जून की आख़िरी शाम

धूप उतर रही थी भीतर
बाहर उमस भरी छाँव थी 


सब अपनी तरह से
अपनी-अपनी दिशा में
गतिमान थे 


वक़्त कहीं ठहर गया था
वैसे ही जैसे 

पेड़ों की डालियाँ अनासक्त स्थिर सी थीं 


हवा थमी हुई थी 


ऐसे में 

जो दीप जलाते 

तो एक ही बार में जल जाते
हवा के वेग से बाती को अनावश्यक संघर्ष नहीं करना पड़ता 


जैसा कि सामान्यतः होता है 


पर आज हमें बाहर नहीं
मन के भीतर एक दीप जलाना था 


बाहर जो रोज़ जलाते हैं उस दीपक से प्रेरणा ली
और प्रतिकूलताओं की आँधियों के बीच
मन में एक दीप जलाया 


जून ने
जाते हुए
यूँ बाती को सांद्र किया !












समझावन के कितने मंत्र

ख़ुद को ओढ़ा
ख़ुद को ही बिछा लिया
अपना कंधा ही था रोने के लिए
उसी को आधार किया
इस तरह हमने रात के समंदर को पार किया


जब बहुत अकेला पाया ख़ुद को
स्वयं ही अपने मन को हृदय से लगा लिया
समझावन के अपने गढ़े हुए मंत्र थे
उन्हें दोहरा सकल नकारात्मकता का संहार किया
इस तरह हमने गहराते धुँधलके को पार किया


वो भाव-भाषा की दुनिया में विपन्न है
क्यूँ भला हमने उसकी कमियों को अपने हृदय से लगा लिया
उदार हो कर उसकी सीमा स्वीकार ली
और सकल विडंबनाओं को अपने सर मढ़ने से ख़ुद को निस्तार किया
रिश्तों की वैतरणी में डूबने-उतरने को ही हमने जीवन का सार किया


कि
वहीं का कोई सिरा
वहाँ तक ले जाएगा 


कि
वैतरणी पार किए बिना
वो धाम कहाँ से आएगा!





पीड़ा का अर्थशास्त्र

मृत्युतुल्य कष्टों का
एक अंतहीन सिलसिला है


ज़िन्दगी!
तू बस दुःख-दर्द की
एक अदद शृंखला है


इस शृंखला के बिना
तुम तुम नहीं हो 


और हम भी हम नहीं 


कि
दुःख ही
हमसे हमारी पहचान कराते हैं!


प्रार्थना में बहते आँसू के मूल में
भले अपना दुःख रहा हो 


पर यह दुःख
विस्मृत हो
कब समष्टिगत करुणा में
परिवर्तित हो जाता है
ये साश्चर्य देखते हुए हम अभिभूत हुए बिना रह नहीं पाते हैं
दर्द में ही फिर हम मोद मनाते हैं!


दुःख हमें ज़मीन से जोड़ जाता है
हमें थोड़ा और इंसान बनाता है 


पीड़ा का अपना अर्थशास्त्र है
वह हमें अपने तरीक़े से समृद्ध करती है 


हाँ, ज़िन्दगी!
तू दुखती हुई
जीवन के सबसे ज़्यादा क़रीब रही


ये दर्ज़ करते हुए
समय के मुख पर स्मित मुस्कान थी!
 

कितने-कितने छल

रिश्तों में इतना छल है
निहित स्वार्थों का पूरा दल-बल है
ऐसे में चल ज़िन्दगी तू कैसे चलती है
हर क्षण यहाँ प्रतिबद्धताएँ बदलती हैं

आँखों में जो पानी है 

उसकी अलग कहानी है 


नसों में दौड़ते लहू की थिरकन 

थम जाती है 

सम्बन्धों की मरीचिका 

रह-रह कर ऐसे रूप धर प्रकट हो आती है   



ज़िन्दगी क्या करे
बस चलती है
छली जाए तो छली जाए
टूट कर फिर सँवरती है!

