अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बूंदों से बातें!

मुसलाधार बारिश हो, तो-
बूंदें दिखाई नहीं देतीं,
पर आद्र कर जाता है
बरसता पानी!

मखमली घास पर
बिछ जातीं हैं स्नेहिल बूंदें,
बन कर
कोई याद पुरानी!

बूंदों में प्रतिविम्बित सतरंगी स्वप्न,
हर एक क्षण एक नया जन्म,
हर एक पल की
अपनी एक विरल कहानी!

झम झम के संगीत में,
धरा पर झरते गीत में,
कितने राज़, कितनी खुशियाँ
अब तक हैं अनजानी!

रुको तनिक,

सुन लो बातें बूंदों की,
गुन लो बातें बूंदों की-
ये दुनिया...
है आनी जानी!

आत्मसात कर सारा गीत गगन का
उसमें जोड़ सुर कुछ अपने मन का
है रचनी हमें
कोई धुन सुहानी!

इसलिए,

हे बूंदों! तुम सब यूँ ही रहना धवल,
करते रहना जड़ों को सबल,
फिरना स्वच्छंद...
करते हुए मनमानी!

मस्ती में ही कुछ सीखेंगे,
तुमसे ही प्रेरित हो लिखेंगे,
जीवन की
हम नयी कहानी!

इन्द्रधनुष के नाम...!

वेनिस और रोम घूमने गए हुए थे, बहुत अच्छी रही यात्रा... लेकिन इसके बारे में फिर कभी. अभी स्टॉकहोम की ही एक शाम सहेजते हैं यहाँ... इससे पहले कि इन्द्रधनुष की ही तरह स्मृति में भी वह छवि धुंधला जाए, उसे सहेज लेना चाहिए!
यूँ ही उस शाम खिल आये स्पष्ट इन्द्रधनुष ने चमत्कृत कर दिया... हर रंग अपने अस्तित्व को परिभाषित कर रहा था... आसमान मानों समुद्र हो और उसपर हो निर्मित रंगबिरंगा पुल...; कुछ तस्वीरें लीं लेकिन शायद ही उस पल का सौन्दर्य कैद हो पाया हो कैमरे के क्लिक में.
प्रस्तुत है कुछ भाव, कुछ पंक्तियाँ जिसे कविता सा कुछ बना गयी, वह शाम-


दोहरा इन्द्रधनुष:
जैसे-
दो सतरंगी पुल गगन में,
चन्द पलों के लिए दृश्यमान
फिर जैसे लुप्त होते ही
बस गया हो मन में!

खिली धूप में देखा उसे
काले बादल पर
अवतरित होते हुए,
जैसे दिख गयी हो
कोई प्रार्थना
फलित होते हुए...

क्षणिक सौन्दर्य का
कीर्तिमान गढ़
हो गया वह अंतर्ध्यान,
न केवल देखने में था वैसा
बल्कि वह कर भी गया
पुल का काम...

समय की नदी को पार करवाया उसने
जहां बहुत पीछे कहीं
झिलमिला रही थी एक शाम,
वह शाम इस मायने में विशिष्ट थी
कि वह भी थी
इन्द्रधनुष के नाम...

दूरी का भाव हो जाता है दूर
जब महसूसते हैं, कि
एक गगन के नीचे हैं हम,
कोई भी टुकड़ा हो धरती का
एक सी ही बारिश से
उसे सींचे है गगन...

एक ही सूरज है,
है वो एक ही चाँद,
जो चमकता है
धरती के हर कोने पर;
बनतीं है हर बार
इन्द्रधनुष की सम्भावना,
किसी भी कोने में
आँखों के नम होने पर...

और फिर,
बनते हैं पुल...
जिससे हो कर संवेदना
लम्बा सफ़र
तय कर पाती है!
इन्द्रधनुष लुप्त हो भी जाए
तो क्या?
उसकी क्षणिक झलक ने ही जता दिया-
उन उच्चाईयों तक भी
राह जाती है!

बचपन...!

चिरंतन पर 'बचपन' के ढ़ेर सारे अनूठे रंगों एवं अभिव्यक्तियों में शामिल मेरी एक कविता..., धन्यवाद चिरंतन इस प्यारे विषय पर अंक प्रस्तुत करने के लिए!

वो खो गया है
दूर हो गया है

नन्हे नन्हे
प्यारे प्यारे
अँधेरी काली रात में
जब टिमटिमाते हैं तारे

तो वहीँ कहीं
झलक अपनी दिखलाता है,
स्मृतियों के आकाश पर
धीरे से आता है!

कितने ही
खेल खिलौने याद दिलाने,
रूठे पलों को
फिर से मनाने!

वो था, तो सपने थे
वो था, तो सब अपने थे

एक मुस्कान ही
जग जीतने को पर्याप्त थी,
खुशियों की चाभी
जो प्राप्त थी!

सुन्दर मनोहर
भोला भाला था मन
फिर जाने कब?
विदा हो गया बचपन

अब तो बस
तारे टिमटिमाते रहते हैं
यदा-कदा
हम दोहराते रहते हैं-

उसकी महिमा उसका गान
काश! मिल जाए वो किसी शाम

फिर, पूछेंगे उससे
कि क्यूँ नहीं छोड़ गया?
कुछ मासूमियत के रंग...
मिल जाए,
तो सीख लें फिर उससे
जीवन का वो बेपरवाह ढ़ंग...

बोलो बचपन
मिलोगे न?
फिर से हृदय कुञ्ज में
खिलोगे न!

एक मात्र कवच!

होता है ऐसा भी...
जीवन के समानांतर चलता रहता है,
कुछ मौत के जैसा भी-

मन में घर कर जाती है
उदासीनता,
उत्साह का इस कदर लोप हो चुका होता है...
मानों वह कभी रहा ही न हो
अस्तित्व का अंश!

जबकि सच्चाई यह होती है-
उत्साह वैसे ही रहा होता है अपना
जैसे सम्बद्ध है साँसों से जीवन,
मुक्तहस्त लुटाई गयीं होती हैं खुशियाँ
फूलों से होता है भरा हुआ
खिला खिला उपवन!

फिर,
क्या अकारण ही छाती है निराशा?
चिंतित मन को क्या हो दिलासा?

इस मनःस्थिति से
कैसे हो मुक्ति?
शायद,
मन के भीतर ही है कहीं
छिपी हुई युक्ति!

वो
मिल जाए बस,

आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!

तब बरसेंगे मेघ!

भूल गए हैं
बरसना मेघ
वैसे ही
जैसे हम
अन्याय का प्रतिकार करना
भूल गए हैं

गरजना भी शायद
भूल गया है आसमान
वैसे ही
जैसे हम
सत्य के लिए आवाज़ उठाना
भूल गए हैं

बिजलियों ने भी
कौंधना छोड़ दिया है
तब से
जब से हमने
निबाहनी शुरू कर दी है हर बात पर
समझौते की परिपाटी

आज हमारी गूंजती चीत्कारों तक
ले कर आई हैं सन्देश हवाएं-

सीधी अपनी रीढ़ करें हम
तब बरसेंगे मेघ!

अब हम बताएं...

कितना समय लेंगे दृढ़ होने में हम,
कब तक तरसेंगे मेघ!

जीवन चक्र!

बीज से पौधा
पौधे में पत्तियां
फिर फूल
फिर फल

और फिर
सब सौंप कर हमें
लौट जाना
उसी बीज रूप में,

उसने
सहर्ष स्वीकारा है
अपना जीवन चक्र

ये हम ही हैं जो
बात बात में
करते हैं अपनी दृष्टि वक्र

शायद सोचा ही नहीं हमने-

इन सबके बीच
कितना कुछ
हम हर पल हैं खोते...

आश्चर्य है-

और कोई लाभ न पा जाए
इस डर से कई बार तो हम
पुष्पित पल्लवित ही नहीं होते!

निःस्वार्थ कोई बीज
आखिर हम क्यूँ नहीं बोते?

'आज' के सान्निध्य में!

नदी किनारे बैठ कर
खंगाली अपनी झोली
तो पाया उसमें
बीते कल के सुनहरे अक्षर
'आज' की धुक-धुक चलती सांसें
और संभावित भविष्य!

समेटा फिर सब कुछ
एकटक निहारा मझधार को
धारों की आवाजाही
व नौकाओं की चाल को
और फिर देखते ही देखते
बदल गया परिदृश्य!

अब मैं
बीते कल और आने वाले कल को
बारी-बारी से
धारा को अर्पित करती जा रही थी
सोचा,
रहूँ 'आज' के सान्निध्य में
आखिर कौन लौट सका है अतीत में
अब किसने देखा है भविष्य!

***
पीछे मुड़कर देखा तो आज की ही तारीख़ की पहली पोस्ट है अनुशील पर, दो वर्ष हो गए:)

मन का एकाकी कोना!

रात में सूरज..., हाँ ऐसा ही होता है यहाँ; कुछ रात दस बजे के आसपास सूर्य की रौशनी से जगमग दृश्य... ऐसी ही होती है स्टॉकहोम में गर्मियों की शामें... जब तक आँख लगती है रात ग्यारह बारह के आसपास तब तक तो रौशनी रहती ही है और जब भी कभी करवट बदले और आँख खुल जाए तीन या फिर चार बजे, तब भी रौशनी होती ही है... जाने कब अन्धकार होता है और कब गायब हो जाता है, पता भी नहीं चलता! आसमान बड़ा सुन्दर लगता है खुली खिड़की से... एक कैनवास सा, जहां कितने ही आकार उकेर रखे हों प्रभु ने...



कहाँ सोचा था कभी
इतनी दूर भी कभी आना होगा
रहना होगा यहाँ
जाननी समझनी होगी यहाँ की भाषा
और महसूसने होंगे यहाँ के मौसम


यहाँ होता है खूब रौशनी से भरा ग्रीष्म
होती है खूब अँधेरी सर्दी की रातें


रौशनी का अतिरेक कभी
और कभी अँधेरे का सर्व व्यापक होना
ताल मेल बिठाते-बिठाते
विस्मृत हो जाता है मन का एकाकी कोना


मन के उस कोने में
भर जाती है धूप
बहुत अँधेरा आने वाला है
विगत वर्षों में अनुभूत हो चुका है वह स्वरुप


इसलिए
कल के लिए ज़रूरी है,
आँखों में ही सही
आज कुछ रौशनी बसाई जाए!
आज
अनुकूल मौसम में,
कल के लिए
कुछ कलियाँ उगाई जाए!!

हर युग के प्रारब्ध में...!

जब तक रहते हैं हम तब तक इमारत सांस लेती है और त्यक्त होते ही मानों इमारत का भी जीवन समाप्त होने लगता है... और विरानगी समाते समाते धीरे धीरे वह बन जाता है खंडहर!
हर युग की यही कहानी है, हर इमारत ढ़हती है..., यादों के महल भी समय के साथ खंडहर बन जाते हैं..., हमारा शरीर भी तो एक रोज़ कभी बुलंद रही छवि का अवशेष मात्र ही रह जाता है...!
चिरंतन के लिए कविता लिखनी थी..., विषय था खंडहर; इस पर सोचते हुए मन बहुत विचलित हुआ, सन्नाटों को सुनने के प्रयास में लिख गयी कविता आज यहाँ भी सहेज लेते हैं...!
अपने सुन्दर अंक में सारगर्भित रचनाओं के बीच मेरे प्रयास को भी स्थान देने के लिए चिरंतन का आभार!


ऊंची अट्टालिकाओं की भीड़ में
ले रहे हैं सांस,
ख़ामोश खंडहर...

अपनी ख़ामोशी में,
सहेजे हुए
वक़्त की कितनी ही करवटें
कितने ही भूले बिसरे किस्से
बीत चुके
कितने ही पहर...

सन्नाटे में गूंजती
किसी सदी की हंसी
जीर्ण-शीर्ण प्राचीरों के
मौन में फंसी,
इस सदी के द्वार पर
दे दस्तक
दिखलाती है-
वक़्त कैसे अपने स्वभाव के अधीन हो
ढ़ाता है कहर...

हमेशा ये अट्टालिकाएं भी नहीं रहेंगी
निर्विकार, निर्विघ्न चल रही है प्रतिक्षण
परिवर्तन की लहर...

हर युग के प्रारब्ध में है लिखा हुआ एक खंडहर!

यूँ ही नहीं खिल आता है फूल!

उसने
खाद से जीवन लिया,
हवा, पानी और प्रकाश
ग्रहण किया परिवेश से,
अन्यान्य सुखद परिवर्तनों की
नींव पड़ी भीतर
और अस्तित्व में आ गया फूल

खाद की सदाशयता
त्याग, तपस्या और अनुराग
हवा, पानी एवं प्रकाश का
सहर्ष उत्कट सहभाग
है सौन्दर्य के प्राकट्य का मूल

यूँ ही नहीं खिल आता है फूल

आंशिक रूप से
ग्रहण किया गया
हर तत्व,
खिलखिलाहट में उसकी
मुस्काता है!
कितने ही अव्यव
रूप अपना
त्यागते हैं,
तब जाकर एक फूल
अस्तित्व में आता है!

