौबीस घंटे में बहत्तर बार वाग्भंग करते हैं !!

क्रमशः...

--सत्यनारायण पाण्डेय 

मन आकंठ भरा रहता है

कहीं कोई
बस एक किरण हो
जीवन का सकल अन्धकार
थमा रहता है 


ज़िन्दगी
हौले से मुस्कुरा देती है
दिया अपनी शक्ति भर
ख़रा रहता है 


आने जाने वाले
नहीं जानेंगे कभी
ये जो रास्ता है न
इसका मन आकंठ भरा रहता है 


कि राही के दर्द से रस्ते रोते हैं
संवेदनहीन दुनिया से नज़रें फेरीं तो देखा
प्रकृति का कण-कण मेरे दुःख में
मेरे साथ खड़ा रहता है 


तुमने नहीं देखा
तो उदास रह गयीं
वरना इन आँखों में ख़ुशी का मंज़र
क्षण-दर-क्षण यूँ ही धरा रहता है 


आओ न
मिल बैठेंगे बात करेंगे
कि ज़िन्दगी में कैसे जीवन तत्व ही
कई बार मरा रहता है !!

ऊँ अक्षरब्रह्मणे नमः! ३ सत्यनारायण पाण्डेय



पापा से बातचीत :: एक अंश
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ऊँ अक्षरब्रह्मणे नमः!

सभी सुधीजनों को नमस्कार!
शब्द , शब्दार्थ, व्यवहारिक परिवेश के संन्दर्भ में कुछ दैनन्दिन जीवन से जुड़े शब्दों का अनुशीलन:--
दान, दक्षिणा, पाप, पुण्य, स्वर्ग, नर्क, निरक्षर, साक्षर। आदि।

दान मनुष्य मात्र का स्वाभाविक कर्म है। अपनी सात्विक कमाई का एक निश्चित अंश जरूरत मंदों के लिए निःस्वार्थ भाव से अर्पित करना।
प्राचीन काल में यह प्रथा थी कि ब्राह्ममुहुर्त में गुप्तदान के क्रम में सामर्थ्यवान लोग अन्न, वस्त्र, फल, द्रव्य अन्यान्य उपयोगी चीजें नगर के मुख्य चौराहे पर रख आते थे। जरूरतमंद अपनी-अपनी जरूरत के अनुसार वस्तुएं ग्रहण कर लेते थे।
यह अप्रत्यक्ष दान का अच्छा ढंग था, देने वाले और लेने वाले एक दूसरे को जान भी नहीं पाते थे।

यज्ञादि में यज्ञपुरोहित सहित अन्य याचक मंडली के लिए दान एक मुख्य विहित कर्म था, यज्ञ की सिद्धि के लिए दक्षिणा अनिवार्य कृत्य था, दक्षिणा देने के बाद ही यज्ञ सात्विक कहलाता था, अन्यथा तामसिक यज्ञ कहा जाता था।

"दक्षिणा विरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते", तथा "हतं यज्ञं अदक्षिणम्"
यज्ञकर्ता ब्राह्मण इसके अधिकारी माने जाते थे, जिसका उद्देश्य था उस निस्पृह पुरोहित के माध्यम से जरूरतमंद और असहायों तक सहायता पहुंचाया जाना। इसी लिए तो याज्ञिक सात्विक ब्राह्मणो की संज्ञा पुरस्य ग्रामस्य वा हितैषी (पुरः+हितः=पुरोहितः) पुरोहित कहलाते थे। आज की बात ही और है ,ब्रह्मण भी संग्रही हो गए , व्यवस्था भी भग्न सी हो गयी।

स्वर्ग और नर्क की स्थिति है भी या यह एक परिकल्पन मात्र है, यह विवाद चलता रहता है।
सु+वर्ग =स्वर्ग (यण् सन्धि) सु=अच्छा, वर्ग =स्थल, भूभाग। तात्पर्य सुन्दर सुखद स्थल से जुड़ा है। हम ही अपने शास्त्र द्वारा सुनिश्चित स्वार्थ रहित कृत्यों से जहां रहते हैं , उसे सु वर्ग यानि स्वर्ग बना देते हैं।
ठीक इसके विपरीत आचरण से स्वर्ग भी शीघ्र नर्क में परिवर्तित हो जाता है। मेरी समझ मे(नञ् अर्कः=सूर्यः) जहां ज्ञान रूप प्रकाश का अभाव अन्घतमस् से घिरा, दुख दैन्य से भरा स्थान ही तो नर्क है।