आँचल में सिमटे यात्रा के फूल

यात्रारत हैं सभी


भागते बादल
गति की व्याख्या हैं


पर्वत की अपनी यात्रा है
अचल खड़ा वह
कितने ही फूलों का घर है
कितने ही हरेपन का गेह है वह


हमने देखा
साक्षात नेह है वह!




स्वीटज़रलैंड, २०१७

साक्षी

तारों भरे आसमान में
एक तारे पर नजर टिकाये गुजरी रात
रिश्तों का
अलौकिक ताना-बाना
बुनती है


कि
हम अकेले नहीं हैं


कि
हमारा क्षण-क्षण का संघर्ष
हमारे प्रतिपल के संकल्प
हमारे हमराह हैं


और
वह तारा
हमारी जूझन-टूटन का साक्षी!

प्रगल्भता की ओर

यात्रा में
टिक कर खड़े होने को

जैसे हैं
उससे बड़े होने को


छाँव की परिभाषा आनी चाहिए


धूप की उजली आभा भी
मन ही मन हिय में बसानी चाहिए


कि
धूप-छाँव के खेल
बाहर जितने निर्दयी है
मन के भीतर भी
वैसी ही निर्ममता बरतते हैं


इन विकट समीकरणों को जी लेने की कलात्मकता
जीवन में भी निभानी चाहिए


आँखों में नमी हो
हृदय को भी नमी की भाषा आनी चाहिए!




आसमान देखते हुए

आसमान देखते हुए
कितना कुछ उमड़ता-घुमड़ता है


बादलों की चित्रकारी
अनायास
मन में उतर आती है


सिमटा हुआ मन
फिर आसमान हो जाता है


कोई-कोई क्षण
अपने बीतने में
कभी-कभी
कितना
महान हो जाता है


कि
उस एक क्षण की स्मृति में
ज़िन्दगी बिताई जा सकती है!


ऐसे ही क्षणों से
समृद्ध जीवन हो


देख लेना आसमान बस
जो कभी अपने भीतर झाँकने का मन हो!

प्रार्थना

रिश्तों में अपनापन हो
सदा ही नमी रहे
भावाकाश पर
कभी न चाँद सितारों की कमी रहे


खुलते-खुलते जीवन के तमाम रहस्य
खुलते चले जाएँ
वैसे ही जैसे 


तमाम परतें खुलतीं हैं 


एक के बाद एक
शनैः शनैः


और कृतकृत्य कर देती हैं!



मन की आँखों को हृदय तल पर गिरती
करुणामयी बूँदों की झलक दिखे
वैसे ही जैसे 



नेमतें ज़ाहिर होती हैं 

अपने स्पष्ट रूप में स्वतः 

अनायास 


और चमत्कृत कर देती हैं!



यहाँ, इस ठौर, सभी तमाशाई हैं!

खिड़की


खुलती है समंदर की ओर


समंदर
जिसे छिपा लिया है
सामने फैले हरेपन ने


दूर बादलों का जमघट
अठखेलियाँ कर रहा है


बरस रहा है आसमान


एक घर वहाँ
क्षितिज से लगे
मुस्कुरा रहा है


सूरज का उगना-डूबना
वह निर्निमेष कब से
निहार रहा है


लाली छाई है
यहाँ, इस ठौर, सभी तमाशाई हैं


चल रहा है खेल
खेल ही तो निरंतर चल रहा है


खिड़की रोज़ देखती है--


एक दिन निकल रहा है
एक दिन ढ़ल रहा है!