लिखते हुए, शब्दों की अपार कमी है...!

आज सहेज लेते हैं, किसी दिन फ़ोन पर सुनायेंगे ये पापा को:)

एक घने पेड़ की छाँव को
तब मैंने जाना
जब घनघोर वृष्टि ने घेरा मुझे
आश्रय सभी ओझल थे
आँखों के आगे अँधेरा था
बूंदों की सुन्दरता के सारे किस्से झूठे लग रहे थे

तब तपस्वी सम लगा पेड़
जीवन के सुनसान में उसकी हरी छतरी के नीचे आकर
देखा मैंने नीला विस्तार
उमड़ता हुआ गगन में सागर अपार

आंसू उमड़ आये
कई सजीव पल बूंदों की तरह हो आये समक्ष
जिन पलों में जीवन सबसे व्यर्थ लगा था मुझे

उन तमाम कठिन पलों के बावज़ूद
आज भी मेरे पास जीवन है
क्यूंकि
एक दृढ पेड़ की छाँव ने हर बार बचाया मुझे जीवन की तपन से
सहेजी मेरे लिए हर बार घोर निराशा के बाद वाली उजास

मेरे लिए वो पेड़ हमेशा आप रहे पापा!
.....................

मन आद्र है आँखों में नमी है
लिखते हुए, शब्दों की अपार कमी है...!

आज बस इतना ही...!

कहीं कुछ भी ठीक नहीं है
अड़चनें हर ओर हैं घेरे खड़ीं
ऐसे में मैं लिखना चाहती हूँ एक आस से परिपूर्ण कविता
अपने अपनों के लिए
अपने लिए...

लेकिन फिर लगता है सब बेमानी है
बादल हैं कि बरसते नहीं केवल आँखों में ही पानी है

आज बस इतना ही...

कि नयन बरस रहे हैं
और इसमें सम्मिलित कई नयनों का पानी है
जो है जहां उसके अपने दुःख, अपनी विवश कहानी है

आज बस इतना ही...

कल अलग अलग करूंगी सब तहें
निकल आए शायद वहीँ से कोई मुस्कान
सहेज लूंगी फिर उसे
अपने लिए...
अपने अपनों के लिए!

अनुराग, रौशनी के प्रति!

उगता है सूरज जिस दिशा में
उधर ही खुलती हैं मेरे घर की खिड़कियाँ
रखा है एक पौधा वहीँ पर
फुरसत में बैठ कर देखती हूँ सूरज की ओर उसका झुकाव
टहनियां बढ़ रही हैं कुछ ऐसे
मानों सूरज ने किरणों का हाथ बढ़ाया हो
और उसे थामने की खातिर
हो गयीं हों वे धनुषाकार
एक तरफ कुछ ज्यादा झुंकी हुई

ये सूरज का साथ मेरे पौधे को जीवन देगा
ये झुकाव उसे समृद्ध करेगा
तेज को कर आत्मसात
पौधा अपने समय से पुष्पित और पल्लवित होगा

बस एक नैसर्गिक अनुराग हो रौशनी के प्रति
तो स्वतः ही जीवन कुसुमित हो जाता है
उज्जवल पक्षों के प्रभाव से
नित सवेरा आता है
एक स्थान पर स्थित पौधों की तरह
चलता फिरता इंसान भी जब
सूरज के तेज का अनुगामी होगा
निश्चित उसके क्रिया-क्लापों का असर
सुखद व दूरगामी होगा

आँखों में एक सूरज लिए जब हर कोई चलेगा...
सुवासित चमन का हर फूल झरने से पहले कहेगा-
अहोभाग्य मेरा, क्यूँ न बिछ जाऊं राहों में
मुझ पर चल कर जाने वाला कल इतिहास रचेगा!

समंदर की धड़कन सुनकर...!

जैसी लिखी गयी समंदर किनारे पहली बार उस रूप में ही सहेज रहे हैं यहाँ...! चिरंतन पर सागर से भावों को बाँधने के साझे प्रयास में एक कड़ी के रूप में जुड़ने हेतु लिखी गयी थी यह कविता... दुबारे पढ़ते हुए कुछ एक संशोधन के बाद वहाँ प्रकाशित! आभार मीता जी, बेहद सुन्दर रचनाओं के बीच मेरे प्रयास को भी स्थान देने के लिए:)

समंदर किनारे से रेत के कुछ कण चुन कर
उलझे भावों के धागों से सपने बुन कर
चले हम जो कहते हुए लहरों की कहानी,
जुड़ गए कितने ही पथिक आहटें सुन कर...

आंसुओं का एक समंदर सबके नयनों में समाया है
आती-जाती लहरों का संगीत चहुँ ओर छाया है
ऐसे में गूंजता है एक मौन पूरी तन्मयता से,
अभी अभी एक दीप ने अँधेरे को हराया है...

जलती हुई लौ का नन्हा सा प्रकाशवृत्त सबल है
मझधार का किनारों के प्रति मोह प्रबल है
बिखरे हैं कितने ही रेतीले आकार समंदर किनारे,
धाराओं के सान्निध्य में भावों का संसार धवल है...

इस धवल संसार से सुनहरे कुछ मोती चुनकर
चले हम सजाने परिदृश्य एक कविता बुन कर
देखिये तो, हो पायी है परिलक्षित वह गहरी शांति?
लिखा है हमने यह सब समंदर की धड़कन सुनकर...

मन के नीड़ में...!

बादलों के पीछे से झांकती रौशनी
जैसे हो शब्दों की ओट से झांकती कविता
दर्ज़ करती हुई अपनी उपस्थिति
स्थापित करती हुई अपना वजूद
भरी भीड़ में...

बादल छंट जाते हैं
और रौशनी जाती है सन्मुख
शब्द विलीन हो जाते हैं और रिक्त हुए बिन्दुओं से
प्रकट हो जाती है कविता
मन के नीड़ में...

एक पुष्प की मुस्कान सहेजे
बिना कुम्हलाये चलती है वो आँचल में अपने धूप लिए
छाँव की तलाश भी उस तक पहुँच कर ही पाती है विराम
धूप-छाँव का अनूठा संगम है कविता
दिख जायेगी स्पष्ट, भले हो
भरी भीड़ में...

स्पंदित होती हुई मन के नीड़ में!

ताकि, जब जाएँ तो...!

साँसें चुक जायेंगी
जिस दिन...
उस दिन चल देंगे जग से हम!
मात्र पड़ाव ही तो है जीवन
फिर मोह कैसा...
कैसा गम!

बस रहें जब तक
तब तक बना रहे मन-प्राण...
शुभ संकल्पों का आँगन!
कांटें चुनते हुए गुजरें राहों से
ताकि, जब जाएँ तो...
राह हो सुगम!

एक निर्धारित समय के लिए ही
मिलता है अवसर...
होती है धरती अपनी, अपना होता है गगन!
बस स्मरण रहे यह सत्य, तो
हर मोड़ पर मिलेगा...
मुस्कुराता हुआ जीवन!

सब खेल हैं विधाता के
जीवन, मरण, विस्मरण...
हे सृष्टि, तेरा अद्भुत क्रम!
लौटना है एक रोज़ धाम तेरे
पराये जग से नाता तोड़...
प्रभु, तुझसे कैसी अनबन!

है बात ये ज़रा सी!

शाम को अकेले बैठे हुए लिख गया यह मन एवं वातावरण का परिदृश्य... सुबह से बारिश हो रही है, मौसम जैसे बदल सा गया है... २० डीग्री से पुनः ५-६ डीग्री पर लौट आया है तापमान यहाँ स्टॉकहोम में...; मन का क्या... उसका मौसम तो नित परिवर्तित होता ही रहता है...

अभी बूँद-बूँद बरस रहा है अम्बर
ऐसे में निर्जन अकेला होगा वहाँ समंदर

यहाँ अकेले हैं हम और देख रहें हैं हर एक बूँद की गति
एक क्षण की कथा और फिर निश्चित है क्षति

खिड़की से झाँक रही हैं आँखें मेरी उदासीन
ये रोता हुआ अम्बर ये शाम है ग़मगीन

कम्पित हो रहा है गमले के पौधे का हरापन
हवा ने सहलाया धीरे से लिए हुए अपनापन

कुछ बूँदें पत्तों पर लगीं झिलमिलाने
थाहा हमने अपना अंतर बारिश के बहाने

भीतर कुछ घुले-मिले से रंग पाए
मौन नयनों से हमने नीर बहाए

फिर कुछ ही पल में जाती रही उदासी
कोई बड़ा सन्दर्भ नहीं... है बात ये ज़रा सी

अगले मोड़ पर ही...!

किसी भी बात पर जब
मिथ्याभिमान होने लगे,
तो, याद रहे...
तुमसे भी कोई बड़ा है!

कितना भी
वृहद् हो गगन,
अपने मद में हो लें हम
कितने भी मगन;
वक़्त
सबको नाप लेता है,
सारे हिसाब देख लेने को
वो अगले मोड़ पर खड़ा है!

किनारे हैं तो बिना मिले भी
साथ चलना तो होगा ही,
मझधार का खेल
समझना तो होगा ही;
समझायेंगे तभी तो पंथी को
कि मिल जाती है मंज़िल,
राह में हैं ठोकरें तो क्या?
हौसला हर रोड़े से बड़ा है!

समस्या आती है तो सहारे सकल
छीन लेती है,
मन की शान्ति समस्त
लील लेती है;
ऐसे में
एक बार झांकना हृदय में,
हाथ थामने को
विधाता स्वयं खड़ा है!

मिट जाता है हर अक्स
उभर कर पानी में,
किसे पता?
क्या होगा घटित कहानी में;
छोटा सा मन
छोटा सा जीवन,
छोटे छोटे एहसासों का
मोल बड़ा है!

अकेला कभी नहीं होता इंसान
बस हौसला रखना,
देखना, अगले मोड़ पर ही...
कोई तेरे लिए खड़ा है!

स्याह या सफ़ेद...?

सफ़ेद होता है...
स्याह होता है
बीच में कई रंग
घुले-मिले होते हैं चरित्र में,
इंसान झूलता रहता है
दो किनारों के मध्य
और आकार
उभरते जाते हैं चित्र में...
मानों,
सब परिस्थितियां ही
निर्धारित करती हैं,
कुछ भी अपने वश में नहीं
ये तथ्य
साधिकार प्रचारित करती हैं

होगा ये भी एक सच
पर एक तथ्य और है,
भले उतना प्रचारित नहीं
पर बात यही सिरमौर है...
कि,
स्याह या सफ़ेद होने का
विवेक है हमारे पास,
प्रभु प्रदत्त नेयमत यह
प्रणम्य है,
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!

उस भविष्य तक...!

मन के पृष्ठों से
कागज़ तक आते आते,
कितना कुछ है... जो छूट जाता है...
शब्दों की ऊँगली थामते ही
सादा सा कोई सच,
सदा के लिए रूठ जाता है...

कांच से रिश्तों पर
जब बेरहम हवा की मार पड़ती है,
तो बचा-खुचा संतुलन टूट जाता है...
आजमाती है लगातार ज़िन्दगी
धर-धर रोज़ नए रूप,
किनारे तक आते ही समंदर छूट जाता है...

क्या खोजेंगे क्या पायेंगे खोये हुए लोग
नज़र के सामने ही,
संभावनाओं का घड़ा फूट जाता है...
यहाँ हम निराश होते हैं
और वहाँ रौशनी हो जाती है कुछ कम,
फ़लक पर सितारा कोई रूठ जाता है...

आस की सुनहरी किरण
नज़र से ओझल न होनी चाहिए कभी,
निराश दौर लौ की उर्जा लूट जाता है...
'वर्तमान' भले तबाह हो जाए विध्वंसात्मक उथल-पुथल में
पर 'भविष्य' तब भी सदा बचा रहेगा,
प्रलयी मंज़र
'अतीत' के पृष्ठों में ही कहीं छूट जाता है...

उस भविष्य तक जायेंगे हम
मौन धरे, अपने बल-बूते
टूटता है, टूटने दो, कांच टूट जाता है...
शब्दों की ऊँगली थामते ही
सादा सा कोई सच,
सदा के लिए रूठ जाता है!

फिर चल देना...!

हमेशा के लिए
कुछ भी तो नहीं होता यहाँ
इसलिए,
जो
देना हो, तो-
अपनों को अपने समय से
कुछ पल देना...

तट पर बालू से खेलती
नन्ही संभावनाओं
के
अटपटे प्रश्नों का,
जो दे सको, तो-
सुलझे हुए आसान से
हल देना...

संभव नहीं और शायद ज़रूरी भी
नहीं कि
जीवन को हमेशा
पकड़ा ही जाए,
अच्छा है...
बस
कुछ पल सुस्ताना छाँव में
फिर चल देना...!

एक अकेले छिद्र पर टिकी आस!

मन में निरंतर चल रही एक प्रार्थना के कुछ अंश यूँ लिख गए... सो बस सहेज ले रहे हैं यहाँ...!

