अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जीवन बीत रहा है...!

भाग रहा है वक़्त
हर क्षण
जीवन
बीत रहा है!

क्या सहेजें
क्या संभालें
पात्र से हर पल-
जल रीत रहा है!

ये कैसी उलटी
हवा चली है
राम पराजित-
रावण जीत रहा है!

भागते बादलों की
क्षणिक सफलता मात्र है यह
सत्य-संयम-सौंदर्य-
जहां में आशातीत रहा है!

चमकता हुआ
हर ग्रहण के बाद,
सूर्य का तेज..युगों से-
धरा का मीत रहा है !

भाग रहा है वक़्त
हर क्षण
जीवन
बीत रहा है!

6 टिप्पणियाँ:

संजय कुमार चौरसिया 20 सितंबर 2010 को 4:14 pm  

भाग रहा है वक़्त
हर क्षण
जीवन
बीत रहा है!

bahut sundar

Nitindra 20 सितंबर 2010 को 5:19 pm  

"क्या सहेजें
क्या संभालें
पात्र से हर पल-
जल रीत रहा है! "

बहुत सुन्दर अभियक्ति ...
रचना की हर पंक्तियों में बहुत गहराई है...सन्देश है ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 20 सितंबर 2010 को 5:44 pm  

चमकता हुआ
हर ग्रहण के बाद,
सूर्य का तेज..युगों से-
धरा का मीत रहा है !

भाग रहा है वक़्त
हर क्षण
जीवन
बीत रहा है!
--

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है!

M VERMA 20 सितंबर 2010 को 6:02 pm  

वक्त तो रूकता नहीं .. हमें ही वक्त से सामंजस्य बनाकर चलना होगा.
सुन्दर रचना

anju 20 सितंबर 2010 को 6:52 pm  

बहुत सुंदर अनुपमा जी ,॥ भाग रहा हे वक्त ,जीवन बीत रहा हे


अंजु

संगीता स्वरुप ( गीत ) 21 सितंबर 2010 को 8:41 am  

जीवन के यथार्थ को कहती अच्छी रचना ..

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