एक टुकड़ा आसमान का
और गोद भर धरती-
जिसपर सर टिकाये
टकटकी लगाये...
देखते रहें दृश्य विहंगम
नीले अम्बर और खारे सागर का संगम
ऐसा अवकाश... ऐसी घड़ियाँ हर बार चाहिए
आँखों को नहीं दूसरा संसार चाहिए
ये दृष्टि...
ये मिलन...
दूरी के बावजूद
मिल रहे बिन अड़चन...
इस सुन्दर संयोग का
जगत में विस्तार चाहिए
आँखों को नहीं दूसरा संसार चाहिए
जो जीने के लिए ज़रूरी हैं...
उन भ्रमों का
बने रहना ही श्रेयस्कर है,
विश्वास रहे, बीज उगेंगे अपने समय पर
उन्हें बस थोड़ी सी जगह
औ' थोड़ा सा प्यार चाहिए
आँखों को नहीं दूसरा संसार चाहिए
सारी बातें
बड़ी भली हैं...
पर, जो जीवन को अर्थ दे
वो दुर्लभ सार चाहिए
आँखों को नहीं दूसरा संसार चाहिए!
आँखों को नहीं दूसरा संसार चाहिए!
उनके पास गीत है...!
उनके पास गीत है
वे गाते हैं...,
पंछी
सारा आकाश
नाप आते हैं
हमारे पास
मुट्ठी भर दाने हैं,
वही...
बस वही हम
लुटाते हैं
इससे पहले कि
ख़ाली हथेलियाँ हमारी शर्मिंदा हों,
चुग कर कुछ मोती...
झट से
वे उड़ जाते हैं
उनके पास गीत है
वे गाते हैं....
समझो छाँव की भाषा!
समझ में आती हो तो समझो छाँव की भाषा
मिलेगी वहीँ कहीं सुस्ताती धूप की परिभाषा
जो बिना हार माने चलते ही जाते हैं राहों में
उनके नयनों में है चमकती जीवन की आशा
जी सको तो जी लो दुःख के सकल आयाम
वहीँ कहीं मिलेगा तुम्हें सुख का भी सामान
सब कुछ यहीं धरा है, क्या स्वर्ग क्या नरक
धरती पर ही हैं स्थित ये दोनों कल्पित धाम
लिखना जो वश में हो तो लिख जाओ शाम
हो एक प्यार भरा ख़त ज़िन्दगी के भी नाम
जितने भी शब्द थे, वो सब तो खर्च कर डाले
ग़र पहुँच सके तो पहुँचे अब मौन ही पैगाम
हो पाए तो लिपिबद्ध करो नगमें और तराने
दिए की तरह निकल पड़ो अंधकार को हराने
जो हार गए हैं जीवन से, बताओ स्पष्ट उन्हें
हर हालात में जीते जाने के हैं सहस्त्रों बहाने
पढ़ना हो तो किताबों संग चेहरे भी पढ़ा करो
अपने आसपास से ज़रा तो सहर्ष जुड़ा करो
मिलेगी कितनी ही निगाहें, तुम्हें तकती हुईं
दे सको सहारा तो भागते हुए थोड़ा मुड़ा करो
मन के भंवर में है उठती कितनी ही जिज्ञासा
इस दुनिया के सब रंग कहाँ समझ ही आते हैं
समझ में आती हो तो समझो छाँव की भाषा
मिलेगी वहीँ कहीं सुस्ताती धूप की परिभाषा
आशान्वित है धरा!
जो हुआ अवतरित
हरापन...
कब क्यूँ कैसे?
घोषित हो गया मरा!
धुरी पे घूमते हुए
विचारमग्न,
कुछ कुछ चिंतित
हो उठी धरा!
हम पर ही
आस लगाये हुए है,
कातर नयनों से
एकटक ताक रही है...
वो सहनशील धरणी
माँ है हमारी
हमारे मन के भीतर
झाँक रही है...
क्षीण संकल्पों के दौर में भी
नहीं उदासीन वह,
हरापन भले नहीं आँचल में
पर घाव तो है न हरा!
मरहम भी बन कर आएगा
कोई पूण्य संकल्प...
शत-प्रतिशत
आशान्वित है धरा!
कुछ भला लगे, तो...!
कुछ शब्द बिखरने थे...
बिखर गए,
बस इस बिखराव में
अर्थ जोड़ कर पढ़ लेना...
कुछ भला लगे, तो...
स्मृतियों में मढ़ लेना!
लिखते हैं आस-विश्वाश ही
कई सन्दर्भों से जोड़ कर,
क्या कहा...?
दोहराव है...,
हो भी क्यूँ न!
हर अभिव्यक्ति में तुम
अपने अंश पकड़ लेना...
कुछ भला लगे, तो...
स्मृतियों में मढ़ लेना!