एक छेद भर रौशनी भीतर आती रहे
और ढूंढ़ ले खोया हुआ उत्साह

वो
उत्साह
जो चूक गया है
बीतते उम्र के साथ शायद कहीं दुबक गया है

बहुत देर तक यूँ दुबका रहा तो
हो जाएगा विनष्ट
और फिर नहीं उग पायेगा विश्वास
कभी भी...,
एक ज़रा से उत्साह के अभाव में

अँधेरी
बंद कोठरी के
एक अकेले छिद्र पर ही मेरी आस टिकी है;
प्रविष्ट करे रौशनी
और खोज निकाले खो चुके उत्साह को

पाए जाने के तुरंत बाद
धूल झाड़कर
खड़ी हो जाए उमंग

झूमे मन
और फिर से शुरू हो जीवन...!

हे जीवन!

हे जीवन!
तुम्हें लिखने के लिए,
अगर कई लिपियों का सहारा लेना पड़े...
कई भाषाओँ की दहलीजों से,
उपमाएं चुननी पड़े...
तो, दुनिया की किसी भी एक भाषा में
लिख देंगे तेरी मुस्कराहट;
किसी भी भाषा का दरवाज़ा खटखटा कर
चुन लेंगे,
तेरी भाव भंगिमाओं के लिए उपमाएं;
विश्वास है,
कोई भी भाषा में
पूरी सशक्तता के साथ लिख सकते हैं
तेरे हौसले को;
लेकिन,
लिखने होंगे जब आंसू
तो अपनी ही भाषा के द्वारे लौट आयेंगे...
इसलिए, नहीं कि
अन्य किसी भाषा में
आंसू लिखने को वैसे ही पाक़ शब्द नहीं...
बल्कि, इसलिए
क्यूंकि ये सच है, कि
किसी अन्य भाषा में हम
सहजता से रो नहीं पायेंगे...

तुम्हारे आंसू समझने के लिए हमें भी रोना होगा...!
और रोने के लिए हमें अपनी भाषा में होना होगा...!!

क्यूँ लिखते हैं हम...?

अपना ही मन पढ़ने के लिए
लिखते हैं हम...
खुद को समझने के लिए!

जब फिसल जाती है सकल रेत मुट्ठी से...
तब भी
कुछ एक रज कणों को
अपना कहने के लिए,
लिखते हैं हम...
दो सांसों के बीच का अंतराल जीने के लिए!

जब-जब मिलता है बाहें फैलाये जीवन...
तब-तब
उसके हर अंश को समेट
वापस आसपास बिखरा देने के लिए,
लिखते हैं हम...
खाद से ख़ुशबू लेकर लुटा देने के लिए!

जब भी होता है आसमान उदास...
तब उसमें
अपनी कल्पना से
अनगिन बादल बना देने के लिए,
लिखते हैं हम...
हवाओं का आँचल सोंधी महक से भींगा देने के लिए!

चुप सी कलम की स्याही जांचने के लिए
लिखते हैं हम...
अपने ही भीतर झांकने के लिए!

एक अनुभूति की तलाश!

मेरी एक बड़ी प्यारी दोस्त है... बहुत दूर हैं हम अभी जमशेदपुर से... वहीँ तो हमने साझा कितना कुछ जिया है स्कूल के दिनों में, और फिर कुछ एक वर्ष बनारस में भी बी.एच.यू वाले दिनों में; अंतिम मिले होंगे बी.एच.यू के त्रिवेणी हॉस्टल में ही कभी फिर तो जगह ही बदल गयी... और अब न जाने कब प्रत्यक्ष मिलाये ज़िन्दगी...! लेकिन, संतोष है कि बात होती रहती है... व्यस्तताओं के मध्य कुछ वक़्त यहाँ-वहाँ इधर-उधर की बातों के बीच कुछ एक बातें कविता भी बन जाती हैं...
कहते-कहते जब श्वेता ने 'खुद के समीप और दुविधाओं से दूर' होने की दुर्लभ सम्भावना वाली बात कही तो मेरे मन से भी अनायास निकल पड़ा... काश!
फिर इस सम्भावना ने... इस सम्भावना को साकार कर सकने की सक्षमता के अभाव ने... इस पंक्ति के आसपास उमड़-घुमड़ रही कविता ने..., जैसे मेरा हाथ थाम कर ये 'बेवजह' सा कुछ लिखवा दिया...!

खुद के समीप
और दुविधाओं से दूर-
है ऐसा भला क्या कोई स्थल
इस जहान में?
जहां संभव हो सके
इस स्थिति की अनुभूति...

अगर है कहीं, तो
हमें एक बार
जाना है वहाँ...
उन्मुक्त
मुस्कुराता
जीवन है जहाँ...

महसूस करनी है
वो शांति...
जो अपने निकट होने से
सृजित होती है,
चिंतन-मनन-प्रण
सब चल रहा है...
देखें, कब ये दुर्लभ बात
घटित होती है!

ख़ुशी थोड़ी कम है...!

बहुत सारा दर्द
बिखरा है ज़माने में,
ख़ुशी थोड़ी कम है...
सूखेपन से
जगह-जगह दरक गयी है धरती,
आँख कुछ नम है...

ऐसे में
बारिश की तस्वीर बना कर,
मन बस बहल जाता है...
कविता का अंतस
कोमलता लिखते हुए,
कई बार दहल जाता है...

अपने फूल से
बिछड़ी हुई कोई पंखुड़ी,
कुछ करुण सा गा देती है...
वहीँ से लेखनी
कोई तान चुन कर,
आपको सुना देती है...

हमारे सन्नाटों में
गूंजती है लगातार जो धुन,
मुखरित उसमे गम है...
बहुत सारा दर्द
बिखरा है ज़माने,
ख़ुशी थोड़ी कम है...!

स्मित मुस्कान लिए मुरझा जाना... यही तो चमत्कार है!

समृद्ध हो शब्दों की दुनिया
उन्हें बुनने का हुनर भी हो
मगर न हो कथ्य
तो सब बेकार है...
धारा का क्या? वो तो बीच में बहती है...
न इस पार... न उस पार है!

कहने को कुछ खरा हो तो
शब्दावलियाँ स्वयं चली आती हैं
भाव कर लेते हैं भाषा का आवाहन
भावों का शब्दों पर अधिकार है...
लेखनी का क्या? वो तो कहती रहती है...
कभी नीली... तो कभी काली उसकी धार है!

देखो, उनका हाव भाव ही
लिख जाता है स्वर्ण कलम से हवाओं में
खुशबू का काव्य
फूलों का अद्भुत संसार है...
मिट जाने का क्या? वादियाँ हर पल खुश रहती है...
स्मित मुस्कान लिए मुरझा जाना... यही तो चमत्कार है!

उनके पास सच्चे सन्देश हैं
खरा है उनका वक्तव्य
पढ़िए उन्हें... भाषा भी बड़ी ग्राह्य है उनकी
प्रकृति हमारी संवेदनाओं का ही विस्तार है...
व्यस्तताओं का क्या? वह तो आजीवन बनी रहती है...
जीवन की भागमभाग में... कहाँ कोई एतवार है!

लिख रहे हैं शब्द
और गुन रहे हैं अर्थ
जो खो जाती यूँ ही कहीं, वो छवि-
मन के किसी कोने में अब साकार है...
कविता का क्या? वो तो चलती रहती है...
कभी वह मुट्ठी भर रेत... तो कभी पर्वताकार है!

कब टूटेगी वो कारा?

बहना उसका धर्म है
बहता है पानी

बहती धारा ने सुनी जब
ठहराव की कहानी-
तो विचलित मन से मुड़ गयी
परिवर्तन की लहर आ रही थी
धारा सहर्ष उससे जुड़ गयी

अब बहते हुए वो कष्ट, कंटक, रोड़े
सब साफ़ करती है
सहनशील है...
हर बार हमें माफ़ करती है

अचल खड़े पर्वत के पाँव पखारते हुए
धारा सन्देश दे जाती है
सुविधानुसार ढ़लने वालों को
अटल अचल सिद्धांतों की याद दिलाती है

बहता पानी
अपना धर्म निभाता है
कुछ भी हो जाए पर्वत अपने स्वभाव के अनुरूप
अटल खड़ा रह जाता है

सिद्धांततः
जिसकी जैसी प्रकृति उसका वैसा कर्म...
मानव हो कर भी
क्यूँ नहीं निभ पाता फिर हमसे मानव धर्म?

बहते हुए
यह बड़ा प्रश्न छोड़ गयी है धारा
आत्मा जिसमें बंदी है...
कब टूटेगी वो कारा?

खाली जगह

जब मन
खाली खाली होता है
तो यादों से भर जाता है
जब भी
ज़रा सा अवकाश देती है ज़िन्दगी
कितना कुछ बीता हुआ याद आता है

लगता है ऐसा...
मानों जो पात्र लबालब भरे हुए हैं
उन्हें कुछ खाली होना चाहिए
कुछ यादों की तरलता भी हो वहाँ
और कुछ आँखों का पानी होना चाहिए

जिससे और कुछ हो हो
इतना तो होगा ही-
नमी बनी रहेगी
भरे होने पर भी जो रीतापन है पात्रों में
उसे यादों की कुछ एक बूँद ही भर देगी

यादें जिंदा रहे तो
रीते वर्तमान को
भविष्य की कड़ियाँ मिल जाती हैं
'आज' भी तो 'कल' मात्र याद बन कर रह जाएगा-
ये महसूसते ही 'आज' को जीने की तमन्ना
राहों में कलियाँ बन कर खिल जाती हैं

यादों...
जब भी देखना उदास हैं हम
आना और पल पल महका जाना...
पेड़ों की चोटियों पर खिले फूलों ने
जो छतरी का सा आकार ले लिया है
उनका रंग कुछ और दहका जाना...

आँखों को नहीं दूसरा संसार चाहिए!

एक टुकड़ा आसमान का
और गोद भर धरती-
जिसपर सर टिकाये
टकटकी लगाये...
देखते रहें दृश्य विहंगम
नीले अम्बर और खारे सागर का संगम
ऐसा अवकाश... ऐसी घड़ियाँ हर बार चाहिए
आँखों
को नहीं दूसरा संसार चाहिए

ये दृष्टि...
ये मिलन...
दूरी के बावजूद
मिल रहे बिन अड़चन...
इस सुन्दर संयोग का
जगत में विस्तार चाहिए
आँखों को नहीं दूसरा संसार चाहिए

जो जीने के लिए ज़रूरी हैं...
उन भ्रमों का
बने रहना ही श्रेयस्कर है,
विश्वास रहे, बीज उगेंगे अपने समय पर
उन्हें बस थोड़ी सी जगह
औ' थोड़ा सा प्यार चाहिए
आँखों को नहीं दूसरा संसार चाहिए

सारी बातें
बड़ी भली हैं...
पर, जो जीवन को अर्थ दे
वो दुर्लभ सार चाहिए
आँखों को नहीं दूसरा संसार चाहिए!

उनके पास गीत है...!

उनके पास गीत है
वे गाते हैं...,
पंछी
सारा आकाश
नाप आते हैं

हमारे पास
मुट्ठी भर दाने हैं,
वही...
बस वही हम
लुटाते हैं

इससे पहले कि
ख़ाली हथेलियाँ हमारी शर्मिंदा हों,
चुग कर कुछ मोती...
झट से
वे उड़ जाते हैं

उनके पास गीत है
वे गाते हैं....

समझो छाँव की भाषा!

समझ में आती हो तो समझो छाँव की भाषा
मिलेगी वहीँ कहीं सुस्ताती धूप की परिभाषा
जो बिना हार माने चलते ही जाते हैं राहों में
उनके नयनों में है चमकती जीवन की आशा

जी सको तो जी लो दुःख के सकल आयाम
वहीँ कहीं मिलेगा तुम्हें सुख का भी सामान
सब कुछ यहीं धरा है, क्या स्वर्ग क्या नरक
धरती पर ही हैं स्थित ये दोनों कल्पित धाम

लिखना जो वश में हो तो लिख जाओ शाम
हो एक प्यार भरा ख़त ज़िन्दगी के भी नाम
जितने भी शब्द थे, वो सब तो खर्च कर डाले
ग़र पहुँच सके तो पहुँचे अब मौन ही पैगाम

हो पाए तो लिपिबद्ध करो नगमें और तराने
दिए की तरह निकल पड़ो अंधकार को हराने
जो हार गए हैं जीवन से, बताओ स्पष्ट उन्हें
हर हालात में जीते जाने के हैं सहस्त्रों बहाने

पढ़ना हो तो किताबों संग चेहरे भी पढ़ा करो
अपने आसपास से ज़रा तो सहर्ष जुड़ा करो
मिलेगी कितनी ही निगाहें, तुम्हें तकती हुईं
दे सको सहारा तो भागते हुए थोड़ा मुड़ा करो

मन के भंवर में है उठती कितनी ही जिज्ञासा
इस दुनिया के सब रंग कहाँ समझ ही आते हैं
समझ में आती हो तो समझो छाँव की भाषा
मिलेगी वहीँ कहीं सुस्ताती धूप की परिभाषा

आशान्वित है धरा!

जो हुआ अवतरित
हरापन...
कब क्यूँ कैसे?
घोषित हो गया मरा!
धुरी पे घूमते हुए
विचारमग्न,
कुछ कुछ चिंतित
हो उठी धरा!

