अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कुछ एक लुप्तप्राय सी खुशियाँ ....

नन्ही सी गौरैया
जितने दाने चुगती है
उससे कहीं अधिक
आँगन में
खुशी बिखेर जाती है !
आज जब
ये खुशियाँ
लुप्तप्राय सी हैं ,
तो गौरैया ...
बहुत याद आती है !!
अब शायद
होगा उनका
काव्य-कविताओं में ही
आना-जाना
यह बात अनायास
रुला जाती है !!!
आने वाली पीढ़ी
क्या पायेगी हमसे..?
जरा सोचें-
प्रकृतिस्थ बातें,
कैसे हमसे
हर पल दूर
हुई जाती है ???
हमारे आँगन में
आज
गौरैया
क्यूँ नहीं गाती है ?

9 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार 13 सितंबर 2010 को 11:25 am  

आज जब
ये खुशियाँ
लुप्तप्राय सी हैं ,
तो गौरैया ...
बहुत याद आती है !!

मर्म भेदी पंक्तियां।

हमारे आँगन में
आज
गौरैया
क्यूँ नहीं गाती है ?

बहुत अच्छा सवाल जो ठहर कर विचार करने को मज़बूर करता है।
कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है ।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
शैशव, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की कविता पढिए!

C. P. Sharma 13 सितंबर 2010 को 12:43 pm  

मुझे याद है, बचपन में सुबह
जब घर की छत पे जाते थे
तो मोरों को नाचते हुए देख
आत्म विभोरहो उठते थे
और जब वे उड़ जाते थे
तो मोर पंखों को समेट
कितने खुश होते थे.
विडंबना है आज की
हमारा राष्ट्रीय पक्षी है मोर!!!
हमारे बच्चे हमसे पूछते है ....
कैसे होते हैं मोर? कहाँ मिलते हैं?
तो हम उन्हें तस्वीर दिखा देते हैं,
या अजायब घर ले जाते हैं.
क्या करदिया है हमने!!!!!!!!!!!
कहाँ जा रहे है हम लोग!!!!!!!!!!!!!!!

Poorviya 13 सितंबर 2010 को 1:53 pm  

sunder hai purani yaad taaza kar di

संगीता स्वरुप ( गीत ) 13 सितंबर 2010 को 2:37 pm  

बहुत सुन्दर रचना ...लुप्तप्राय: को याद दिलाने में कामयाब कविता

anupama 13 सितंबर 2010 को 3:37 pm  

dhanyavad manoj ji:)
read the post on the link given... thanks for the favour!

anupama 13 सितंबर 2010 को 3:38 pm  

@c.p.sharma ji
sundar likha hai aapne:)
thanks for blessing my poem with ur expressive lines!

anupama 13 सितंबर 2010 को 3:39 pm  

thanks kaushal ji,sangeeta ji:)

Udan Tashtari 14 सितंबर 2010 को 6:06 am  

गहन रचना!!


हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

anupama 15 सितंबर 2010 को 7:48 am  

धन्यवाद!

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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