अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक धागा भेजा है!

भ्रातृत्व और अपनत्व के भाव से सकल संसार ही अनुप्राणीत है.....: हृदय के उद्गार हर उस रिश्ते के लिए जिसकी प्रेरणा इन शब्दों की आत्मा है :-


भावों से परिपूर्ण.., भाव रूप में ही
एक धागा भेजा है!
जीवन के कई सांझ-सवेरों के अनुगूंज को-
शब्दों में सहेजा है!!

इन्ही शब्द विम्बों में
अपनी राखी...
पा लेना भैया!
हमारी दूरी
पाट ली जाएगी...
चल पड़ी है जो..,भावों की नैया!
अविचल चलते राहों पर
कवच शुभकामनाओं का...
तेरे भीतर विराजते शिव ही तो स्वयं है..,तेरे खेवैया!
सबकुछ शुद्ध अटल है तो
पहुंचेगा ज़रूर तुम तक....
इतना कहते हुए अब तो आँखों से..,बह चली है गंगा मैया!

अब विराम देती हूँ अपनी वाणी को
सहेज लेना जो इस अकिंचन ने भेजा है!
जीवन के कई सांझ-सवेरों के अनुगूंज को-
शब्दों में सहेजा है!!

13 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) 23 अगस्त 2010 को 10:12 pm  

जीवन के कई सांझ-सवेरों का अनुगूंज
शब्दों में सहेजा है!!

बहुत सुंदरता से सहेजा है ...

anupama 23 अगस्त 2010 को 10:13 pm  

dhanyavad sangeeta ji!

Udan Tashtari 24 अगस्त 2010 को 1:50 am  

सुन्दर रचना.


रक्षा- बंधन के इस पावन पर्व पर मेरी तरफ से शुभकामनाएं

anupama 24 अगस्त 2010 को 5:10 am  

aapko bhi dher sari subhkamnayen!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 24 अगस्त 2010 को 6:39 am  

बहुत ही सुन्दर रचना लिखी है आपने!
--
भाई-बहिन के पावन पर्व रक्षा बन्धन की हार्दिक शुभकामनाएँ!

संगीता पुरी 24 अगस्त 2010 को 8:21 am  

एक धागा के बंधन ही तो है .. रक्षाबंधन की बधाई और शुभकामनाएं !!

anupama 24 अगस्त 2010 को 4:48 pm  

dhanyavad shastri ji!
aapko bhi is pawan parv par dher sari subhkamnayen..

anupama 24 अगस्त 2010 को 4:49 pm  

dhanyavad sangeeta puri ji!
raksha bandhan ki hardik subhkamnayen:)

anju 24 अगस्त 2010 को 5:27 pm  

bahut sundar anu ji......har bahen ki bhai ke liye mangi duaeian poori ho

anupama 25 अगस्त 2010 को 6:28 am  

thanks anju ji:)

souvik 20 अगस्त 2013 को 3:17 pm  

Bahut hi sundar tareekey sey rakhi key bandhan ko shabdon key dhaggon sey siya hai

Ashish Anshu 21 अगस्त 2013 को 3:34 am  

aapka ashirvaad hum logon ke sath hamesha bana rahta hai ye hum logon ka soubhagay hai di

Anita 23 अगस्त 2013 को 5:51 am  

अब विराम देती हूँ अपनी वाणी को
सहेज लेना जो इस अकिंचन ने भेजा है!
जीवन के कई सांझ-सवेरों के अनुगूंज को-
शब्दों में सहेजा है!!
हृदय की गहराई से निकले उद्गार !

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