हम पर ही
आस लगाये हुए है,
कातर नयनों से
एकटक ताक रही है...
वो सहनशील धरणी
माँ है हमारी
हमारे मन के भीतर
झाँक रही है...

क्षीण संकल्पों के दौर में भी
नहीं उदासीन वह,
हरापन भले नहीं आँचल में
पर घाव तो है न हरा!
मरहम भी बन कर आएगा
कोई पूण्य संकल्प...
शत-प्रतिशत
आशान्वित है धरा!

कुछ भला लगे, तो...!

कुछ शब्द बिखरने थे...
बिखर गए,
बस इस बिखराव में
अर्थ जोड़ कर पढ़ लेना...
कुछ भला लगे, तो...
स्मृतियों में मढ़ लेना!

लिखते हैं आस-विश्वाश ही
कई सन्दर्भों से जोड़ कर,
क्या कहा...?
दोहराव है...,
हो भी क्यूँ न!
हर अभिव्यक्ति में तुम
अपने अंश पकड़ लेना...
कुछ भला लगे, तो...
स्मृतियों में मढ़ लेना!

अनुभूति का नन्हा सा
आकाश है,
मेरे आसपास
लगभग नज़रंदाज़ किये जाने भर
प्रकाश है...,
इनमें कुछ अपने गुने
सारतत्व जड़ देना...
कुछ भला लगे, तो...
स्मृतियों में मढ़ लेना!

कुछ घड़ी ठहरना था...
मेरे दर पर ठहर गए,
बस अगले पड़ाव पर इन भावों संग
कुछ एक चढ़ाईयां तुम भी चढ़ लेना...
कुछ भला लगे, तो...
स्मृतियों में मढ़ लेना!

यूँ ही लहरों का आना-जाना थाहते हैं...!

उड़ते-उड़ते
भला सा झोंका कोई,
मन में
भीतर पैठ गया,
भावों का समंदर
लहराया...
फिर, जाने क्यूँ?
किनारे बैठ गया...

वहाँ से
चलते हैं रेत पर
कुछ-एक
कदम,
शब्दों के
माध्यम से...
अभिव्यक्त करते हुए
निज मन,

और...
और, यूँ ही
लहरों का आना-जाना
थाहते हैं...
ज़िन्दगी!
तू क्या जाने,
हम तुझे कितना चाहते हैं!

कविता हूँ... यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती!

मन की गांठे खोल कर
थोड़ा
सा झुकना होगा,
अक्षरों को सहेज कर
उठाने के लिए...

समय
की आंच में
थोड़ा सा पकना होगा,
बहना होगा निर्विकार
नदिया कहलाने के लिए...

फिर
मिलूंगी मैं तुम्हें
अक्षर अक्षर में मुस्काती
कविता हूँ...
यूँ
ही कलम की नोक पर नहीं आती!

उबड़-
खाबड़ अनजान
रास्तों पर चलना होगा,
उठाने होंगे ठोस कदम
आगे राह बनाने के लिए...

अमिट
अनाम सा दर्द
सहजता से सहना होगा,
उठाने होंगे गम सभी
खुशियों का गाँव बसाने के लिए...

फिर मिलूंगी मैं तुम्हें
अक्षर अक्षर में मुस्काती
कविता हूँ...
यूँ
ही कलम की नोक पर नहीं आती!

भूली बिसरी यादों की गलियों को
छू कर गुजरना होगा,
मृत्युतुल्य कष्ट उठाने होंगे
साथ जीवन का पाने के लिए...

कोटि-कोटि नयनों के आंसू चुनते
कभी नहीं थकना होगा,
कुछ सच्चे सुन्दर ख़्वाब सजाने होंगे
और जुट जाना होगा उन्हें बचाने के लिए...

फिर मिलूंगी मैं तुम्हें
अक्षर अक्षर में मुस्काती
कविता हूँ...
यूँ
ही कलम की नोक पर नहीं आती!

क्षितिज के पार!

हम करते हैं मानवीयकरण प्रकृति का
और कहलवाते हैं
किसी पंछी या फिर कल-कल बहती नदिया से
अपनी वेदना...
अपनी संवेदना

क्या कभी सोचा है हमने?
हमारे मन की वाणी बन कर
क्या सोचता होगा उनका मन
हमारी कथा बांच कर कैसा लगता होगा उन्हें...
क्या होता होगा कोई स्पंदन

जब धरती और अम्बर के क्षितिज पर मिलने के भ्रम को
अपनी अपनी तरह से व्याख्यायित करते हैं हम
तो क्या नहीं मुस्कुराते होंगे धरा और गगन
कि, देखो तो-
कितना सयाना है... हमारे बहाने अपनी बात कहता है
कवि कहाँ-कहाँ क्या-क्या टटोलता रहता है!

क्या पता तब हाथों में हाथ डाले
उसी क्षितिज पर धरती अम्बर टहलते हों
बांटते हो अपने-अपने किस्से और फिर
अपनी-अपनी राह निकलते हों

कौन जाने...
चाँद तारों से पटा अम्बर
हममें तारों की टिमटिमाहट और तेज ढूंढ़ता हो...
और जब देख लेता हो
हमारे आपके रूप में टंके अनगिन ध्रुवतारे धरती पर
तो भावविभोर हो हर्षातिरेक में आँखें अपनी मूंदता हो...

क्या पता
धरती अम्बर फिर आपस में बतियाते हों
अपने आँचल में टंके ध्रुवतारों से गर्वान्वित हो
धरती के सारे घाव बिसर जाते हों

हो न हो... होता होगा कुछ ऐसा ही
तभी तो प्रलय नहीं हुआ
और अब तक हम ज़िन्दा हैं!
भले ही
हंस लेने के बहाने
अब चुनिन्दा हैं!

अब भी देखो,
धरती गगन के बहाने अपना ही मन गा रही है
हममें आपमें सांस ले रही महान संभावनाओं के प्रति
लेखनी श्रद्धानत हुई जा रही है
और इस दृश्य में शामिल नेपथ्य में खड़ी कविता
बस मंद मंद मुस्कुरा रही है!

टेढ़े-मेढ़े रास्ते ओर एक सीधा सा सच!

रास्ते टेढ़े-मेढ़े हैं जैसे
ठीक वैसे ही टेढ़ी हैं टहनियां
टेढ़े-मेढ़े हैं ज़िन्दगी के हाव-भाव
टेढ़ा ही तो होता है अधिकतर
आसमान पर टंकने वाला चाँद

सीधी सरल नहीं है ऊँचाई की ओर जाती सीढ़ियाँ
सहज नहीं है ज़मीन पर चलना
टेढ़ा-मेढ़ा है नदियों का बहना
और ज्यादातर पानी से झांकते अपने प्रतिविम्ब में भी
टेढ़ा ही मुस्कुराता है चाँद

टेढ़ेपन की इस होड़ में
क्यूँ पीछे रहता इंसान?
सहजता को खूंटियों पे टांग
उसने भी थाम ली
टेढ़ेपन की कमान!!!

अब कविता पुकारती फिरती है
लिए हथेली पर जान...
क्यूँ दौड़ में पीछे रह गयी सहजता...,
क्यूँ मिला उसे
पागलपन का नाम???

टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता हो भले ही
पर कम से कम हो एक सीधे से सच का भान-
सहज ही तो मिला था जीवन...,
तो क्यूँ न आजीवन सहेजा जाए
सहजता का वरदान!!!

उदास नहीं हूँ मैं...!

उदास नहीं हूँ मैं
लेकिन, फिर भी...
आसपास है बिखरा हुआ
सूनापन

सामान्य सी भाषा में
शायद कहते हैं इसे ही-
जाना पहचाना सा...
बेगानापन

भूल गयी कोई याद का
धीरे से दस्तक देना और फिर-
लिए हुए फिरना
रिक्त बेचैन मन

टूटे-बिखरे शब्दों को
कविता कहने की भूल करना और
यूँ ही भूले से कह देना उसे
निर्मम जीवन

ये कैसे हो जाता है?
बांधना चाहते हैं कुछ और,
हो आती है कोई और ही बात
स्मरण

यहाँ वहाँ आड़ी-तिरछी
खींची लकीरें कितनी सारी,
कोई नहीं बदल पाया
रास्ते का समीकरण

रास्तों को पता है, किस मोड़ पर चौराहे हैं
कहाँ से दो राह जाती है, और
कहाँ से जुदा हो जाता है
शरीर से अंतर्मन

उदास नहीं हूँ मैं
लेकिन, फिर भी...
आसपास है बिखरा हुआ
सूनापन

जाने कहाँ रो रही है प्रकृति बूंदों में आंसू
जाने कौन से देश खिल रही है वो वेदना बनकर
जाने कहाँ से आ रहा है
यह कातर क्रंदन!

इस क्रंदन के बीच, कुछ तरल से भाव
मद्धम मद्धम ही सही, पर बह रहे हैं...
अभी-अभी कानों में कह गया
गुनगुनाता पवन

हम सबके हृदय की पीर बह कर
पखारने को पाँव उद्यत खड़ी है राहों में
अब तो हो संवेदनाओं का
पूण्य आगमन

फिर, खिल उठेगा ये कुञ्ज सारा
चहकेंगे खग वृन्द
और गूँज उठेगा
सूनापन

परिचय की कोंपले फूटेंगी
नहीं रहेगा किसी डाल पर
वो जाना पहचाना सा...
बेगानापन...!

करती रहती है...
कर रही है आश्वस्त कविता, पर
अपनी जीत के प्रति आश्वस्त होगा कभी
क्या उसका भी उद्यम?

कुछ कारण होगा...!

कुछ भी अकारण नहीं होता...
कोई सूक्ष्म सी डोर हाथ आने वाली होती है
कुछ अप्रत्याशित सा घटित होने वाला होता है
कोई पृष्ठभूमि तैयार हो रही होती है
इस बेकल मन के आँगन में...

अब यूँ ही तो अकस्मात बादलों का बरसना नहीं होता
कुछ भी अकारण नहीं होता...!

बीज रूप में वह धरती की गोद में है सोता...
संभावनाओं की धूप में छाँव का प्रस्फुटन
प्रलयी माहौल में सहज जीवन का अंकुरण
झुक जाते हों जहां स्वतः ही प्रार्थना में नयन
दिव्य से प्रांगन में...

उग आती है मखमली घास भले इन्हें कोई नहीं बोता
कुछ भी अकारण नहीं होता...!

कुछ भी अकारण नहीं होता...
न दुःख का आना न सुख का जाना
न फूलों का खिलना और न ही उनका मुरझाना
मिलना भी सकारण है और वैसे ही है बिछड़ना
इस विराट विश्व के आँगन में...

अब यूँ ही तो कोई पल दर पल हर पल को नहीं खोता
कुछ भी अकारण नहीं होता...!

हे ईश्वर!

आज एक पुरानी कविता मिल गयी... करीब बारह साल पहले लिखी हुई...; जाने किस मनोदशा में लिखा था यह सब... अखब़ार में छपी दिल दहलाने वाली ख़बरों से प्रभावित हो कर शायद...! आज देखते हैं तो लगता है... इतनी ही बुरी होती दुनिया तो अब तक समाप्त न हो गयी होती...
हैं मुट्ठी भर किरणें... हैं मुट्ठी भर लोग... जिनके प्रताप से चल रही है दुनिया और ईश्वर भी निश्चिंत है... क्यूंकि वह जानता है एक बूँद अच्छाई सागर भर बुराई पर शर्तिया विजय पा लेगी!

हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

चौपायों
में तो सिर्फ पशुता है,
दोपाये आसुरी हैं...

हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

बेचैन
हृदय...
श्रीहीन सी अन्तःपुरी है...

हे
ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

मृत्यु
की सी कातरता
इंसानियत के सामने मुँह बाये खड़ी है...

हे
ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

लुटता
हुआ इंसान और लूटने वाला भी इंसान-
ये कैसी विडम्बना सम्मुख आन पड़ी है...

हे
ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

मानवता की शवयात्रा में
मूक दर्शक बन क्यूँ ये भीड़ खड़ी है...

हे
ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...

*

हे
ईश्वर!
इतना विवेकशील बनाया इंसानों को,
फिर क्यूँ हमारा हमराह
स्वयं हरि है?
घटनाक्रम क्यूँ लिखवा रहा है चेतना से
कि... तेरी दुनिया बहुत बुरी है?

आदि
मध्य अंत... ये कैसी धुरी है!

अस्तित्व का भान!

मेरी कवितायेँ शीर्षक विहीन हुआ करती थीं... यूँ ही लिखते थे और कोई शीर्षक नहीं ढूंढ़ पाते थे... किसी शीर्षक की परिधि में भाव को बाँधने का अनुशाषण सीखना मेरे शब्दों के लिए सरल नहीं रहा है... एक बार एक शीर्षक मिला था नाता उसपर लिखी थी कविता... पहले भी यहाँ उसके विषय में लिख चुके हैं... एक और शीर्षक मिला था अलविदा उस पर भी कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं, अब इधर जब 'अस्तित्व' पर लिखने की बात आई तो 'नाता' और 'अलविदा' कविता याद हो आये... विश्वास नहीं था कि कुछ लिख पाएंगे क्यूंकि मेरे लिए लिखना बस ऐसे ही होता है बिना सोचे समझे.... अब ये मीता जी की प्रेरणा ही रही कि एक सुबह यह कविता 'अस्तित्व का भान' अस्तित्व में आ गयी! धन्यवाद चिरंतन, अपने अंक में मेरी कविता को स्थान देने के लिए...

