अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हमारे बीच एक कविता बहती है!

कविता
कैसे बनती है
कैसे वह हृदय से
बह निकलती है
इस विस्मय में
कई युग बीत जाते हैं,
कई कल्पों तक
शामें ढलती हैं!
आज कौन से
मन मयूर की
झांकी दिखाई जाये!
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये!!

गीत कहे जब छंदों से
रे! तू मेरी प्यारी बहना
आँधियों में जला जो दीपक
उसके तिमिर विजय का क्या कहना
हौसलों के दम पे
ज़िन्दगी जी जाती है,
बातों बातों में ही
कोई दिव्य बात निकल आती है!
तब तक चलो
अनुभूति की धूल
फाँकी जाये!
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये!!

संवेदना का
एक ही धरातल हो
कहने वाला जितना रोया
सुनने वाला भी उतना ही द्रवित उतना ही घायल हो
तब जाकर
काव्य की धारा बहती है,
हर क्षण हमें आबद्ध किये
एक कविता रहती है!
हृदय सुने
और हृदय से ही
शब्द सरिता बांची जाये!
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये!!

16 टिप्पणियाँ:

वन्दना 17 अगस्त 2010 को 8:32 am  

संवेदना का एक ही धरातल हो
कहने वाला जितना रोया ... सुनने वाला भी उतना ही द्रवित उतना ही घायल हो
तब जाकर काव्य की धारा बहती है
वाह वाह वाह्………………सच कहा कविता तभी होती है जितना कहने वाला डूबा हो उतना ही सुनने वाला भी उन ही भावों मे डूब जाये………………एक बेहद शानदार , लाजवाब प्रस्तुति……………बधाई।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 17 अगस्त 2010 को 8:59 am  

संवेदना का एक ही धरातल हो
कहने वाला जितना रोया ... सुनने वाला भी उतना ही द्रवित उतना ही घायल हो
तब जाकर काव्य की धारा बहती है ,
हर क्षण हमे आबद्ध किये हुए एक कविता रहती है !

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...इसी विषय पर मेरी भी एक रचना है ..वेदना....
अंतस की गहराई से
जब आह निकलती है
विलपत हो शब्दों में
तब वो रचना बनती है .

शब्दों को यूँ बाँध - बाँध कर
मन को बांधा करते हैं
अश्कों के सागर पर भी
यूँ बाँध बनाया करते हैं.

anupama 17 अगस्त 2010 को 9:35 am  

dhanyavad vandana ji!
aapki sarahna se abhibhut hoon...
aabhar!

anupama 17 अगस्त 2010 को 9:37 am  

अश्कों के सागर पर भी
यूँ बाँध बनाया करते हैं.
wah sangeeta ji!
kya vilakshan vimb chuna hai aapne.....
aankhen nam ho gayin!
aapke snehpurna sabdashish ke liye aabhar:)

हमारीवाणी.कॉम 17 अगस्त 2010 को 10:16 am  

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वाणी गीत 17 अगस्त 2010 को 10:40 am  

जितनी बूँद गिरे नयनों से ...
उससे ही कविता की गरिमा आंकी जाये ...
नदी सी बहती सुन्दर कविता..!

माधव 17 अगस्त 2010 को 11:06 am  

very beautiful post

Navin C. Chaturvedi 17 अगस्त 2010 को 11:47 am  

ग़ज़ब:

जितनी बूँद गिरे नयनों से ...
उससे ही कविता की गरिमा आंकी जाये !!

anupama 17 अगस्त 2010 को 11:51 am  

kavita ke dharatal par bah rahi bhaavnaon ko aatmsat kar snehashish... shabdashish hetu sabon ka koti koti aabhar!

कौशल तिवारी 'मयूख' 17 अगस्त 2010 को 3:23 pm  

bahut sundar

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 17 अगस्त 2010 को 6:28 pm  

यही है कविता की गरिमा

Udan Tashtari 17 अगस्त 2010 को 7:06 pm  

बहुत उत्कृष्ट रचना! वाह!

Mithilesh dubey 18 अगस्त 2010 को 5:10 am  

bahut hee umda

meeta 26 नवंबर 2011 को 12:23 pm  

Our sweetest songs are those that tell of saddest thoughts . Beautiful poem Anupama ji !!

Pramod Saigal 26 नवंबर 2011 को 2:34 pm  

hey kaavitree hum to bus yahi chaheyge ki aapkee ankh mein kabhie aansoo na aayee. Jo kavita aap likhtey ho woh phir bhi hamey lubhaye. Cheers.

s.chandrasekhar.india 27 नवंबर 2011 को 5:22 pm  

बहना आज बस इतना है कहना:
जितनी बूँद गिरे नयनों से
उससे ही
कविता की गरिमा आंकी जाये ..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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