एक सपना आज हो गया चकनाचूर निर्जन... अकेले सभी से दूर
वर्षों से हमारी आखों में बसा वह सपना सच होते होते रूठ गया एक सपना फिर टूट गया
स्वस्थ्य समाज की संरचना का स्वप्न अंधकार पर प्रकाश की जीत का स्वप्न वास्तविकता के कगार पर जाकर लौट गया एक सपना फिर टूट गया
उसी पल... हमने टूटे हुए सुनहरे स्वप्न को समेटा उसे देने को उचित आकार तत्क्षण ही शुरू हो गए हमारे अनवरत प्रयास अब नहीं होगा जीवन मूल्यों में ह्रास फैलेगा एक नूर अब नहीं होगा हमारा सपना चकनाचूर
एक सुगठित समाज की संरचना का स्वप्न ग़र फिर धराशायी होगा.. तब भी हम घुटने नहीं टेकेंगे नया ताना-बाना बुन कर निकल पड़ेंगे एक और नया प्रयास जरूर करेंगे
जब तक है जिजीविषा... तब तक रहेगा जीवन और जब तक है जीवन तबतक जन्म लेती रहेंगी असंख्य संभावनाएं शक्ति का अभ्युदय होगा शांति की होगी स्थापना परिवर्तन होगा, जो मुट्ठी भर ही सही... मगर सच्चे लोगों के प्रयास का फल होगा और स्वप्न से वास्तवीकता तक के सफ़र को- विराम मिल जायेगा!!!
ये जिजीविषा ही तो हमारे टूटते बिखरते सपनों को हमारे मनों में जिलाए रखती है और उन्हें साकार करने हेतु हर संभव प्रयास करने का हौसला और उम्मीद के कंदील हमारे मनों में जला देती है. गहन अर्थों को समेटती एक खूबसूरत और भाव प्रवण रचना. आभार. सादर, डोरोथी.
14 टिप्पणियाँ:
अनु आपकी इस कविता के सम्मान में मेरी दो पंक्तियाँ:-
तुम याद आती हो बहुत,
मिलने कहाँ आएँ तुम्हें
गुम हो गयी हो तुम कहाँ
मेरे जिगर की सादगी
बहुत बहुत बधाई अनु| आपकी कलम सोचने पर विवश करने लगी है|
bahut sundar panktiyan navin ji!
dhanyavad!!!
"जब तक है
जिजीविषा...
तब तक
रहेगा जीवन
और
जब तक
है जीवन
तबतक
जन्म लेती रहेंगी
असंख्य संभावनाएं"
बेहतरीन अभिव्यक्ति!
चतुर्वेदी जी ने बिलकुल ठीक कहा कि आप की कविताएँ सोचने को मजबूर करती हैं.
सादर...
अनुपमा जी, हमेशा की तरह ही बहुत ही सुन्दर रचना...क्या ये आपकी पहले की लिखी हुई रचनायें हैं??
आप इतनी जल्दी जल्दी यह रचनायें कैसे लिख लेती हैं...
new post on my blog...
ek prabhawshali rachna
kash!! स्वप्न से
वास्तवीकता तक के सफ़र को-
विराम मिल जाये........
ek achchhi rachna...:)
सपने की सुन्दर परिभाषा और मन का बढ़िया विश्लेषण!
सचमुच जब तक जिजीविषा है, जब तक जीवन रहेगा।
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सुनामी: प्रलय का दूसरा नाम।
चमत्कार दिखाऍं, एक लाख का इनाम पाऍं।
बस यही जिजीविषा बनी रहनी चाहिए
..अच्छी प्रस्तुति ..
साकारात्मक सोच के साथ लिखी गई रचना।
सुंदर भाव -
प्रबल जिजीविषा -
बहुत अच्छा लगा पढ़कर -
सकारात्मक भाव जगाती है -
बधाई एवं शुभकामनाएं .
एक कवि की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं (मेरी नहीं है )-
"इस तरह हमने है की तय मंजिलें
गिर पड़े गिर कर उठे उठ कर चले ."
बिलकुल यही हौसला है आपकी कविता में
भाव सुन्दर हैं।
आभार।
ये जिजीविषा ही तो हमारे टूटते बिखरते सपनों को हमारे मनों में जिलाए रखती है और उन्हें साकार करने हेतु हर संभव प्रयास करने का हौसला और उम्मीद के कंदील हमारे मनों में जला देती है. गहन अर्थों को समेटती एक खूबसूरत और भाव प्रवण रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.
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