यथासमय सुबह होती है

बुरे सपने से
उचटी रात की नींद
गवाह है अंधेरों की 


वह असमय जागना
रात से सुबह के फासले को
और बड़ा करता है 


उस शून्य में
घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई देती है
हर टिक-टिक के साथ बीतते हुए भी
समय जैसे ठहरा-सा होता है 


इस ठहराव में
उद्विग्नता है
अँधेरे हैं 


रात से सुबह तक की यात्रा
अंतहीन सी लगती है
नींद जिस दहलीज़ तक स्वतः पहुंचा देती है
जागती आँखों को वही यात्रा कितना तो ग़मगीन करती है 


पल-पल की टीस
उनींदी आँखों में जागती है
रात से सुबह तक का सफ़र
फिर वह भयावह अंधेरों में नापती है 


यथासमय
सुबह होती है.

कागज़ की नाव

बचपन बीत गया
माना
अब यहाँ सब अनमना है 


मगर
सोचो तो
कागज़ की नाव बनाना कब मना है 


जो बन गयी
तो चल पड़ेगी 


चल कर वह
बीत गए
निर्दोष लम्हों तक ले जाएगी
नाव कागज़ की है
बचपन के कोरे एहसास दे जाएगी 


उसे जीते हुए
वर्तमान स्पंदित हो लेगा 


भूत और भविष्य के बीच जो
अपनी शक्ति भर तना है 


कागज़ की नाव बनाना आख़िर कब मना है!




कुछ यात्राएँ अपने ख़त्म होने के बाद शुरू होती हैं

यात्रा में
कितने पड़ाव आते हैं


कभी-कभी
बीत जाने के बहुत बाद
कोई एक याद
कोई एक तस्वीर
मुस्कान टाँक जाती है


कुछ यात्राएँ अपने ख़त्म होने के बाद शुरू होती हैं.

जीवन

हर टहनी पर
भांति-भांति के दर्द का पहरा है


परित्यक्त अनजान ठिकानों पर
कितना-कितना जीवन ठहरा है


तट, जीवन और वहीं कहीं हम

बारिश हो रही है
अकेला है समंदर


कुछ एक पंछी तट पर बैठे हैं
धाराएँ शांत हैं


और
जीवन चल रहा है
प्रार्थना का एक दिया अनवरत जल रहा है


रास्ते शाश्वत हैं

सदियों का सफ़र था


मुसाफ़िर
लम्हे भर की आयु
नियति से लिखवा लाये थे


सो,
लम्हा जीकर चले गए


रास्ते शाश्वत हैं
सदियों सदियों चलते चले गए.


प्रतिबद्धता

इंतज़ार बुनते हुए
आहटों का मंत्रोच्चार सुनते हुए
 

लौ विकल थी 


कि
अँधेरे का दिखता नहीं था कोई छोर 


वो बुझने ही वाली थी
कि इतने में खिली भोर! 


भोर का आना
लौ के लिए आश्वस्ति थी 


कि
अब बुझ सकती थी वह इत्मीनान से
मन पर बिना कोई बोझ लिए 


कि
वह राहगीरों का एकमात्र संबल थी
अँधेरे से होकर गुजरते क़दमों का आत्मबल थी 


लौ को एहसास था
अपने नन्हे से वजूद के महत्त्व का 


सो 

अपनी शक्ति भर 

हवा से लड़ती रही


रात भर जलती रही.

ठोकरें थी, गिरना था, संभलना था

खाली पाँव 

पैदल चलना था
ठोकरें थी, गिरना था, संभलना था 


खो गए पलों को
समय की चट्टानों से
टकराते देखा 


वो लौट आने को विकल थे
बादलों को
गहराते देखा 


मृत्यु के से क्षणों में
जीवन को
परचम सा लहराते देखा 


इन सबके बीच हमें 

दीपक-सा जलना था
ठोकरें थी, गिरना था, संभलना था 


बंद थे सब दरवाज़े जब
तब
थे कुछ झरोखे
जिनको अपने दर पर
आस-विश्वास के पूरे कुनबे को
ठहराते देखा


उसकी छवि
जल में तैरती हुई
धारा को
स्निग्ध कर रही थी
आसमान को धरती पर
उतर आते देखा 


शाश्वत होने के
दावे थे
सब के सब
बस छलावे थे
जो आये
सबको जाते देखा 


इन विडम्बनाओं को आत्मसात किये
हमें बर्फ़-सा पिघलना था
ठोकरें थी, गिरना था, संभलना था 








सुबह दूर है बहुत कि अभी तो रात है

गहन अँधेरे में
तारों भरा आसमान
देख रहे थे 


उन्हें गिन-गिन
विस्मित हुए जाते थे
आसमान की समृद्धि पर 


तारों भरे आसमान को
दर्ज़ कर कविता में
हमें उस क्षण की तस्वीर बनानी थी
उस क्षण का आसमान हमेशा के लिए वहाँ बसाना था 


पर 


शब्द उतने थे नहीं
जितने आसमान में तारे थे
हम निपट अकेले
और वे कितने सारे थे !


हमने देखा--


उनका टिमटिमाना प्रकाश वृत्त नहीं रचता
उनकी पूरी जमात के होते हुए भी परिदृश्य वैसा ही काला रहता है 


मगर हमने महसूस किया--


रौशनी की सहजात
उनकी टिमटिमाहट
टिमटिमाती आशा के प्रतिमान रचती है
कितने ही अँधेरे एकाकी क्षणों में
कितने ही दिनमान रचती है 


तारों से पटे अम्बर को
अपना कहा जा सकता है
उन तारों से बारी-बारी
बात किया जा सकता है 


उनके होने को
उन्हें तकते हुए
जिया जा सकता है 


कि
होते होंगे वहीं
पर हमेशा दिखते तो नहीं 


जो दिख रहे हैं तारे
आशाओं के प्रतिमान सारे 


तो उन्हें दृश्य सा
सहेज लिया हृदयाकाश पर 


तारों वाला अम्बर
जी उठा भीतर 


स्मृतियों में
टिमटिमाते तारे की
धुंधली सी भी उपस्थिति 


क्षीण आशाओं के आकाश को सबल करेगी
गहराते अन्धकार में भी रौशनी की सम्भावना प्रबल रहेगी 


ये तारों वाले अम्बर की बात है
सुबह दूर है बहुत कि अभी तो रात है.

सुप्रभातम्! जय भास्करः! ८० :: सत्यनारायण पाण्डेय

ऊँ श्रीपरमात्मने नमः! सुप्रभातः सर्वेषां सज्जनानां ये गीताज्ञानयात्रायां दत्तचितः संलग्नाः सन्ति!
अद्यापि अस्माकं गीताज्ञानयात्रामोक्षसन्यासयोगोनामष्टादशोऽध्ये प्रचलति!


प्रिय बन्धुगण!
कल के विवेचन में हमलोगों नें गीताज्ञान की महिमा, कौन कौन इस ज्ञान के अधिकारी हैं, किन्हें यह ज्ञान दिया जाना चाहिए और किन्हें नहीं, भक्तों के बीच इस गीताशास्र का प्रचार करने वाला भगवान् का सबसे प्रिय होगा, इत्यादि के विषय में विस्तारपूर्वक जाना; किन्तु सभी मनुष्य इस गीता प्रचार सम्बन्धी कार्य करने की योग्यता नहीं रखते, गीता ज्ञान की सम्यक उपासना एवं तदनुसार आचरण करने वाले विरले ही होते हैं! अतः गीता के स्वाध्याय एवं अध्ययन की महिमा तथा जो स्वयं पढ़ नही सकते उनके द्वारा श्रवण करने की भी महिमा बतलाते हुए भगवान् अर्जुन से कहते हैं--


अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।

सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌॥


अर्थात्, जो पुरुष हम दोनों के इस धर्ममय संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा. जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा.


