प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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31 मई 2017
एक पूरी दुनिया है भीतर
उथल पुथल का समूचा संसार है
गहरी कोई अँधेरी सी गुफा
जहाँ स्पष्ट कोई थाह नहीं है
लकीरों का एक पूरा जमघट है
कितने रास्ते
कितने ही ब्रह्माण्ड
तैर रहे हैं अथाह शून्य में
इंसान अपने आप में एक बहुत बड़ी दुनिया है
इतनी बड़ी
कि शायद इतना बड़ा कोई पैमाना ही नहीं जिससे मापी जा सके वृहदता
ऐसा कोई यूनिट नहीं जिससे अंदाजा हो सके इस दुनिया की विचित्रता का
न ही कोई स्केल है जिस पर सिमित किया जा सके इस विस्तार को
अपार
समझ की सीमाओं से परे इस अपूर्व ब्रह्माण्ड का
एक बहुत ही छोटा सा हिस्सा है इंसान
ये छोटा सा हिस्सा अपने आप में ब्रह्माण्ड है
जटिल
अपार
समझ की सीमाओं से परे... !
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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तुम नहीं जानती
कि तुम क्या हो हमारे लिए.
हमारी विवशता है
हमारे पास शब्द नहीं इतने समर्थ
जो व्यक्त कर सकें "तुम्हें".
तुम्हें कितनी ही मन्नतों से पाया है...
मुस्कान बन कर आई हो हमारी दुनिया में...
आँगन हमारा अपने भाग्य पर इतराया है... !
अपनी सौम्यता से जीत ले सबको
ये ईश्वरीय वरदान साथ है...
कि विधाता ने
हम बेटियों की किस्मत में
दो आँगन लिखे
तो, ये सामर्थ्य भी लिखा उसने
हमारे प्रारब्ध में
कि हम दोनों आँगन की आजीवन शोभा रह सकें
हँस सकें
रो सकें
जीवन में स्वयं "जीवन" का पर्याय हो सकें !!
तुम बिलकुल वैसी हो...
सच, परियों के देश से आई उजली किरण जैसी हो...
और क्या कहें...
शब्दों का उपहार है...
बहुत दूर बैठी दीदी के नम आँखों का प्यार है... !!
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(भाई भाभी )
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प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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पहाड़!
तुम तक आते हुए
हमने नदी को छुआ
वो नदी युगों से तुम्हारे चरण धो रही है
कल-कल बहते झरनों से उसकी हर क्षण बात हो रही है
हमने देखा
पेड़ जो टिक कर खड़े हैं
उनसे झरते पत्तों से एक कथा झर रही है
ये निर्जनता कितनी ही व्यथाओं का घर रही है
बहती नदी की दुर्गम यात्रा की गवाह हैं हवाएं
चोट खाते झरनों की वेदना प्रतिबिंबित होती रही है इस सुनसान में.
हमें संज्ञान है
तुम देखते रहे
नदी झरनों की रोज़ की जूझन टूटन
आद्र रही तुम्हारी कठोर भंगिमाएं
तुम अचल अविरल साथ रहे नदी के
बने रहे झरनों के संबल.
ये भी आभास है हमें
कोई देख न पाया
न ही कोई कभी देख पायेगा
तुम्हारा कोमल मन
और वहां सांस लेती वेदना भी
अनचीन्ही ही रह जाएगी.
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जीवन की इस राह में
कोई नदी है...
कोई झरना...
और हममे से ही कोई कभी-कभी होता है पहाड़ भी !
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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29 मई 2017
झरोखे से दीखता है जो
ज़रा सा आसमान
वह
हमारे मुट्ठी भर अरमानों के प्रतीक सा
झिलमिलाता है.
यही आसमान
हमारी आँखों का सारा आकाश है.
नभ के असीम विस्तार को
अपने हिस्से के आकाश से ही
पहचानते हैं हम
वहां टंकने वाले
चाँद सूरज तारों को
जानते हैं हम
कि
हमारे अरमानों का सूरज भी तो
वहीँ कबसे
ऊग रहा है डूब रहा है.
इस ऊगने डूबने के सिलसिले को
क्षितिज रोज़ जीता है
उदय की लालिमा
अवसान का दुःख-
ये दोनों
उसके हिस्से आते हैं
क्षितिज
धरा और आकाश के
तार-तार दामन को
अपनी परिधि में सीता है.
झरोखे की क्या बिसात!
पर वह
इन अद्भुत घटनाओं का
प्रत्यक्षद्रष्टा तो है ही
झरोखा जानता है
अपने हिस्से के आकाश को.
इसी झरोखे पर बैठा मन
कभी ऊगता है
कभी डूब जाता है
कभी मन क्षितिज हो जाता है !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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25 मई 2017
एक बूँद आंसू में
झलकता रहा समंदर...
कितनी बेचैन लहरें
लहराती हैं अन्दर...
तट की गीली मिट्टी में
थाहते रहे
खोया हुआ सुकून...
तलुओं की अनुभूति अलग
कुछ अलग सी ही है
मन की भी धुन...
हवा के आँचल में
है टंकी हुई
बेचैनियाँ...
लहरों के शोर में
है पसरी हुई
खामोशियाँ...
अपना पता भूले हुए
हम इस मौन में
अपनी बात तलाश रहे हैं...
ज़िन्दगी में पिछले मोड़ तक लौट पाने की राह
किस कदर ओझल है, इस तथ्य से
बीते दिनों हम बड़े हताश रहे हैं !
इन दिनों
एक रास्ता उकेर रहे हैं
कल्पना की सरहद पर...
जी रहे हैं एक मौन
कविता में...
इस तरह सांस लेते रहने की गुंजाईश बचा रखी है हमने !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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16 मई 2017
पहाड़ से दुःख हैं...
समंदर सी गहरी है पीड़ा...
मुट्ठी से
रेत की तरह
फिसलते दिख रहे हैं रिश्ते...
इतना दर्द
कि आंसू सूख जाए...
ऐसी बेचैनी
कि 'जीवन'
जीवन न रह जाए...
सोचा न था
कि इतना दुरूह भी हो सकता है समय...
इतनी निर्मम भी हो सकती है नियति की क्रीड़ा...
ओह! पहाड़ से दुःख हैं...
समंदर सी गहरी है पीड़ा...