स्कूल के अंतिम दिनों में रचित एक कविता ...करीब १० वर्ष बीत गए हैं अब, पर आज भी याद आई तो नयी सी ही लगी!!!
बीत जाती है जब
तब
पता चलता है
जिंदगी क्या चीज़ है!
टूटने लगती है जब
साँसों की डोर
तब एहसास होता है
वह
कितनी अज़ीज है!
जब घिरे हुए हों अंजानो से
तब पता चलता है
पहचाने चेहरों
के बीच होना क्या चीज़ है!
जगह छूटती है
तब एहसास होता है
अपने आसमान तले
अपनी ज़मीन
कितनी अज़ीज है!
दुःख से भारी हो मन
तब पता चलता है
मुस्कान का
खिल आना क्या चीज़ है!
आँखों में जो बूंदें है
उनका एहसास
हमें तमाम
खिलखिलाहटों से भी
अज़ीज है!
जब वेदनाएं
प्रबल हो उठती हैं
तब पता चलता है
बंदगी क्या चीज़ है!
हाथ जोड़े
घुटनों के ब़ल बैठ
"उसकी" आराधना में लीन-
ये छवि
चेतना को
सबसे अज़ीज है!
जब ये हवाएं
सबकुछ
सुखा ले जाती हैं
तब पता चलता है
पाँव तले
घास की नमी क्या चीज़ है!
जब रोने का मन हो..
तो, रो लेना दोस्तों
हंसने की कोशिश में
रोये जा रहे हैं हम,
ये सोच,
कि अपनी तो है,
पर-
हर मोड़ पे जिंदगी
कितनी जुदा-जुदा
कितनी अजीब है!
बीत जाती है जब
तब
पता चलता है
जिंदगी क्या चीज़ है!
टूटने लगती है जब
साँसों की डोर
तब एहसास होता है
वह
कितनी अज़ीज है!
जिंदगी क्या चीज़ है!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
26 अक्टूबर 2010

14 टिप्पणियाँ:
"बीत जाती है जब
तब
पता चलता है
जिंदगी क्या चीज़ है!
टूटने लगती है जब
साँसों की डोर
तब एहसास होता है
वह कितनी अज़ीज है!"
फिर पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!
इसलिए समय रहते चेतना जरुरी है - सच्चा सन्देश देती बहुत सुंदर रचना
bahut shandar rachana hai ........shubhkamanayen
जब घिरे हुए हों अंजानो से
तब पता चलता है
पहचाने चेहरों
के बीच होना क्या चीज़ है!
ऐसा लग रहा है पढ़ कर कि शायद आप को अपने देश की याद आ रही है;स्वाभाविक भी है.
भावुक कर गयी आपकी ये सुन्दर रचना.
सादर
यश
जब वेदनाएं
प्रबल हो उठती हैं
तब पता चलता है
बंदगी क्या चीज़ है!
हाथ जोड़े
घुटनों के ब़ल बैठ
"उसकी" आराधना में लीन-
ये छवि
चेतना को
सबसे अज़ीज है! ............हा हा ...आप ने भी आज के मनुष्य को अपनी आदतों से रूबरू किया है ....स्वार्थ ये मनुष्य की प्रकर्ति ही पलट गई है ....ये मनुष्य की जिन्दगी भी अजीब है आज क्या ...कल की कोई खबर और मंझिल नहीं है ...फिर भी ....जीना तो है ...अच्छी कविता ..अच्छा प्रयत्न आप का अनु जी!!!!!!!!!!
zindagi kee 'Shaksiyat' aur 'Charitra' ka is kavita se behtar aur Kareebee ehsaas nahi ho sakta...
(I m really sorry to write in English as I cud not upload the Hindi font)
तब भी कहाँ पता चलता है जनाब, हमने तो सभी को बेचैनी से ही रुखसत होते देखा है ...
रचना अच्छी है, लिखते रहिये .....
its absolutely ok to write in english,
regards,
बहुत ही भावपूर्ण ...जीवन के बेहद करीब से गुजरती हुई कविता ........ अनायास ही जुड़ गयी कुछ और पंक्तियाँ .......
दूर होते हो, जब गैरों के शहर में
तब पता चलता है रिश्ते क्या चीज है
छूटते है नाते ,निकलते है आंसूं
समझ तब आता है प्यार क्या चीज है
कभी ढूढ़ना अपने शहर में रहते हुए दीवारे
तब पता चले सरहद क्या चीज है
बुने हुए स्वपनों को मिले जब मंजिले
तब समझना ख्बाब क्या चीज है
होश वालों को खबर क्या जिंदगी क्या चीज़ है? जगजीत जी की गायी यह ग़ज़ल लगता है आप को ज़्यादा ही पसंद आई है अनु| आपने इस एक मिसरे को जुदा-जुदा परतों में, अलग अलग उपमेयों से जोड़कर जो विवेचित किया है वो निस्संदेह प्रशंसनीय है| बाकी तो सब कुछ आपने कह ही दिया है अपनी कविता में|
महाकवि सूरदास ने लिखा है-
"मेरो मन अनत कहाँ सुख पायो।
जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आयो॥"
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किसी की उपस्थिति में सुख और अनुपस्थिति से पीड़ा होना सामान्य बात है। परन्तु पीड़ा का अहसास आनन्द से अधिक सघन होता है। यही तो बिछुड़न है। जहाज का पंछी अनंत आकाश में विचरण करता है परन्तु उसे जो सुख जहाज पर मिलता है वह और कहीं नहीं मिलता है। मन की गति पर आधारित आपकी काव्यानुभूति सहज, प्रेरक, प्रभावकारी तथा सराहनीय है।
"मानवीय सरोकार" पर पधारने हेतु साधुवाद!
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी
अक्सर कई चीजों का महत्त्व उन के गुमने या खो जाने के बाद ही पता चलता है और जिनको खोने की टीस या कसक को बेहद खूबसूरती और गहन संवेदना के साथ उकेरा गया है. आभार.
सादर
डोरोथी.
जिंदगी के महत्व को रेखांकित करती भावनाओं से परिपूर्ण एक सुंदर कविता . दिल को छू लेने वाली मानवीय संवेदनाओं की प्रभावी अभिव्यक्ति. बधाई और शुभकामनाएं .
ज़िंदगी को पारिभाषित करने का एक प्यारा सा दुस्साहस्…सीधे सादे बिंबों के ज़रिये गूढ़ दर्शन की अभिव्यक्ति…थोड़ी निराशा-भरी, पर क्या करें ज़िंदगी है ही ऐसी।
ये तो सच है ... बीत जाने के बाद ही एहसास होता है चीज़ का .... वो ग़ज़ल है न जगजीत जी क़ि .....
मिल जाए तो मिटटी है खो जाए तो सोना है ....
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