इस तरह स्पष्ट है स्वर्ग और नर्क के निर्माता और भोक्ता हम खुद हैं, फिर दोनो के अस्तित्व के प्रति संदेह कैसा?

पाप और पुण्य ही तो है दो कमाई जीव मात्र की, विशेषकर मानवमात्र की। कहा भी है:--

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय पर पीडनम्।।

अर्थात् अठारह पुराणो में निष्कर्ष स्वरूप भगवान व्यास ने दो बातें ही मुख्य रूप से कही है:-- पुण्य कमाना चाहते हो परोपकार करो, पाप कमाना चाहते हो दूसरों को पीड़ा पहुंचाओ।

क्या ही संक्षिप्त और सुन्दर परिभाषा "पुण्य और पाप" की उपलब्ध है। मर्जी अपनी अपनी।

निः अक्षर =निरक्षर, अक्षरेण सहितः साक्षरः।
अकारान्त साक्षर शब्द प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों में :-

साक्षरः साक्षरौ साक्षराः होगा।
निम्न श्लोक को देखें :--

सरसं विपरीतं चेत् सरसत्वं न मुञ्चति।
साक्षराः विपरीताश्चेत् राक्षसाः एव केवलम्।।

अर्थात सरस शब्द को आप जितनी बार ईधर से ऊधर और ऊधर से ईधर उलट कर पढें वह हर हाल में सरस ही बना रहेगा।
साक्षराः को लीजिए ऊलटा पढने के साथ साथ यहां अभिप्राय इस बात से है कि पढा लिखा व्यक्ति अर्जित ज्ञान का दुरूपयोग करने लग जाय तो वह ऊलटा (विपरीत्) आचरण के कारण--
साक्षराः उलटा कर पढने पर राक्षसाः बन जाता है।

सधन्यवाद प्रेषित।

डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय

इस पाठशाला में

जीवन
क्या कुछ नहीं सिखाता है


इस पाठशाला में
हर अच्छा-बुरा अनुभव
कंठस्थ हो जाता है


आँखों से
बहते आंसू की व्यथा
कितना कुछ कहती है 



बूंदों में
जीवन की
सम्पूर्ण कथा रहती है 



उन बूंदों से ही
सृजित होनी है
मुस्कान 



वे  बूँदें ही लिखेंगी
इन्द्रधनुषी ख़त
ज़िन्दगी के नाम 



जीवन
हर डगर हँसता है मुस्काता है 



इस पाठशाला में
हर अच्छा-बुरा अनुभव
कंठस्थ हो जाता है




ऊँ अक्षरब्रह्मणे नमः! २ सत्यनारायण पाण्डेय



पापा से बातचीत :: एक अंश
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ऊँ अक्षरब्रह्मणे नमः! 
अक्षरसमेलनेन ब्रह्मरूपशब्दाय नमः! 
अभिवादन सर्वेषां शब्दब्रह्मजिज्ञाषुणां कृते। 
अक्षर सानिध्येन सार्थक शब्दाः संयोज्यन्ते।
यथा व्रतोपवासे प्रचलितशब्दाः --
पर्णा, अपर्णा, उपवास, पारणा, दान, दक्षिणा