इस प्रकार गीताशास्त्र के कथन, पठन, श्रवण का माहात्म्य बता कर अब अर्जुन से ही अब तक की उसकी मनःस्थिति जानने के लिए (सर्वान्तर्यामी होते हुए भी) पूछते हैं कि, हे पार्थ! क्या तुमने मेरे द्वारा कहे गए गीताशास्त्र को एकाग्रचित्त हो श्रवण किया है? हे धनंजय! क्या तेरा वह अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया है?


कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।

कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥


अर्जुन भी एक योग्य एवं परम आज्ञाकारी समर्पित शिष्य की तरह भगवान् के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए अपनी मनःस्थिति का वर्णन करता हुआ कहता है: हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर ही आपके सामने स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूंगा.


नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत।

स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव॥


यहां एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि भगवान् कृष्ण स्वयं नारायण, परमपुरूष, परमात्मा हैं, अर्जुन नर (मनुष्य) दिव्य जीवात्मा का प्रतीक है. शास्त्र भी प्रमाणित करते हैं-- लोक शिक्षण के लिए नर और नारायण की लीला चलती ही रहती है!


दूसरी बात यह कि यह जीवात्मा भी परमात्मा का अंश होने के कारण वैसा ही दिव्य होता है, पर सांसारिक परिवेश में लोभ, मोहादि षड् विकारों के कारण अपने स्वरूप भूल जाता है; भाग्य से कोई योग्य गुरू मिल जाता है और उसे उसके स्वरूप की पहचान करा देता है, "जीव ब्रह्म एव नापरः" की स्मृति दिला देता है, तो सांसारिक मोह का तिरोहित होना स्वाभाविक हो जाता है! तभी तो भगवान् कृष्ण के उपदेश एवं पूछे गये प्रश्न के उत्तर में अर्जुन कहता है "नष्टो मोहः" मेरा मोह नष्ट हो गया; "स्मृतिर्लब्धा" अर्थात् स्मृति प्राप्त हो गयी. भूली हुई चीज की ही तो कोई याद करा देता है और समस्या सुलझ जाती है, जीवात्मा और परमात्मा के बीच के अज्ञान रूपी परदे को हटाना ही तो श्रीमद्भागवत पुराण का जीवात्मा रूप गोपियों के परमात्मारूप कृष्ण द्वारा चीरहरण का प्रसंग भी तो यही संकेत करता है! स्वरूप की स्मृति करा देना सद्गुरू का ही कार्य है, जो कृष्ण ऐसे सद्गुरू का सान्निध्य अर्जुन को मिला और समर्पित शिष्य की तरह उसने स्वीकार भी किया कि यह सब प्रभु कृपा से ही सम्भव हुआ-- "त्वत्प्रसादात्" अर्थात् आपकी कृपा से ही यह सम्भव हुआ! हम सब को भी गुरू-शिष्य का यह स्वरूप ध्यान में रखना चाहिए.


जैसा कि हम जानते हैं, गीता के आरम्भ प्रथम अध्याय से ही अन्तः सलिला की तरह दो और प्रमुख द्रष्टा और श्रोता-- संजय और धृतराष्ट्र जुड़े हैं; प्रसंग विदित ही है.


अतः प्रथम अध्याय में धृतराष्ट्र के प्रश्नानुसार--"धर्म क्षेत्रे..." के अनुसार युद्धक्षेत्र में भगवान कृष्ण और अर्जुन के संवादरूप गीताशास्त्र का वर्णन करके उपसंहार करते हुए संजय अगले तीन श्लोकों में धृतराष्ट्र को गीता की महिमा का बखान करते हुए अपनी स्थिति भी बतलाते हैं--


इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।

संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्‌॥

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्‍गुह्यमहं परम्‌।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्‌॥

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्‌।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥

अर्थात्, संजय बोले- इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्‍भुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना. श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना. हे राजन! भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्‍भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ!



अन्तिम दो श्लोको में संजय भगवान् के अपने द्वारा किए गए विराटरूप दर्शन की महिमा बतलाते हुए धृतराष्ट्र को स्पष्ट कहते हैं कि--


तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।

विस्मयो मे महान्‌ राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥

अर्थात्, हे राजन्‌! श्रीहरि के उस अत्यंत विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ. हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है.


यह अकाट्य सत्य ही है और इस बात का हमें सदैव स्मरण रहना चाहिए कि जहाँ योगेश्वर कृष्ण जैसा ज्ञान एवं गाण्डीवधारी अर्जुन की तरह शक्ति और सजग चेष्टा होगी वहीं श्री, विजय, विभूति और अचल नीति विद्यमान होंगे!


===ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः===


*** *** ***


प्रिय धर्मानुरागी गीताज्ञानयात्रा में आरम्भ से अन्त तक प्रेरणा के श्रोत बने आत्मीय बन्धुगण!


आज प्रथम अध्याय से अठारहवें अध्याय तक की यात्रा आपके सहयोग से और भगवत्कृपा से पूरी हुई, अब आप सब से विनम्र निवेदन है कि अपने सुझाव, विशेष जिज्ञासा, अपने प्रश्न, मेरी त्रुटियाँ बताते हुए मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करें कि मैं भगवत्कृपा से फेसबुक के बाद अधिक से अधिक लोगों के लाभ की दृष्टि से इस गीताज्ञानयात्रा को पुस्तक का आकार दे सकूँ!


ऊँ श्री परमात्मने नमः

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

उसे वहाँ होना ही था

धुँध की व्यापकता में
वहाँ बिखरी अन्यान्य कथाओं में
कविता की भी अपरिहार्य उपस्थिति थी 


उसे
वहाँ होना ही था 


कि
दुखांत अध्यायों के बाद भी
न जीवन रुकता है
न कहानी रूकती है 


धूप-दीप सा
वहाँ जलना होता है कविता को
आरती में जलते हुए कर्पूर की तरह
दहकना होता है पीड़ा को 


कि
फिर वो केवल
खुशबू बन रह जाए 


बीत कर 

किसी सुख-सा याद आए.


इस क्षण की तपिश में
आने वाले क्षणों के लिए रौशनी की संकल्पना है 


तपिश को जीना होगा
धूप-बाती सा जलना होगा
कविता को आँखों में स्वप्न-सा पलना होगा
कि ज़िन्दगी इन्हीं शब्दों छंदों की कोई अल्पना है.


सुप्रभातम्! जय भास्करः! ७९ :: सत्यनारायण पाण्डेय


ऊँ श्रीपरमात्मने नमः! सुप्रभातः सर्वेषां सज्जनानां ये गीताज्ञानयात्रायां दत्तचितः संलग्नाः सन्ति!
अद्यापि अस्माकं गीताज्ञानयात्रामोक्षसन्यासयोगोनामष्टादशोऽध्ये प्रचलति!

प्रिय बन्धुगण!
कल हमारी यात्रा इस "मोक्षसंन्यासयोग" नामक अठारहवें अध्याय के तिरसठवें श्लोक तक हो चुकी. इस अन्तिम अध्याय में अठत्तर श्लोक हैं. अब उपसंहार रूप में पन्द्रह श्लोकों पर ध्यान केन्द्रित करना है.

हमने देखा तिरसठवें श्लोक में भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि-- हे अर्जुन! इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुझसे कहा-- अब तू "एतत् अशेषेण विमृश्य यथेच्छसि तथा कुरु"
अर्थात्, मेरे द्वारा दिये गए ज्ञान पर भली प्रकार से विचार करलो, तारतम्य छूटने न पाय, फिर तुम जैसा चाहो वैसा करो! यहां यह स्पष्ट है कि अर्जुन या हमारे आपके जैसे साधारण मनुष्य भी गीताज्ञान को भली-भाँति समझ लें तो उस ज्ञान के विपरीत आचरण में प्रवृत्त हो ही नहीं सकते! अतएव अर्जुन को भगवान् इतना ही जोर देते हुए कहते हैं कि--"इसे भली प्रकार समझ लो, फिर जो करना चाहो करो".

