अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दे जिंदगी, अगर ऐसी कोई सौगात हो !

जिजीविषा से परिपूर्ण
दिवारात हो !

आशा की किरणों से
सजा रहे अम्बर
जीवन में नवप्रभात हो !

क्या सहेजूँ मैं,
सब तो यहीं रह जाता है...
जो चिता संग साथ जाये-
दे जिंदगी,
अगर ऐसी कोई सौगात हो !

आँचल में कांटे भी हों
फूल भी..
सुख दुःख की आंखमिचौनी में-
समदृष्टि अपनाये,
ऐसी अद्भूत बात हो !

साँसों की आवाजाही
कोमल से कुछ स्वर
धुंधली सी यादों की बरसात हो !

जिजीविषा से परिपूर्ण
दिवारात हो !

13 टिप्पणियाँ:

M VERMA 25 सितंबर 2010 को 2:52 am  

आशा की किरणों से
सजा रहे अम्बर
जीवन में नवप्रभात हो !
आशा जगाती सुन्दर् रचना

वाणी गीत 25 सितंबर 2010 को 4:26 am  

जीजिविषा से परिपूर्ण ...
बस यही तो होना चाहिए ...
ऐसा ही तो होना चाहिए जीवन ...

सुबह -सुबह इतनी सुंदर आशावादी कविता पढ़कर मन प्रफ्फुलित हो गया ..!

Udan Tashtari 25 सितंबर 2010 को 4:52 am  

बहुत उम्दा!

राजभाषा हिंदी 25 सितंबर 2010 को 6:20 am  

इस कविता में जीवन जीने के नज़रिए को पूरी आशा के साथ जोड़ा गया है। जब आप स्‍वयं से प्रेम करना सीख लेंगे तो दूसरे आपसे नफरत करना छोड़ देंगे। मुझे तो यही संदेश मिला। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-बाबा नागार्जुन, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

संजय भास्कर 25 सितंबर 2010 को 7:14 am  

Beautiful as always.
It is pleasure reading your poems.

संजय भास्कर 25 सितंबर 2010 को 7:14 am  

आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

अनुपमा पाठक 25 सितंबर 2010 को 7:29 am  

@all
thanks alot!
baba nagarjuna par saargarbhit post padhi,
thanks for the link@rajbhasha hindi!

@sanjay ji
keep writing, it was good visiting ur blog too:)

sada 25 सितंबर 2010 को 7:49 am  

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

डॉ. मोनिका शर्मा 26 सितंबर 2010 को 5:37 am  

आशा की किरणों से
सजा रहे अम्बर
जीवन में नवप्रभात हो !
बड़ी उमीदें जगाती रचना...... उम्दा प्रस्तुति.....बेहतरीन अभिव्‍यक्ति

रेखा श्रीवास्तव 26 सितंबर 2010 को 7:29 am  

एक सकारात्मक सोच से पूर्ण कविता , बहुत अच्छी अभिव्यक्ति. आभार !

संगीता स्वरुप ( गीत ) 26 सितंबर 2010 को 9:18 am  

क्या सहेजूँ मैं,
सब तो यहीं रह जाता है...
जो चिता संग साथ जाये-
दे जिंदगी,
अगर ऐसी कोई सौगात हो !

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति ....

Ravinder 27 सितंबर 2010 को 9:50 am  

bahut khoobsurat... koi atishyokti na hogi agar main kahun ki kund ko kingkartavyavimur sa mahsoos kar raha hun

अनुपमा पाठक 27 सितंबर 2010 को 12:45 pm  

shabdashish hetu sabhi ka dhanyavad!

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