लोक व्यवहार में आने वाले शब्द - सहानुभूति, स्वर्ग, नर्क, पाप -पुण्य इत्यादि।
पार्वती के तपस्यावर्णन क्रम (कुमारसम्भव पञ्चमसर्ग) मे लिखा है --पार्वती कठोर तप करती हुई पेड़ का पर्ण (पत्ती) खाकर रहती थी तो पर्णा पार्वती, पत्ती (पर्ण ) भी खाना छोड़ दी तो अपर्णा कहलायी।
अब व्रतोपवास के बाद "पारणा" शब्द का प्रयोग हो रहा है, जो सम्भवतः "अपर्णा का फिर से पर्णा" का ही विकसित रूप उपवास के बाद "पारणा" है, ऐसा मैं समझता हूं।
अब उपवास को लें:---
पौराणिक आख्यानों में उपवास को परिभाषित करते हुए कहा है:--
उप समीपे यः वासः जीवात्म परमात्मयोः।
उपवासः स तु विज्ञेयो नतु कायस्य शोषणम्।।
अर्थात् ईश्वर चिन्तन में जीव तत्+लीन=तल्लीन हो जाता था या सामीप्य प्राप्त कर लेता था, यह स्वाभाविक प्रक्रिया थी।
अब उपवास भूखे रह ईश्वर चिन्तन से जुड़ गया जो शरीर का शोषण करना ही कहलाएगा, ईश्वर चिन्तन कम क्षुधा चिन्तन ही ज्यादा होने लगेगा।

***
लोक व्यवहार में एक बहुत प्रचलित शब्द है--"सहानुभूति"
इसका प्रयोग अब सिर्फ नाटकीय तौर पर ही देखा जाने लगा है। शब्द के मर्म के साथ प्रयोगकर्ता की खिलवाड़ हम प्रायः देखते ही हैं।सह=साथ साथ, अनुभूति=अनुभव करना।
जब सहानुभूति जतलाने वाले और जिसके प्रति सहनुभूति दिखायी जा रही है, दोनों की अनुभूति एक धरातल पर नहीं दिखती, तो यह कैसी सहानुभूति है ?
यथाक्रम फिर आगे शब्द समीक्षण का अवसर आएगा।
सधन्यवाद प्रेषित्।

--सत्यनारायण पाण्डेय 

कुछ कतरनें :: बियाबान में चलते-चलते

ऐसे कैसे सीधी सरल रहती,
वक्र हो गयी,
ये खुद से ही है हारी दुनिया



गलती हमारी ही होगी,
जाने क्या हुआ,
रहने लायक रही नहीं हमारी दुनिया !!


***


जिसकी
खो गयी हो चाभी,
वो ताले रो गए


रिश्तों के बियाबान में चलते-चलते,
पाँव में ही नहीं,
मन में भी छाले हो गए !!


***


'तुम' की महिमा अपूर्व
'तुम' स्वयं माधुर्य !!


***


ये अप्रतिम दृश्य,
कई बार
नज़रों से गुज़र चुका है


विस्तृत गगन,
स्नेहिल धरा की ओर,
युगों-युगों से झुका है !!


***


एक गुज़रता है तूफ़ान,
तो कई और,
आ जाते हैं


उनका सामना करते,
छलनी-छलनी,
हम सीने हैं फ़क़त !!


***


अभी जो बैठ गयी है,
थक कर,
तो क्या हुआ


ये आस की नैया,
अहर्निश,
चली बहुत है !


समय
एक सा
कहाँ रहा है कभी



बीतते हुए,
जता जाती हैं खुशियाँ,
कि वे छली बहुत हैं !!


***


आद्यान्त
आंसू ही हैं बहते


इसे दुनिया
यूँ ही नहीं कहते !!


सुप्रभातम्! जय भास्करः! १८ :: सत्यनारायण पाण्डेय

पापा से बातचीत :: एक अंश
हिंदी दिवस :: कुछ तथ्य, कुछ भाव 
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आज १४ सितम्बर "हिन्दी दिवस" के रूप में लगभग ६६ वर्ष पूर्व संविधान सभा में (आज के ही दिन) तय किया गया था कि आने वाले पन्द्रह वर्षों में (धीरे-धीरे) हम राजकीय भाषा के रूप में सम्पूर्ण कार्यालयी व्यवहार के लिए हिन्दी को सम्पूर्ण देश मे अपना लेंगे।