हम सब की समस्या यही रही है, हम गीता वर्षों वर्षों से पढते आ रहे हैं, पर भली-भाँति समझने और तदनुरूप आचरण के लिए कभी भी हम सबों नें चेष्टा नहीं की है. माना सांख्ययोग (ज्ञानयोग), योग यानी निष्काम कर्मयोग, त्रिगुणमयी संसार की विकट लीला, जहाँ हमारी साधारण बुद्धि काम नहीं करती कि हम उन उपदेशों को समझ कर अपना सकें तो अर्जुन पर दया कर सबके हृदय की बात जानने वाले अन्तर्यामी भगवान् दयापूर्वक समस्त गीता के उपदेश का सार संक्षेप बतलाने के विचार के साथ ६४वें-६६वें श्लोक में यूँ कहते हैं--

सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्‌॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थात्, संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन. तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा. हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर. ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है. संपूर्ण धर्मों को (संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को) मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा. मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा!

इससे सहज उपाय क्या हो सकता है कि हम भगवान् के हैं, सबकुछ भगवान् का है, इसीलिए अर्जुन को भगवान् सहज भाव लाने को कहते हैं-- तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको ही प्रणाम कर! ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा! यह सहज योग तो परमात्मा के प्रति श्रद्धा-भक्ति रखने वाले मनुष्य अपना ही सकते हैं. ईश्वर और उनकी वाणी के प्रति बुद्धि फिरने के कारण जिनकी श्रद्धा उनमें नहीं है, उन्हे यह सिखाने बताने की जरूरत भी नहीं.

अतः ऐसे महत्त्वपूर्ण उपदेश के कौन अधिकारी हैं? कौन अधिकारी नहीं हैं? किसे यह सुनाया या बताया जाना चाहिए, किसे नहीं आदि के सम्बन्ध में बतलाते हुए भगवान् कहते हैं कि जो रहस्ययुक्त गीता- शास्त्र को भक्तों के बीच प्रचारित करेगा वह उन्हें ही प्राप्त होगा क्योंकि इससे बढकर प्रिय कार्य उनके लिए कुछ और नहीं है--

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
अर्थात्, तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए. जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है. उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं!

ऊँ जय श्रीराधेकृष्ण!

क्रमशः

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

जहाँ जाओ बेतरतीब मन साथ हो लेता है

कितने शहर देखे
कितने ही आकाश जिए
स्नेह सुकून से परिपूर्ण
ज़रा सी धरा के लिए


पर न मिलना था न मिला सुकून
बेतरतीब मन में बजती ही रही विचलित करने वाली धुन 


धूल से भरे हुए जूतों में
भटकन के मानचित्रों का इतिहास लिए
रास्तों की धुंध पर
उँगलियों से कविता उकेर कितने ही हमने गम सिए 


पर न मिलना था न मिला सुकून
बेतरतीब मन में बजती ही रही विचलित करने वाली धुन 


बादलों में उग रहा था समय
कितने-कितने कैसे-कैसे आकार लिए
हमने अपनी ज़मीं की सीमा से
वो सारे अनगिन आकार जिए 


पर न मिलना था न मिला सुकून
बेतरतीब मन में बजती ही रही विचलित करने वाली धुन 


कितने शहर देखे
कितने ही आकाश जिए
स्नेह सुकून से परिपूर्ण
ज़रा सी धरा के लिए


सुप्रभातम्! जय भास्करः! ७८ :: सत्यनारायण पाण्डेय


ऊँ श्रीपरमात्मने नमः! सुप्रभातः सर्वेषां सज्जनानां ये गीताज्ञानयात्रायां दत्तचितः संलग्नाः सन्ति!
अद्यापि अस्माकं गीताज्ञानयात्रामोक्षसन्यासयोगोनामष्टादशोऽध्ये प्रचलति!

प्रिय बन्धुगण!
कल हमलोगों ने उनचासवें श्लोक से पचपनवें श्लोक तक सांख्ययोग यानी ज्ञानयोग का स्वरूप वर्णन, इस साधना में रत ब्रह्मभाव को प्राप्त योगी के लक्षण तथा उस ब्रह्मभूत योगी को प्राप्त होने वाले फल को जाना कि उस परा भक्ति के द्वारा वह (ज्ञानयोगी) मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ ठीक वैसा का वैसा तत्त्व से जानलेता है; तथा उस भक्ति से मुझको (परमात्मा को) तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझ में ही प्रविष्ट हो जाता है!

इस प्रकार अर्जुन को सांख्ययोग यानी ज्ञानयोग का तत्त्व समझाकर, उसके लिए (अर्जुन के लिए) भक्ति प्रधान कर्मयोग की महिमा बतलाते हुए वैसा करने की आज्ञा देते हैं, न मानने पर क्या हानि होगी यह भी बतलाते हुए कहते हैं--

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्‌॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहाङ्‍कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
अर्थात्, मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है. सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो. उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा.

यहाँ तक हम सब ने ज्ञानयोग, भक्तियुक्त कर्मयोग की विधि को जाना, अब अपनी क्षमता और रूचि के अनुसार सहज ढंग से किसी एक विधा में प्रवृत्त होना आवश्यक है अन्यथा प्रकृति बलपूर्वक वह काम तो करा ही लेगी. अतः अर्जुन को सचेत करते हुए भगवान् आगे कहते हैं--

यदहङ्‍कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्‌॥
अर्थात्, जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा. हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा.

अब प्रकृति यानी स्वभाव जिसे जड़ माना जाता है, वह किसी से बलपूर्वक काम कैसे करा सकती है? इस के उत्तर स्वरूप भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! शरीर रूप यन्त्र में आरूढ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके (प्राणियों के) कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है!

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥

अब प्रश्न उठ सकता है कि फिर कर्मबंधन से छूटकर परम शान्तिलाभ के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए? यह स्पष्ट करते हुए इस प्रसंग का उपसंहार भगवान इस प्रकार करते हैं--

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‍गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥
अर्थात्, हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा. उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा. इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया. अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भली-भाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर.

क्रमशः!

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

सुप्रभातम्! जय भास्करः! ७७ :: सत्यनारायण पाण्डेय


ऊँ श्रीपरमात्मने नमः! सुप्रभातः सर्वेषां सज्जनानां ये गीताज्ञानयात्रायां दत्तचितः संलग्नाः सन्ति!
अद्यापि अस्माकं गीताज्ञानयात्रामोक्षसन्यासयोगोनामष्टादशोऽध्ये प्रचलति!

प्रिय बन्धुगण!
कल के विवेचन में हम सबों ने देखा कि तीन गुण (सत्व, रज, तम) ही प्रमुख रूप से सर्वत्र प्रभावी हैं; तभी तो ज्ञान हो, भक्ति हो, कर्म हो, दान हो, धृति हो, सुख हो-- सभी सात्विकी, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार के कहे गए और राजस और तामस का प्रयत्नपूर्वक त्याग कर सात्विक को धारण करने की प्रेरणा दी गई.

इसी अध्याय के चालीसवें श्लोक में भगवान् ने तो यह पूर्णतः स्पष्ट कर ही दिया कि ऐसा कोई भी तत्व नही है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणो से रहित हो! चाहे पृथ्वी पर, आकाश में, देवताओं में या इसके सिवा और कहीं भी ये तीनों गुण सर्वत्र प्रभावी हैं. अब बुद्धिमत्ता से राजस और तामस से अलग हो सात्विक को अपनाना हमारा कर्तव्य हो जाता है. भगवान् ने द्वितीय अध्याय के पैंतालीसवे श्लोक में भी कहा है--
त्र्यैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्दो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।
अर्थात्, ये वेद भी तीन गुणों के समस्त कार्यरूप समस्त भोगों एवं उसके साधनो का प्रतिपादन करने वाले हैं; इस लिए तू उन भोगों और साधनों के प्रति आसक्ति रहित हो, हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से रहित हो परमात्मा में स्थित योगक्षेम को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्तःकरन वाला बनो.