झूठी इस दुनिया में
सत्य का अस्तित्व कहाँ है?
ये तलाशने को भटके मन
खामोश ताके ऊपर से नील गगन

सुबह से रात हो गयी
उलझनें कितनी साथ हो गयीं
फिर चाँद का मन पिघल गया
वह तुरंत बादलों से निकल गया

साथ चलते हुए कहता रहा
संग संग मानसिक हलचलों को झेलता रहा
अस्तित्व के प्रश्न पर मौन हो गया
एक रौशनी खिली और भटकाव सारा गौण हो गया

कहने लगा चाँद-

अंधकार का अस्तित्व है जबतक
रौशनी की पूजा है तबतक
झूठ जब तक हर मोड़ पर खड़ा है
सत्य वहीँ जीतने के लिए अड़ा है

मृत्यु जब तक मुस्कुरा रही है
जीवन की कलियाँ तब तक खिलखिला रही हैं
उदासी का आलम है जबतक
खुशियों का अस्तित्व है वहीँ कहीं तबतक

कोई अकेला नहीं आया है
प्रभु ने सबको जोड़ों में बनाया है
बारी बारी से सब हमारे जीवन में आते हैं
अस्तित्व में आता है जीवन तो मौत को भी हम एक दिन अपनाते हैं

अब देखो न, मेरी चांदनी का अस्तित्व सूरज से है
उधार की रौशनी से चमकता हूँ
लेकिन दिवस भर जो नहीं कर पाया सूरज
उसी की रौशनी से उसका ही काम करता हूँ-
दर्द तुम्हारे हरता हूँ
नीरव रात्रि में बातें तुमसे करता हूँ
तर्क सारे रखकर मौन हो जाता हूँ
यहाँ बात मेरी नहीं तुम्हारी है, मैं गौण हो जाता हूँ

अस्तित्व का प्रश्न है
तो मन ही मन गुनता हूँ
धड़कनें तेरे हृदय की
साफ़ साफ़ सुनता हूँ

सुन! ध्यान धर
और इस बात का सम्मान कर
कि तेरा अस्तित्व ही प्रमाण है
जीवन झूठा नहीं वह सत्य का संधान है
अंतिम छोर पर मृत्यु की गोद है
जीवन की इन टेढ़ी मेढ़ी राहों पर ही कहीं मुक्ति का बोध है

चल, कि उसे तलाशना है तुझे
अपने 'अस्तित्व का भान' तराशना है तुझे
इतना कहते ही खिल उठा चाँद का मन
आ गए थे दिनमान अब खामोश नहीं था गगन!

बर्फ़ीली बारिश को देखते हुए...!

आज मौसम ही ऐसा है, अभी अभी सूरज देवता झांके खिड़की से... उन्हें प्रणाम किया और कुछ कार्य में व्यस्त हो गए... तीन दिन की छुट्टी के बाद आज पुनः वही भागदौड़ वाली दिनचर्या... इसी सब में उलझे थे कि देखा बर्फ़ गिर रही है... इतनी जल्दी कहीं बदलता है आसमान का परिदृश्य... सूर्य देव गायब और हर तरफ उजला उजला... फिर वही बर्फ़ की चादर ओढ़े धरा!
मन का मौसम भी तो ऐसा ही होता है न... पल पल बदलता हुआ; ये कविता बस यूँ ही मन के मौसम से बाहरी वातावरण को जोड़ती हुई...

चले जाने के बाद लौट आया है
बर्फ़ के गिरते फाहों की शक्ल में
आसमान का रुदन

हो जाएगा
कुछ ही क्षणों में श्वेत
धरा का आँगन

मानों अपने आँचल में उसके सारे आंसू समेट
उसी एक रंग में रंगकर
निभा रही हो धरा कोई नेह भरा बंधन

मन कल्पना करने को स्वतंत्र है
लेकिन कोई और रूपक नहीं मिलता हमें इस बर्फ़ीली बारिश के लिए
इसे बस कह दे रहे हैं हम धरा-गगन का सम्मिलित क्रंदन

सूरज झाँका था सुबह सवेरे
हमारे मंत्रोच्चार के साथ ही लौट गया दबे क़दमों से
उसे शायद पता था आज आसमान का है रोने का मन

अब सभी ओर सफ़ेद ही सफ़ेद है
गिरते बर्फीले लफ्ज़ भी और तनहा ज़मीन भी
लालिमा से युक्त नहीं है अभी नभ फूल या चमन

ये आंसू हो न हो श्वेत ही होते होंगे
रंग से न भले ही पर स्वभाव से तो ज़रूर
निभा लेते है अकेले ही सातों रंगों का वचन

खिली खिली सी लगे चांदनी
दिख पाए अपनी समग्रता में सूरज की किरणें
वो दृष्टि दे जाता है रूदन!

हर 'है' को एक दिन 'था' हो जाना है...!

चलती जाती थी अंतहीन राहें
जीवन चलता जाता था
ये कैसी अद्भुत बात है
कभी स्वर... तो कभी मौन हमें रुलाता था!

एक ऐसा भी समय हुआ इस धरा पर
जब 'कथनी' का 'करनी' से नाता था
दिखती थी जितनी उज्जवल तस्वीर
अन्दर भी उतना ही तेज जगमगाता था!

हर 'है' को एक दिन 'था' हो जाना है
इस सच को स्वीकार अम्बर में बादल छाता था
'है' का अस्तित्व साकार करने को
तत्क्षण वह बरस जाता था!

भले दिन गुज़र गए भले ही
स्मृति में सबकुछ पूर्ववत मुस्काता था
ये 'आज' ही जाने कैसे हावी हो गयी निराशा...
कल तक चाहते थे और सौन्दर्य अवतरित हो जाता था

होगी फिर से शुरुआत अवश्य, आखिर जानते ही हैं
यहाँ झूठ हर क्षण भरमाता है.... भरमाता था
नयी रीत नहीं है... पुरानी प्रीत है यह
जीवन अब भी वैसे ही रुलाता है... कल जैसे रुलाता था!

खिली धूप के बाद की उदासी...!

क्यूँ होते हैं लोग ऐसे... दुनिया इतनी बुरी क्यूँ है... हम किसी के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करते तो कोई क्यूँ बेवजह हमें कष्ट पहुंचता है... ये ऐसे सवाल हैं जो ज़िन्दगी हमेशा दागती रहती है! अभी कुछ ही दिन पूर्व बहुत सारी बेवजह की समस्यायों से मन व्यथित था, आज भी व्यथित है. ये सोच रहे हैं कि लोगों में इतनी हिम्मत क्यूँ नहीं कि जो कहना है वो सामने आकर कह सकें, बेतुके अनाम कमेंट्स करना ओछी मानसिकता नहीं तो और क्या है...? ये मेरी जगह है, यहाँ मैं कुछ एक सुकून के पल बिताती हूँ... 'अनुशील' पर होना मेरे लिए ऐसे कई प्रियजनों के संग होना है जो मुझे मेरी लेखनी की वजह से आज तक याद रखे हुए हैं... ये उन दोस्तों के लिए है जो कमेन्ट तो नहीं करते पर वे जब भी आते हैं यहाँ तो उनकी आहट महसूस हो जाती है मुझे...! यहाँ पर आकर अगर कोई अनामी असंगत टिपण्णी कर के जाता है तो मैं ही नहीं मेरे मित्र भी आहत होते हैं... ऐसी ही कुछ अनाम असंगतियों को रोकने के लिए comment moderation लागू किया! लेकिन, समस्याएं और व्यथित करने वाले तत्व पीछा छोड़ने वाले थोड़े ही न हैं... शायद दोष मेरा ही है... अगर ऐसा नहीं होता तो एक के बाद एक विचलित करने वाली बातें मुझ छोटी सी जान के साथ ही क्यूँ घटित होती और वो भी बिना किसी अंतराल के... एक के बाद एक!
*****
कल बड़े प्यार से एक बेहद प्यारी लड़की के लिए यूँ ही कुछ लिखा था... मन के किन्हीं तहों में खिलखिलाती हुई वह खुद कुछ लिख गयी थी... अशेष मुस्कानें, जिसे मैंने शब्द मात्र दिया था... सब अच्छा था, खुश थी मैं... अपनी व्यस्तताओं के बीच मुस्कुराने का अवकाश पाकर बहुत दिनों के बाद ज़रा सी व्यवस्थित थी मैं!
ऐसा नहीं है कि ऐसी कोई बड़ी विपत्ति आ गयी हो लेकिन मैं कद-काठी और शरीर से ही नहीं, मन-मिजाज़ और बुद्धि से भी बहुत छोटी हूँ... कृशकाय हूँ... बहुत जल्दी विचलित हो जाती हूँ. अगर बात मेरी होती तो रो-धो कर समाप्त कर देती, अपने मन को समझा देती, लेकिन यहाँ बात उसकी थी जिसे मैंने बड़े प्यार से कुछ एक शब्द भेंट किये थे और टिपण्णी करने वाले एक महानुभाव ने आकर सीधे सीधे उसके शिष्टाचार पर ही प्रश्न कर दिया...!
क्या कहूँ? कमेन्ट का आदान प्रदान अगर शिष्ट होने की शर्त है तो मैं भी अशिष्ट हूँ... क्यूंकि मैं भी हर जगह कमेन्ट के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं कर पाती हूँ... लेकिन ये शर्त मुझे हास्यास्पद लगती है.... और जहां तक पूजा का सवाल है उसकी शिष्टता पर शायद ही किसी को संदेह होगा... छह वर्षों से लगातार लिख रहीं हैं वे... मीडिया से जुड़ी हैं तो ब्लॉगिंग शिष्टाचार और अन्य पहलुओं से परिचित हैं ही...
अपनी राय रखने का हक सबको है लेकिन समय स्थान और स्थिति भी कोई चीज़ होती है... यह भी तो एक शिष्टाचार है! उम्र, अनुभव और ज्ञान में सभी मुझसे बहुत बड़े हैं... ये सब कहना मुझे अपनी अशिष्टता ही लग रही है लेकिन यह कहे बिना रहना भी मेरे लिए संभव नहीं...
मुझे पता है, पूजा अनुभवी है... आहत हुई भी होगी पिछली पोस्ट पर किये गए किसी के कमेन्ट और बेबुनियाद इलज़ाम से तो मुझे क्षमा कर देगी!

लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि सी!

एक भोली भाली भली सी... प्यारी सी लड़की... अपनी खिलखिलाहट से अँधेरा रौशन कर देने वाली लड़की... अपनी उदासी से हवाओं को भी उदासी का ही कोई नगमा डूब कर गाने को प्रेरित कर देने वाली लड़की... अपने विशुद्ध पागलपन में कुछ कुछ मेरे जैसी लेकिन अपनी विशिष्टताओं में केवल और केवल अपने जैसी, अकेली और अनूठी लड़की... कलम से हर बार चमत्कृत कर देने वाली रचनात्मकता का प्रतिबिम्ब- मेरे लिए यही तो है न परिचय लहरें वाली पूजा का!
बहुत दिनों से इस प्यारी सी लड़की के लिए बहुत कुछ लिखने का मन था... लेकिन जो हम करना चाहते हैं जो हम कहना चाहते हैं वह हमेशा हो ऐसा संभव तो नहीं... पता नहीं आज भी लिख जाएगा वह कुछ या नहीं या लिख भी गया तो प्रेषित हो पायेगा या नहीं...
एक दिन यूँ ही ढ़ेर सारी उदासी घेरे हुए थी... कोई ऐसा नहीं था जिससे बात की जाए... जिसके पास बस यूँ ही फ़ोन घुमा दिया जाए तभी कहीं से एक हवा के झोंके सी वह आई और परिचय का गहरा रंग लगाती हुई उड़ गयी...! तारीख़ भी कुछ ऐसी ही थी... कभी कभार आने वाली... २९ फ़रवरी! लेकिन उस दिन पहली बार बात करते हुए ही ये एहसास पक्का हो गया कि ये रंग अब हमेशा रहेगा मेरे जीवन में! लहरें आती जाती ये सुदूर तट अवश्य छूती रहेंगी और प्रतिविम्ब सा कुछ कुछ हर बार किनारों को लौटते हुए देती जायेंगी!
बहुत सारी यहाँ वहाँ की बातों के बीच उसकी खनकती हुई आवाज़ मेरी निधि बन गयी और एक प्यारी सी दोस्त से पुराना सा परिचय जान पड़ा भले बात पहली बार हुई हो...! कुछ एक परिचय ऐसे ही होते हैं, उनका होना ऐसा होता है जैसे नीरव अन्धकार में चमकता एक ध्रुवतारा! रिश्ते, भाव और एहसासों का आकाश ऐसा ही होता है... कल्पना सा सुन्दर पर यथार्थ की ठोस ज़मीन पर कड़ी
धूप में खिलखिलाता हुआ भी... तभी तो इनसे बड़ा सत्य कुछ और नहीं होता!
बात करते हुए ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार बात कर रहे हैं...
पूजा, देखना कहीं किसी दिन ढ़ेर सारी डार्क चोक्लेट्स के साथ तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक देने न पहुँच जायें... जितनी दूर हैं ऐसा संभव तो नहीं जान पड़ता लेकिन कौन जाने सच भी हो जाए... आखिर संभावनाओं का नाम ही तो जीवन है!

