अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जड़ों में ही तो... प्राण बसा है !

मैंने अविरल अश्रुलड़ियों को
शब्द श्रृंखला सा रचा है!
मेरे भीतर कई छंदों का
सुन्दर संसार बसा है!
इस एहसास के साथ मैं
हर शब्द बुनती हूँ, कि
मिटा न पाए उसकी क्रूरता
भले निर्मम समय हर रचना पर हँसा है!

क्या लिख लेंगे नया हम
बड़ी विचित्र सी दशा है!
जीवन कमल कीचड़ के बीच
खिला और सदा से वहीँ फँसा है!
इस व्यूहचक्र से आगे ही
सुन्दरता परिभाषित होती है
धरती पर हैं जीनेवाले, पर
आसमानी ख्वाब ही क्यूँ यूँ नैनों को जँचा है!

अपनी मिट्टी की खुशबू से
भाव भाषा का अंतस्तल रचा है!
ऊपर की ओर बढती लता है
पर जड़ों में ही तो... प्राण बसा है!
इस भावसुधा को अपनाकर
चलते रहिये राहों पर,
मिल जाएगी सुनहरी मंजिल भी-
आखिर जीवन अपने आप में प्रेरक एक नशा है!


आँच (आँच-37 चक्रव्यूह से आगे) की समीक्षा में सुझाये गए परिवर्तनों के बाद सचमुच समृद्ध हुई है कविता!
कविता पर इस स्नेह वर्षा हेतु आचार्य परशुराम राय जी के प्रति आभार सहित पुनः पोस्ट कर रहे हैं यहाँ...


अविरल अश्रुलड़ियों को
शब्द श्रृंखला सा रचा है!
मेरे भीतर छंदों का
सुन्दर संसार बसा है!
इस एहसास के साथ
हर शब्द बुनती हूँ-
मिटा न पाए क्रूरता
भले निर्मम जगत हर रचना पर हँसा है!

नया लिख लेंगे क्या हम
बड़ी विचित्र सी दशा है!
जीवन कमल कीचड़ के बीच
खिला और सदा से वहीँ फँसा है!
इस व्यूहचक्र से आगे ही
सुन्दरता परिभाषित होती है
धरती पर हैं जीनेवाले, पर
आसमानी ख्वाब ही क्यूँ नैनों को जँचा है!

अपनी मिट्टी की खुशबू से
भाव भाषा का अन्तस रचा है!
ऊपर की ओर बढ़ती लता
पर जड़ों में ही तो... प्राण बसा है!
इस भावसुधा को अपनाकर
चलते रहिये राहों पर,
मिल जाएगी मंजिल भी-
आखिर जीवन स्वयं में प्रेरक एक नशा है!

13 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर 19 सितंबर 2010 को 9:14 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

संजय भास्कर 19 सितंबर 2010 को 9:15 am  

मुझे आपका ब्लॉग बहुत बढ़िया लगा! बहुत ही सुन्दर और शानदार रचना है जो काबिले तारीफ़ है!
मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है !

संगीता स्वरुप ( गीत ) 19 सितंबर 2010 को 9:24 am  

आखिर जीवन अपने आप में प्रेरक एक नशा है !

बिलकुल सच ....बहुत अच्छी प्रस्तुति ..सुन्दर रचना

वीना 19 सितंबर 2010 को 10:13 am  

सही में जीवन कीचड़ कंवल के बीच ही खिला है
बहुत सुंदर रचना

C. P. Sharma 19 सितंबर 2010 को 10:49 am  

अनुपमा जी, आपकी लेखनी में जादू भरा है जो सब का मन मोह लेती है. आप के सुर में मै भी अपना सुर मिला देता हूँ,

जड़ से ही तो होता है
जीवन श्रेष्ठ प्रवाह,
जड़ सींचो तो होता है
हरियावल सहलाव.
भाव प्रचुर हों तो होता है
सुन्दर काव्य प्रहाव,
शब्द स्वतः उमड़ पड़ते है
लय संगीत बहाव.
जड़ सींचो जड़ में ही तो है
काव्य भाष के प्राण,
बिन जड़ सींचे नहीं उबरे
काव्य भाष की शान.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) 20 सितंबर 2010 को 12:16 am  

जीवन अपने आप में एक प्रेरक नशा है..

एक शेर याद आ गया:-
जी रहा हूँ इस ऎतबार के साथ
ज़िंदगी को मेरी जरूरत है...

वाणी गीत 20 सितंबर 2010 को 5:58 am  

अपनी मिट्टी की खुशबू से
भाव भाषा का अंतस्तल रचा है !
ऊपर की ओर बढती लता है
पर जड़ों में ही तो...... प्राण बसा है !...

लाख आसमान में उड़ें मगर पैर जमीन पर हो ...
अच्छी रचना !

संगीता पुरी 20 सितंबर 2010 को 6:25 am  

बढिया !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) 30 सितंबर 2010 को 8:18 am  

आंच पर सिकने के बाद स्वाद ज्यादा आ रहा है ....शुभकामनायें

vandana 30 सितंबर 2010 को 8:56 am  

Anupama....

छू लिया आज आपने...!

धरती पर हैं जीनेवाले ,पर
आसमानी ख्वाब ही क्यूँ यूँ नैनों को जँचा है !
Amazing!!!!

अनुपम ध्यानी 30 सितंबर 2010 को 9:05 am  

uttam rachna anupama jeee

arun c roy 30 सितंबर 2010 को 10:21 am  

bahut sunder kavita.. sampadan ke poorv bhi upraant bhee.. geet kee parampara ko jiwit rakhen..

rafat 30 मार्च 2012 को 4:38 pm  

भले निर्मम समय हर रचना पर हँसा है!
क्या लिख लेंगे नया हम
बड़ी विचित्र सी दशा है!..BEHTREEN KALAAM KO SALAAM PURI KWITAA KAI BAAR PADHNE LAAYAK

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