स्टॉकहोम, २०१७

संभावनाओं का संसार

पल-पल में
रंग बदलते नभ का
जाने कहाँ ओर-छोर है


मन के आकाश में
गूँजता
अन्यान्य भावों का प्रगल्भ शोर है


ज़िन्दगी
प्रायः दिखती कुछ है
होती कुछ और है 


तमाम कष्टों को जीते हुए ही
कहीं वहीं मिलती
समाधान की भी डोर है 


और यही
ठीक यही
यही चमत्कार है 


जब बिलकुल ख़त्म हुई सी लगती है
तब भी उसमें संभावनाएँ अपार हैं 


ज़िन्दगी!
हो न हो तुम्हारे भीतर ही
मुक्ति का भी संसार है
भले ही दृश्यमान मात्र मँझधार ही मँझधार है!

निरुद्देश्य चलते चलना स्वमेव एक उद्देश्य है

निरुद्देश्य पैदल चलते हुए
रास्ते-दर-रास्ते अपने पाँव से नापते हुए
गति को आयाम मिलता रहा


जितना चलते चले गए
धूल पटे रास्तों पर
लगातार


उतना ही
अंदर की यात्रा में
पैठ बढ़ती रही


चलते-चलते
पाँव चेतना शून्य होते गए
पास से छू कर गुज़रती हुई हवाओं का स्पर्श
सम्मोहित करता रहा


स्व से पार की सीमा में
जाने कब प्रवेश हुआ
कहना कठिन है


पर जान सके यह जब महसूस हुआ-
धीरे-धीरे परिस्थितिजन्य सम्पूर्ण क्रोध वाष्पित हो जाना
उसके वाष्पित होते ही अपने ही भीतर करुणा के प्राकट्य से धन्य हो पाना


अश्रुविग्लित आँखों से
धूँध छँटती सी महसूस हुई


तर्क-वितर्क की निरर्थकता
स्वतः ही
चेतन मन पर प्रकट हो आयी


अपनी यात्रा सुगम रहे इस ख़ातिर
औरों की सुगमता का मार्ग प्रशस्त करना
कहीं न कहीं स्वतः सिद्ध सी बात है
यही ध्येय हो


कि
अंततः सकल यात्राएँ
ख़ुद से ख़ुद तक की यात्रा ही है


बाहर विचरते हुए हम
अन्यान्य भावों के दास न होकर
उन पर स्वामित्व हासिल करें
यह स्वमेव हो


कि
अंततः सारी कलह शिकायतें
यहीं रह जानी है


हमारे पास अपना कहने को एक ही ज़िन्दगानी है


और वो भी क्षणभंगुर
किंचित लघु!

पिता के लिए

तुम
अपनी आँखों की नमी में
हमें रोता हुआ पाओगे


विदा कर दोगे हमें
मगर हम वहीं कहीं छूटे हुए रह जाने हैं
सदा के लिए


तुम्हारे आँगन में जो चलना सीखा
उस सीख के सहारे
जीवन अरण्य की सकल दुर्गमता पार करेंगे


हम हमेशा 

तुम्हारे घर के कोने-कोने में बसी 

यादों में रहेंगे


और तुम
हमारा विश्वास बन
हमारी प्रेरणाओं का आधार रहोगे


अबोध पहले क्षणों सा ही
तुम आजन्म
हमारा संसार रहोगे!

संकल्पों का प्रताप

दुरूह यात्राओं को
सहजता से, तय करना ही
सिफ़त होगी


यह तो तय है
ज़िन्दगी हर क्षण, एक नयी
आफ़त होगी


हमारे संकल्पों के बल पर ही
उम्मीद का सूरज निकलेगा
कभी तो सूकूँ मिलेगा
राहत होगी 

भ्रामक समीकरणों को जीतती मुस्कानें

सुख-दुःख के समीकरण
भ्रामक थे 


मुस्कुराहटों के कोलाज़ ने
भ्रम की उघरन को
भरसक सिया 


मस्कुराहटों के वे अनगिन बिम्ब
प्रकृति माँ ने हमें
सहर्ष दिया-


खिलते फूलों के रूप में
खिलती हुई धूप में 


खिले हुए अपने कई रोमांचक प्रतिरूप में।


कितनी मुस्कुराहटें!

