मन मौसम

बूँदों का मोक्ष है
बारिश


बादलों के
मिट जाने की चाह की पुष्टि है
बारिश


आकाश का अलंकार
और धरती का संस्कार है बारिश


दुःख की सपाट राह में
सुख की जरा सी नमी है बारिश।

आने वाले कल के लिए

ये
अनिश्चित-से
काश और शायद सरीखे शब्दों की ही महिमा है
कि हम चलते चले जाते हैं
उन मोड़ों से भी आगे
जहाँ से आगे की कोई राह नहीं दिखती 


ये शब्द सम्भावनाओं का वो आकाश हैं
जो घिरे हुए बादलों के बीच भी
चमक उठते हैं
अपनी रौ में!


एक आशा है
जो जिलाए रखती है
अंधकार के घोर प्रपात में 


हम दामन में
एक मुस्कान बचाए रखते हैं
तब भी जब कुछ भी नहीं होता अपने हाथ में 


मन की चंचलता
उठते-गिरते
अपने लिये
मन-भर आकाश गढ़ लेती है


जिसमें
नए सिरे से
सूरज चाँद टाँक
समय की गति के गूढ़ार्थ पढ़ लेती है!


लिखना आश्वस्ति है!

कुछ तो बात होगी
कि अपनी बेचैनियों का हल
हम कविताओं में जीते हैं
घूँट-घूँट
आँसू
आँखों से रीते हैं!    


लिख लेना
कितनी ही बार
अपने आप में ही हल होता है
कई बार हम
लिखते हुए
अंधकार से जीते हैं!


चलते हुए
समाधान
राहों में उग आते हैं
चलती कलम की
स्याही से हम
अपना बिखरा मन सीते है!


एक भाषा है
जिसमें हम ख़ुद से बात करते है
उसकी लिपि बताती है
हम
कितना बचे हैं
और कितना बीते हैं!

सुख है!

इतना वृहद है दुःख
इतने सारे हैं दुःख
कि अपना दुःख बहुत छोटा हो जाता है 


दुःख रचा नियति ने
तो दुःख को आसमान-सा ऐसा विस्तार दिया
कि ये सबके हिस्से आया 


जैसे सबका अपना-अपना आसमान
वैसे सबके अपने-अपने दुःख 


इस वृहदता में
अपने दुःख की लघुता महसूस कर
रोना-कलपना त्याग
जीवन जीने में जुट जाना ही सुख है 


कि
सुख का
अलग से कहीं कोई अस्तित्व नहीं 


दुःख में साथ मुस्कुराना ही सुख है!

आभास

दर्द
दामन
हौसला
दुआ--


अभी-अभी
यहाँ से होकर
गुज़री है ज़िन्दगी!


सूनापन
विरक्ति
संशय
समाधान--


अभी-अभी
इस ठौर
ठहरी है ज़िन्दगी!


प्रार्थनाएँ
ठोकरें
ठेस
अट्टहास-- 


कुछ नहीं सुनती
अपनी धुन में चली जाती है
बहरी है ज़िन्दगी?! 


आह

डूबता रहा मन
भींगता रहा मन
हर बार
बार-बार
ज़िन्दगी की थाह में!


यूँ ही
उठते-गिरते चलते रहे हम
कभी मुस्कान लिए आँखों में
कभी लिए हुए आँखें नम
पथरीली जीवन राह में!


रिश्ते
और रास्तों के
सारे समीकरण
सिमट आये
अपनी एक कराह में!

टूटन का सौंदर्य

टूट-फूट का भी अपना सौंदर्य है
अवशेष अपने आप में काव्य है


जिन्हें ज़िंदगी ने ख़ूब तोड़ा है क़दम-क़दम पर
वे बेहतर समझते है जीवन का मर्म 


ऐसे ही लोगों का एक छोटा सा कुनबा होता है
जो लोगों की राह के काँटें चुनता है 


औरों का मार्ग प्रशस्त हो
इस हेतु श्रम करता है 


कि
वह जानता है टूटन का दुःख 


और यह दुःख अगर जीवन से विमुख न कर दे
तो यही पीड़ा बनती है वो संजीवनी
जो किसी को अनुकरणीय बनाती है
अविस्मरणीय बनाती है 


टूटन
कड़वाहटें न भरे मन में
ये भी सहज संभाव्य है
जीवन हर हाल अपने आप में काव्य है!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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