मिलते ही लगा, कि
अपनी है
जीवन इसकी आखों में
अर्थ नया पाता है!
'लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि'
देख इसे
शब्द स्वयं
संवर जाता है!!

काश!

कहीं
किसी
भाषा में
कोई तो शब्द ऐसा होता
जो यहाँ के भाव
जस का तस
वहाँ तक पहुंचा देता
पर ये खेद की बात है,
ऐसा होता नहीं है...

शब्दों
की अपनी सीमाएं हैं...
अपने बंधन हैं...
और जब यूँ चलते हैं शब्द
एक स्थान से अपने गंतव्य की ओर
तो मार्ग में
और भी अन्य ध्वनियाँ
साथ हो लेती हैं,
या कभी कभी
ऐसा भी होता है-
कुछ ध्वनियाँ छिटक जाती हैं
मूल शब्द से;
अपनी समग्रता में तो शब्द
नहीं ही पहुँचते हैं
मंजिल तक!

सम्प्रेषण
की सारी समस्याएं
और इन समस्यायों से
जन्म लेने वाली
अन्य भिन्न समस्याएं...
जाने
क्या
उपचार है इसका?

शब्द
अपना काम करें,
पर शब्द और भाषा से परे भी
एक ज़मीन हो...
जहाँ मौन में बात हो जाए...
आपसी समझ और सहजता की वह निधि हो
जो हर कठिन परिस्थिति में
समाधान लेकर अवतरित हो पाए...
काश!

कंठ क्यूँ अवरुद्ध है...!

अणु अणु संबद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

उच्चरित होते ही
प्राण सहित
अस्तित्व में आ जाता है शब्द
इसलिए जब बोलें,
तो सोच समझ कर बोलें!
दे जब भी
अवसर
ये भागती हुई ज़िन्दगी
तब बिना एक भी पल गवाएं
मन की गांठें खोलें!

कंठ क्यूँ अवरुद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

सब नाज़ुक से तार हैं
टूटन से
इनकार नहीं
टूट जाये, तो
हौसलों को फिर से जोड़ें!
राह में आने वाले
रोड़े पत्थर से
जो आहत हों
तो हृदय कुञ्ज की
विश्वासी कलियों को निचोड़ें!

मिल जायेगा अमिय भाव जो शुद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

वो इत्र
इकठ्ठा हो जायेगा
जो हवाओं को महका देगा
ऐसे में
कुछ विशिष्ट से बीज बोयें!
काँटों और फूलों का
मेल ही तो है
ये दुनिया
इसे विपत्ति मान कर
भला क्यूँ रोयें!

अणु अणु संबद्ध है
संसार में कुछ भी नहीं किसी के विरुद्ध है...

एक गीत सुनते हुए...!

जीवन के कई रंग होते हैं... कई पड़ाव होते हैं, कई मोड़ों से गुजरती है ज़िन्दगी... कभी तेज तो कभी मद्धम और एक ऐसा भी पल आता है जब अध्याय बदलता है. इस जीवन से उस जीवन का फासला पल में तय हो जाता है और मन अटका रह जाता है बीच में कहीं अपना क्षितिज तलाशता हुआ! इस पार से उस पार जाना हमेशा आसान नहीं होता..., कहीं से विदाई ही तो कहीं पर स्वागत का शंखनाद है- लेकिन भावों का संसार इन वाक्यांशों से नहीं बनता... यहाँ तो अश्रुधार है जो बह निकलती है शहनाई की धुन पर...! बचपन के आँगन को छोड़ते हुए यह दर्द सहती आई हैं बेटियां... अपने अंश को विदा करते हुए मात पिता अकथ पीड़ा महसूस करते आये हैं सदा से... और विदा करा कर ले जाने वालों की भी आँखें नम होती आयीं हैं सदा से ही... विदाई की घड़ी होती ही है ऐसी, गंभीरता की प्रतिमूर्ति बने भाई भी सुबकने लगते हैं और यह दृश्य इतना हृदयविदारक होता है कि इसकी कल्पना मात्र से मन विचलित सा होने लगता है.

कितना अजीब है न... पौधे भी अपनी ज़मीन और वातावरण से जुदा कर दिए जाएँ तो मर जाते हैं... गमले में खिलने वाला पौधा, वन में नहीं पनपता और वनफूल गमलों में नहीं खिलते लेकिन बेटियां एक आँगन को छोड़ दूसरे आँगन में कदम रखतीं हैं तो वहीँ की हो जाती हैं... ये सामर्थ्य केवल हमें दिया है प्रभु ने, रीत रिवाज़ जो निबाहने थे उसे सो उसने सारा धैर्य और अकूत सहनशक्ति हमें उपहारस्वरूप दे दी... तभी तो लीला चल रही है उसकी!

इन बातों को लेकर खूब उलझता है मन... सारे नियम भी खूब समझता है मन और ऐसे में नम आँखों से स्मृति का एक धागा पकड़ कर, छूट गए घर के आँगन में, बचपन के कितना ही लम्हे जी आता है. और फिर तो नयी उर्जा के साथ नए वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने का क्रम चलता ही रहता है आजीवन...
ऐसे में अगर 'अब के बरस भेजो भैया को बाबुल' जो कहीं बज रहा हो तो सिर्फ कान ही नहीं रोम रोम सुनता है यह गीत और रुंधे हुए गले से स्वर नहीं निकलते तो आंसू कुछ शब्द के रूप में बह जाते हैं... इन शब्दों को सहेजते हुए हम उन कोटि कोटि नयनों की नमी महसूस कर रहे हैं जो इस दर्द से अनजान नहीं हैं...
पीछे छूट गए बचपन को याद करते हुए अपने आँगन के लिए ललकती... अपने नैहर से सन्देश की राह तकती पथरायी आखों का मर्म बेध डालता है. रिमझिम फुहारों के लिए तड़पती आत्मा का गीत है यह... कैसे न भीगेगी आँखें! 'क्यूँ हुई मैं परायी' का जवाब किसी के पास नहीं यह जानते हुए भी जब स्वर मिलते हैं इस भाव को गीत में तो पूरी कलात्मकता से बिखरी हुई उदासी कुछ और उदास सी लगती है... है न?

ललित भैया, आपका भावुक हृदय अगर इस गीत पर कुछ लिखता तो वह निश्चित ही अनुपम होता... हम तो ऐसे में बस मौन ही साध सकते हैं...! आपकी प्रेरणा से कुछ बूंदें उकेरी हैं... दशमलव पर कभी इस गीत पर एक आलेख अपूर्ण से भावों को पूर्णता प्रदान करेगा इसी आशा के साथ आज अनुशील पर प्रस्तुत हैं मेरे बिखरे से शब्द...!

***

आज (२६. ७. २०१३) इस पन्ने तक आना हुआ पुनः, उन भावों को फिर से जीया…, सबकुछ यथावत याद हो आया… आपकी प्रेरणा से इस पोस्ट का लिखा जाना… उसके बाद आपका भी उसी रोज़ इस गीत के विषय में लिखना… तथ्य और कथ्य दोनों लिहाज़ से समृद्ध आलेख

***

आहटें सुनाई देती हैं… उस आहट का शुक्रिया जिसका यहाँ आना मुझे इतने समय बाद इस पन्ने तक ले आया और दशमलव के उस पन्ने तक भी ले गया जिसका लिंक आज यहाँ भी सहेज ले रहे हैं!

सामीप्य के कुछ मानक भेज रहे हैं...!

आज मेरे छोटे भाई का जन्मदिन है...
उपहारों को चुनते हुए... बुनते हुए... यूँ लिख गयी भावनाएं...
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं, ब्रज वल्लभ :))

बादलों के देश से
खूब सारी किरणें इकट्ठी की
और उन्हें तुम्हारा पता बताया...
बताना तो...
वे तुम तक पहुंची या नहीं?

खिलखिलाते फूलों की मुस्कान से कहा-
वे तेरे चेहरे पर खिल जाए
यह अनुरोध किये बड़ा वक़्त हुआ...
बताना तो...
तेरे मुख पर वह खिली या नहीं?

इतनी दूरी से
सामीप्य के कुछ मानक भेज रहे हैं
यादों की गलियों के पत्थर से हम खेल रहे हैं...
बताना तो...
ये आवाजें तुम तक पहुंची या नहीं?

लम्बी दूरी तय करनी है न
सो बड़े सवेरे ही चल पड़ी थीं यहाँ से
शुभकामनाओं की... आशीषों की नाव
बताना तो...
अब तक पहुंची या नहीं?

'यश', 'कीर्ति' और 'सफलता' से कहा
कि तुम्हारे द्वार जाए
पता है?
एक स्वर में सब क्या बोले...?
'हम रहते हैं वहीँ...'!!!

मेरे सिरहाने एक मुट्ठी रौशनी हर रोज़ पड़ी मिलती है...!

जब मैं रोती हूँ
और, ऐसा अक्सर होता है
तब अलग अलग कारणों से
सभी, या तो समझाते हैं
नाराज़ होते हैं
डांटते हैं
अपनी खीझ ज़ाहिर करते हैं
और फिर यह सब यूँ प्रभावित करता है मुझे, कि-
अपने रोने पर रोना आता है
कोई रंग नहीं भाता है

हाँ! फूल कुम्हला जाते हैं
आँखों की नमी से
धुंधली हो जाती है
आसमानी छटा,
और कई बार तो
आसमान मेरे संग
बेमौसम रोने भी लगता है
हो जाती है बारिश...
बादल का कोई टुकड़ा यूँ ही छाता है
और मेरी ज़मीन पर बरस जाता है

ये
यूँ ही होता होगा
कुछ कुछ भ्रम सा...
लेकिन, सोचो तो!
कितना ज़रूरी है यह एहसास
जिंदा रहने के लिए-
साथ खड़े हो कर
साथ रोने की
सहभागिता भी कोई निभाता है
ईश्वर मेरी ख़ातिर प्रकृति का रूप धर कर आता है

मेरे सिरहाने
एक मुट्ठी रौशनी
हर रोज़ पड़ी मिलती है
ये बात और है, कि
अँधेरा भी खूब सताता है...
चलो कोई बात नहीं,
बाती को जलने से काम
अँधेरा मिटेगा या नहीं
ये निर्णय करने वाला
केवल वही विधाता है!

आती रहना मेरी ओर!

टूटता है कोई सपना
छूटती है कोई डोर
अँधेरा रौशन हो जाता है
फिर खिल आती है भोर

कहीं से छिटक कर कभी
ख़ुशी आ जाती है मेरी ओर
गम का क्या? उनका तो...
न कोई ओर न छोर

सांध्य लालिमा क्षितिज पर
मचाये हुए है शोर
उन्हें महसूसते हो रहे हैं
मन-प्राण भावविभोर

ये प्रकृति...
कितने रंगों को समाये,
आंदोलित किये हुए है
पोर-पोर;
हे प्रकृति! ऐसे ही अपने महात्म्य से
प्रभावित करती रहना...
कभी हम बढ़ेंगे, कभी तुम दो कदम बढ़ाना
आती रहना मेरी ओर!

भक्ति का रंग!

रंगों में रंग जाने का दौर गया
अब कोई किसी रंग में नहीं रंगता
सब ओर दिखावे का बोलबाला है
लेकिन सबको ये रंग नहीं जमता...

सतरंगी सुषमा है बाहर बाहर
अन्दर तो युद्ध ही है ठनता
होलिका का अर्थ तब तक समर्थ नहीं होता
जब तक कोई प्रह्लाद नहीं बनता...

हिरन्यकश्यप का अहंकारी हठ
और होलिका की विशिष्ट क्षमता
नन्हे बालक की भक्ति के आगे बौने हो गए
और जीत गयी प्रभु की ममता...

इस दिव्य सन्देश को आत्मसात कर
भक्ति के पावन रंग में जो मन है रमता
उसे रंगों की शालीनता भावविभोर कर देती है
फिर तो ये उत्सव नहीं कभी थमता...

ये खेल है निराला...!

ढ़ेर सारे रंगों में
एक पक्का रंग है-
उदासी का रंग

इस रंग से
खुशियाँ कब से
लड़ रहीं हैं जंग

और यह है कि
निर्विकार भाव से
सब गुनता रहता है,
विश्वास का एक
पक्का धागा लेकर
जीवन की कड़ियाँ बुनता रहता है...

एक फीकी सी
बुनावट
उभरती है,
खुशियों के भड़कीले सितारे जहां जड़े हुए हैं
उन बिन्दुओं पर
ठहरती है...