तब से आज के दिन हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी माह, हिन्दी वर्ष सरकारी कार्यालयों, बैंको, जीवन बीमा कार्यालयों, विद्यालयों, विश्व विद्यालयों में ६६-६७ वर्षों से यह रस्मअदायगी करते चले आ रहे हैं हम। और "हिन्दी डे" भी हम धड़ल्ले से कह लेते हैं। शुद्ध हिन्दी की जगह "हिंगलिस" (हिन्दी,इंगलिस) का प्रयोग जोर पकड़ता ही चला गया है।

वाक्यगत, शब्दगत, वर्तनी संबंधी अशुद्धियों की तो नित्य भरमार ही देखने को मिलती है।

आखिर इतने वर्षों के बाद भी हिन्दी दिवस की संकल्पित परिकल्पना को सचमुच हम भारतीय -- शुद्ध शुद्ध लिखनें, बोलनें और दैनन्दिन कार्यालयी कार्य सम्पादन में पूरी ईमानदारी से अपना कर कब तक पूरा करने की स्थिति में आएंगे।

यह विडम्बना ही है कि हर निर्दिष्ट कोई विशिष्ट दिवस हमारी औपचारिक कार्य क्रम तक ही सीमित रह जाते हैं।

जयतु हिन्दी! जयतु हिन्दी दिवसः! जयतु भारतवर्षः!

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 


बदलते परिदृश्यों में निहित आस किरण


उड़ते हुए आसमान
और उस पर टंके हुए
टिके हुए सपनों के सितारे


भागते बादल की छाँव
पल भर का ठहराव


बदलते दृश्य
जीवन की सकल रश्मियाँ
तत्वतः अस्पृश्य


कहते हुए रुक जाना
चलते हुए लौट आना

अनमना सा हर परिदृश्य 


ऐसे में हम बाट जोहते हैं
उस एक आकार का
जो उस दूर गगन में उभरेगा 



और हमारी सकल दुविधाओं का इकलौता उत्तर होगा !! 

 

ऊँ अक्षरब्रह्मणे नमः! १ सत्यनारायण पाण्डेय

पापा से बातचीत :: एक अंश
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ऊँ अक्षरब्रह्मणे नमः!
अक्षरसमेलनेन ब्रह्मरूपशब्दाय नमः!
आज प्रचलन में कई ऐसे शब्द हैं, जो व्युत्पत्तिलभ्यार्थ से भिन्न रूढ़ अर्थ मे प्रयुज्यमान हैं।


जैसे:---कुशलः, प्रवीणः, गोवाहः, गोवाहकः वा।
कई शब्द जो अपने मूलार्थ से भिन्न विपरीत अर्थबोध के लिए विवश से हो रहे है:---
जैसे:---प्रपञ्चः, नारदः, वकीलः

अब देखते हैं इन शब्दों को विस्तार से :-

कुशलः--व्युत्पत्तिलभ्यर्थः = कुशान् लाति इति कुशलः, पूजन आदि के लिए बिना क्षतिग्रस्त हुए आश्रम मे कुश लाने वाला बटुक या शिष्य।

अब यह शब्द किसी काम को बिना चोट चपेट के पूर्ण करने वाले व्यक्ति को "ये अमुक कार्य में बड़े कुशल हैं", ऐसा कहा जाता है, जबकि कुश लाना तो दूर (कुश लाने वाला) उसने कुश देखा भी नही होता। यह रूढ़ अर्थ है।


२ 

प्रवीण:--वीणा वादने दक्षः योग्यः वा। अब भले किसी ने वीणा देखी भी न हो, लेकिन किसी काम को ठीक-ठीक कर दे तो, उसे कहा जाता है-"ये इस काम मे बड़े प्रवीण हैं"।


३ 

गोवाहः, गोवाहकः, गोचारणे नियुक्तः जनः--गोचारणवाहकः कालान्तर मे अभी "चरवाहा" के रूप में प्रचलित।
पहले वन में गायों मे एक दो गायों के भटक या खो जाने पर गोस्वामी उस गोवाहक के द्वारा बताए गए वन के उस भू-भाग से भूली गाय को ढूढ निकालते थे। आज वह "गवाह" शब्द के रूप में उच्चरित है और गवाह=किसी घटना के साक्षी देने का काम करता है। गवेषणा भी इसी प्रसंग से जुड़ा शब्द है--गो+एषणा=गवेषणा=गाय की खोज करने वाला, पर अब शोध=खोज करना (रीसर्च) रूढार्थ को बताता है।गवेषकः=शोधकर्ता। 

