इंसानियत का आत्मकथ्य!

गुजरती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आये
कितने ही दलदल
पर
झेल सबकुछ
अब तक
अड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

अट्टालिकाएं
करें अट्टहास
गर्वित उनका
हर उच्छ्वास
अनजान
इस बात से, कि
नींव बन
पड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

देख नहीं
पाते तुम
दामन छुड़ा
हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे
बिसार दूं
इंसानियत की
कड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

जब जब हारा
तुम्हारा विवेक
आये राह में
रोड़े अनेक
तब तब
कोमल एहसास बन
परिस्थितियों से
लड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

भूलते हो
जब राह तुम
घेर लेते हैं
जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर
होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका
छड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

मैं नहीं खोयी
खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो
इंसानियत हो तुममें मौजूद
फिर धरा पर ही
स्वर्ग होगा
प्रभुप्रदत्त नेयमतों में, सबसे
बड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

11 टिप्पणियाँ:

Yashwant R. B. Mathur 28 अक्टूबर 2010 को 6:05 am बजे  

मैं नहीं खोयी
खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो
इंसानियत हो तुममें मौजूद
फिर धरा पर ही
स्वर्ग होगा

बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति!

Travel Trade Service 28 अक्टूबर 2010 को 6:18 am बजे  

मैं नहीं खोयी
खोया है तुमने वजूद.........फिर धरा पर ही
स्वर्ग होगा
प्रभुप्रदत्त सभी नेयमतों में सबसे
बड़ी हूँ मैं! ...........अनु जी ....बहुत बहुत सुन्दर कविता के साथ मानव जाती को सन्देश और अटलता से से खड़ा एक अक्ष उसका सोच ...पर... ...ये सब मानव समझ जाये तो ...फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा !

Saurabh 28 अक्टूबर 2010 को 8:58 am बजे  

गेयता के विन्यास पर सधी हुई और अर्थवान रचना.. बहुत-बहुत बधाई..
इस रचना का प्रत्येक स्टैन्जा गहन है.. विशेषकर -
//जब जब हारा
तुम्हारा विवेक
आये राह में
रोड़े अनेक
तब तब
कोमल एहसास बन
परिस्थितियों से
लड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!//
परिस्थितियों के विरुद्ध एक कोमल एहसास का भिड़ना न सिर्फ़ सार्थकरूप से प्रयुक्त हुआ है बल्कि उसका ’लड़ना’ आपकी प्रस्तुति में महसूस भी होता है..
पुनश्च धन्यवाद.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 28 अक्टूबर 2010 को 9:42 am बजे  

पर मैं कैसे
बिसार दूं
इंसानियत की
कड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं!

बहुत अच्छी रचना ....

दिगम्बर नासवा 28 अक्टूबर 2010 को 10:44 am बजे  

जब जब हारा
तुम्हारा विवेक
आये राह में
रोड़े अनेक
तब तब
कोमल एहसास बन
परिस्थितियों से
लड़ी हूँ मैं!
अटल
खड़ी हूँ मैं...
ताली दो हाथों से बजती है ... समय रहते ही जागने में भलाई है ...

मनोज कुमार 28 अक्टूबर 2010 को 11:51 am बजे  

बहुत सुंदर अनुपमा जी। इसीलिए तो मैं बार-बार कहता हूं,
बस मौला ज्‍यादा नहीं, कर इतनी औकात,
सर उँचा कर कह सकूं, मैं मानुष की जात

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
राजभाषा हिन्दी पर - ये अंधेरों में लिखे हैं गीत!
मनोज पर -आंच – समीक्षा डॉ. जे. पी. तिवारी की कविता ‘तन सावित्री मन नचिकेता’

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 28 अक्टूबर 2010 को 1:09 pm बजे  

Anupama ji | aapki kavia bahut sundar hai... is main kaa aik roop yah bhi hai jo atal hai margdarshak hai... vaise main ko dusre roop me bhi liya jata hai..aapne us main ki chhavi yaha par todi hai... aapki yah kavita kal chachamanch par hogi..dhanyvaad

Ghulam Kundanam 28 अक्टूबर 2010 को 9:21 pm बजे  

साहस, संयम , संतोष , शुभेच्छा, संयत, ... ... की धनी आपकी तरह आपकी कविता.

www.navincchaturvedi.blogspot.com 29 अक्टूबर 2010 को 12:02 pm बजे  

अड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!
नींव बन पड़ी हूँ मैं!
इंसानियत की कड़ी हूँ मैं
परिस्थितियों से लड़ी हूँ मैं!
वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं!
प्रभुप्रदत्त नेयमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं!

कई सारी तुकों को न सिर्फ़ मिलाया है बल्कि उन्हें उन के उचित स्थान पर बिठाया भी है| सार्थक कविता है ये अनु| बधाई|

जयकृष्ण राय तुषार 29 अक्टूबर 2010 को 1:07 pm बजे  

bahut sundar rachna badhai anupama ji

रंजना 29 अक्टूबर 2010 को 3:12 pm बजे  

वाह...कितनी सुन्दर बात कही इस अद्वितीय रचना के माध्यम से आपने...

हमारी परम्पराओं में संभवतः इसी कारण सुबह सवेरे जागने पर सर्व्प्रथान धरती माँ को नमन करने की परंपरा है कि उसके गुणों को हम स्वयं ने धारण करें और वैसे ही विशाल हृदयी तथा सामर्थ्यवान बनें.

ऊपर चाहे हम जहाँ तक पहुँच जाएँ पर अपनी जमीन(इंसानियत) को जो बिसरा देता है, सबकुछ पाकर भी उसके हाथ रीते रह जाते हैं...

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