अब हम सब यह स्पष्ट रूप से जान चुके हैं कि त्रिगुणी व्यवस्था से परे कुछ भी नहीं है; साथ ही यदि हम भगवद्बुद्धि के साथ सावधानी बरतें तो राजस और तामस से बचते हुए सात्विकता को अपना कर परम श्रेय मोक्ष तक की यात्रा निर्बाध करते हुए अन्ततः इससे भी मुक्त हो परमात्मा (मोक्ष) को प्राप्त हो सकते हैं! हम चाहे अपनी मर्जी से यहाँ हों, कर्मफल के कारण यहाँ हों, या परमात्मा ने अपनी लीला का क्षुद्र आस्पद बनाकर हमें इस त्रिगुणमयसंसार में भेजा हो-- जो भी मान लें, पर इतना तो हमें पता है कि चौरासी लाख योनियों में श्रेष्ठ योनि मनुष्य योनि में हम सब हैं, तो तुलसी बाबा के शब्दों में--"साधनधाम मोक्षकर द्वारा" के अनुसार हमें प्रयत्नपूर्वक मोक्षमार्ग का अनुसरण करना ही चाहिए. हम संसार में रहें, हमारी बाध्यता हो सकती है, पर हम संसार को अपने अन्दर घुसने से प्रयत्नपूर्वक गीता के बताए मार्ग पर चल कर रोकने में सफल तो हो ही सकते हैं. हम सब को पता है-- नाव नदी के पानी में ही रहती और चलती है, पर पानी को नाव में नहीं प्रविष्ट होना चाहिए. पानी जैसे ही नाव में भरेगा नाव नदी में डूब जायेगी. ठीक उसी तरह संसार में रहना हमारी मजबूरी हो सकती है, रहे, पर हम में संसार प्रवेश न करने पाये नहीं तो नाव की तरह हम भी डूब जायेंगे! जल में कमल की तरह ही हमें संसार में स्थित रहना चाहिए. जैसे कमल जल में तो जरूर रहता है पर बराबर जल से ऊपर अपनी स्थिति बनाये रखता है, हमें संसार में रहते हुए निर्लिप्त भाव से आसक्ति रहित हो कर्तव्य कर्मों का निष्कामभाव से सम्पादन करते हुए मोक्ष मार्ग का अनुसरण करते हुए परम लक्ष्य को पा लेना है!

हाँ, यह सही है कि मनुष्य समस्त कर्म सुख की प्राप्ति के लिए ही करता है जो तीनों गुणों के प्रभाव में सात्विक, राजस और तामस तीन प्रकार का ही होता है (इसका विशद वर्णन ऊपर छत्तीसवें, सैंतीसवें, अड़तीसवें और उनचालीसवें श्लोक में किया जा चुका है). उस क्रम में हम सबों ने यह जाना है कि यद्यपि सात्विक सुख के लिए किया गया प्रयत्न आरम्भ में भले कठिन और दुखदायी या विष तुल्य लगे पर वह परिणाम में अमृत तुल्य ही होता है. राजस सुख भोग काल में इन्द्रियों के सहयोग से भले उस समय सुखद अमृत तुल्य लगे पर उसका परिणाम तो विष तुल्य ही होता है और तामसी सुख तो भोग काल में और परिणाम दोनों मे ही निद्रा, आलस्य और प्रमाद से आरम्भ ही होता है, अतः वह तो कल्याणकारी हो ही नहीं सकता. इन बातों का हमें बार बार स्मरण करते हुए दृढतापूर्वक मोक्ष मार्ग में बढते रहना है. 

इस वृहद् विवेचना के बाद अब आज के विषय को आगे बढाते हैं--
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥
अर्थात्, सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है जो कि ज्ञान योग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे हे कुन्तीपुत्र! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ!

आगे भगवान् अर्जुन को और अर्जुन के माध्यम से हमें भी सात्विक कर्मों द्वारा ईश्वर प्राप्ति के मार्ग का दिग्दर्शण कराते हुए कहते हैं--
बुद्ध्‌या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्‌।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌॥
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्‌॥
अर्थात्, विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारण शक्ति के द्वारा अंतःकरण और इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है. फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है. ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी पराभक्ति को (जो तत्त्व ज्ञान की पराकाष्ठा है तथा जिसको प्राप्त होकर और कुछ जानना बाकी नहीं रहता वही यहाँ पराभक्ति, ज्ञान की परानिष्ठा, परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि इत्यादि नामों से कही गई है) प्राप्त हो जाता है. उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है.

आगे हम भक्ति सहित कर्मयोग की महत्ता देखेंगे!

जय श्रीराधेकृष्ण!
क्रमशः

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

द्वीपों को जोड़ती धारा

तराशे जाने को प्रस्तुत होना
नए आकारों में
ढ़ल पाने की सम्भावना की पुष्टि है 


पत्थर सहता है चोट
तराशा जाता है
क्या से क्या बन जाता है. 


सुख-दुःख हथौड़ों से ही तो हैं
चोट ही तो करते हैं 


एक जाकर दुखी करता है
एक का आना चोटिल करता है 


कभी कभी लगता है--


सुख-दुःख
दोनों ही अन्वेषक हैं 


हमारे भीतर का ईश-तत्व उजागर करने आते हैं
तराश कर हमारी रुखड़ाहटों को
हमें समतल कर जाते हैं. 


सुख उदारता से प्रकट हो
हमें भी उदार बनाता है
दुःख अंतर्दृष्टि दे
उस उदारता को सींचता है 


कि
जुड़ सकें
संवेदनाओं के सिरे 


कि
वृहद् वितान में
द्वीपों से तितर-बितर
दूर-दूर स्थित हम 


कहीं तो एक हो सकें 


संवेदन तरलताओं के बीच
परिस्थितिजन्य सकल कठोरताएँ  खो सकें. 


द्वीपों को जोड़ देता है
जैसे बहती धारा का प्रवाह 


वैसे ही हमें हो
अणु-अणु में व्याप्त
सुख-दुःख की थाह 


मेरे भीतर उगे उसकी भी आह!


सुप्रभातम्! जय भास्करः! ७६ :: सत्यनारायण पाण्डेय


ऊँ श्रीपरमात्मने नमः! सुप्रभातः सर्वेषां सज्जनानां ये गीताज्ञानयात्रायां दत्तचितः संलग्नाः सन्ति!
अद्यापि अस्माकं गीताज्ञानयात्रामोक्षसन्यासयोगोनामष्टादशोऽध्ये प्रचलति!

प्रिय बन्धुगण!
कल तक के विवेचन में हम लोगों ने देखा कि अठारहवें श्लोक से लेकर पैंतीसवें श्लोक तक में ज्ञान, कर्म और कर्ता तथा बुद्धि एवं धृति के सात्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद बताते हुए सभी के सात्विक भाव को ग्रहण करने एवं परमात्मप्राप्ति में बाधक राजस और तामस को त्यागने के लिए प्रेरित किया गया है. आगे छत्तीसवें, सैंतीसवें श्लोक में यह बतलाया गया है कि जिसके लिए मनुष्य समस्त कर्म करता है उस सुख के भी तीन प्रकार के होते हैं (सात्विक, राजस और तामस). सात्विक सुख के लक्षण बतलाते हुए भगवान् कहते हैं--

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥
अर्थात्, जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है!

अब क्रमशः राजस सुख एवं तामस सुख के स्वरूप का वर्णन यूँ किया गया है--

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
अर्थात्, जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है. जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है!

आगे भगवान स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि सृष्टि के समस्त पदार्थ तीनों गुणों से युक्त हैं--

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
अर्थात्, पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी तत्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो.

तीन गुणों की व्यापकता और प्रभाव सहित प्रतिफल की चर्चा कर आगे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के स्वाभाविक नियत कर्म की चर्चा प्रस्तावना पूर्वक एकतालीसवें श्लोक से चौवालीसवें श्लोक तक क्रमशः किया गया है--

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌॥
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥
अर्थात्, हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं. अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना-- ये सब ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं. शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव-- ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं. खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार-- ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र भी स्वाभाविक कर्म है.

इस प्रकार चारो वर्णों के स्वाभाविक कर्मों का स्वरूप बतलाकर भक्तियुक्त कर्मयोग का स्वरूप और फल बतलाने के लिए, उन कर्मों का किस प्रकार आचरण करने से मनुष्य अनायास परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, उसे भगवान आगे बताते हुए कहते हैं--

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
अर्थात्, अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है. जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है.