***


अब कुछ ऐसे शब्द जो व्युत्पन्न अर्थ से भिन्न अर्थाभिव्यक्ति के लिए विवश है:---


जैसे:-

प्रपञ्चः- प्रपञ्चयति=अर्थं विस्तारयति=संदेहं असन्देहं करोति=अनिर्णये निर्णयति।
अर्थात् प्रपञ्च भ्रामक स्थिति को सुस्पष्ट करने का द्योतक है, पर विडंबना यह है कि इसका प्रयोग वितंडावाद फैलाना, स्थिति को भ्रामक बनाने के अर्थ मे धड़ल्ले से होने लगा है, जो मूल अर्थ के विपरीत है।

नारदः--नारं=ज्ञानं ददाति इति - नारदः
अर्थात् ज्ञान देने वाला। ज्ञान देना बुरा है क्या? पर आज नारद शब्द का अर्थ "चुगली करने वाला", "बहका कर मार्ग से भटकाने वाले" के रूप में प्रयोग किया जाने लग गया है।


वकील मेरी समझ से--

वाक्=वाक्=वाणी, सरस्वती; और कील = खुंटी (निडिल)
वाक् रूपी कील को इदमित्थम रूप में स्थिति को स्पष्ट करने वाले आज "वकील" कहलाते हैं। यह मेरी दृष्टि मे सही है।


भविष्य में अन्य ऐसे शब्दों पर विचार किया जाएगा।

धन्यवाद!

--सत्यनारायण पाण्डेय


हम अभिशाप थे या वरदान रहे

सुनो
प्रेम की गली जो आये  हो
तो ज़रा ध्यान रहे 


आँखों में चमकता
जो पानी हो
उसमें भाव रूप बलिदान रहे 


इस बात से
अनजाने  हों कि
हम अभिशाप थे या वरदान रहे 


कि
बस होना ही काफ़ी है 


अकारण होता है प्रेम
तर्क वितर्क की नहीं यहाँ कोई झांकी है 


बस होना  ही  काफ़ी है !!

जी ही लेते हैं न...

अभिशप्त होते हैं कुछ मन
वेदना की अतल गहराईयों में
गोते लगाने के लिए 


कितने ही अच्छे मन से
कुछ करने जायें
बुरा ही पाते हैं परिणाम 


कुछ प्रारब्ध के ही ऐसे होते हैं विधान !


बड़ी मुश्किल से
कहीं से अर्जित की गयी
एक कतरा मुस्कान 


हो जाती है
क्षण भर में अंतर्ध्यान 


बहते आँसू फिर
एक मात्र सहारा होते हैं
ज़िन्दगी की इन राहों में वे नहीं सिमटते
अभिशप्त मन बहती धारा होते हैं 


कि


वे अभिशप्त हैं 

ऐसा होने के लिए
आँखें बनी ही हों जैसे विडम्बनाएं देखने
और आहत हो रोने के लिए 


इतना होते हुए भी
जी ही लेते हैं न 


कि अभिशप्त हैं जीने के लिए !!

सुप्रभातम्! जय भास्करः! १७ :: सत्यनारायण पाण्डेय

पापा से बातचीत :: एक अंश
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Dr. S.N.Pandey

सुप्रभातः सर्वेषां !!