नीले आकाश के
अंतिम छोर की ओर ताकती
हरी टहनी की मुस्कुराहट को तस्वीर में उतारते हुए
सूरज की किरणों ने
हमें देख लिया


किरणें भी मुस्कुरा दीं


उनकी मुस्कुराहटें भी तस्वीर का हिस्सा हो गयीं


अब
जब उस तस्वीर को
देखते हैं


तो एक सुकूँ मुस्कुरा उठता है-


कि
देखो तो
गहन उदासी में भी
तुम्हारे पास कितनी मुस्कुराहटें हैं


सुख न सही, सुख की कितनी तो स्पष्ट आहटें हैं
...

प्रकृति की ओर निर्निमेष तकते नयनों को
यूँ अनगिन चमत्कारों का उपहार स्वतः मिल जाता है !




मुड़ कर देखने का उसे अवकाश नहीं

रो लें जी-भर कर
सर दे मारें दीवारों पर


पर
ज़िन्दगी मजबूर है क्या ?!
जो आँसू पोंछगी
गले लगाएगी ?!


अरे!
वह तो
अपनी धुन में चलती है
अपनी ही धुन में
चलती चली जाएगी!

मुड़ कर देखने का 

उसे अवकाश नहीं 

हमारा मन पढ़ ले 

ये उसका अन्दाज़ नहीं 


ख़ुद हमें ही घुटनों की धूल झाड़
आगे बढ़ना होता है
उसका साथ बना रहे इसके लिए
परिस्थितियों की दुर्गम पहाड़ियों को चढ़ना होता है 


इतना सब करते हुए
अपने आप पर किया विश्वास फलित होता है
ज़िंदगी अपना लेती है
कि कभी-कभी उसका मन भी द्रवित होता है ! 

उनकी सूक्ष्म आपसी समझ को प्रणाम

बाती के संघर्ष को
अस्ताचलगामी सूर्य
प्रणाम करता है 


अपने सारे उत्तरदायित्व
नन्हें दीप को सौंप
वह आश्वस्त हो प्रस्थान करता है


अकथ पीड़ा प्रकाशपूँज की
नन्हा दीप समझता है


अपनी शक्ति भर जलता हुआ 

आँधियों के ख़ौफ़ पर विहँसता है 


कि
संघर्ष की जीत से
नहीं प्रकृति को भी इंकार है 


दीप और सूर्य के
परस्पर कर्तव्य निर्वहन पर ही
टिका सृष्टि का विस्तार है 

ठूँठ और हम

टूट कर गिरे हुए ठूँठ ने
हमें अपनी ही याद दिलाई 


टूटना, बिखरना, फिर भी बने रहना
यही जीवन की सच्चाई 


कि आज टूटी हैं
तो कल हरी भी होंगी 


प्राथमिकताओं के भँवर में
बातें कुछ खरी-खरी भी होंगी 


ठूँठ होने की प्रक्रिया
वापस हरेपन तक लौटेगी  


कि चक्रवत है सब

ज़िंदगी सूनेपन को जीती हुई एक रोज़ खिलखिलाहटों को जीतेगी !!







कि यात्राओं की अपनी महिमा है

उस शहर भींगते हुए
भींगते शहर को देखा था 


बारिश साथ थी
बूँदों का सान्निध्य था 


ज़िंदगी
नमी को भीतर सींचती
नमी को जीती


एक सरल रेखा थी


कि 

यात्राओं की अपनी महिमा है 

कि 

रास्ते सीखाते हैं हमें
तमाम विकटताओं के बीच सहज होने का पाठ
रास्तों को जी कर ही आत्मसात होती है
गति की अपरिहार्यता !