अनुभूति का नन्हा सा
आकाश है,
मेरे आसपास
लगभग नज़रंदाज़ किये जाने भर
प्रकाश है...,
इनमें कुछ अपने गुने
सारतत्व जड़ देना...
कुछ भला लगे, तो...
स्मृतियों में मढ़ लेना!
कुछ घड़ी ठहरना था...
मेरे दर पर ठहर गए,
बस अगले पड़ाव पर इन भावों संग
कुछ एक चढ़ाईयां तुम भी चढ़ लेना...
कुछ भला लगे, तो...
स्मृतियों में मढ़ लेना!
यूँ ही लहरों का आना-जाना थाहते हैं...!
उड़ते-उड़ते
भला सा झोंका कोई,
मन में
भीतर पैठ गया,
भावों का समंदर
लहराया...
फिर, जाने क्यूँ?
किनारे बैठ गया...
वहाँ से
चलते हैं रेत पर
कुछ-एक
कदम,
शब्दों के
माध्यम से...
अभिव्यक्त करते हुए
निज मन,
और...
और, यूँ ही
लहरों का आना-जाना
थाहते हैं...
ज़िन्दगी!
तू क्या जाने,
हम तुझे कितना चाहते हैं!
कविता हूँ... यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती!
मन की गांठे खोल कर
थोड़ा सा झुकना होगा,
अक्षरों को सहेज कर
उठाने के लिए...
समय की आंच में
थोड़ा सा पकना होगा,
बहना होगा निर्विकार
नदिया कहलाने के लिए...
फिर मिलूंगी मैं तुम्हें
अक्षर अक्षर में मुस्काती
कविता हूँ...
यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती!
उबड़-खाबड़ अनजान
रास्तों पर चलना होगा,
उठाने होंगे ठोस कदम
आगे राह बनाने के लिए...
अमिट अनाम सा दर्द
सहजता से सहना होगा,
उठाने होंगे गम सभी
खुशियों का गाँव बसाने के लिए...
फिर मिलूंगी मैं तुम्हें
अक्षर अक्षर में मुस्काती
कविता हूँ...
यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती!
भूली बिसरी यादों की गलियों को
छू कर गुजरना होगा,
मृत्युतुल्य कष्ट उठाने होंगे
साथ जीवन का पाने के लिए...
कोटि-कोटि नयनों के आंसू चुनते
कभी नहीं थकना होगा,
कुछ सच्चे सुन्दर ख़्वाब सजाने होंगे
और जुट जाना होगा उन्हें बचाने के लिए...
फिर मिलूंगी मैं तुम्हें
अक्षर अक्षर में मुस्काती
कविता हूँ...
यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती!
क्षितिज के पार!
हम करते हैं मानवीयकरण प्रकृति का
और कहलवाते हैं
किसी पंछी या फिर कल-कल बहती नदिया से
अपनी वेदना...
अपनी संवेदना
क्या कभी सोचा है हमने?
हमारे मन की वाणी बन कर
क्या सोचता होगा उनका मन
हमारी कथा बांच कर कैसा लगता होगा उन्हें...
क्या होता होगा कोई स्पंदन
जब धरती और अम्बर के क्षितिज पर मिलने के भ्रम को
अपनी अपनी तरह से व्याख्यायित करते हैं हम
तो क्या नहीं मुस्कुराते होंगे धरा और गगन
कि, देखो तो-
कितना सयाना है... हमारे बहाने अपनी बात कहता है
कवि कहाँ-कहाँ क्या-क्या टटोलता रहता है!
क्या पता तब हाथों में हाथ डाले
उसी क्षितिज पर धरती अम्बर टहलते हों
बांटते हो अपने-अपने किस्से और फिर
अपनी-अपनी राह निकलते हों
कौन जाने...
चाँद तारों से पटा अम्बर
हममें तारों की टिमटिमाहट और तेज ढूंढ़ता हो...
और जब देख लेता हो
हमारे आपके रूप में टंके अनगिन ध्रुवतारे धरती पर
तो भावविभोर हो हर्षातिरेक में आँखें अपनी मूंदता हो...
क्या पता
धरती अम्बर फिर आपस में बतियाते हों
अपने आँचल में टंके ध्रुवतारों से गर्वान्वित हो
धरती के सारे घाव बिसर जाते हों
हो न हो... होता होगा कुछ ऐसा ही
तभी तो प्रलय नहीं हुआ
और अब तक हम ज़िन्दा हैं!
भले ही
हंस लेने के बहाने
अब चुनिन्दा हैं!
अब भी देखो,
धरती गगन के बहाने अपना ही मन गा रही है
हममें आपमें सांस ले रही महान संभावनाओं के प्रति
लेखनी श्रद्धानत हुई जा रही है
और इस दृश्य में शामिल नेपथ्य में खड़ी कविता
बस मंद मंद मुस्कुरा रही है!