कस्याऽपिलघुवृहद्वाकार्यस्य कारकाः शीमद्भाग्वद्गीतानुसारमेवंविधम्:-
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणञ्चपृथग्विधम्।
नानाविधं पृथक् चेष्टा दैवं चात्र पञ्चमम्।।

अर्थात! किसी भी कार्य के सम्पादनार्थ पांच सहयोगी कारकों का होना आवश्यक है,
पहला:: अधिष्ठान्=कार्यस्थल का चयन, अर्थात आधार का चयन।
दूसरा:: कर्ता (सम्पादकः) करने वाला।
तीसरा:: करणं च पृथक् विधम्=कार्य साधन मे सहयोगी उपकरण।
चौथा:: इन तीनों के प्राप्त होने पर यदि सकारात्मक सोच के साथ कर्ता कार्यसिद्धि के लिए विविध चेष्टाओं के प्रति सजग नही है, तो भी सब व्यर्थ।

दैवं चात्रपंचमम्=दैवं=भाग्यं, भाग्य को पांचवें कारक में भगवान् ने परिगणित किया है, कार्यसिद्धि के चार कारकों के प्रति जो ईमानदारी से लगे होते हैं, दैव=भाग्य भी उन्ही का सहायक होता है।
यह भगवद्वाणी है, सफल कर्ता के लिए अक्षरशः अनुकरणीय!
बाकी तो जो हम हैं, वह हैं ही।

सधन्यवाद प्रेषित्।
जयतु भास्करः!
--सत्यनारायण पांडेय

सुप्रभातम्! जय भास्करः! १६ :: सत्य नारायण पाण्डेय

पापा से बातचीत :: एक अंश
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अभी पितृपक्ष चल रहा है! ब्राह्मणों के दान ग्रहण करने और ऐसा करने के परिणाम दुष्परिणाम से सम्बंधित कई कुतर्क एवं भ्रांतियों को लेकर एक सहज सी बातचीत का कुछ अंश. सोचा यहाँ भी संकलित हो जाए!


Dr. S. N. Pandey


यह सत्य है कि किसी के हाथों दान दक्षिणा ग्रहण करना अपने तेज़ को, पुण्य को समाप्त कर देता है।
अधोगति मिलती है, पिशाच योनि भी मिली है।
आदिशंकराचार्य और पिशाच वार्ता, प्रेतत्व से मुक्ति का उपाय किया जाना, रामेश्वरम् के दर्शनार्थियों के दर्शन के एक प्रतिशत प्रत्येक दर्शनार्थी के पुण्य प्राप्ति के वरदान से प्रेतत्वमुक्ति।
संक्षेप में यह बात उभर कर आती है, दान दक्षिणा ग्रहण करने से ब्राह्मणत्व के तेज में कमी आती है, वहीं पुण्य अर्जन कर उस तेज को पुनः हासिल भी किया जा सकता है।
अतः ब्राह्मण केलिए अनिवार्य था, या है:---
त्रिकाल संध्या, नित्य कम से कम दस हजार गायत्री मंत्र का जप, सत्याचरण का पालन, ईश्वरनाम कीर्तन, भजन पूजन, भटके को सन्मार्ग दिखाना।
फिर से इन सत्कर्मो के प्रप्त तेज रूपी अग्नि में कर्मनिष्ठ ब्राह्मण के सारे दोष जल कर भष्म हो जाते हैं और शरणागत यजमान का भी कल्याण हो जाता है।
"ज्ञानाग्निदग्ध कर्माणि तमाहुः पण्डितं बुधाः।"
अनजाने में स्वर्णलवंग युक्त ताम्बुल ग्रहण करने के कारण आकाश मार्ग से हमारे पूर्वज शाकद्वीप नहीं लौट सके और साम्ब के द्वारा भूधन, गोधन, अन्न, द्रव्यादि से संतुष्ट कर जम्बूद्वीप में बसाये गए।
हमारे पूर्वज शाकद्वीप से आने के बाद यज्ञोपरान्त गुप्तरूप से दिए गए दान से तेज में कम तो हुए थे, पर आज की तरह निस्तेज नहीं थे, कारण पर्याप्त जप, तप, सत्याचार, सदाचार, देव पूजन, भजनादि से दानग्रहण के दुष्प्रभाव का समन कर लेते थे।
आज हम छल छद्म से यजमान से दक्षिणा भी ग्रहण करने से नहीं चुकते। यजमान से उसके हित के लिए जप, तप, पाठादि के संकल्प को भी पूरा नहीं करते, दक्षिणा पूरी लेते हैं, स्वाभाविक है, इस कृत्य से ब्राह्मण का पुण्य तो क्षीण होता ही है, गर्हितदान उसे पिशाचत्व भी प्रदान करते हैं।
देवी भागवत् में एक कथा आती है:-
'किसी कारणवश देव गुरू वृहस्पति अन्तर्ध्यान हो गए। असुरों का अत्याचार बढने लगा।देवता त्राहि त्राहि करने लगे।असुरों को वश में करने केलिए विहित यज्ञ आवश्यक था, गुरू वृहस्पति गुप्त हो गए थे।
इन्द्र ने शुक्राचार्य के पुत्र से पौरोहित्य के लिए आग्रह किया। शुक्राचार्य के पुत्र ने विचार किया, इन्द्र की यज्ञसिद्ध के लिए हमें दक्षिणा लेनी पड़ेगी, क्योंकि सिद्धान्त है "हतं यज्ञं अदिक्षणम्"
और दक्षिणा ग्रहण से मेरा तेज घटेगा, याचक इन्द्र जो शरण में आए हैं, अपने अहित की कल्पना से इन्कार करता हूं तो, शरणागत त्याग दोष का भागी बनूंगा।
अन्ततः यज्ञ सम्पादन के बाद जप तप स्वाध्यायादि से अपने पूर्व तेज को प्राप्त कर लेने की सोच के साथ इन्द्र के यज्ञसम्पादन को उन्होने स्वीकार किया था।
इस विशद विवेचन के बाद यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि पौरोहित्य कर्म में संलग्न  ब्राह्मणों का नित्यनैमित्तिक जीवन कैसा होना चाहिए।