और
फिर बढ़ जाती है
आगे,
ये खेल है निराला
और वैसे ही
निराले हैं धागे...

उदासी की
सपाट ज़मीन पर
कुछ रंग बिरंगे फूल खिलें
विपत्तियाँ तो उगी हुई हैं ही
अब कुछ
सहज सरल से विम्ब मिलें

मृत्यु से पहले
सीखें हम
जीने का ढ़ंग

जिस तरह साया चलता है
वैसे ही रहे
जीवित रहते जीवन का संग!

सपने बुनने के बहाने...!

हमने
कुछ पन्ने पलटे यूँ ही...
रंगों की शामें खिल उठीं,
पर बहुत कुछ बुरा भी हुआ
कुछ बादल बरसे
कुछ नज़्में रुठीं!

फिर
धूल झाड़कर सहेजे सपने...
रूठी नज़्मों को धूप दिखाया,
अवांछित सब कुछ
काट छाँट कर
पुनः शब्दों को सजाया!

हाँ, जारी रहा
चोट को भुलाने का असफल उपक्रम...
एक दीया कहीं पर बुझ गया,
खिलने को खिलते रहे पुष्प
पर कष्ट भी अपने चरम पर था
समस्त निराशाओं से मन समय रहते जूझ गया!

बस
इसी बात पर आंसू पोंछे...
कुछ कतरों को सी लिया,
सपने बुनने के बहाने
कुछ चुन बिन कर इकठ्ठा किया
और एक सत्य शाश्वत जी लिया!

सत्य, शिव और सुन्दर!

एक समंदर है
हर इंसान के अंतस्तल में,
उबड़ खाबड़ भूमि है
तो नरमी भी है यहाँ वहाँ समतल में!

बस
किनारे से चलते हुए...
भीतर तक जाना है,
वहीँ जहाँ गहराई है
सत्य और शिव का ठिकाना है!

हम
स्वयं खुद से
दूर रहते हैं आजीवन,
आत्मा से पहचान का
नहीं आता कोई मौसम...

भीड़
में रहकर
भीड़ के हो जाते हैं,
हम चले थे पाने खुद को
पर भंवर में खो जाते हैं!

जितना
चलते हैं धरती पर
सूक्ष्म क़दमों से उतना भीतर चलना है,
आत्मा के द्वार पर दस्तक दे पायें
तब तक गिरना और संभलना है...

यही
हमारी आपकी सबकी
पहचान है,
ईश्वर क्या है? हममें आपमें हम सब में
बसा हुआ भगवान है!

जिस
दिन शरीर में रहकर शरीर से परे
आत्मा स्वयं को मानेंगे हम,
उस दिन मुस्कुराएंगे दिनमान
भाग जाएगा हृदय का तम...

जीव ही शिव है
जीवन ही पूजा है
परिक्रमारत प्रतीत होती
फिर हर डगर!

जिसकी जैसी दृष्टि होगी
वह वैसी दुनिया पायेगा,
आभासी है यह जग
जो जैसा सोचेगा वह वैसा हो जाएगा!

अपनी
दुनिया... अपनी धरती पर
अपने अपने स्वर्ग और नर्क रचते हैं हम,
हृदय कुञ्ज में कोलाहल है
और मन में बसते हैं कितने ही तम!

माटी
की काया में
जबतक है जगमग प्राण,
मन मस्तिष्क में
है चलना यही विधान...

तर्क...
बुद्धि... मस्तिष्क की
और मन की चंचलता-
सबसे श्रेष्ठ... सबसे परे
है हृदय की सरलता

बस
यह प्रतिमान साथ हो
फिर सत्य सारे मूर्त हैं,
जुड़ाव की प्रक्रिया की
पहली यह शर्त है!

मन
बुद्धि प्राण से बना यह शरीर
जिस दिन आत्मा को पहचानेगा...
उस दिन वह
जीवन की महिमा को जानेगा!

और
हो जाएगा
सत्य, शिव और सुन्दर
खोज जिसे रहे हैं बाहर
विधाता ने रख छोड़े हैं वो सारे तत्व हमारे ही अन्दर!

अब तुझसे ज़िरह करे कौन!

मृत्यु की सी नीरवता है
मन बड़ा उदास है,
दूर खड़ा है जीवन
कहीं न कोई आस है...

अकारण ही
आँख बह रही है,
मौन हैं हम, लेकिन
कलम कह रही है...

ये क्या है?
जो हमसे लिखवाता है,
जीवन चलता रहता है
फिर, मन क्यूँ अकारण बैठ जाता है?

इन प्रश्नों के उत्तर में
हमारे पास है बस एक अर्थपूर्ण मौन
जो समझना है समझ ले, ऐ ज़िन्दगी...
अब तुझसे ज़िरह करे कौन!

धन्य वह जिसने शरणागतवत्सल को पहचाना है!

ये ऐसा ही फ़साना है
जीवन खोटा सिक्का है
और उसे हर हाल में चलाना है

हैं यहाँ...

भांति भांति के लोग
भांति भांति के रोग
कलयुगी इस हवा में
निश्चित प्राण जायेंगे सूख

फिर भी गाये जा जो तराना है
जीवन खोटा सिक्का है
और उसे हर हाल में चलाना है

यहाँ पर...

कैसा रिश्ता कैसे नाते
जो आये सबको देखा जाते
धरती के हिस्से में है
जितनी छाया उतनी धूप

बस मन को भरमाना है
जीवन खोटा सिक्का है
और उसे हर हाल में चलाना है

यही हुआ है...

ऊपर का श्रृंगार रहा
रुखा सूखा उद्गार रहा
जीवन ऊपर ऊपर ही बीत गया
दिखा तो केवल बाहरी रूप

कुछ आत्मा से रिश्ता गहराना है
जीवन दुर्लभ प्रसाद है
इसको उसी रूप में अपनाना है

फिर राह ही राह है
धन्य वह जिसने
शरणागतवत्सल को पहचाना है!

ये सत्य भी तह लिया!

कविता के केंद्र में
कभी कोई एक व्यक्ति नहीं होता,
कविता भाव है...
और भाव तो विस्तार का नाम है!
वो और क्षितिज होते हैं
जहां उगती है कविता
उसका
तेजोमय धाम है!

एक के तार से
दूसरे के तार
जुड़ जाते हैं...
इस सदी से उस सदी तक
कविता में रच बस
भाव जीवित रह जाते हैं...

कविता
इतनी दिव्य होती है
कि उसकी सत्संगति का
लाभ मिल जाता है,
लिखने वाला
अपनी पीड़ा लिखने बैठता है और
सार्वभौम पीड़ा का
कोई अक्षर अनायास लिख जाता है!

ऐसे ही
कई सन्दर्भों में
बात ये जांची परखी
सच्ची है,
ये पल क्या जानेगा?
बीतना इसकी नियति
अभी उम्र इसकी
कच्ची है!

जब सफ़ेदी जायेगी
उसके बालों में
और ये पल जब
बीता कल हो जाएगा-
तब जानेगा
शब्दों का रहस्य
और फिर अपनी नासमझी पर
कल ये पल पछतायेगा...

चल समय!
आज तुझसे भी
कुछ ऐसे ही
हँसते रोते कह लिया,
तू बिना विचलित हुए-
कैसे चल देता है अपनी राह?
ये समझने के लिए अभी बहुत चलना है हमें...
ये सत्य भी तह लिया!

पीड़ा में मन मोद मनाए!

ये दुनिया ही ऐसी है
संवेदनशील हों अगर आप
तो कभी
सुखी नहीं रह सकते...
एक दर्द रिसता रहता है भीतर
एक ज्वाला में जलता रहता है मन
एक ऐसी पीर
जो आप किसी से कह नहीं सकते!

अगर प्रवृति जान ली अपनी
तो इसी में चतुर्दिक भलाई है
कि इस दर्द से
यारी कर ली जाए...
नहीं तो समस्यायों का विकराल रूप
सुरसा सम मुख खोले रहेगा
इसलिए,
आनंद ढूंढ़ कर पीड़ा में मन मोद मनाए!

किसी के पास उजाला नहीं है,
देना है तो देने के नाम
हर मोड़ पे लोग
केवल विशुद्ध तम ही देते हैं...
ख़ुशी का लबादा ओढ़े लोग
घुट रहे हैं भीतर भीतर,
क्या दे ऐसे अभाव में किसी को?
देते हैं तो केवल गम ही देते हैं!

मन मेरे!
छोड़ ये जग के फेरे
ये सदियों से ऐसा ही है
बदला है, बदलेगा...
आंसू तेरे अपने हैं, नीर बहा ले
और इस दोस्ती पे मान कर-
कभी नहीं पथरायेंगी तेरी आँखें
हर दुःख में ये आंसू तेरे संग बहेगा!

नयन हमारे बरसाती हैं!

धड़कनों का संगीत
सुनाई दे जाए
ऐसी नीरव शांति है यहाँ
कुछ शब्द हैं, हैं कुछ विचार
जन्म ले रही हर पल
मन में क्रांति है यहाँ

मेरा मन युद्धक्षेत्र बना हुआ है
लड़ रही हैं
दो परस्पर विरोधी शक्तियां
भरने में लगे हुए हैं उन्हें, जो
जीवन हर क्षण
दे जाता है रिक्तियां

अपने आप से लड़ते हुए
कवितायेँ
लिखी जाती हैं...
क्या करें हम?
बड़ी विडम्बना है
नयन हमारे बरसाती हैं!

जहां बैठ धूप में
सुखा लेते अपने आंसू
वो आँगन ही नहीं है
जहां नाच उठती
संग संग कुछ प्राकृत बूंदें
वो प्रांगन ही नहीं है

अब तो बस एक ओट है
जहां से झाँक कर
सूरज रौशनी दे जाता है
जो रिश्ते कभी प्रकट नहीं होते
उन रिश्तों का आकाश
सदा मुस्काता है

कविता
एक सामानांतर रेखा की तरह
चलती है संग
उसकी सदाशयता
हर बार
करती है दंग

मेरे गगन पर
खिलने वाले इन्द्रधनुष को
यह कविताओं का रंग बड़ा भाता है
स्वयं सतरंगी है वह
पर बड़ी मासूमियत से
इनपे रिझा जाता है

शायद ये इन्द्रधनुष की ही चाहत है
जो हमसे
कविता लिखवाती है...
क्या करें हम?
बड़ी विडम्बना है
नयन हमारे बरसाती हैं!

बस एक स्मरण!

शायद भूल गयी है
बात वो सारी...
जो चलना सीखते वक़्त
हम सबने सीखा था,
गिरते थे
फिर उठ कर
चलने का
हम सबमें सलीका था!

उस भोले-भाले उम्र में
न समझ थी,
न फ़लसफ़ों का ज्ञान था...
बस भोलापन था,
और शायद वही
सभी रटंत उक्तियों से महान था!

तभी तो,
बालपन में...
किसी के साथ नहीं घटित होता है
हतोत्साहित होना,
चलना नहीं आता है
सीखते हुए गिरते हैं
पर फिर पल में बिसर जाता है
छिले हुए घुटने के लिए रोना-धोना!

उठ कर नन्हें पग से
फिर ऊँगली थाम लेते हैं
कैसे नहीं होंगे पारंगत
बच्चे ये संकल्प ठान लेते हैं

फिर
यूँ ही गुज़रते हुए
समयचक्र
वो मासूमियत लील जाता है!
पढ़ता हुआ... बढ़ता हुआ
चलता हुआ... दौड़ता हुआ
एक रोज़ हारता है मन,
और भीतर से हिल जाता है!

निराशा के भंवर में फिर
राहें खो जाती हैं...
ज़िन्दगी फिर अचानक
सारे रंग त्याग स्याह हो जाती है...

तब बस एक स्मरण
उबारने को होता है हितकर
जानते हैं आप सभी... पर तब भी
हमसे फिर सुन लो, मित्रवर

एक भूली हुई बात बस
दुहरानी है कविता में
लिख जा रही है आज फिर
पर बात वही पुरानी है कविता में

आज भी सुख-दुःख की
ऊँगली थामे ही चलना है
गिरना है और
गिर कर पुनः संभालना है

सारा ज्ञान किनारे कर
बस चलना सीख रहे
एक बालक से
प्रेरणा लेनी है...
जीवन सतत संघर्ष है
जिंदगानी तो
संघर्ष, प्रण और हौसलों की ही
एक त्रिवेणी है!

अंतराल!

जब शांत होती है वादियाँ
और मन बेचैन होता है
इच्छा होती है
किसी पुराने दोस्त से बात हो जाए

किसी पुराने दोस्त से बात होना
बात होना भर नहीं होता
बात करने से ज़्यादा
वह होता है
उन लम्हों को जीना-
जब सपनों से
ऊँची थी उड़ानें...
पल दर पल बाहों में होते थे
कितने ही तराने...
जब मोड़ से रस्तों के जुदा हो जाने की बात,
बेगानी थी!
आसपास जितने चेहरे थे,
सबसे पहचान पुरानी थी!

