जिंदगी तन्हा तन्हा,
इस कदर क्यूँ है
सब हासिल,
तो भटकता मन..
दर बदर क्यूँ है!
खो गयी बीते शाम ही
सारी खुशबू,
पंखुड़ियों का-
ऐसा क्षणिक..
सफ़र क्यूँ है!
आसमान छत है
और जमीन ही ठिकाना है,
ठिठुरती रूहों पे-
बरपता..
ऐसा कहर क्यूँ है!
झूम रही हैं लताएँ
जाने किस ख़ुशी से,
मेरे आँगन में-
ठहरा..
ये उदास पहर क्यूँ है!
सुना है फैली हुई
अमन की बस्ती है यहाँ,
नफरतों के लिए-
बदनाम..
फिर ये शहर क्यूँ है!
हर आँख में पानी
रोता हुआ हर दिल,
फिर पास से गुजरता-
सूखा..
ये नहर क्यूँ है!
हर पल
हार ही तो रहें हैं जिंदगी,
फिर बेवजह-
जश्न की..
ये लहर क्यूँ है!
हवाओं में
गाते परिंदों की ताने घुली है,
इंसानी फ़ितरतों में-
घुला..
इतना जहर क्यूँ है!
जिंदगी तन्हा तन्हा,
इस कदर क्यूँ है
सब हासिल,
तो भटकता मन..
दर बदर क्यूँ है!
इंसानी फ़ितरतों में घुला इतना जहर क्यूँ है!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
18 अक्टूबर 2010

9 टिप्पणियाँ:
हवाओं में
गाते परिंदों की ताने घुली है,
इंसानी फ़ितरतों में-
घुला..
इतना जहर क्यूँ है!सुन्दर शब्द ...सुन्दर मन ....सुन्दर अभिव्यक्ति ...अनुपमा जी ...............हा हा इस बीच ...एक गाना याद आगया इस बीच .....सागर कितना मेरे पास है
मेरे जीवन में फिर भी प्यास है ..........नाकामियों से नाता मेरा जोड़ा , अमानुष बना के छोड़ा
सत्य एवं मन को झकझोरती रचना ,,सच में सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं है आज के इंसान के पास ,,वो व्यक्ति मात्र बनकर रह गया है ,,,इंसान बनना भूल सा गया है
अच्छी ग़ज़ल, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
उठ तोड़ पीड़ा के पहाड़!
हसरतें बढ़ गई हैं हद ज्यादा,
खुशियों से महरूम ये लहर क्यूँ हैं…
--
कल के चर्चा मंच पर इस पोस्ट को चर्चा में लिया है!
बहुत ही ख़ूबसूरत रचना..
अनुपमा जी
इस बार मेरे नए ब्लॉग पर हैं सुनहरी यादें...
एक छोटा सा प्रयास है उम्मीद है आप जरूर बढ़ावा देंगे...
कृपया जरूर आएँ...
सुनहरी यादें ....
सुना है फैली हुई
अमन की बस्ती है यहाँ,
नफरतों के लिए-
बदनाम..
फिर ये शहर क्यूँ है!
shandaar panktiyan.
हर आँख में पानी
रोता हुआ हर दिल,
फिर पास से गुजरता-
सूखा..
ये नहर क्यूँ है!
....वाह ...हर पंक्ति लाजवाब और दिल को छू जाती है...बहुत सुन्दर
इंसानी फितरत में इतना जहर क्यों है ...
यह सवाल तो हमें भी बहुत परेशान करता है ...
बहुत सारे सार्थक सवाल जो हर संवेदनशील व्यक्ति को व्यथित करते हैं ..!
हर पल
हार ही तो रहें हैं जिंदगी,
फिर बेवजह-
जश्न की..
ये लहर क्यूँ है!
.बहुत सुन्दर
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