जय  भास्कर !!

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

आधे-अधूरे ख़्वाबों में...


कितने ही प्रश्न थे
अनुत्तरित ही रहे 


लेकिन
जो कुछ सीखा हमने
उनसे ही सीखा 


जिनके उत्तर कभी नहीं मिले
जीवन उन प्रश्नों में मुस्कुराया 


हमने आधे-अधूरे ख़्वाबों में
नवजीवन का
अद्भुत अंकुरण पाया 


वहीँ से
एक किरण आँखों में बसाये
हम चल रहे  हैं 


ज़िन्दगी
भागती चली जा रही है
हम धीरे-धीरे दीये सा जल रहे हैं !!

जीवन, यात्रा और हम

कभी राह में
छूट गये
कभी उसे छोड़ दिया


जीवन को
'यात्रा' नाम दिया
और अनिश्चितताओं से जोड़ दिया


चलते रहे जो अनवरत
उठते-गिरते, गिरते-उठते
राहों ने खुद-बखुद कभी यूं भी सुखद मोड़ लिया


पड़ाव के मोह से बन्धता तो था मन
पर बढ़ना ही था आगे, सो हमने
बिंधे मन को पड़ाव के मोह पाश से तोड़ लिया


कभी राह में छूट गए कभी उसे छोड़ दिया
जीवन को यात्रा नाम दिया और अनिश्चितताओं से जोड़ दिया !!

यूँ ही... यूँ हो...

हम रूंधे हुए गले से
कह रहे हों
और तुम्हारी आँखों से
अविरल आंसू बह रहे  हों
 

इससे आदर्श
कोई स्थिति हो तो बताओ
स्मृति कुंजों से
ऐसी भावदशा ढूंढ लाओ. 


धारा के समान
बह रहे हों
शब्द तरंगों को
तह रहे हों


इस तरह
पर्वत के चरणों पर लहराओ
सतह को छोड़
जरा गहराई में समाओ. 


हृदय में
सप्रेम साकार रह रहे हों
मन वीणा से
नाम तुम्हारा कह रहे हों 


इस तरह की
भंगिमाएं सजाओ
क्षितिज की सुषमा
कभी यूँ भी आँगन में बुलाओ.



रचनाशीलता का प्रभाव
कब ऐसा सबल होगा
कि सुनने वाला
सजल होगा 



कुछ ऐसे ही
बेतुके भाव लिए लिखते हैं
जो हैं
हम वैसे ही दीखते हैं !!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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