आगे भगवान् स्पष्ट करते हैं कि चारो वर्णों के धर्म यानी सुनिश्चित किए गए कर्म अपने आप में श्रेष्ठ हैं, अतः किसी भी परिस्थिति में उसका त्याग नहीं करना चाहिए! इसके पहले के श्लोक में ही स्पष्ट कहा गया है कि जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है, और जिससे यह जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने अपने स्वाभाविक कर्मों के सम्पादन द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है--

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
अर्थात्, अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता. अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं.

अतः हम जहां भी हों जिस रूप में हों अपने अपने कर्मों का निष्पादन कर्तव्य भाव से करते जायें. कहीं कोई दोष भी दिखाई दे तो भी सहज सुनिश्चित कर्म त्यागना नहीं चाहिए. अग्नि यज्ञ से लेकर भोजन पकाने तक में सहयोगी है फिर भी धूमयुक्त होने के कारण हम अग्नि का त्याग तो नहीं कर सकते! इसी प्रकार सभी कर्म किसी न किसी दोष से आवृत हैं अतः त्याग की बात न कर हमें स्वभाविक नियत अपने अपने कर्मों का पालन अवश्य करना चाहिए!

जय श्रीकृष्ण!

क्रमशः

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

दिसम्बर, इतवार और धूप


ये किन्ही व्यस्त ठिकानों पर
दौड़ती भागती सीमाओं पर
उगती
तो शायद
इसके एहसास से
अछूते रह जाते हम 


दिसम्बर के बर्फ़ीले दिनों में
फुर्सत वाले इतवार की दोपहर को
अपने पूरे ताम झाम के साथ
उगी वह
और अंक में ले लिया
मेरे कमरे की खिड़की पर खिले फूलों को 


धूप ने 

स्नेह से उन्हें स्पर्श कर
जताया अपना होना 


बताया 


कि


काफ़ी होता है कई बार जीवन में
मात्र एक एकाकी कोना 


वह कोना
जहाँ धूप झालर बुन सके 


जहाँ हम अपना होना सुन सकें!


धूप और इतवार
दिसम्बर ही नहीं जीवन की भी तमाम विडम्बनाओं को झूठला रहे थे 


पंखुड़ियाँ
चमत्कृत देख रही थीं
एक सामान्य से क्षण का परिष्कृत हो जाना


दुःख दुविधाओं के बीच
ऐसा सुन्दर था
धूप! तुम्हारा आना.



मन रे! उड़ना लिए विश्वास

विवशता अपनी जगह
अपनी जगह आकाश


इस फ़ासले को पाटना
मन रे!
उड़ना
लिए विश्वास


वो बढ़ती ही जाती है
उत्तरोत्तर 


उसकी गति से साम्य बिठाना
मन रे!
जानना, कि
जीवन है संत्रास 


मंजिलों का अनचीन्हा पता
राहों की पेचीदगियाँ--


इनके होने से ही है क़दमों की गति
मन रे!
दूरियाँ पाटने का
तुम्हारा उत्कट रहे प्रयास 


थक कर बैठ जाना स्वाभाविक है
सरल भी
लेकिन यह श्रेय नहीं है 


राह में
छलों और छालों का वर्चस्व तो
होना ही है
होगा ही
उनकी परवाह किये बिना चलते चलना
मन रे!
कभी न क्षीण हो
गंतव्य तक पहुँचने की
तुम्हारी प्यास 


विवशता अपनी जगह
अपनी जगह आकाश


इस फ़ासले को पाटना
मन रे!
उड़ना
लिए विश्वास



सुप्रभातम्! जय भास्करः! ७५ :: सत्यनारायण पाण्डेय


ऊँ श्रीपरमात्मने नमः! सुप्रभातः सर्वेषां सज्जनानां ये गीताज्ञानयात्रायां दत्तचितः संलग्नाः सन्ति! 
अद्यापि अस्माकं गीताज्ञानयात्रामोक्षसन्यासयोगोनामष्टादशोऽध्ये
प्रचलति!

प्रिय बन्धुगण!
इस अध्याय के सतरहवें श्लोक पर हम ध्यान दें जिसमें भगवान कहते हैं--"जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों मे लिप्त नहीं होती, वह पुरूष इन सब लोगों को मारकर भी वास्तव मे न तो मारने वाला है और न उसके कारण पाप से बँधता ही है!
यहां ध्यान देने की बात है कि हम कर्ता हैं ही नहीं, हम तो एक उपकरण मात्र हैं, संचालक परमात्मा हैं! हम अहंकार के कारण ही अपने को कर्ता मानकर सुख दुख के भागी बनते हैं. तीसरे अध्याय के सत्ताइसवें श्लोक में भी यह स्पष्ट किया गया था कि सारे कर्म प्रकृति एवं तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के प्रभाव से होते रहते हैं, पर अहंकार वश मूढ प्राणी अपने को कर्ता मान बैठता है और आगे अठ्ठाइसवें श्लोक में यही स्पष्ट किया गया है--

"तत्ववित गुणा गुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते।" 
अर्थात, तात्विक दृष्टि रखने वाला यह भली प्रकार समझता है कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं, मैं इसमे एक उपकरण की तरह हूं, ऐसा समझते हुए वह बंन्धन में नहीं पड़ता! फिर इसी अध्याय के चौदहवें श्लोक में किसी भी कार्य के सम्पादन में पांच हेतुओं की चर्चा की गई है--अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न भिन्न करण यानी साधन, नाना प्रकार की चेष्टाएँ और पाँचवाँ दैव कहा गया.

अतः मनुष्य मन, वाणी और शरीर से जो भी कर्म करता है, उसमें ये पाँचों कारण होते हैं, पर मनुष्य अज्ञानता के कारण शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझने की भूल कर बैठता है. आत्मा शुद्ध निर्विकार है और अकर्ता है यह भाव हमें अपने में लाना चाहिए!

भगवान् इन्हीं भावों की परिपुष्टि के लिए ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय--तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा तथा कर्ता, करण और क्रिया इन तीन प्रकार के कर्म-संग्रह की बात इसी अध्याय के अठारहवें श्लोक में करते हैं एवं सांख्ययोग के सिद्धान्तानुसार कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रह की बात बताते हैं. आगे भगवान तत्व ज्ञान में सहायक सात्विक भाव को ग्रहण करने की प्रेरणा के लिए और विरोधी भाव-- राजस, तामस को त्यागने के लिए 'कर्म-प्रेरणा' और 'कर्म-संग्रह' का प्रतिपादन करते हैं. पुनः ज्ञान, कर्म और कर्ता के सात्विक, राजस और तामस त्रिविध भेद क्रमशः आगे के प्रस्तावना सहित उन्नीसवें श्लोक से अठ्ठाइसवें श्लोक तक में प्रभु यूँ करते हैं--

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि॥
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्‌।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्‌॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्‌।
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्‌।
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्‍कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्‌॥
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्‌।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥
आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
अर्थात्, गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के तीन-तीन प्रकार के भेद कहे गए हैं. जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, वह ज्ञान सात्त्विक है किन्तु जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, वह ज्ञान राजस है. जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है- वह तामस कहा गया है. जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है और जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है. जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है. जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष-शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है! जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है. जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री है वह तामस कहा जाता है!

