अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कविता

बनती रहे कविता . .
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
भाव नित परिमार्जित होता रहे अपने वेग से
लेखक और पाठक .. संवेदना के एक ही धरातल पर हो खड़े
भेद ही मिट जाये .....
फिर सौंदर्य ही सौंदर्य है इस विलय में !!!!

जीने के लिए जमीन के साथ-साथ ..
आसमान का होना भी जरूरी है
धरती पे रोपे कदम ... सपने फ़लक पे भाग सकें
फिर सृजन की संभावनाएं पूरी हैं
हो विश्वास का आधार .. हो स्नेह का अवलंब
नहीं तो नैया डूब जाती है संशय में !!!!

बहती रहे कविता सरिता की तरह ..
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
जीवन की आपाधापी में कुछ क्षणों का अवकाश हो
कुछ लम्हे एकाकी से पास हो
निहारने को आसपास बिखरी अद्भुत रश्मियाँ ..
और डूब जाने को विष्मय में !!!!

यही तो सहेजा जायेगा ..
और शब्दों में सजकर नयी आभा में प्रगट हो पायेगा
एक पल की अनुभूति का मर्म
विस्तार को प्राप्त हो नीलगगन की गरिमा पायेगा
ये कालजयी भावनाएं ही बच जाएँगी ..
नहीं तो .. यहाँ कहाँ कुछ भी बच पाता है प्रलय में !!!!!!!!!!

4 टिप्पणियाँ:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 23 अगस्त 2010 को 12:23 pm  

अनुपम

संगीता स्वरुप ( गीत ) 23 अगस्त 2010 को 12:39 pm  

धरती पे रोपे कदम ... सपने फ़लक पे भाग सकें
फिर सृजन की संभावनाएं पूरी हैं
हो विश्वास का आधार .. हो स्नेह का अवलंब
नहीं तो नैया डूब जाती है संशय में !!!!

बहुत सुन्दर ....

anupama 23 अगस्त 2010 को 2:54 pm  

dhanyavad sanjeev ji

anupama 23 अगस्त 2010 को 2:54 pm  

dhanyavad sangeeta ji

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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