टेढ़े-मेढ़े रास्ते ओर एक सीधा सा सच!
रास्ते टेढ़े-मेढ़े हैं जैसे
ठीक वैसे ही टेढ़ी हैं टहनियां
टेढ़े-मेढ़े हैं ज़िन्दगी के हाव-भाव
टेढ़ा ही तो होता है अधिकतर
आसमान पर टंकने वाला चाँद
सीधी सरल नहीं है ऊँचाई की ओर जाती सीढ़ियाँ
सहज नहीं है ज़मीन पर चलना
टेढ़ा-मेढ़ा है नदियों का बहना
और ज्यादातर पानी से झांकते अपने प्रतिविम्ब में भी
टेढ़ा ही मुस्कुराता है चाँद
टेढ़ेपन की इस होड़ में
क्यूँ पीछे रहता इंसान?
सहजता को खूंटियों पे टांग
उसने भी थाम ली
टेढ़ेपन की कमान!!!
अब कविता पुकारती फिरती है
लिए हथेली पर जान...
क्यूँ दौड़ में पीछे रह गयी सहजता...,
क्यूँ मिला उसे
पागलपन का नाम???
टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता हो भले ही
पर कम से कम हो एक सीधे से सच का भान-
सहज ही तो मिला था जीवन...,
तो क्यूँ न आजीवन सहेजा जाए
सहजता का वरदान!!!
उदास नहीं हूँ मैं...!
उदास नहीं हूँ मैं
लेकिन, फिर भी...
आसपास है बिखरा हुआ
सूनापन
सामान्य सी भाषा में
शायद कहते हैं इसे ही-
जाना पहचाना सा...
बेगानापन
भूल गयी कोई याद का
धीरे से दस्तक देना और फिर-
लिए हुए फिरना
रिक्त बेचैन मन
टूटे-बिखरे शब्दों को
कविता कहने की भूल करना और
यूँ ही भूले से कह देना उसे
निर्मम जीवन
ये कैसे हो जाता है?
बांधना चाहते हैं कुछ और,
हो आती है कोई और ही बात
स्मरण
यहाँ वहाँ आड़ी-तिरछी
खींची लकीरें कितनी सारी,
कोई नहीं बदल पाया
रास्ते का समीकरण
रास्तों को पता है, किस मोड़ पर चौराहे हैं
कहाँ से दो राह जाती है, और
कहाँ से जुदा हो जाता है
शरीर से अंतर्मन
उदास नहीं हूँ मैं
लेकिन, फिर भी...
आसपास है बिखरा हुआ
सूनापन
जाने कहाँ रो रही है प्रकृति बूंदों में आंसू
जाने कौन से देश खिल रही है वो वेदना बनकर
जाने कहाँ से आ रहा है
यह कातर क्रंदन!
इस क्रंदन के बीच, कुछ तरल से भाव
मद्धम मद्धम ही सही, पर बह रहे हैं...
अभी-अभी कानों में कह गया
गुनगुनाता पवन
हम सबके हृदय की पीर बह कर
पखारने को पाँव उद्यत खड़ी है राहों में
अब तो हो संवेदनाओं का
पूण्य आगमन
फिर, खिल उठेगा ये कुञ्ज सारा
चहकेंगे खग वृन्द
और गूँज उठेगा
सूनापन
परिचय की कोंपले फूटेंगी
नहीं रहेगा किसी डाल पर
वो जाना पहचाना सा...
बेगानापन...!
करती रहती है...
कर रही है आश्वस्त कविता, पर
अपनी जीत के प्रति आश्वस्त होगा कभी
क्या उसका भी उद्यम?
कुछ कारण होगा...!
कुछ भी अकारण नहीं होता...
कोई सूक्ष्म सी डोर हाथ आने वाली होती है
कुछ अप्रत्याशित सा घटित होने वाला होता है
कोई पृष्ठभूमि तैयार हो रही होती है
इस बेकल मन के आँगन में...
अब यूँ ही तो अकस्मात बादलों का बरसना नहीं होता
कुछ भी अकारण नहीं होता...!
बीज रूप में वह धरती की गोद में है सोता...
संभावनाओं की धूप में छाँव का प्रस्फुटन
प्रलयी माहौल में सहज जीवन का अंकुरण
झुक जाते हों जहां स्वतः ही प्रार्थना में नयन
दिव्य से प्रांगन में...
उग आती है मखमली घास भले इन्हें कोई नहीं बोता
कुछ भी अकारण नहीं होता...!
कुछ भी अकारण नहीं होता...
न दुःख का आना न सुख का जाना
न फूलों का खिलना और न ही उनका मुरझाना
मिलना भी सकारण है और वैसे ही है बिछड़ना
इस विराट विश्व के आँगन में...
अब यूँ ही तो कोई पल दर पल हर पल को नहीं खोता
कुछ भी अकारण नहीं होता...!