यहां तक हमने देखा कि तत्वज्ञान में सहायक सात्विक भाव को ग्रहण करने के लिए और उसके विरोधी राजस एवं तामस भाव को छोड़ने के लिए कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रह में ज्ञान, कर्म और कर्ता के तीन तीन भेद (सात्वीकी, राजसी और तामसी) को बतलाया ताकि हम सब ज्ञान, कर्म, कर्ता को स्वरूपगत अपनाते समय राजस और तामस से बचते हुए सात्विक भाव को अपना सकें! अब आगे बुद्धि और धृति भी सात्विक, राजसी और तामसी-- भेद से तीन तीन प्रकार की कही गई है, जिसकी प्रस्तावना भगवान् उनतीसवें श्लोक में करते हुए क्रमशः पैंतीसवें श्लोक तक बुद्धि एवं धृति के भी सात्विक, राजस और तामस रूप का वर्णन इस प्रकार करते हैं--

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥
प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥
अर्थात्, हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक सुन--
जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए राजा जनक की भाँति बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है) और निवृत्ति मार्ग को (देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए श्री शुकदेवजी और सनकादिकों की भाँति संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है. मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है. जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है. जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है) से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है परंतु फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है. दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को धारण किए रहता है- वह धारण शक्ति तामसी है.

प्रिय बन्धुओं मैंने बार बार आग्रह किया है, विषय को समझने और धारण करने के लिए तो थोड़ा सतर्क रहना ही होगा.

जय श्रीकृष्ण!

क्रमशः!

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय

कितने आसमान !





समुद्र, पाषाण, बादल, उड़ान--
एक ही दृश्य में
कितनों के
कितने आसमान !


हर क्षण
बदलता है परिदृश्य
देखें किस क्षण जुड़ता है
हमसे कौन दृश्य अभिराम !


स्थिर विश्रामरत पंछी
गोधूलि बेला के धुँधले प्रकाश में
निर्विकार बैठा
आँक रहा अपनी यात्रा का मर्म--
कैसी तो
निरर्थक रही न उसकी उड़ान
कि
दूर ही रहा
उससे उसका आसमान 


वहीं उड़ते पंछी विचर रहे हैं
गोधूलि बेला के धुँधले प्रकाश में
उड़ते हुए 

निमग्न हैं सम्पादित करने में अपना चिरलक्षित कर्म--
कि कितना भी निरर्थक हो
विचरने का परिणाम 
उड़ते ही रहेंगे
कि
उड़ना ही उनका आसमान 


पानी शांत है
लहरें आती जाती हुईं
पंछियों को देख विस्मित हुई जाती है
गति के प्रतिमान भिन्न हैं पर गति ही तो है सबका साझा धर्म--
कैसा भी परिदृश्य हो
कितना भी भयावह हो उन्वान
चलते चलें
कि उसी पटल पर रचेगा इन्द्रधनुष भी
आखिर वो है संभावनाओं का आसमान 


बड़ी स्नेहिल व्यवस्था है
प्रकृति के अंक में
सच है, पलते हैं प्रश्न कई
पर वहीं तो सांस लेते हैं सकल समाधान !


समुद्र, पाषाण, बादल, उड़ान--
एक ही दृश्य में
कितनों के
कितने आसमान !



सुप्रभातम्! जय भास्करः! ७४ :: सत्यनारायण पाण्डेय


ऊँ श्रीपरमात्मने नमः! सुप्रभातः सर्वेषां सज्जनानां ये गीताज्ञानयात्रायां दत्तचितः संलग्नाः सन्ति! अद्यापि अस्माकं गीताज्ञानयात्रा अष्टादशोऽध्यायैव भविष्यति!

प्रिय बन्धुगण!
इस अध्याय की यात्रा के आरम्भ में ही भूमिका के क्रम में यह संकेत दिया है कि यह अठारहवां अध्याय समस्त अध्यायों का सार रूप है, अतः हमें समझने के लिए पूरी सतर्कता भी रखनी होगी!
गीताज्ञानयात्रा के आरम्भिक यात्राक्रम में भी यह बार बार दुहराया गया है कि श्रीमद्भगवद्गीता मुख्य रूप से "ज्ञानसंवलित कर्मयोगशास्र" ही है. यहां अठारहवें अध्याय में भी कर्मयोग की ही प्रतिष्ठा है. हमें इस ज्ञान यात्रा में थोड़ी सावधानी तो रखनी ही चाहिए.

कल दस श्लोक तक की यात्रा हुयी थी. हमने देखा दसवें श्लोक में भगवान् सच्चे त्यागी का लक्षण बतलाते हुए कहा है कि--
जो मनुष्य अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता, परन्तु यह मुझे ही सम्पदित करना है, इसलिए करना ही है, इस भाव से कर्म करने वाला ही सतोगुणी, संशयरहित बुद्धिमान् और सच्चा त्यागी है. इस तरह यहां भी स्पष्ट किया गया कि सात्विक त्यागी यानी निष्काम भाव से कर्तव्य कर्म का अनुष्ठान करने वाला कर्मयोगी ही सच्चा त्यागी है, कर्म का ही कोई त्याग कर दे तो वह त्यागी नही कहला सकता.

अब यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उठ सकता है कि निषिद्ध और काम्य कर्मों के त्याग की भाँति अन्य समस्त कर्मों का स्वरूप से त्याग करने वाले को भी तो त्यागी कहा जा सकता है, फिर निष्काम भाव से कर्म करने वाला ही सच्चा त्यागी होता है, ऐसा क्यों कहा गया?
इसी को स्पष्ट करते हुए ग्यारहवें श्लोक में कहा गया कि शरीरधारी के लिए सभी कर्मों त्याग सम्भव ही नही--

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥
अर्थात्, क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना संभव ही नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही त्यागी है- यह कहा जाता है.

अब प्रश्न उठ सकता है कि जब सभी किए गए शुभाशुभ कर्मों के फल भुगते बिना केवल कर्म फल के त्याग से मनुष्य त्यागी यानी "कर्मबन्धन रहित" कैसे हो सकता है? इस शंका की निवृत्ति बारहवें श्लोक में की गई है--

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्‌।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्‌॥
अर्थात्, कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ- ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता.
यहां यह स्पष्ट हो गया कि विहित शास्त्र सम्मत कर्मों का लगाव रहित हो सम्पादन के साथ कर्मफल का त्याग कर देने वाले कर्म बन्धन में नहीं पड़ते और कर्मो का फल भी किसी काल में नहीं होता, पर कर्म फल का त्याग न करने वाला अच्छा, बुरा और मिला हुआ फल मरने के बाद अन्य जन्म में भी भुगतता ही है!

अब आगे संन्यास यानी सांख्ययोग के तत्व को समझाने के लिए सांख्य-सिद्धान्त के अनुसार कर्मों की सिद्धि में पांच हेतु की चर्चा करते हुए बताया गया है--

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌॥
शरीरवाङ्‍मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
अर्थात्, हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच हेतु कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बतलाने वाले सांख्य-शास्त्र में कहे गए हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान. कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ) और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं) एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव (पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कार) है. मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं.

इस प्रकार सांख्ययोग के सिद्धान्तानुसार कर्मों की सिद्धि के लिए पांच कारणों का संकेत कर यह बतलाया गया है कि वास्तव में शरीर में रहते हुए भी आत्मा का कर्मों से कोई संबंध नहीं होता, आत्मा सर्वथा शुद्ध निर्विकार और अकर्ता है. अतः सोलहवें श्लोक में आत्मा को कर्ता मानने वाले को मलिन बुद्धिवाला और अज्ञानी बतलाते हुए भगवान् कहते हैं--

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥
अर्थात्, ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने के कारण कर्मों के होने में आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता.

ठीक इसी प्रकार आत्मा सर्वथा शुद्ध, निर्विकार और अकर्ता है, ऐसा समझने वाले की प्रशंसा करते हुए सतरहवें श्लोक में भगवान् कहते हैं--

यस्य नाहङ्‍कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥
अर्थात्, जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मरता है और न पाप से बँधता है।

जैसे अग्नि, वायु और जल द्वारा प्रारब्धवश किसी प्राणी की हिंसा होती है तो वह वास्तव में हिंसा नहीं है, वैसे ही जिस पुरुष का देह में अभिमान नहीं है और स्वार्थरहित केवल संसार के हित के लिए ही जिसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती हैं, उस पुरुष के शरीर और इन्द्रियों द्वारा यदि किसी प्राणी की हिंसा होती हुई लोकदृष्टि में देखी जाए, तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है क्योंकि आसक्ति, स्वार्थ और अहंकार के न होने से किसी प्राणी की हिंसा हो ही नहीं सकती तथा बिना कर्तृत्वाभिमान के किया हुआ कर्म वास्तव में अकर्म ही है, इसलिए वह पुरुष पाप से नहीं बँधता!