इच्छा होती है,
एक फ़ोन की दूरी पर जो बिंदु है
उससे सारी दूरियां क्षण में पाट ली जाए
इस अंतराल में जो कुछ घटा बीता है
सारी पीर बाँट ली जाए

पर इतना सहज
कहाँ होता है?
दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना!

लोग समय के साथ बदल जाते हैं...!

कुछ एक ऐसे विम्बों को याद करते हुए जो वक़्त के साथ बदल गए कुछ इस तरह कि विश्वास की जड़ें हिल गयी... आहत मन से लिखी एक पुरानी कविता स्वयं को ही सांत्वना देने के लिए सहेज लेते हैं यहाँ...!

लोग समय के साथ बदल जाते हैं
इतना, कि-
ये यकीन कर पाना भी
नामुमकिन सा लगता है
कि एक समय रहा होगा
जब खूब बनी होगी,
किसी मोड़ पर तब
उलझन नहीं रही होगी!
कितनी कविताओं में
प्रेरणा बन मुस्कुराया होगा,
ये बदली सी वही बहार है
जिसने इतना रुलाया होगा!

यकीन हो न हो
पर ऐसा ही अक्सर होता है
जीवन तो हर रूप में
कोई न कोई धोखा है
और धोखा भी ऐसा कि-
आप झटक नहीं सकते
एक पराये निर्जीव वस्तु की तरह
पटक नहीं सकते
क्यूंकि अपने पतन की ओर
बढ़ने से पहले
वह आपके भीतर पैठ चुका होता है
जितना उसका दोष
उतना ही दोष आपके चयन का होता है

लेकिन,
इसका यह अर्थ नहीं
कि बाहें सिमट जायेंगी
आज भी बाहें फैलाये उमंगें खड़ी हैं
जिन्हें आना है आओ,
एक बार छलने का अवसर तुम्हारे पास सुरक्षित है
क्या होगा,
अधिक से अधिक
एक बार और विश्वास की सिरायें हिल जायेंगी...?

पर, फिर भी निश्चिंत रहो
समेट लेंगे हम अपने टूटे विश्वास को,
सिद्धांत वही रहेगा
सबका स्वागत है...
इस आँगन में सब आ सकते हैं
यहाँ का समीर सबके लिए एक सा बहेगा!

बस कुछ एक
नाज़ुक सी बातों का
एहसास रहे...
जिनका मान हमें है,
ऐसे कुछ यादों के सूखे पत्ते
तेरे भी पास रहे!!!

शब्दों के झुरमुट में...!

कुछ समय पहले लिखी गयी एक कविता आज यहाँ भी सहेज ली जाए...
तीन वर्ष हो गए उनके लिए कुछ कुछ यूँ ही कभी कभी लिखते हुए... अब शब्द पिरोने वाला उपहार भी दे तो क्या... शब्द ही न..:) और मज़े की बात है कि हठ करके वापस हम उनसे भी कुछ न कुछ लिखवा लेते हैं... मितभाषी अपने नाम के अनुरूप ही सुशील स्वाभाव वाले मेरे स्वामी क्या करें... हमको झेलने के सिवा!

वैसे तो
आभार व्यक्त करने जैसा कुछ
है नहीं हमारे बीच,
रिश्ता ही इतना प्रगाढ़ है
कि ऐसी किसी भी
औपचारिकता के लिए कोई जगह नहीं...

लेकिन
फिर भी आज हमें
व्यक्त करना है आभार
कहनी है बातें
इसी बहाने
दो चार

मेरी आधारहीन
बकवासें झेलते हो
मेरे कहने पर कुछ एक शब्दों से
तुम भी खेलते हो
हर एक तूफ़ान को
हँसते हुए झेल जाते हो
कोई भी दाव हो
उसी शालीनता से खेल जाते हो
कहाँ से लाते हो
इतना धीरज?
अँधेरी शाम हो जाते हैं हम
और तुम सदा रहते हो उगता सूरज!

मेरी ज़िन्दगी में
यूँ उगने का
शुक्रिया
हर जन्म में हों
हम अपने प्रिय की
प्रिया

सच कहते हो तुम
बिन बोले ही
मन की भाषा समझी जाती है
शब्दों के झुरमुट में
भावों की प्याली ही
खाली हो जाती है

जो कही न गयी
वह भी समझना
मौन समझते हैं हम भी
पर कभी कभी यूँ ही कहना
कि तुमसे प्यार करता हूँ
तेरी बेवकूफियों को सार कहता हूँ
इतने से ही भर जाएगा मेरा मन
झूम उठेगा मेरा गगन

कभी कभी मेरे लिए
ये बेवकूफ़ियां
तुम भी कर जाना
मौन समझते हैं हम भी
पर कभी
कह कर भी स्नेह जताना

उदारता से
हर बार देते हो
वैसे ही देते रहना क्षमादान
हम दोनों
मिल कर देख लेंगे
जीवन का घमासान!!!

ईश-व्यथा!

दिखता भले नहीं,
पर ईश्वर यहीं कहीं है!
ये दृश्य का दोष नहीं...
अगर हमारे पास दृष्टि ही नहीं है!

एक भोली सी
मुस्कान में वह है...
कभी महसूस हुई थी जिसमें,
उस ध्यान में वह है...

ज़िन्दा है वह
टूटती हुई सांसों में...
जाते वक़्त होती है जो,
उन अनुभूतियों के फांसो में...

छलकता है वह रोज़
किसी के आंसू बन कर...
मंदिर की सीढ़ियों पर बाट जोहता है
दीन दुखी जिज्ञासु बन कर...

उसकी जिज्ञासा यथावत
बनी ही रहती है
वो खड़ा है इधर फिर ये भक्तों की टोलियाँ
किसे पूजती रहती है

हर आत्मा में स्थित है वो
फिर, साक्षात् खड़े देवों को बिसार कर...
ये कहाँ जा रहा है हुजूम?
किसी प्रस्तर प्रतिमा को अपनी श्रद्धा का आधार कर...!

ईश्वर अचरज से देख रहा है...
मूर्ति पर सुशोभित पीताम्बर!
और इधर घूम रही है धरती अपनी समस्यायों के साथ अपनी धुरी पर
क्या करे? अकेला असहाय नीला अम्बर!

विवेकशील बना कर भेजा उसने...
पर हमारी बुद्धि शायद मंद है!
अन्दर देवालयों में पहुँच तो जाते हैं, पर
श्रद्धा विश्वास तो सब बाहर ही कहीं ताले में बंद है!

अब ईश्वर चुपचाप...
वहीँ सीढ़ियों पर बैठा देख रहा है,
अन्दर भीड़ लगी है...
और बाहर वह कंकड़ चुन कर पुनः उन्हें फेंक रहा है!

कोई तो आये...
भक्त और भगवान का मिलन हो!
चकाचौंध से दूर कोटि-कोटि आत्माएं प्रफुल्लित हो जाएँ...
ऐसी पूजा का चलन हो!

ईश्वर आशान्वित है-
तभी तो उसका रूप धर प्रकृति नाच रही है
मानों अपने ही लय में वह झूमती हुई
ईश-व्यथा बांच रही है...!

एक मोड़ आएगा ऐसा...!

कुछ एक रिश्तों के हँसते खिलते फूल
कुछ एक गुनगुनाती मस्तियां
तूफ़ानों में अडिग रहीं
उजड़ी भी तो फिर बस गयीं बस्तियां

गिरने के बाद उठ जाने का,
रोज़ दस्तूर निभाते जाते हैं
आँधियों में भी, हैं कुछ हौसले ऐसे
जो दीप जलाये जाते हैं

झुलसाने लगी जब धूप की गोद
आ गयीं तब बरसातें
सुबह की किरणें गायें फिर-
गुज़रनी थीं, गुज़र गयी रातें

बस एक के बाद एक क़दम
आश्वस्त हो बढ़ते रहें
मिल जायेंगी राहें
बस दुर्गम सीढ़ियाँ चढ़ते रहें

एक मोड़ आएगा ऐसा
जब ज़िन्दगी अलविदा कहेगी
पर उसके पहले कटिबद्ध है वह
क्षण दर क्षण साथ रहेगी

जब तक संग है जीवन
उत्सवधर्मी मन करता रहे मस्तियां
सत्कर्म से दीप्त हो आत्मा
जीवन के बाद भी जीती हैं कुछ हस्तियां

कुछ है जो बीत गया!

मौसम आने जाने हैं
कभी ग्रीष्म ऋतु आई
तो कभी शीत गया

कुछ पाकर कुछ खोकर
चिंतामग्न तो कभी चिंतनमग्न हो
गाता है मन कोई गीत नया

सच? क्या जीवन जीत गया
आज कुछ उदास है मन
कुछ है जो बीत गया

खिली खिली है कली
मगर उदास हैं पंखुड़ियाँ
बह रहीं हैं उन्मुक्त गगन में
मगर चुप सी हैं स्वर लहरियां
मुस्कुरा रही है चांदनी
पर गुम सी हैं पैंजनिया
दौड़ रही है विचारों की आंधी
पर जमी हुई हैं धमनियां

पात्र से जल रीत गया
बीतते पल के साथ
कुछ है जो बीत गया

हासिल है क्षण इतने सारे
गा सकता है मन
खिले हैं फूल उपवन उपवन
निर्जन ही पर वन
बँट कर हो गया सबका
फिर भी ढूंढ़े अपनापन
कैसी विडम्बना है, अपना होकर भी
अपना नहीं है जीवन

खिलते ही, फूलों का टूटना
सुनिश्चित हो जाता है
डाली से जुदा खुशबू का संगीत नया

मरूभूमि से मरघट तक
सन्नाटा ही सफ़र में है
आवाज़ों का दौर कबका है रीत गया

क्या? फिर काल जीत गया
उदास सी है शाम
कुछ है जो बीत गया

कविता तो बस ठहर गयी वहाँ!

कभी कभी मन में आता है
ये सब व्यर्थ है...
लिखना... पढ़ना
शब्दों के जाल जंजाल

जाने इस नश्वर जगत में
क्या पाने को
उद्धत हैं हम
किये जा रहे हैं कदम ताल

लिख कर क्या होना है
भाव सिसकता पड़ा रहेगा
और लोग पूछते रहेंगे
शब्दों द्वारा मात्र शब्द का ही हाल

फिर क्या वजह है?
क्यूँ न चाहते हुए भी,
लिखी जाती है कविता
है उलझा उलझा सा सवाल...

यूँ ही जूझते हुए
कुछ अवतरित सा हुआ
कहीं एक सूर्य
उदित सा हुआ :

कविता
तब लिखी जाती है,
जब उनकी अनिवार्यता को
कलम नकार नहीं पाती है...

न अपने लिए न औरों के लिए
लिखी जाती है वह जब उसके बिना-
एक सांस के बाद दूसरी सांस
सिलसिलेवार नहीं आती है...

उसका होना एक सांस से...
दूसरे सांस तक की यात्रा है
वह शव को शिव बनाने वाली
इकार की मात्रा है...

अपना मार्ग तय करना
उसे आता है,
निमित्त मात्र है लेखनी, लिखने वाले से बस उसका
माध्यम भर का नाता है!

उसका होना, उसका मार्ग, उसके पाठक
सब पूर्वनिर्धारित हैं
जीवन का दुःख से, दुःख का कविता से रिश्ता गहरा है
ये सत्य बड़े प्रचारित हैं

पर वास्तव में ये कौन जानता है
सुख दुःख की विभाजन रेखा है कहाँ!
जहाँ भाव मिले सरस सुकोमल सच्चे
कविता तो बस ठहर गयी वहाँ!!

चलते हैं कदम उधर ही, जिधर से जुड़े हृदय के तार हैं!

बाहें फैलाये
खड़ी है हरियाली
रास्ते हज़ार हैं!
चलते हैं कदम उधर ही
जिधर से जुड़े
हृदय के तार हैं!!

कई बार
अपना ही मन
हम पढ़ नहीं पाते है
कोई दिव्य शक्ति चुन लेती है
तब हमारे लिए राह
जिसे हम अक्सर पहचान नहीं पाते हैं

दुर्गम सुगम
प्रांतरों से गुज़रते हुए
ये विश्वास ज़रूरी है-
'जो होता है अच्छे के लिए ही होता है'
माने मन यह बात,
फिर हर हाल में सृजन की सम्भावना पूरी है

हंसी ख़ुशी
गुज़रे दिवा रात्रि
बहती जाती जीवनधार है!
चलते हैं कदम उधर ही
जिधर से जुड़े
हृदय के तार हैं!!

हमारा कोई स्वार्थ न हो
फिर भी सहृदयता को
बेवजह संदेह से देखा जाए...
ऐसा होता आया है यहाँ
तन कर चलता है अन्धकार,
बैठा प्रकाश नज़र झुकाए

पर ये सब
क्षणिक भ्रम सा है
इनसे आस्थाएं न प्रभावित हों
हौसलों की मीठी धूप से चमकें रेतीले कण
उनमें कई नन्हे नन्हे सूरज
तत्क्षण समाहित हों

ऐसे ही प्रकाशवृत्त में
पल रहे
जीवन के कई संस्कार हैं!
चलते हैं कदम उधर ही
जिधर से जुड़े
हृदय के तार हैं!!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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