[ ओसलो, २०१७ जून ]





छतरी का आस्माँ हो जाना

बारिश और छतरी का भी
कैसा अद्भुत नाता है


जब बरसता है अम्बर
तो छतरी
हमारा आसमान हो जाती है


ऐसे ही
कुछ एहसास छतरी बनकर
जीवन में हमें
तेज़ बारिश और तपती धूप से बचाएँ !


कभी हम भी तो
किसी के टुकड़े भर ज़मीं के लिए
हौसलों का आसमान हो जाएँ !!

हरेपन का गीत

सब रस्में
निबाही जातीं है


क्या स्याह क्या सुफ़ेद
धरा पर प्रतिपल नयी-सी सुबहें आतीं हैं


बादल अपने दल-बल संग
नित रूप नया धरते हैं


धरा के आँचल में
हरी धारियों की सौभाग्यशाली उपस्थिति हो
इस ध्येय हेतु वे कितने करतब करते हैं


रात बीतती है, बीते
अब सुबह आए


धरती निर्द्वंद, अपने हरेपन के, गीत गाए!


इतना आसाँ नहीं जीवन कहलाना

कुछ देर का जलना
फिर
बुझ जाना


दिव्य है
प्रार्थनारत लौ-सा
दुर्लभ जीवन पाना


क्षणिकता के सौंदर्य को
कर आत्मसात 
मुस्कुराना 


कर्कशताओं को झेलते हुए
मृदुता की
वांछित मिशाल बन पाना 


सच, इतना आसाँ नहीं जीवन कहलाना !

सूरज और दीया-बाती

वो
डूबते हुए
अपनी थाती


बाती को सौंप गया।


बाती ने
मिट्टी की काया को
आधार किया


अंधियारे में
रोशनी की नाव ने
यूँ दर्द का सागर पार किया।

वे हृदय की निधि हैं

पराश्रित होना ही
दुःख है 


कि
खुशियाँ
पराश्रित नहीं होतीं

वे हृदय की निधि हैं
वहीं सन्निहित भी 

बाहरी किसी अवलंब पर
टिका नहीं
ख़ुशी का तारतम्य जो मन से हो
फिर कारवाँ कहीं रुका नहीं 


वगरना
जीवन बीत जाता है
दुःख जीत जाता है 


ख़ुशियों से हम
और हमसे ख़ुशियाँ 

अछूती रह जातीं है 


कि
वे स्वभावतः
अनचिन्हे कोणों से प्रकाश-सम आती हैं 

हे ईश्वर!

सब
विनष्ट हो जाए
फिर नया सृजन हो


एक ही तरह के दुःख से
आहत है मन
नये-नये दुःखों का
हे ईश्वर! अब आगमन हो

मौन की परिधि तक का दुर्लभ सफ़र

मौन की महिमा
अपार है
जो यह भाषा आत्मसात कर ली जाए
तो कहती भी है
सुनी भी जाती है 


अपने सबसे प्रभावी रूप में!


मगर
वाचालता के हम इतने आदी हैं
कि मौन की परिधि तक
पहुँच ही नहीं पाते 


कि
उस देहरी तक पहुँचने की
अपनी नैतिक साँकल्पिक अहर्ताएँ हैं।

चलते-चलते

कहते-सुनते
दुःख-दर्द बिसर जाते हैं


चलते-चलते
हम यहाँ-वहाँ ठहर जाते हैं


तब
मौन बोलता है


जीवन अपने होने के अर्थ खोलता है!

आते रहे बादल, गाते रहे बादल

एक के बाद एक
आते रहे बादल
अपनी धुन में दुःख के राग
गाते रहे बादल


फिर खूब बरसे
हम ज़रा सी हँसी को बेतरह तरसे


फिर हमने
बादलों की तरह
दुःख को ही गीत बना लिया


हमारे हिस्से की मुस्काने अब हमारा दुःख मुस्कुराता है


यूँ जीवन चलता चला जाता है !

निष्ठा

हवा के वेग से
लड़ता नहीं


बस,
जलता है


बाती का संघर्ष
सतत चलता है!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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