इस प्रकार संन्यास यानी ज्ञानयोग का तत्व समझाने के लिए आत्मा के अकर्तापन का प्रतिपादन कर अब उसके अनुसार कर्म के अंग-प्रत्यंगों को भलीभाँति समझने के लिए कर्म-प्रेरणा और कर्मसंग्रह का प्रतिपादन अठारहवें श्लोक में करते हैं--

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥
अर्थात्, ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय- ये तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं और कर्ता, करण तथा क्रिया, ये तीन प्रकार का कर्म-संग्रह है.


ऊँ जय श्रीराधेकृष्ण!

क्रमशः!

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

उस मोड़ पर

यात्रा के उस मोड़ पर
पंछी थे, पानी था, गहराई थी


हम होकर भी
कहीं नहीं थे,
ये भी एक सच्चाई थी.


दृश्य का होना
और हमारा खोना
स्वतः घटित काव्यांश-से
कविता में उपस्थित थे 


अनुभूतियों में
ऐसे कितने ही अंश
मोती सम जड़ित थे! 


दुःख-पीड़ा ही नहीं
सुख भी लुप्त था 


सुख दुःख के बीच की
कोई स्थिति थी
मन इस संधिबेला में
सकल उलझनों से मुक्त था 


कि 


हम कहीं थे ही नहीं
वहाँ मात्र हमारे होने की परछाईं थी 


यात्रा के उस मोड़ पर
पंछी थे, पानी था, गहराई थी.







सुप्रभातम्! जय भास्करः! ७३ :: सत्यनारायण पाण्डेय


ऊँ श्रीपरमात्मने नमः!

सुप्रभातः सर्वेषां सुहृदजनानां ये मनोयोगपूर्वकं अर्जुनविषादयोगोनाम प्रथमोऽध्यायतः मोक्षसंन्यासयोगपर्यन्तं निरन्तरं संलग्नाः सन्ति!

प्रिय बन्धुगण!

मैंने आरम्भ में ही निवेदन किया था श्रीमद्भगवद्गीता विषादयोग प्रथम अध्याय से मोक्षसंन्यासयोग अठारहवें अध्याय तक की यात्रा है. जन्म-मरण रूप संसार के बंधन से सदा के लिए छूटकर परमानन्द स्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर लेना ही तो मोक्ष कहलाता है, जिसके प्रति आकर्षण सांसारिक विषयों के प्रति विकर्षण के बिना सम्भव ही नहीं. अतः सांसारिक विषयों से मुक्ति के लिए विषाद् का होना भी भगवत्कृपा ही है, अर्जुन के लिए सौभाग्य की बात थी भगवान् कृष्ण ऐसे उपदेशक (काउंसलर) उसे मिले. हम सबों को भी गीतोपदेश संसार में  जीने की कला सिखाती है, दैव कृपा से अगर खुद के साथ विषाद् का योग हो और हम गीता का अध्ययन मनन करें तो परम लक्ष्य मोक्ष तक की यात्रा सुगमता से कर लेंगे!

ध्यातव्य है कि इस अठारहवें अध्याय में पूर्वोक्त समस्त अध्यायों का सार संग्रह करके मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग का "संन्यास" के नाम से और कर्मयोग को "त्याग" के नाम से इंगित करते हुए उनका अंग-प्रत्यंगो सहित विषद वर्णन किया गया है तथा साक्षात् मोक्षरूप परमेश्वर में सर्व कर्मों का संन्यास यानी त्याग करने पर बल दिया गया है, यही मार्ग है जो संसार में निर्लिप्त भाव से बरतते हुए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे जीवात्मा मोक्ष (परमानन्द स्वरूप परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है. इसी रूप में इस अध्याय का उपसंहार हुआ है, इसी लिए तो इस अध्याय का नाम 'मोक्षसंन्यासयोग' रखा गया है!

इस अध्याय में अर्जुन सर्वप्रथम यही प्रश्न भगवान् के सामने रखता है कि हे प्रभो! मुझे संन्यास यानी ज्ञानयोग का और त्याग यानी फलासक्ति के त्याग रूप कर्मयोग का तत्व भली-भाँति अलग-अलग बतलाने की कृपा करें--

सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥

अर्जुन की जिज्ञासा के अनुरूप भगवान् ने अगले दो श्लोकों में संन्यास और त्याग के विषय में विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत बतलाते हुए कहा है--

काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥
अर्थात्, श्री भगवान बोले- कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं. कई एक विद्वान ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिए त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं.

अब आगे भगवान् अर्जुन को सावधान होकर सुनने की बात कहते हुए त्याग के विषय में विस्तार से बतलाते हैं--

निश्चयं श्रृणु में तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌॥
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌॥
अर्थात्, हे अर्जुन! संन्यास और त्याग, इन दोनों में से पहले त्याग के विषय में तू मेरा निश्चय सुन क्योंकि त्याग सात्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का कहा गया है. यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, बल्कि वह तो कर्तव्य है क्योंकि यज्ञ, दान और तपकर्म बुद्धिमान पुरुषों को (वह मनुष्य बुद्धिमान है, जो फल और आसक्ति को त्याग कर केवल भगवदर्थ कर्म करता है) पवित्र करने वाले हैं. इसलिए इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा मत है.

अब आगे तीन कोटि के त्याग--सात्विक त्याग, राजस त्याग और तामस त्याग का लक्षण बतलाते हुए उलटे क्रम में तामस त्याग, राजस त्याग और सात्विक त्याग का लक्षण क्रमशः बताया गया है--

नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्‌॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन।
सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥
अर्थात्, निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है परन्तु नियत कर्म का स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है. इसलिए मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है. जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है- ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता. शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इस भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाने वाला त्याग सात्त्विक त्याग माना गया है.

अब दसवें श्लोक में भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि सात्विक त्याग करने वाले पुरूष का निषिद्ध और काम्य कर्मों के प्रति तथा कर्तव्य कर्मों के प्रति कैसा भाव रहता है. सात्विक त्यागीपुरूष का लक्षण यूँ बताया गया है--

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥
अर्थात्, जो मनुष्य अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और न ही कुशल कर्म में आसक्त होता है, वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है.

क्रमशः

जय श्रीराधेकृष्ण!

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

गति और किनारा

स्मृतियों का किनारा था



ये मौसम
उस मौसम को
तकता था 



यूँ जीवन को
जीवन का सहारा था.



सुप्रभातम्! जय भास्करः! ७२ :: सत्यनारायण पाण्डेय


ऊँ श्रीपरमात्मने नमः! सुप्रभातः सर्वेषां सज्जनानां ये गीताज्ञानयात्रायां दत्तचितः संलग्नाः सन्ति! अद्यापि श्रद्धात्रययोगनामसप्तदशोऽध्याये एव यात्रा भविष्यति!
प्रिय बन्धुगण!

अभी तक इस अध्याय में हमलोग तीन प्रकार की श्रद्धा के अनुरूप तीन प्रकार के आहार, तीन प्रकार के यज्ञ एवं तीन प्रकार के तप के लक्षणों से परिचित हुए!
अब अगले तीन श्लोक में तीन प्रकार के दान की चर्चा की गई है--

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्‌॥
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
अर्थात्, दान देना ही कर्तव्य है- ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल और पात्र के प्राप्त होने पर उपकार उपकार की प्रत्याशा के बिना दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है. किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में रखकर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है. जो दान बिना सत्कार के अयोग्य देश-काल में कुपात्र को दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है.

आगे यह स्पष्ट किया गया है कि तीन प्रकार की श्रद्धा के अनुरूप (यज्ञ तप, दान) सात्विक यज्ञ, तप, दान ही उचित और उपादेय क्यों हैं?ऊँ, तत् और सत् का यज्ञ, दान, तप आदि से सम्बन्ध का वर्णन विस्तार से किया गया है. यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऊँ, तत्, सत् परमेश्वर के ही तीन नाम हैं, तथा इनसे प्रशस्त मांगलिक उत्तम कर्मों के सम्पादन में प्रयोग आवश्यक है ताकि हम सही ढंग से दैनन्दिन कर्मों को सात्विक रीति से सम्पादित करते हुए मोक्ष के अधिकारी बन सकें. जैसा कि हम जानते हैं, अगला अन्तिम अठारहवां अध्याय "मोक्षसंन्यासयोग" ही है!

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌॥
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते॥
अर्थात्, ॐ, तत्‌, सत्‌- ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गए. इसलिए वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' के उच्चारण से ही आरम्भ होती हैं. तत्‌ अर्थात्‌ 'तत्‌' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है- इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं. 'सत्‌'- यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा उत्तम कर्म में भी 'सत्‌' शब्द का प्रयोग किया जाता है. यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्‌' है और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्‌ है.

इस प्रकार यहाँ तक विस्तार पूर्वक यह बतलाया गया कि सात्विक श्रद्धा से शास्त्र के निर्देशानुसार सम्पादित यज्ञ, दान, तप आदि विहित कर्म ही श्रेयष्कर एवं श्रेष्ठ फल देने वाले होते हैं. अब यह किसी की जिज्ञासा हो सकती है कि जो शास्त्र विहित यज्ञादि कर्म बिना श्रद्धा के करते हों (तात्पर्य यह कि करना है, कर दिया, दान देना है, दे दिया, पर श्रद्धा नहीं है) वैसे कर्म का क्या परिणाम होता है?  इसी को स्पष्ट करते हुए इस अध्याय का उपसंहार किया गया है--

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥
अर्थात्, बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है- वह समस्त 'असत्‌' श्रेणी में आता है इस कारण वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही!

इस तरह सुस्पष्ट है कि हम जो कुछ भी करें शुद्ध सात्विक श्रद्धा से करें अन्यथा वे किए गए यज्ञ, तप, दान या जो भी कर्म होंगे "असत्" कहलाएंगे जो लोक परलोक कही के लिए भी लाभदायक नहीं सिद्ध होना है.

कल से हम सबों की यात्रा "मोक्षसंन्यासयोग" नामक अठारहवें अध्याय में प्रविष्ट होगी। जय श्रीकृष्ण!

क्रमशः!

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

स्टॉकहोम, दिसम्बर और मन



उदास करता है 


अंधेरा
अपने प्रारब्ध में ही
लिखवाए आता है 


सूरज की
न्यूनतम उपस्थिति में
सिहरता हुआ
अपने ज़ख्मों की
मगर स्वयं दवा होता है.


तमाम अंधेरों
तमाम उदासियों का
वाहक हो कर भी 


निर्मम विदाईयों का
स्मारक हो कर भी 


वह प्रिय है
रहेगा हमेशा ही 


बस इसलिए 


कि 


उसके आँचल में
श्वेत ही श्वेत संस्कार हैं
रुई के फ़ाहों-से
स्वप्निल बर्फ़ के कण हवाओं पर सवार हैं! 


वह है प्रिय
रहेगा प्रिय सदा ही 


इसलिए भी


कि 


इस मौसम में ही
मेरी खिड़की पर डाल को फूल मिलते हैं
लम्बे इंतज़ार के बाद
उजले आर्किड खिलते हैं!


वह लेकर आता है
उजली बारिश
उजली बारिश से आच्छादित परिवेश
और मेरे नन्हे से गमले में
उजला वसंत  


इस
श्वेत-स्वर्णिम-सादी आभा के जादू से
दुखती पीर छू-मंतर हो जाए 


मन
क्षण भर के लिए ही सही
जादुई दिसम्बर हो जाए !



कौन जाने, अगला क्षण कैसा हो !

जो है यही दुनिया है
इसी पल है
न कहीं और कोई जहां है
न ही कोई कल है


आज की हथेलियों में
जो रेखाएँ दिखती हैं
तय करने को जो रास्ते दिखते हैं 



उनमें ही
आगत-विगत
सकल उलझनों का हल है 


उन रास्तों पर
अपने पुरुषार्थ भर चलना है
चलते रहना है 


आज की धमनियों में
बह रहा रक्त ही
हमारी चेतना का ओज सकल है 


कि 


जो है यहीं है 


न कहीं दूसरा कोई आसमां
न ही कहीं और कोई थल है
जो है यही दुनिया है
इसी पल है !



सुप्रभातम्! जय भास्करः! ७१ :: सत्यनारायण पाण्डेय


ऊँ श्रीपरमात्मने नमः! सुप्रभातः सर्वेषां सज्जनानां ये गीताज्ञानयात्रायां दत्तचितः संलग्नाः सन्ति! अद्यापि श्रद्धात्रययोगोनाम सप्तदशाध्याये एव यात्रा भविष्यति!

प्रिय बन्धुगण!

कल इस अध्याय के आठवें श्लोक में सात्विक आहार कैसा होता है, यह बतलाया गया था, जिसे सात्विक बुद्धि के लिए सबको ग्रहण करना चाहिए ताकि सात्विक श्रद्धा का संचार हृदय, मन, बुद्धि में हो और हम सत्कर्म करते हुए मुक्तिमार्ग पर अग्रसर हो सकें!
आदिम काल से सत्संग में, लोक व्यवहार में सुनते आए हैं--"जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन", अतः बुद्धिमान पुरूष आरम्भ से ही खानपान के प्रति सजग रहे हैं.

आगे के दो श्लोकों में कल्याण चाहने वाले सात्विक मनुष्यों के लिए त्याग करने योग्य राजसी और तामसी आहार का भी वर्णन इस प्रकार किया गया है--

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्‌॥
अर्थात्, कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं. जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है.

इस प्रकार सात्विक, राजसीऔर तामसी तीन प्रकार के भोजन के भेद बतलाने के बाद वैसे भोजन करने वाले तीनों प्रकार के लोग अपनी अपनी मनोवृति के अनुसार ही यज्ञादि में प्रवृत्त होंगे, अतः आगे के ग्यारहवें, बारहवें एवं तेरहवें श्लोक में क्रमशः सात्विक, राजसिक और तामसिक यज्ञ के स्वरूप का वर्णन किया गया है--

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्‌।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्‌॥
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्‌।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥
अर्थात्, जो शास्त्र विधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है- इस प्रकार फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया गया यज्ञ सात्त्विक है. केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, वह यज्ञ राजस है. शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं.

ऊपर तीन तरह के यज्ञस्वरूप पहचान के लिए बताए गए, ताकि कल्याण और मुक्ति मार्ग के पथिक राजसी और तामसी यज्ञ से अपने को दूर रख सकें! इस प्रकार तीन प्रकार के यज्ञों के लक्षण बतलाकर अब तप के भी तीन प्रकारों के लक्षण क्रमशः (सात्विक तप, राजसिक तप, तामसिक तप)बतलाये गए हैं. इसी क्रम में प्रथमतः सात्विक तप का लक्षण बतलाने के लिए शारीरिक, वाणी संबंधी एवं मन से संबंधित तप का वर्णन अगले तीन श्लोकों में एक-एक कर किया गया है--

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते॥
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
अर्थात्, देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा-- यह शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है. जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है-- वही वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है. मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता, इस प्रकार के तप को मन सम्बन्धी तप कहा जाता है.

आगे सतरहवें, अठारहवें एवं उन्नीसवें श्लोक में तीन प्रकार की श्रद्धा के अनुरूप उन उन श्रद्धाओं से युक्त मनुष्य के द्वारा प्रवृत्यमान तीन प्रकार के तप (सात्विक, राजसी और तामसी) का वर्णन किया गया है, यह भी संकेत दिया गया है कि कल्याण चाहने वाले मनुष्य को तामसी तप का सर्वथा त्याग करना चाहिए--

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्‌।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्‌॥
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
अर्थात्, फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं. जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है. जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है.

क्रमशः

--डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय 

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